Veer Mishra Pandit
Veer Mishra (Raghav Mishra)
प्रभु श्रीराम स्तुति भावार्थ सहित ,,,,,
रामचंद्र कृपालु भजमन हरणभवभयदारुणं ।
नवकञ्जलोचन कञ्जमुख करकञ्ज पदकञ्जारुणं ॥१॥
व्याख्या: हे मन कृपालु श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर । वे संसार के जन्म-मरण रूपी दारुण भय को दूर करने वाले हैं । उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान हैं । मुख-हाथ और चरण भी लालकमल के सदृश हैं ॥१॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनीलनीरदसुन्दरं ।
पटपीतमानहु तडित रूचिशुचि नौमिजनकसुतावरं ॥२॥
व्याख्या: उनके सौन्दर्य की छ्टा अगणित कामदेवों से बढ़कर है । उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर वर्ण है । पीताम्बर मेघरूप शरीर मानो बिजली के समान चमक रहा है । ऐसे पावनरूप जानकीपति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥
भजदीनबन्धु दिनेश दानवदैत्यवंशनिकन्दनं ।
रघुनन्द आनन्दकन्द कोशलचन्द्र दशरथनन्दनं ॥३॥
व्याख्या: हे मन दीनों के बन्धु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले, आनन्दकन्द कोशल-देशरूपी आकाश में निर्मल चन्द्रमा के समान दशरथनन्दन श्रीराम का भजन कर ॥३॥
शिरमुकुटकुण्डल तिलकचारू उदारुअङ्गविभूषणं ।
आजानुभुज शरचापधर सङ्ग्रामजितखरदूषणं ॥४॥
व्याख्या: जिनके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट, कानों में कुण्डल भाल पर तिलक, और प्रत्येक अंग मे सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं । जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं । जो धनुष-बाण लिये हुए हैं, जिन्होनें संग्राम में खर-दूषण को जीत लिया है ॥४॥
इति वदति तुलसीदास शङकरशेषमुनिमनरञ्जनं । ममहृदयकञ्जनिवासकुरु कामादिखलदलगञजनं ॥५॥
व्याख्या: जो शिव, शेष और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं का नाश करने वाले हैं, तुलसीदास प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे हृदय कमल में सदा निवास करें ॥५॥
मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर सावरो ।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥६॥
व्याख्या: जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से सुन्दर साँवला वर (श्रीरामन्द्रजी) तुमको मिलेगा। वह जो दया का खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है ॥६॥
एही भाँति गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषीं अली । तुलसी भवानी पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥
व्याख्या: इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखियाँ हृदय मे हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं, भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं ॥७॥
जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।
मञ्जुल मङ्गल मूल बाम अङ्ग फरकन लगे ॥८॥
व्याख्या: गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदय में जो हर्ष हुआ वह कहा नही जा सकता। सुन्दर मंगलों के मूल उनके बाँये अंग फड़कने लगे ।।८॥
06/06/2023
🚩🚩🚩🚩Jai shree ram🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
*🚩जय श्री सीताराम जी की* 🚩
*आप सभी श्री सीतारामजीके भक्तों को प्रणाम*
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*श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड प्रतापभानु की कथा*
चौपाई :
*गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ*।
*निज आश्रम तापस लै गयऊ॥*
*आसन दीन्ह अस्त रबि जानी*।
*पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥1॥*
भावार्थ:-
सारी थकावट मिट गई, राजा सुखी हो गया। तब तपस्वी उसे अपने आश्रम में ले गया और सूर्यास्त का समय जानकर उसने (राजा को बैठने के लिए) आसन दिया। फिर वह तपस्वी कोमल वाणी से बोला- ॥1॥
*को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें।*
*सुंदर जुबा जीव परहेलें*॥
*चक्रबर्ति के लच्छन तोरें*।
*देखत दया लागि अति मोरें॥2॥*
भावार्थ:-
तुम कौन हो? सुंदर युवक होकर, जीवन की परवाह न करके वन में अकेले क्यों फिर रहे हो? तुम्हारे चक्रवर्ती राजा के से लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आती है॥2॥
*नाम प्रतापभानु अवनीसा*।
*तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥*
*फिरत अहेरें परेउँ भुलाई*।
*बड़ें भाग देखेउँ पद आई॥3॥*
भावार्थ:-
(राजा ने कहा-) हे मुनीश्वर! सुनिए, प्रतापभानु नाम का एक राजा है, मैं उसका मंत्री हूँ। शिकार के लिए फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्य से यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाए हैं॥3॥
*हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा।*
*जानत हौं कछु भल होनिहारा॥*
*कह मुनि तात भयउ अँधिआरा।*
*जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥4*॥
भावार्थ:-
हमें आपका दर्शन दुर्लभ था, इससे जान पड़ता है कुछ भला होने वाला है। मुनि ने कहा- हे तात! अँधेरा हो गया। तुम्हारा नगर यहाँ से सत्तर योजन पर है॥4॥
दोहा :
*निसा घोर गंभीर बन,*
*पंथ न सुनहु सुजान।*
*बसहु आजु अस जानि तुम्ह,* *जाएहु होत बिहान॥159 (क)॥*
भावार्थ:-
हे सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना॥159 (क)॥
*तुलसी जसि भवतब्यता,*
*तैसी मिलइ सहाइ।*
*आपुनु आवइ ताहि पहिं,*
*ताहि तहाँ लै जाइ॥159(ख)*॥
भावार्थ:-
तुलसीदासजी कहते हैं- जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह आप ही उसके पास आती है या उसको वहाँ ले जाती है॥159 (ख)॥
चौपाई :
*भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा।*
*बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥*
*नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही।*
*चरन बंदि निज भाग्य सराही॥1॥*
भावार्थ:-
हे नाथ! बहुत अच्छा, ऐसा कहकर और उसकी आज्ञा सिर चढ़ाकर, घोड़े को वृक्ष से बाँधकर राजा बैठ गया। राजा ने उसकी बहुत प्रकार से प्रशंसा की और उसके चरणों की वंदना करके अपने भाग्य की सराहना की॥1॥
*पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई।*
*जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥*
*मोहि मुनीस सुत सेवक जानी*।
*नाथ नाम निज कहहु बखानी॥2॥*
भावार्थ:-
फिर सुंदर कोमल वाणी से कहा- हे प्रभो! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम (धाम) विस्तार से बतलाइए॥2॥
*तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना।*
*भूप सुहृद सो कपट सयाना॥*
*बैरी पुनि छत्री पुनि राजा।*
*छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।।*
भावार्थ:-
राजा ने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजा को पहचान गया था। राजा तो शुद्ध हृदय था और वह कपट करने में चतुर था। एक तो वैरी, फिर जाति का क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बल से अपना काम बनाना चाहता था॥3॥
*समुझि राजसुख दुखित अराती।*
*अवाँ अनल इव सुलगइ छाती*॥
*ससरल बचन नृप के सुनि काना।*
*बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥4॥*
भावार्थ:-
वह शत्रु अपने राज्य सुख को समझ करके (स्मरण करके) दुःखी था। उसकी छाती (कुम्हार के) आँवे की आग की तरह (भीतर ही भीतर) सुलग रही थी। राजा के सरल वचन कान से सुनकर, अपने वैर को यादकर वह हृदय में हर्षित हुआ॥4॥
दोहा :
*कपट बोरि बानी मृदल,*
*बोलेउ जुगुति समेत।*
*नाम हमार भिखारि अब,*
*निर्धन रहित निकेत॥160॥*
भावार्थ:-
वह कपट में डुबोकर बड़ी युक्ति के साथ कोमल वाणी बोला- अब हमारा नाम भिखारी है, क्योंकि हम निर्धन और अनिकेत (घर-द्वारहीन) हैं॥160॥
क्रमशः,,,,
*🚩जय श्री सीताराम जी की* 🚩
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