Amit Upadhyay

Amit Upadhyay अमित उपाध्याय
A Music Consultant, Guitar Player, Trainer, Founder / Director

पढ़ना और लिखनापढ़ना केवल शब्दों को समझना नहीं, बल्कि दूसरों के अनुभवों में प्रवेश करना है—उनकी सोच, संवेदनाओं, संघर्षों ...
09/08/2026

पढ़ना और लिखना

पढ़ना केवल शब्दों को समझना नहीं, बल्कि दूसरों के अनुभवों में प्रवेश करना है—उनकी सोच, संवेदनाओं, संघर्षों और जीवन को अपने अनुभवों की सीमाओं से परे जाकर देखना। वहीं लिखना अपने अनुभवों, विचारों और भावनाओं को शब्द देकर दुनिया तक पहुँचाना है।

कभी पढ़ना-लिखना ज्ञान, अनुभव और विचारों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम था। लेकिन समय के साथ शिक्षा और लेखन का अर्थ भी बदलता गया। पढ़ना परीक्षा, नौकरी और सफलता की तैयारी बनता गया और लिखना अंक, प्रमाणपत्र, अवसर और प्रभाव प्राप्त करने का साधन।

धीरे-धीरे ज्ञान का मूल्य भी इस आधार पर आँका जाने लगा कि उससे कितना धन, पद या शक्ति हासिल की जा सकती है। किताबें, शिक्षा और लेखन अब केवल समझने और साझा करने के लिए नहीं, बल्कि आगे बढ़ने और कुछ हासिल करने के साधन के रूप में भी देखे जाने लगे हैं।

Reading and Writing

Reading is not merely understanding words; it is entering into the experiences of others—seeing their thoughts, emotions, struggles, and lives beyond the boundaries of our own experiences. Writing, on the other hand, is giving words to our experiences, thoughts, and feelings and carrying them to the world.

Once, reading and writing were means of carrying knowledge, experiences, and ideas from one generation to another. But over time, the meaning of education and writing has also changed. Reading has increasingly become preparation for examinations, jobs, and success, while writing has become a means of gaining marks, certificates, opportunities, and influence.

Gradually, the value of knowledge too began to be measured by how much wealth, status, or power it could provide. Books, education, and writing are now seen not only as ways of understanding and sharing, but also as means of moving ahead and achieving something.

08/08/2026

मोदी सरकार की “नाकामियाँ” इस प्रकार हैं:

1. बेरोज़गारी और रोजगार की गुणवत्ता।

2. नोटबंदी (2016) — अचानक ₹500 और ₹1,000 के नोट बंद करने से अर्थव्यवस्था और छोटे कारोबार को बड़ा झटका लगा; RBI के अनुसार अधिकांश बंद मुद्रा वापस बैंकिंग प्रणाली में लौट आई।

3. COVID-19 के दौरान अचानक लॉकडाउन — मार्च 2020 का अचानक लॉकडाउन प्रवासी श्रमिकों, छोटे व्यवसायों और अनौपचारिक क्षेत्र पर गंभीर असर रहा।

4. कृषि कानूनों का विवाद — 2020 के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लंबे किसान आंदोलन के बाद सरकार को नवंबर 2021 में कानून वापस लेने पड़े।

5. मणिपुर हिंसा — 2023 से जारी जातीय हिंसा के दौरान केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया और प्रधानमंत्री की राजनीतिक/प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल हैं।

6. महँगाई और घरेलू खर्च — खाद्य पदार्थों, ईंधन और रोज़मर्रा की वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग पर दबाव डाला है।

7. आय और संपत्ति असमानता — भारत की आर्थिक वृद्धि के लाभों के असमान वितरण तथा संपत्ति के बढ़ते संकेंद्रण को लेकर आलोचना हुई है।

8. MSME और अनौपचारिक क्षेत्र पर दबाव — नोटबंदी, GST के शुरुआती कार्यान्वयन और COVID लॉकडाउन ने छोटे कारोबार एवं अनौपचारिक रोजगार को प्रभावित किया है।

9. संसदीय जवाबदेही पर सवाल — महत्वपूर्ण कानूनों को कम चर्चा में पारित करने, विपक्ष के साथ टकराव और संसद में व्यवधान के दौरान विधायी प्रक्रिया को लेकर विवाद हुए हैं।

10. संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर चिंता — न्यायपालिका, चुनावी संस्थाओं, मीडिया और जाँच एजेंसियों की स्वतंत्रता को लेकर विपक्ष तथा कुछ नागरिक-संगठनों ने चिंता व्यक्त की है।

सेलिब्रेशन का दौर।पूरे देश में, देश की लगभग हर संस्था में, न जाने किस बात का सेलिब्रेशन चल रहा है। ऐसा लगता है जैसे उत्स...
08/08/2026

सेलिब्रेशन का दौर।

पूरे देश में, देश की लगभग हर संस्था में, न जाने किस बात का सेलिब्रेशन चल रहा है। ऐसा लगता है जैसे उत्सव अब किसी उपलब्धि का परिणाम नहीं, बल्कि अपने-आप में एक सामाजिक आवश्यकता बन गया है। हर छोटी-बड़ी उपलब्धि को उत्सव में बदल देना शायद हमें यह विश्वास दिलाता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है।

लेकिन इसी उत्सव के समानांतर कुछ दूसरे आंकड़े भी मौजूद हैं। देश की आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी, महँगाई, असमानता, भूख और मानव विकास जैसे सवाल अपनी जगह खड़े हैं। हंगर इंडेक्स हो या जीवन की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े अनेक संकेतक—कई क्षेत्रों में तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं है, जितनी उत्सवों की चमक दिखाई देती है।

सवाल उत्सव मनाने का नहीं है। उत्सव मनाना मनुष्य की स्वाभाविक आवश्यकता है; वह कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद और सामूहिकता पैदा करता है। सवाल तब पैदा होता है, जब उत्सव वास्तविक परिस्थितियों को देखने की हमारी क्षमता पर पर्दा डालने लगे। जब उपलब्धि का प्रदर्शन उस प्रश्न से अधिक महत्वपूर्ण हो जाए कि वास्तव में समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में क्या बदला है।

किसी राष्ट्र की प्रगति केवल उसके उत्सवों, समारोहों और नारों से नहीं मापी जा सकती। प्रगति का एक दूसरा चेहरा भी होता है—भूखे व्यक्ति की थाली, बेरोजगार व्यक्ति का भविष्य, परिवार की क्रय-शक्ति, बच्चे की शिक्षा और नागरिक के जीवन की गरिमा।

शायद इसलिए कभी-कभी उत्सव के बीच ठहरकर यह देखना भी जरूरी है कि हम वास्तव में क्या हासिल कर रहे हैं—और क्या केवल यह विश्वास करने का उत्सव मना रहे हैं कि हम आगे बढ़ रहे हैं।

बॉब डिलन का गाना "The Times They Are a-Changin'" सिर्फ़ एक गाना नहीं है—इसे बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव का एक गीत (एंथम...
06/08/2026

बॉब डिलन का गाना "The Times They Are a-Changin'" सिर्फ़ एक गाना नहीं है—इसे बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव का एक गीत (एंथम) माना जाता है। 1964 में, जब अमेरिका तेज़ी से बदल रहा था, तब लिखा गया यह गाना नागरिक अधिकार आंदोलन (Civil Rights Movement), युवाओं की सक्रियता और बदलती सामाजिक सोच की भावना को दिखाता है।

मुख्य संदेश

इस गाने का मुख्य संदेश है:

«दुनिया बदल रही है, और जो लोग खुद को नहीं बदलेंगे, वे पीछे छूट जाएंगे.»

डिलन अलग-अलग तरह के लोगों को संबोधित करते हैं:

- आम लोग: बदलाव का विरोध न करें—यह होकर रहेगा।
- लेखक और आलोचक: जल्दबाज़ी में कोई राय न बनाएं क्योंकि इतिहास अप्रत्याशित तरीकों से आगे बढ़ रहा है।
- राजनेता और नेता: पुरानी सोच से चिपके रहने के बजाय युवा पीढ़ी की आवाज़ सुनें।
- माता-पिता: अपने बच्चों की सोच को सिर्फ़ इसलिए न ठुकराएं क्योंकि वे आपकी सोच से अलग हैं।

मशहूर पंक्तियों का अर्थ

"Come gather 'round people..." (आइए, लोग इकट्ठा हों...)

यह सभी से यह समझने का आह्वान है कि एक बड़ा बदलाव पहले से ही हो रहा है।

"For the loser now will be later to win." (जो आज हारने वाले हैं, वे बाद में जीतेंगे।)

जो लोग आज कमज़ोर या असफल दिखते हैं, वे कल के नेता बन सकते हैं। सामाजिक रुतबा और सत्ता कभी स्थायी नहीं होते।

"The first one now will later be last." (जो आज सबसे आगे हैं, वे बाद में सबसे पीछे हो जाएंगे।)

जिनके पास आज विशेषाधिकार या सत्ता है, वे हमेशा उस स्थिति में नहीं रहेंगे। इतिहास लगातार सामाजिक व्यवस्था को बदलता रहता है।

क्या यह सिर्फ़ राजनीति के बारे में है?

नहीं। हालाँकि यह 1960 के दशक के राजनीतिक और सामाजिक माहौल से प्रेरित था, लेकिन यह गाना हर तरह के बदलाव की बात करता है—सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी, शैक्षिक और यहाँ तक कि व्यक्तिगत भी। इसका संदेश आज भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल बदलाव और बदलती सामाजिक सोच के दौर में प्रासंगिक है।

दार्शनिक नज़रिया

मूल रूप से, यह गाना एक शाश्वत सत्य को व्यक्त करता है:

- बदलाव जीवन का एक बुनियादी नियम है।
- जो व्यक्ति, संस्थाएँ और समाज समय के साथ नहीं बदलते, वे अंततः अप्रासंगिक हो जाते हैं।

इसीलिए, रिलीज़ होने के दशकों बाद भी "The Times They Are a-Changin'" लोगों के दिलों को छूता है। किसी खास राजनीतिक विचारधारा को बढ़ावा देने के बजाय, यह हमें याद दिलाता है कि इतिहास आगे बढ़ता है और बदलाव के साथ ढलना ज़रूरी है। बॉब डिलन के 'द टाइम्स दे आर ए-चेंजिंग' (The Times They Are a-Changin') लिखने के साठ साल से ज़्यादा गुज़र चुके हैं, फिर भी इसका संदेश आज भी लोगों को प्रभावित करता है। इससे एक दिलचस्प दार्शनिक सवाल उठता है: अगर छह दशक बाद भी लोग यही दोहरा रहे हैं कि "समय बदल रहा है", तो क्या सच में समय बदल रहा है—या हम बस इंसानी व्यवहार के उन्हीं तौर-तरीकों को अलग-अलग रूपों में देख रहे हैं?

अपराध: व्यक्ति का निर्णय या समाज का प्रतिबिंब?किसी भी अपराध की चर्चा होते ही समाज की पहली प्रतिक्रिया प्रायः नैतिक होती ...
02/08/2026

अपराध: व्यक्ति का निर्णय या समाज का प्रतिबिंब?

किसी भी अपराध की चर्चा होते ही समाज की पहली प्रतिक्रिया प्रायः नैतिक होती है—कौन सही है, कौन ग़लत; किसे दंड मिलना चाहिए और किसे नहीं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि कानून और न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य उत्तरदायित्व निर्धारित करना है। किंतु समाजशास्त्र का प्रश्न इससे भिन्न होता है। वह यह नहीं पूछता कि अपराध उचित था या अनुचित; वह यह पूछता है कि ऐसी परिस्थितियाँ कैसे निर्मित हुईं, जिनमें वह अपराध संभव हुआ।

यहीं से व्यक्ति और समाज के संबंध का प्रश्न आरंभ होता है। क्या मनुष्य केवल अपनी स्वतंत्र इच्छा का परिणाम है, या वह अपने सामाजिक परिवेश का भी उत्पाद है? यदि किसी व्यक्ति के विचार, मूल्य, आकांक्षाएँ और व्यवहार उसके परिवार, शिक्षा, आर्थिक स्थिति, सांस्कृतिक वातावरण और सामाजिक संबंधों से निर्मित होते हैं, तो क्या उसके निर्णयों को इन संदर्भों से अलग करके समझा जा सकता है?

व्यक्तित्व कोई स्थिर या जन्मजात इकाई नहीं है। वह निरंतर निर्मित होने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य का प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक संबंध, प्रत्येक असफलता, प्रत्येक अवसर और प्रत्येक संघर्ष उसके भीतर एक नया दृष्टिकोण जोड़ता है। जीवन के उद्देश्य भी इसी प्रक्रिया में जन्म लेते हैं। व्यक्ति जिन लक्ष्यों को अपने जीवन का अर्थ मानता है, वही उसके निर्णयों की दिशा निर्धारित करते हैं। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि "इंसान के जीवन का अनुभव और उद्देश्य उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।"

समाजशास्त्रीय दृष्टि से अपराध को समझने का अर्थ अपराध का औचित्य सिद्ध करना नहीं है। इसका उद्देश्य अपराधी को निर्दोष घोषित करना भी नहीं है। इसका उद्देश्य उन सामाजिक संरचनाओं को पहचानना है, जिनके भीतर व्यक्ति का व्यक्तित्व विकसित होता है। जब किसी समाज में बेरोज़गारी, असमानता, सामाजिक बहिष्कार, हिंसा, भेदभाव या अवसरों की कमी लगातार बनी रहती है, तो वे केवल सामाजिक समस्याएँ नहीं रहतीं; वे मनुष्य के अनुभवों का हिस्सा बन जाती हैं। और अनुभव ही अंततः व्यक्तित्व का आधार बनते हैं।

यहीं समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और दर्शन की सीमाएँ भी स्पष्ट होती हैं। मनोविज्ञान व्यक्ति के भीतर चल रही मानसिक प्रक्रियाओं, भावनाओं और संज्ञानात्मक संरचनाओं का अध्ययन करता है। दर्शन नैतिकता, स्वतंत्र इच्छा, उत्तरदायित्व और न्याय जैसे प्रश्नों की पड़ताल करता है। समाजशास्त्र इन दोनों से भिन्न होकर उन सामाजिक संरचनाओं, संस्थाओं और संबंधों का विश्लेषण करता है, जिनमें व्यक्ति स्वयं को गढ़ता है। इसलिए किसी अपराध का सामाजिक विश्लेषण, मनोवैज्ञानिक या दार्शनिक विश्लेषण का विकल्प नहीं, बल्कि उसका एक अलग आयाम है।

इतिहास भी यह संकेत देता है कि अपराधों की प्रकृति समय और समाज के साथ बदलती रही है। जो व्यवहार किसी युग में सामान्य था, वह दूसरे युग में अपराध घोषित हो गया; और जिसे कभी अपराध माना जाता था, वह बाद में सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर गया। इससे यह प्रश्न उठता है कि अपराध केवल व्यक्ति के निर्णय का परिणाम है, या वह उस समाज की संरचना और मूल्यों का भी दर्पण है जिसमें वह घटित होता है।

यदि व्यक्तित्व अनुभवों और उद्देश्यों से निर्मित होता है, और अनुभव सामाजिक परिस्थितियों से, तो व्यक्ति और समाज के बीच एक गहरा अंतर्संबंध दिखाई देता है। ऐसे में अपराध केवल एक कानूनी घटना नहीं रह जाता; वह सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय अनुभवों के बीच के जटिल संबंधों का भी संकेत बन जाता है।

यहीं से चर्चा का एक व्यापक आयाम खुलता है—क्या अपराध को केवल व्यक्ति के कर्म के रूप में पढ़ना पर्याप्त है, या उसे उस सामाजिक प्रक्रिया के रूप में भी समझना चाहिए जिसने उस व्यक्ति का निर्माण किया? यह प्रश्न किसी एक उत्तर की अपेक्षा नहीं करता; बल्कि मनुष्य, समाज और उत्तरदायित्व के संबंधों पर निरंतर विचार करने का आमंत्रण देता है।

काम करने की ताकत सीधे भोजन से आती है।भोजन ⟶ ग्लूकोज़ ⟶ ATP (C₁₀H₁₆N₅O₁₃P₃)फिर शरीर में यह अभिक्रिया होती है:ATP + H₂O → ...
02/08/2026

काम करने की ताकत सीधे भोजन से आती है।

भोजन ⟶ ग्लूकोज़ ⟶ ATP (C₁₀H₁₆N₅O₁₃P₃)

फिर शरीर में यह अभिक्रिया होती है:

ATP + H₂O → ADP + Pi + ऊर्जा

यही निकली हुई ऊर्जा हमें चलने, सोचने, बोलने, पढ़ने, लिखने और हर शारीरिक व मानसिक कार्य को करने की शक्ति देती है।

इसलिए प्रकृति का एक सरल नियम है—

जितना काम, उतना भोजन।

कम काम करके अधिक भोजन करेंगे, तो अतिरिक्त ऊर्जा वसा (Fat) के रूप में जमा होने लगेगी।
और अधिक काम करके पर्याप्त भोजन नहीं करेंगे, तो शरीर अपनी ऊर्जा और ऊतकों का उपयोग करना शुरू कर देगा।

शरीर को न भूखा रखिए, न बेवजह अधिक भरिए। जितनी ऊर्जा खर्च करें, उतनी ही उचित मात्रा में वापस दीजिए।

एक कर्मचारी, पाँच नौकरियाँ — विकास का भ्रम या बेरोज़गारी की नीति?भारत में काम करने वालों की कोई कमी नहीं है। हर साल लाखो...
29/07/2026

एक कर्मचारी, पाँच नौकरियाँ — विकास का भ्रम या बेरोज़गारी की नीति?

भारत में काम करने वालों की कोई कमी नहीं है। हर साल लाखों युवा डिग्रियाँ लेकर नौकरी की कतार में खड़े हो जाते हैं। फिर भी कंपनियों के विज्ञापन कुछ और ही कहानी कहते हैं। उन्हें एक ऐसा कर्मचारी चाहिए जो अकाउंटेंट भी हो, सेल्समैन भी, मार्केटिंग एक्सपर्ट भी, डेटा एनालिस्ट भी, टेक्नीशियन भी और ज़रूरत पड़े तो ऑफिस बॉय का काम भी कर दे। बदले में वेतन? बस इतना कि वह किसी तरह ज़िंदा रह सके।

कहते हैं देश में रोज़गार बढ़ रहा है। यदि सचमुच बढ़ रहा है, तो फिर एक व्यक्ति से पाँच लोगों का काम क्यों कराया जा रहा है? यदि पाँच लोगों का काम एक ही व्यक्ति करेगा, तो बाकी चार लोग कहाँ जाएँगे? क्या यही नई रोजगार नीति है—बेरोज़गारी के आँकड़े कम दिखाने के लिए कर्मचारियों पर काम का पहाड़ लाद दो?

कॉर्पोरेट जगत इसे "मल्टी-स्किलिंग", "प्रोडक्टिविटी" और "एफ़िशिएंसी" जैसे आकर्षक शब्दों में बेचता है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि इसका अर्थ अक्सर कम कर्मचारियों से ज़्यादा काम करवाना और वेतन पर खर्च बचाना होता है। कर्मचारी की क्षमता नहीं बढ़ती, बल्कि उसकी ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं; उसका वेतन नहीं बढ़ता, केवल काम बढ़ता है।

यदि कंपनियों के पास सचमुच पैसे नहीं हैं, तो सरकारें यह स्वीकार क्यों नहीं करतीं कि अर्थव्यवस्था उतनी मज़बूत नहीं है जितनी मंचों से दिखाई जाती है? और यदि कंपनियाँ रिकॉर्ड मुनाफ़ा कमा रही हैं, तो नए लोगों को नौकरी देने के बजाय एक ही कर्मचारी का शोषण क्यों किया जा रहा है?

विडंबना यह है कि सरकारें निवेश आने, उद्योग बढ़ने और रोजगार सृजन के बड़े-बड़े दावे करती हैं, जबकि ज़मीन पर लाखों योग्य युवा नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। दूसरी ओर, जिन्हें नौकरी मिली हुई है, वे पाँच लोगों का काम करके मानसिक तनाव, थकान और असुरक्षा के साथ जीवन जी रहे हैं। एक तरफ़ बेरोज़गारों की लंबी कतार है, दूसरी तरफ़ काम से टूटते कर्मचारी—और इसे ही "विकास" कहा जा रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सरकार की भूमिका क्या है? क्या उसकी ज़िम्मेदारी केवल निवेश आकर्षित करना है, या यह सुनिश्चित करना भी है कि कंपनियाँ पर्याप्त रोजगार पैदा करें और कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें? यदि नीतियाँ केवल मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए बनेंगी और श्रम को केवल लागत माना जाएगा, तो इसका परिणाम असमानता, बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष के रूप में सामने आएगा।

कड़वा सच यह है कि समस्या केवल कंपनियों की नहीं है। जब सरकारें रोजगार की गुणवत्ता, उचित वेतन और पर्याप्त नियुक्तियों पर गंभीरता से सवाल नहीं उठातीं, तब कॉर्पोरेट जगत स्वाभाविक रूप से कम से कम लोगों से अधिक से अधिक काम करवाने की दिशा में बढ़ता है। इसका खामियाज़ा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।

एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था वह नहीं होती जहाँ एक कर्मचारी पाँच लोगों का काम करे। एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था वह होती है जहाँ पाँच लोगों को सम्मानजनक रोजगार मिले। जब तक विकास का पैमाना केवल मुनाफ़ा रहेगा और रोज़गार नहीं, तब तक "विकास" का शोर सुनाई देगा, लेकिन बेरोज़गारी की ख़ामोशी उससे कहीं ज़्यादा गूँजती रहेगी।

"सीजेपी के द्वारा संचालित तत्कालीन आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने भाजपा के प्रति लोगों के मन में बैठे भय को ...
25/07/2026

"सीजेपी के द्वारा संचालित तत्कालीन आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने भाजपा के प्रति लोगों के मन में बैठे भय को खत्म कर दिया है।

जो लोग पहले खुलकर अपनी असहमति व्यक्त करने से हिचकते थे, वे धीरे-धीरे सड़कों पर उतरकर अपनी बात रखने लगे। आंदोलन ने यह विश्वास पैदा किया कि लोकतंत्र में सत्ता कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि नागरिक संगठित और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठाएँ, तो भय की दीवारें टूट सकती हैं। इसके बाद विरोध केवल कुछ संगठनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के लोग भी अपनी शिकायतों और मांगों को सार्वजनिक रूप से रखने लगे। इस दृष्टि से उस आंदोलन ने केवल किसी नीति का विरोध नहीं किया, बल्कि नागरिकों के भीतर लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग का आत्मविश्वास भी जगाया।"

"The most significant outcome of the CJP-led protest was that it ended the fear of the BJP among many people.

Those who had previously hesitated to voice their dissent began speaking out and taking to the streets to express their concerns. The movement instilled the belief that, in a democracy, no matter how powerful a government may be, citizens can challenge it peacefully and collectively. As a result, public dissent was no longer confined to a handful of organizations; people from different sections of society also began openly raising their grievances and demands. In that sense, the protest was not merely about opposing a particular policy—it also helped restore many citizens' confidence in exercising their democratic rights."

24/07/2026

1 करोड़ जुर्माना और 10 साल की सज़ा!

अब नीट का पेपर सचमुच "महंगा" हो गया।

पहले अगर कोई पेपर लीक कराने का सोचता था, तो खर्च कुछ और होता था। अब हिसाब देखिए—सज़ा से बचने के लिए 70–80 लाख इधर, ऊपर से 1 करोड़ का जुर्माना उधर। यानी कुल मिलाकर पेपर लगभग 2 करोड़ का बैठ गया।

अब कोई ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा इसकी तैयारी में उतरने की हिम्मत नहीं करेगा। आखिर इतनी महंगी "एंट्री फीस" हर किसी के बस की बात नहीं।

वाह! इसे ही तो कहते हैं मास्टरस्ट्रोक। मोती जी जो भी करते हैं, कमाल ही करते हैं।

23/07/2026

अरे ओ, नफ़रत के सौदागर।

तुम जो महलों में बैठकर,
बारूद के मौसम लिखते हो,
और बच्चों की नींद के बदले
बाज़ारों में हथियार बेचते हो।

तुम्हारे हाथों पर
सिर्फ़ स्याही नहीं,
सभ्यताओं की राख चिपकी है,
और इतिहास की कराह भी।

तुम कहते हो—
यह राष्ट्र की रक्षा है।
मैं पूछता हूँ—
किस राष्ट्र की?
उस माँ की,
जिसका बेटा कभी लौटकर नहीं आया?
या उस व्यापारी की,
जिसकी तिजोरी हर विस्फोट के साथ भरती गई?

तुम युद्ध नहीं लड़ते,
तुम सिर्फ़ आदेश लिखते हो।
मरते वे हैं
जिनके नाम तक
तुम्हारी ज़ुबान पर नहीं आते।

तुम्हारी जीत
श्मशानों की गिनती में लिखी जाती है,
और तुम्हारे भाषण
अनाथ बच्चों की चुप्पियों में डूब जाते हैं।

याद रखना,
हर तलवार
एक दिन अपने ही मालिक की परछाईं काटती है।
हर नफ़रत
घूमकर उसी दरवाज़े पर लौटती है,
जहाँ से उसे विदा किया गया था।

तुम चाहे
साम्राज्य खड़े कर लो,
झंडों से आकाश भर दो,
लेकिन मनुष्य की अंतरात्मा
तुम्हारे किसी हथियार से नहीं डरती।

और जिस दिन
लोग भय से नहीं,
सत्य से बोलेंगे,
उसी दिन
तुम्हारे साम्राज्य की सबसे ऊँची दीवार
सबसे पहले ढहेगी।

और जरूर ढहेगी।

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