Public Awareness

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The Authority has been organizing various legal awareness programmes from time to time to sensitize the public about their legal rights.

22/07/2021

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Photos 25/04/2016

हर भारतीय महिला को पता होने चाहिए ये 10 कानूनी अधिकार


अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम एक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति पुंज के रूप में उभर रहे हैं. हमारे संविधान ने हमें जो अधिकार और अवसर दिए हैं उन्हें भी प्रमुखता मिल रही है. आज महिलाएं भी मेहनत कर रही हैं और अपने करियर को लेकर गंभीर हैं. हांलाकि, मानसिक, शारीरिक और यौन उत्पीड़न, स्त्री द्वेष और लिंग असमानता इनमें से ज्यादातर के लिए जीवन का हिस्सा बन गई हैं. ऐसे में महिलाओं को भी भारतीय कानून द्वारा दिए गए अधिकारों के प्रति जागरुकता होनी चाहिए.

1. समान वेतन का अधिकार- समान पारिश्रमिक अधिनियम के अनुसार, अगर बात वेतन या मजदूरी की हो तो लिंग के आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जा सकता.

2. काम पर हुए उत्पीड़न के खिलाफ अधिकार- काम पर हुए यौन उत्पीड़न अधिनियम के अनुसार आपको यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का पूरा अधिकार है.

3. नाम न छापने का अधिकार- यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को नाम न छापने देने का अधिकार है. अपनी गोपनीयता की रक्षा करने के लिए यौन उत्पीड़न की शिकार हुई महिला अकेले अपना बयान किसी महिला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में या फिर जिलाधिकारी के सामने दर्ज करा सकती है.

4. घरेलू हिंसा के खिलाफ अधिकार- ये अधिनियम मुख्य रूप से पति, पुरुष लिव इन पार्टनर या रिश्तेदारों द्वारा एक पत्नी, एक महिला लिव इन पार्टनर या फिर घर में रह रही किसी भी महिला जैसे मां या बहन पर की गई घरेलू हिंसा से सुरक्षा करने के लिए बनाया गया है. आप या आपकी ओर से कोई भी शिकायत दर्ज करा सकता है.

5. मातृत्व संबंधी लाभ के लिए अधिकार- मातृत्व लाभ कामकाजी महिलाओं के लिए सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि ये उनका अधिकार है. मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत एक नई मां के प्रसव के बाद 12 सप्ताह(तीन महीने) तक महिला के वेतन में कोई कटौती नहीं की जाती और वो फिर से काम शुरू कर सकती हैं.

6. कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार- भारत के हर नागरिक का ये कर्तव्य है कि वो एक महिला को उसके मूल अधिकार- 'जीने के अधिकार' का अनुभव करने दें. गर्भाधान और प्रसव से पूर्व पहचान करने की तकनीक(लिंग चयन पर रोक) अधिनियम (PCPNDT) कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार देता है.

7. मुफ्त कानूनी मदद के लिए अधिकार- बलात्कार की शिकार हुई किसी भी महिला को मुफ्त कानूनी मदद पाने का पूरा अधिकार है. स्टेशन हाउस आफिसर(SHO) के लिए ये ज़रूरी है कि वो विधिक सेवा प्राधिकरण(Legal Services Authority) को वकील की व्यवस्था करने के लिए सूचित करे.

8. रात में गिरफ्तार न होने का अधिकार- एक महिला को सूरज डूबने के बाद और सूरज उगने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, किसी खास मामले में एक प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही ये संभव है.

9. गरिमा और शालीनता के लिए अधिकार- किसी मामले में अगर आरोपी एक महिला है तो, उसपर की जाने वाली कोई भी चिकित्सा जांच प्रक्रिया किसी महिला द्वारा या किसी दूसरी महिला की उपस्थिति में ही की जानी चाहिए.

10. संपत्ति पर अधिकार- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत नए नियमों के आधार पर पुश्तैनी संपत्ति पर महिला और पुरुष दोनों का बराबर हक है.

Photos 22/04/2016

कम्‍पनी अधिनियम – Company

कम्‍पनी को व्‍यक्तियों के एक ऐसे स्‍वैच्छिक संघ के रूप में परिभाषित किया गया है जो कारोबार करने के प्रयोजनार्थ गठित किया गया हो, जिसका एक विशिष्‍ट नाम और सीमित देनदार हो। कम्‍पनियां भले ही वे सरकारी हों या निजी, अर्थव्‍यवस्‍था का अभिन्‍न हिस्‍सा होती हैं। कम्‍पनियां ही वह माध्‍यम हैं जिसके ज़रिए देश का विकास होता है और वह विश्‍व भर में प्रगति करता है। उनका निष्‍पादन देश की आर्थिक स्थिति का महत्‍वपूर्ण पैमाना होता है।

भारत में, कम्‍पनी अधिनियम, 1956, सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण कानून है जो केन्‍द्र सरकार को कम्‍पनियों के निर्माण, वित्तपोषण, कार्यकरण और समापन को विनियमित करने की शक्तियां प्रदान करता है। इस अधिनियम में कंपनी के संगठनात्‍मक, वित्तीय, प्रबंधकीय और सभी संगत पहलुओं से संबंधित क्रियाविधियां हैं। इसमें निदेशकों एवं प्रबंधकों की शक्तियों और जिम्‍मेदारियों, पूंजी जुटाने कम्‍पनी की बैठकों के आयोजन, कम्‍पनी के खातों को रखने एवं उनकी लेखा परीक्षा, निरीक्षण की शक्तियां इत्‍यादि का प्रावधान किया गया है।

यह अधिनियम संपूर्ण भारत में और सभी कम्‍पनियों पर लागू है, भले ही वे अधिनियम या पूर्ववर्ती अधिनियम के तहत पंजीकृत हुई हों न हुई हों। लेकिन यह विश्‍वविद्यालयों, सहकारी समितियों, अनिगमित व्‍यावसायिक, वैज्ञानिक और अन्‍य संस्‍थाओं पर लागू नहीं होता।

यह अधिनियम केन्‍द्र सरकार को कम्‍पनी की लेखाबहियों की जांच करने, विशेष लेखा परीक्षा का निदेश देने कम्‍पनी के कामकाज की जांच का आदेश देने और अधिनियम का उल्‍लंघन करने पर अदालती कार्रवाई करने की शक्तियां प्रदान करता हैं। इन निरीक्षणों का उद्देश्‍य यह जाननता है कि कम्‍पनियां अपना कामकाज अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार चला रही हैं, क्‍या किसी कम्‍पनी या कम्‍पनी समूह द्वारा ऐसी अनुचित पद्धतियां तो नहीं अपनाई जा रही जो जनहित में न हो और क्‍या कही कुछ कुप्रबंध तो नहीं जिससे शेयरधारकों, ऋणदाताओं, कर्मचारियों और अन्‍यों के हितों पर प्रतिकूल असर पड़ता हो।

यदि किसी निरीक्षण से धोखाधड़ी या घपले का प्रथम दृष्‍टया मामला बनता है तो कम्‍पनी अधिनियम के उपबंधों के तहत कार्रवाई शुरू की जाती है या उसे केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो को सौंप दिया जाता है।

कम्‍पनी अधिनियम कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय और कम्‍पनियों के पंजीयक का कार्यालय, सरकारी परिसमापक, पब्लिक ट्रस्‍टी, कम्‍पनी विधि बोर्ड, निरीक्षण निदेशक इत्‍यादि के जरिए केन्‍द्र सरकार द्वारा प्रशासित किया जाता है। कम्‍पनियों के पंजीयक (आरओसी) नई कम्‍पनियों के निगमन और चल रही कम्‍पनियों के प्रशासन के कार्य को नियंत्रित करता है।

कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय, जिसे पहले वित्त मंत्रालय के तहत कम्‍पनी कार्य विभाग के नाम से जाना जाता था मुख्‍यालय कम्‍पनी अधिनियम, 1956 अन्‍य सम्‍बद्ध अधिनियमों एवं उनके तहत बनाए गए नियमों तथा विनियमों के प्रशासन से जुड़ा है ताकि कानून के अनुसार कॉर्पोरेट क्षेत्र के कार्यकरण को विनियमित किया जा सके। मंत्रालय का त्रि-स्‍तरीय संगठनात्‍मक ढांचा इस प्रकार है:-

नई दिल्‍ली में मुख्‍यालय

मुम्‍बई, कोलकात्ता, चेन्‍नई और नोएडा में क्षेत्रीय निदेशालय और
राज्‍यों एवं संघ राज्‍य क्षेत्रों में कम्‍पनियों के पंजीयक (आरओसी)
सरकारी परिसमापक जो देश में विभिन्‍न उच्‍च न्‍यायालयों के साथ सहबद्ध हैं, भी इस मंत्रालय के समग्र प्रशासनिक नियंत्रण के अंतर्गत है। मुख्‍यालय स्थित संरचना में कम्‍पनी विधि बोर्ड, शामिल हैं जो एक अर्थ-न्‍यायिक निकाय है जिसकी मुख्‍य न्‍यायपीठ नई दिल्‍ली में है, दक्षिणी क्षेत्र के लिए एक अतिरिक्‍त मुख्‍य न्‍यायपीठ चेन्‍नै में और नई दिल्‍ली, मुम्‍बई, कोलकाता एवं चेन्‍नै में चार क्षेत्रीय न्‍यायपीठ हैं।

मुख्‍यालय के संगठन में दो निरीक्षण एवं जांच निदेशक तथा पूरक स्‍टाफ, अनुसंधान एवं सांख्यिकी के एक आर्थिक सलाहकार और अन्‍य कर्मचारी है जो कानूनी, लेखांकन, आर्थिक एवं सांख्यिकीय मामलों पर विशेषज्ञता प्रदान करते हैं।

चार क्षेत्रीय निदेशक , जिन पर संबंधित क्षेत्रों जिनमें अनेक राज्‍य और संघ राज्‍य क्षेत्र शामिल है, का प्रभार है अन्‍य बातों के अलावा, अपने क्षेत्रों में कम्‍पनियों के पंजीयक के कार्यालयों के कार्यकरण के और सरकारी परिसमापकों के कार्य भी देख-रेख भी करते हैं। वे कम्‍पनी अधिनियम, 1956 के प्रशासन से संबंधित मामलों में संबंधित राज्‍य सरकारों और केन्‍द्र सरकार के साथ सम्‍पर्क भी बनाए रखते हैं।

कंपनी अधिनियम की धारा 609 के तहत नियुक्‍त कम्‍पनियों के पंजीयक (आरओसी), जिनके अन्‍तर्गत अनेक राज्‍य और संघ राज्‍य क्षेत्र आते हैं, का मुख्‍य कर्त्तव्‍य संबंधित राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों में शुरू की गई कम्‍पनियों को पंजीकृत करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी कम्‍पनियां अधिनियम के तहत सांविधिक अपेक्षाएं पूरी करें। उनके कार्यालय उनके पास पंजीकृत कम्‍पनियों से संबंधित रिकॉर्डों की रजिस्‍ट्री के रूप में कार्य करते हैं।

Company Law
आरओसी में निहित शक्तियां निम्‍नानुसार है:-

अंतर्नियमों एवं बहिर्नियमों का पंजीकरण
विवरणिका का पंजीकरण
पूंजी की छूट का पंजीकरण
सूचना या स्‍पष्‍टीकरण मांगना
दस्‍तावेज ज़ब्‍त करना
कम्‍पनी के कामकाज की जांच करना
कंपनी की लेखा बहियों इत्‍यादि की जांच करना
रजिस्‍टर से अक्रिय कम्‍पनियों को हटाना
पंजीयक के समक्ष विवरणिका इत्‍यादि प्रस्‍तुत करने की कम्‍पनी का कर्त्तव्‍य प्रवर्तित करना।
कुछ विशिष्‍ट मामलों में सूचना को घोषित नहीं करना
पंजीयक द्वारा समापन की याचिका दाखिल करना।

सरकारी परिसमापक कम्‍पनी अधिनियम की धारा 448 के तहत केन्‍द्र सरकार द्वारा नियुक्‍त अधिकारी होते हैं और विभिन्‍न उच्‍च न्‍यायालयों से सम्‍बद्ध होते है। वे संबंधित क्षेत्रीय निर्देशकों के प्रशासनिक प्रभार के अन्‍तर्गत होते हैं जो केन्‍द्र सरकार की ओर से उनके कार्यकरण की देख रेख करते हैं।

अधिनियम के अनुसार, कम्‍पनी से तात्‍पर्य है ”अधिनियम के अंतर्गत बनाई गई और पंजीकृत कम्‍पनी अथवा मौजूदा कम्‍पनी अर्थात ऐसी कम्‍पनी जो किन्‍हीं पूर्ववर्ती कंपनी कानूनों के अंतर्गत बनाई या पंजीकृत की गई हो।”
कम्‍पनी की मुख्‍य विशेषताएं इस प्रकार है:-

कृत्रिम विधिक व्‍यक्ति :- कम्‍पनी इस अर्थ में कृत्रिम व्‍यक्ति होती है कि यह कानून द्वारा निर्मित की जाती है और इसमें वास्‍तविक व्‍यक्ति के गुण नहीं होते। यह अदृश्‍य, अमूर्त, अनश्‍वर होती है और केवल कानून की दृष्टि में ही विद्यमान होती है। इसलिए इसे व्‍यक्तियों से बने निदेशक मण्‍डल के ज़रिए काम करना होता है।

पृथक विधिक निकाय :- कम्‍पनी अपने सदस्‍यों या शेयरधारकों से भिन्‍न एक स्‍पष्‍ट विधिक निकाय होती है। इसका अर्थ यह है कि :- कंपनी सम्‍पत्ति उसी की होती है न कि सदस्‍यों या शेयरधारकों की; कोई सदस्‍य व्‍यक्तिश: या संयुक्‍त रूप से कम्‍पनी की परिसम्‍पत्तियों पर स्‍वामित्‍व का दावा नहीं कर सकता, कोई एक सदस्‍य कंपनी के गलत कार्यों के लिए जिम्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता भले ही उसके पास समस्‍त शेयर पूंजी हो; कंपनी के सदस्‍य कंपनी के साथ संविदा निष्‍पादित कर सकते हैं।

अविरत उत्तराधिकार:- कंपनी अविरत जारी रहती है और इसके जारी रहने पर इसके सदस्‍यों की मृत्‍यु, दीवालियापन, इसके मानसिक या शारीरिक अक्षमता का असर नहीं पड़ता। इसका निर्माण कानून द्वारा किया जाता है और कानून ही इसे भंग कर सकता है।

सदस्‍यों की सीमित देनदारी :– इसके सदस्‍यों की देनदारी उनके द्वारा अभिदत्त शेयरों पर अदा न की गई धनराशि तक ही सीमित है। इस तरह, यदि कंपनी का परिसमापन किया जा रहा हो तो पूर्णत: प्रदत्त शेयरों के मामले में सदस्‍यों से आगे और अंशदान करने के लिए नहीं कहा जा सकता।

साक्षी मोहर :- कम्‍पनी की एक साझी मोहर होती है जो उस कम्‍पनी का हस्‍ताक्षर होती है तथा सभी सदस्‍यों की आम सहमति व्‍यक्‍त करती है। कम्‍पनी की मोहर उसके लिए और उसकी ओर से निष्‍पादित सभी दस्‍तावेज़ों पर लगाई जाती है।

शेयरों की अन्‍तरणीयता :- सार्वजनिक कंपनी के शेयर कम्‍पनी की अनुमति के बिना लेकिन अंतर्नियमों में निर्धारित तरीके के अनुसार मुक्‍त रूप से अंतरित किए जा सकते हैं। शेयरधारक अपने शेयर किसी अन्‍य व्‍यक्ति को अन्‍तरित कर सकते हैं और इससे कंपनी की निधियों पर प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन, एक नि‍जी कम्‍पनी अपने शेयरों के अन्‍तरण पर प्रतिबंध लगानी है।

अलग संपत्ति :- कम्‍पनी की समस्‍त सम्‍पत्ति उसी में निहित होती है। कम्‍पनी उसका नियंत्रण, प्रबंधन, धारण अपने ही नाम में कर सकती है। सदस्‍यों का कम्‍पनी की सम्‍पत्ति में व्‍यक्तिश: या सामूहिक रूप से कोई स्‍वामित्‍वाधिकार नहीं होता। शेयरधारक का कम्‍पनी की सम्‍पत्ति में बीमा योग्‍य अधिकार भी नहीं होता। कम्‍पनी के ऋणदाताओं का दावा केवल कपनी की सम्‍पत्ति पर हो सकता है न कि अलग-अलग सदस्‍यों की सम्‍पत्ति पर।

मुकदमा दायर करने या करवाने की क्षमता :- कम्‍पनी मुकदमा दायर करके अपने अधिकार प्रवर्तित करवा सकती है और इसके द्वारा सांविधिक अधिकारों के उल्‍लंघन करने पर इस पर मुकदमा दायर किया जा सकता है।
इस अधिनियम के बुनियादी उद्देश्‍य इस प्रकार है:-

कम्‍पनी के संवर्धन और प्रबंधन में अच्‍छे व्‍यवहार और कारोबारी ईमानदारी का एक न्‍यूनतम स्‍तर;
उत्‍कृष्‍ट बुनियाद पर कम्‍पनी के विकास में मदद करना;
शेयरधारकों के हितों की रक्षा करना;
ऋणदाताओं के हितों की रक्षा करना;
सरकार को पर्याप्‍त शक्तियां प्रदान करने के लिए, ताकि वह जनहित में और कानून द्वारा निर्धारित
प्रक्रिया के अनुसार कम्‍पनी के कामकाज़ में हस्‍तक्षेप कर सके;
अपने वार्षिक तुलनपत्र तथा लाभ हानि खाते में कम्‍पनी के कामकाज का उचित एवं वास्‍तविक प्रकटन;
लेखांकन एवं लेखापरीक्षा के उचित मानदण्‍ड;
प्रदत्त सेवाओं के पारिश्रमिक के रूप में प्रबंधन तंत्र को देय लाभ के हिस्‍से पर उच्‍चतम सीमा लगाना;
जहां कर्त्तव्‍य और हित के टकराव की संभावना हो, वहां लेन देनों पर नियंत्रण रखना;
ऐसे किसी भी कम्‍पनी के कामाकज की जांच पड़ताल के लिए प्रावधान, जिसका प्रबंधन इस तरह से किया गया कि शेयरधारकों की छोटी संख्‍या के प्रति नकारात्‍मक हो या कुल मिलाकर कम्‍पनी के हितों के प्रतिकूल हों;
सार्वजनिक कम्‍पनियों या सार्वजनिक कम्‍पनियों की अनुषंगी निजी कम्‍पनियों के प्रबंधन में लगे लोगों द्वारा उल्‍लंघन के मामले में प्रतिबंध लगाकर उनके कर्त्तव्‍य पालन को प्रवर्तित करना और निजी कम्‍पनियों को सार्वजनिक कम्‍पनियों पर लागू कानूनों के अधिक प्रतिबंधी प्रावधानों के अधीन लाना।
सरकार की सामाजिक और आर्थिक नीति के अंतिम उद्देश्‍यों को हासिल करने में मदद करना।

Photos 22/04/2016

भारतीय तलाक कानून – Indian Divorce Law

Divorce Law

भारत में तलाक और दुबारा विवाह को कानून की मंज़ूरी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत मिली हुई है. परन्तु करीबन 55 साल के चले आ रहे इस कानून की तुलना अगर हम मौजूदा परिप्रेक्ष्य में करें तो हर पुरानी हुई चीज़ की तरह इसमें भी त्रुटियां है अतः इस कानून में भी बदलाव की ज़रूरत है.

इसी के तहत केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मौजूदा अधिनियम में बदलाव के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी. सरकार इसके लिए विवाह कानून संशोधन विधेयक संसद में पेश करेगी. सूचना व प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी के अनुसार कानून में नए संशोधनों के तहत वैवाहिक रिश्तों के खत्म होने को तलाक का आधार बनाया गया है अतः अब तलाक लेना आसान हो जाएगा.
विवाह दो दिलों का मिलन

विवाह एक ऐसा पवित्र बंधन है जहाँ दो दिल और दो परिवार आपस में एक अनूठे बंधन में बंध जाते हैं. एक लडकी अपना परिवार छोडकर अपने पति का साथ निभाने के लिए उसके परिवार का हिस्सा बन जाती है. कहते हैं कि जीवन एक गाडी की तरह है और पति-पत्नी उस गाडी के दो पहिये, जिनके संतुलन से जीवन की गाड़ी चलती है. अगर संतुलन बना रहेगा तो गाडी सही चलेगी, परन्तु यदि एक भी पहिए का संतुलन बिगड़ा तो वह परिवार बिखरने की स्थिति में आ जाता है और तलाक तक की नौबत आ जाती है. परन्तु क्या तलाक बिगड़ते हुए रिश्तों को सुलझाने की सही दवा है? क्या शादी जैसे पवित्र रिश्ते की डोर इतनी कमज़ोर होती है कि आपसी कलह के चलते इस डोर को तोड़ा जा सकता है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 को भारतीय परिवारों की अखंडता का मुख्य कारण भी कहा जा सकता है. यह हिंदू विवाह अधिनियम की जटिलता ही है जिसके कारण आज भी हम एक परिवार में रहते हैं. हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार एक दम्पत्ति नाजायज़ शारारिक संबंध, आपसी झगड़े के बढ़ने, दूसरे साथी के मानसिक रूप से बीमार होने या फिर हिंदू धर्म से किसी और धर्म में परिवर्तित होने की स्थिति में तलाक के लिए न्यायालय जा सकता है. अगर कोई दम्पत्ति तलाक के सिलसिले में कानून का दरवाज़ा खटखटाता है तो ऐसी स्थिति में न्यायालय दोनों को कुछ वक्त तक अलग रहने या साथ रहने को कह सकता है ताकि वह अपने फैसले पर पुनःविचार कर सकें और तलाक लेने के फैसले को बदल सकें.
क्या है परिवार न्यायालय

परिवार न्यायालय एक विशेष तरह का न्यायलय है जिसे तहत परिवार में बढते आपसी झगड़े और कलह को आसानी से सुलझाने का प्रयत्न किया जाता है. अगर एक दंपत्ति के जीवन में परेशानी है और वह तलाक लेना चाहते हैं तो ऐसे स्थिति में परिवार न्यायालय उनको छः महीनों तक अलग रहने का आदेश देता है जिससे वह अपने फैसले पर पुनः विचार कर सके.
तलाक के प्रमुख कारण

किसी और व्यक्ति या स्त्री से शारीरिक संबंध होना.
नपुंसकता दूसरा कारण है जिसके द्वारा तलाक की नौबत उत्पन्न होती है.
आपके जीवनसाथी का अतीत भी तलाक की वजह बन सकता है.
किसी व्यक्ति का मानसिक रूप से सही ना होना.
धोखा देना या बेवफाई करना.
शादी के बाद दहेज की मांग करना.
एक दूसरे के विचारों में समानता ना होना.
आर्थिक तंगी के चलते.
अगर आप किसी तरह का नशा करते हों.
दोनों के शैक्षिक योग्यता में अंतर होना.
सांस्कृतिक या जाति-धर्म का अंतर होना.
दूसरे व्यक्ति का आपके घरेलू मामलों में दखल देना.
आपसी कलह और झगड़ा.
कहीं कुछ खो रहे हैं हम

अंत में एक सवाल जो सरकार द्वारा उठाए गए कदम से उजागर होता है कि क्या तलाक प्रक्रिया का आसान होना हिंदू या भारतीय समाज के लिए उचित है? क्योंकि अभी तक चले आए नियमों और कानूनों के चलते ही विश्व में भारतीयों की पारिवारिक एकता और अखंडता की बात होती थी. पूरा विश्व जानता है कि भारत विश्व में अपनी सभ्यता के लिए सबसे धनी राष्ट्र है जहाँ आज भी आपसी रिश्तों को उच्च दर्जा दिया जाता है. परन्तु कहीं इस बदलाव के रहते हम कुछ खो तो नहीं देंगे

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Photos 21/04/2016

छुट्टी के वेतन पर नियम-कानून

छुट्टी के वेतन पर नियम-कानून समझें

हाल ही में एक आदमी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। वो पिछले 15 साल से कंपनी में काम कर रहा था। वो रिटायर नहीं हुआ था और न ही उसने वीआरएस लिया था। उसे दूसरी कंपनी से बेहतर ऑफर मिला और उसने इस्तीफा दे दिया। लंबे अरसे तक एक ही कंपनी में काम करने के कारण उसे रिटायरमेंट बेनिफिट भी बहुत अच्छा मिला। उसे उसकी बची हुई छुट्टियों का वेतन भी दिया गया।

समस्या तब खड़ी हुई जब उसकी पुरानी कंपनी ने छुट्टियों के वेतन का टैक्स (टीडीएस) भी काट लिया। इनकम टैक्स एक्ट में भी एक सीमा तक ही छुट्टियों के वेतन पर टैक्स मिलती है। सामान्य तौर पर कंपनियां इस टैक्स में छूट उन्हीं कर्मचारियों को देती हैं जो रिटायरमेंट के साथ कंपनी छोड़ते हैं। कंपनियां उन कर्मचारियों को छूट देने से बचती हैं जो रिटायरमेंट से पहले कंपनी छोड़ देते हैं।

कैसे बनता है छुट्टियों का वेतन?

अगर कोई कर्मचारी कंपनी नियमों के मुताबिक साल भर में मिलने वाली पूरी छुट्टियां नहीं लेता है तो उसकी बची हुई छुट्टियां बेकार चली जाती हैं। इसके अलावा हो सकता है कि कंपनी इन बची हुई छुट्टियों के बदले पैसे दे दे या उन्हें इकट्ठा करके बाद में आपको फायदा दे दिया जाए। कर्मचारी अपने सर्विस पीरियड के दौरान इकट्ठी की गई इन छुट्टियों का इस्तेमाल कभी भी कर सकता है।

इसके अलावा इन छुट्टियों के बदले कर्मचारी रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ते समय पैसे भी ले सकता है। इकट्ठी की गई छुट्टियों के बदले ली गई धनराशि ही त्नलीव इनकैशमेंटत्न होती है। सर्विस पीरियड के दौरान छुट्टियों के एवज में मिलने वाले वेतन पर टैक्स लगता है। ये टैक्स सरकारी और निजी संस्थान दोनों में ही काम करने वाले कर्मचारियों पर लगता है।

क्या हैं नियम?

इसके उलट टर्मिनेशन पर मिलने वाले वेतन पर लगने वाले टैक्स के लिए अलग प्रावधान होते हैं। सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली त्नलीव इनकैशमेंटत्न पूरी तरह से टैक्स फ्री होता है। निजी संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों को छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर टैक्स में आंशिक छूट मिलती है। निजी कर्मचारियों को 10 महीने तक के औसत वेतन पर टैक्स में छूट मिलती है। इसके अलावा छुट्टियों के बदले मिलने वाला वेतन 3 लाख रुपये या उससे कम होने पर भी छूट का प्रावधान है। इसके साथ ही रिटायरमेंट के समय छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर पूरी तरह से टैक्स छूट मिलती है।

क्या कहता है कानून?

law

अनुच्छेद 10 (10एए) में ऑन रिटायरमेंट या अदरवाइज शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसमें गौर करने लायक शब्द त्नअदरवाइजत्न है। ये करदाताओं को सीधे शब्दों में बता रहा है कि इसके तहत टैक्स में छूट उन्हीं कर्मचरियों को मिलेगी जो रिटायरमेंट के अलावा किसी दूसरी वजह से नौकरी छोड़ते हैं और उन्हें छुट्टियों के बदले वेतन मिला हो। इस अनुच्छेद का इस्तेमाल 28 जुलाई 1997 को 142 सीटीआर 325 सीआईटी और डीपी मल्होत्रा के बीच चल रहे केस के फैसले में किया गया।

मल्होत्रा ने नौकरी से इस्तीफा देने के बाद अनुच्छेद 10 (10एए) के तहत छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर लगने वाले टैक्स में छूट का दावा किया था। इनकम टैक्स अफसर ने मल्होत्रा के दावे को खारिज कर दिया। उसके मुताबिक इस अनुच्छेद के तहत उन्हीं कर्मचारियों को फायदा मिल सकता है जिन्हें रिटायरमेंट के बाद त्नलीव सैलरीत्न मिली हो। उसके मुताबिक नौकरी के दौरान इस्तीफा देकर कंपनी छोड़ने वाले कर्मचारियों को इसका फायदा नहीं मिलता है।

रिटायरमेंट शब्द क्यों है अहम?

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इनकम टैक्स कोर्ट के मुताबिक रिटायरमेंट शब्द का बहुत विस्तृत मतलब होता है। रोजगार के संबंध में इसका मतलब होता है करियर का निचोड़। हालांकि इस शब्द का एक अर्थ इस्तीफा भी होता है। कानून के शब्दकोष के मुताबिक इस्तीफे के एक मतलब रिटायरमेंट भी होता है। ज्यादातर शब्दकोषों के मुताबिक रिटायरमेंट और रेजिग्नेशन दोनों का ही मतलब नौकरी का निचोड़ है।

इसका सीधा सा मतलब है कि नौकरी से इस्तीफा भी एक तरह का रिटायरमेंट ही है। एक बार जब कोई कर्मचारी इस्तीफा दे देता है तो उसे उस तारीख से नौकरी से हटा हुआ मान लिया जाता है जब कंपनी का कोई अधिकारी उसके इस्तीफे को मंजूर कर लेता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कर्मचरी को इस्तीफा मंजूर होने के साथ ही रिटायर मान लिया जाता है।

क्या कहते हैं कोर्ट के फैसले?

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कानून के मुताबिक अगर कोई कर्मचारी पेंशन पर रिटायर होता है तो रिटायरमेंट शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ आयकर अधिनियम के अनुच्छेद (10एए) की भाषा से साफ है कि रिटायरमेंट शब्द का विस्तृत इस्तेमाल किया जा सकता है। अनुच्छेद के मुताबिक चाहे कर्मचारी पेंशन पर रिटायर हुआ हो या किसी दूसरी वजह से रिटायर कहा जा सकता है।

इससे साफ हो जाता है कि रिटायरमेंट होने पर चाहे वो इस्तीफे देने की वजह से हुआ हो, वो छुट्टियों के बदले मिलने वाले वेतन पर लगने वाले टैक्स में छूट का पात्र माना जाएगा। कुछ ऐसा ही फैसला मद्रास उच्च न्यायालय ने सीआई और आरजे शाहने के बीच चले केस में दिया था। कोर्ट ने कहा था कि रिटायरमेंट कई तरह का होता है। यह स्वैच्छिक और पेंशन पर दोनों तरह से हो कसता है। अगर किसी व्यक्ति ने स्वैच्छा सा रिटायरमेंट लिया है तो वह अनुच्छेद 10(10एए) के तहत लाभ लेने का हकदार माना जाएगा।

21/04/2016

भारतीय दंड संहिता धारा 3

भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३ ऐसे अपराधो की सजा के बारे में है जो की भारत से बहार किये गए है पर कानून के अनुसार उन्हें भारत में ही पेश किया जायेगा व यही उनकी सुनवाई होगी. इसके तहत कोई भी व्यक्ति जिसपे की यह दंड संहिता लागू होती है के द्वारा किये गए किसी भी अपराध के बारे में, भले ही वोह भारत से बहार किये गए हो की सुनवाई व सजा भारत में होगी.

Mobile uploads 07/05/2015

सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय कानून में
‘किशोर’ की परिभाषा की
सांविधानिक वैधता के सवाल पर गौर करने का निश्चय किया
है। इसमें अपराध की संगीनता
के बावजूद 18 साल से चंद सप्ताह कम आयु का होने पर
भी ऐसे अपराधी को नाबालिग
ही माना गया है।
न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति
दीपक मिश्रा की
खंडपीठ ने कहा कि हम इस मामले पर गौर
करेंगे क्योंकि यह आयु निर्धारण से संबंधित है।
न्यायाधीशों ने कहा कि यह कानून का सवाल है
और गंभीर अपराध में आरोपी
पर बालिग के रूप में मुकदमा चलाने का निर्णय करते समय
उसकी आयु के निर्धारण का अपराध
की गंभीरता से कुछ तो तालमेल होना चाहिए।
न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में उठाए गए मसलों पर विचार के लिए
अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती से सहयोग करने का आग्रह किया है। इस
याचिका में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून में प्रदत्त किशोर
की परिभाषा को निरस्त करने का भी अनुरोध किया गया है।
न्यायालय ने अटार्नी जनरल को इस मामले में विधि मंत्रालय और गृह मंत्रालय
की ओर से हलफनामा तथा संबंधित रिपोर्ट 29 मार्च तक दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस
मामले में अब तीन अप्रैल को आगे सुनवाई होगी।
यह याचिका कमल कुमार पांडे और सुकुमार नाम के वकीलों ने दायर की है। याचिका
में किशोर न्याय कानून की धारा 2 (एल), धारा 10 और 17 के प्रावधानों के
तर्कहीन, मनमाना और असंवैधानिक होने का दावा किया गया है। अटार्नी जनरल ने
कहा कि न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट ने सभी बिंदुओं पर गौर किया है
लेकिन उसने किशोर का वर्गीकरण करने के लिए उसकी उम्र कम करने
की सिफारिश करने से परहेज किया है। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि वे
न्यायमूर्ति वर्मा समिति की रिपोर्ट पर गौर नहीं करेंगे क्योंकि उसके समक्ष
शुद्ध रूप से कानून का मसला था।
अटार्नी जनरल वाहनवती ने कहा कि केन्द्र सरकार इस मामले में न्यायालय के
साथ सहयोग के लिए तैयार है और राज्य सरकारों से भी इस विषय पर गौर करने के लिए कहा
जा सकता था। उन्होंने कहा कि कुछ गैर सरकारी संगठन भी इस विषय पर
काफी सक्रिय हैं। न्यायाधीशों ने इस पर कहा कि राज्यों की इसमें
कोई भूमिका नहीं है और हम गैर सरकारी संगठनों को नहीं सुनेंगे।
न्यायालय ने कहा कि चूंकि यह मामला आयु निर्धारण से संबंधित है और किशोर न्याय कानून
अंतरराष्ट्रीय कंनवेन्शन पर आधारित है। ऐसे भी कई देश हैं, जिन्होंने किशोर
की उम्र परिभाषित करने के इरादे से इसे 16 साल निर्धारित किया है तो कुछ ने 18 साल
ही रखा है।
न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के संदर्भ में
ही इस पर विचार कर रहे है। इससे पहले, जनहित याचिका में आरोपी व्यक्ति
को ‘किशोर’ के रूप में वर्गीकृत करना विधि के विपरीत है और किशोर न्याय कानून
में प्रदत्त संबंधित प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं के वकील
ने कहा कि इस कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा कानून के प्रतिकूल है।
उनका तर्क है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 82 और 83 में किशोर
की परिभाषा में अधिक बेहतर वर्गीकरण है। धारा 82 के अनुसार सात साल से
कम आयु के किसी बालक द्वारा किया गया कृत्य अपराध नहीं है जबकि धारा 83
के अनुसार सात साल से अधिक और 12 साल से कम आयु के ऐसे बच्चे द्वारा किया गया कोई भी
कृत्य अपराध नहीं है जो किसी कृत्य को समझने या अपने आचरण के स्वरूप
तथा परिणाम समझने के लिये परिपक्व नहीं हुआ है।
न्यायालय का यह निश्चय दिल्ली में पिछले साल 16 दिसंबर को 23 साल की
लड़की से सामूहिक बलात्कार की घटना में शामिल छह आरोपियों में से एक के
नाबालिग होने की बात सामने आने के बाद से अधिक महत्वपूर्ण है। इस वारदात के बाद से
ही किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की आयु का मामला चर्चा में है।
वाहनवती ने कहा कि इस मसले पर गौर करते समय यह ध्यान रखना होगा कि यह किशोर के
कृत्य का सवाल नहीं है बल्कि यह भी सोचना होगा कि उसने ऐसा क्यों किया और
यह भी संबंधित तथ्य है कि समाज ने उसे विफल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह
भी कहा कि किशोर को वर्गीकृत करते समय उसकी उम्र
सीमा कम करके 16 साल की जाये या फिर इसके 18 साल रखा जाये या इस मसले
पर निर्णय का सवाल अदालत के विवेक पर छोड़ना होगा।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की वर्ष 2011
की रिपोर्ट के अपराध के आंकड़ों से पता चलता है कि 18 साल से कम आयु के किशोरों द्वारा किए
गए अपराधों में कुल मिलाकर करीब दो फीसदी का इजाफा हुआ है।
यही नहीं, 2011 में किशोरों ने 33887 अपराध किये जिसमें से 4443 अपराध
करने वाले किशोरों ने उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त की थी और 27577
किशोर अपराधी अपने परिवारों के साथ रह रहे थे जबकि सिर्फ 1924 किशोर ही
बेघर थे।
याचिका के अनुसार इन किशोर अपराधियों में से लगभग दो तिहाई किशोर 16 से 18 आयु वर्ग के हैं। याचिका में
कहा गया है कि 2010 की तुलना में 2011 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में 34 प्रतिशत
की वृद्धि हुई है।

07/05/2015

‘असंतुष्ट’ पत्नियों द्वारा अपने पति और ससुराल के अन्य
सदस्यों के खिलाफ दहेज विरोधी कानून के
दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम
कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि ऐसे मामलों में
पुलिस ‘स्वत:’ ही आरोपी को
गिरफ्तार नहीं कर सकती और
उसे ऐसे कदम की वजह
बतानी होगी,
जिनकी न्यायिक समीक्षा की जाएगी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि पहले गिरफ्तारी और फिर बाकी
कार्यवाही करने का रवैया ‘निंदनीय’ है, जिस पर अंकुश लगना चाहिए। न्यायालय
ने सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि दहेज प्रताड़ना मामले सहित
सात साल तक की सजा के दंडनीय अपराधों में पुलिस गिरफ्तारी का
सहारा नहीं ले।
न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने
कहा, हम सभी राज्य सरकारों को निर्देश देते हैं कि वह अपने पुलिस अधिकारियों को हिदायत दे
कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A के तहत मामला दर्ज होने पर स्वत:
ही गिरफ्तारी नहीं करे, बल्कि पहले दंड प्रक्रिया संहिता
की धारा 41 में प्रदत्त मापदंडों के तहत गिरफ्तारी की
आवश्यकता के बारे में खुद को संतुष्ट करें।
न्यायालय ने कहा कि पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार करने की जरूरत के बारे में
मजिस्ट्रेट के समक्ष कारण और सामग्री पेश करनी होगी।
न्यायाधीशों ने कहा, पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा स्त्री को प्रताड़ित करने
की समस्या पर अंकुश पाने के इरादे से भारतीय दंड संहिता की धारा
498-A शामिल की गई थी। धारा 498-A को संज्ञेय और गैर
जमानती अपराध होने के कारण प्रावधानों में इसे संदिग्ध स्थान प्राप्त है, जिसे असंतुष्ट पत्नियां
कवच की बजाय हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं।
न्यायाधीशों ने कहा, परेशान करने का सबसे आसान तरीका पति और उसके
रिश्तेदारों को इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार कराना है। अनेक मामलों में पति के अशक्त दादा-
दादी, विदेश में दशकों से रहने वाली उनकी बहनों को
भी गिरफ्तार किया गया। न्यायालय ने कहा कि गिरफ्तारी व्यक्ति
की स्वतंत्रता को बाधित और उसे अपमानित करती है और हमेशा के लिए धब्बा
लगाती है और कोई भी गिरफ्तारी सिर्फ इसलिए
नहीं की जानी चाहिए कि अपराध गैर जमानती और
संज्ञेय है।
न्यायाधीशों ने कहा, गिरफ्तार करने का अधिकार एक बात है और इसके इस्तेमाल को न्यायोचित
ठहराना दूसरी बात है। गिरफ्तार करने के अधिकार के साथ ही पुलिस
अधिकारी ऐसा करने को कारणों के साथ न्यायोचित ठहराने योग्य होना चाहिए।
न्यायाधीशों ने कहा, किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध करने का आरोप लगाने के
आधार पर ही फौरी तौर पर कोई गिरफ्तारी नहीं
की जानी चाहिए। दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस
अधिकारी के लिए उचित होगा कि आरोपों की सच्चाई की
थोड़ी बहुत जांच के बाद उचित तरीके से संतुष्ट हुए बगैर कोई
गिरफ्तारी नहीं की जाए।
दो सदस्यीय बेंच ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का हवाला देते हुए लिखा है
कि अनुच्छेद 498 A के तहत 2012 में करीब 2 लाख लोगों की
गिरफ्तारी हुई जो कि 2011 के मुकाबले 9.4 फीसदी ज्यादा है।
2012 में जितनी गिरफ्तारी हुई उनमें से लगभग एक चौथाई महिलाएं
थीं। अनुच्छेद 498 A में चार्जशीट की दर 93.6
फीसदी है जबकि सजा की दर 15
फीसदी है जो काफी कम है। फिलहाल 3 लाख 72 हजार 706
केस की सुनवाई चल रही है, लगभग 3 लाख 17 हजार मुकदमों में आरोपियों
की रिहाई की संभावना है। इन आंकड़ों को देखते हुए लगता है कि इस कानून का
इस्तेमाल पति और उनके रिश्तेदारों को परेशान करने के लिए हथियार के तौर पर किया जा रहा है।
न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता के तहत हुए अपराधों में कुल गिरफ्तार व्यक्तियों का
यह छह फीसदी है।

07/05/2015

अजान भारतीय दंड संहिता के धाराओं 153 व 295 के अधीन संज्ञेय अपराध
है। अजान मुसलमानों व गैर मुसलमानों के बीच मजहब के आधार पर शत्रुता उत्पन्न करता
है। लेकिन नागरिक अथवा जज की परिधि से बाहर है। उपरोक्त धाराओं के अंतर्गत किए
गए अपराधों का संज्ञान/संस्तुति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के अधीन
प्रेसीडेंट या राज्यपाल ही दे सकता है। लेकिन किसी
प्रेसीडेंट या राज्यपाल ने सन् 1947 से आज तक किसी अजान लगाने वाले
अपराधी इमाम के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 153 व
295 के अधीन अभियोग चलाने की संस्तुति नहीं
दी, जब कि दिल्ली पुलिस आयुक्त ने भारतीय दंड संहिता के धारा
99 के अंतर्गत सुरक्षा मांगने के कारण मेरे विरुद्ध 153बी व 295ए के अधीन
अभियोग चलाए। मै 26.2.2003 को आरोप मुक्त भी हुआ लेकिन अजान आज तक बंद
नहीं हुई। स्पष्टतः उपरोक्त धाराओं का दुरुपयोग राज्यपाल वैदिक संस्कृति को मिटाने और
इमामों को संरक्षण देने के लिए करते आ रहे हैं। आर्यावर्त सरकार इसे रोकना चाहती
है। क्या मीडिया निज हित में आर्यावर्त सरकार का साथ देगी?
क्या आप को यह राज्यपाल का व्यवहार भारतीय दंड संहिता की धारा 108
के अधीन अपराध नहीं लगता कि जो अपराध कर रहा है, उसे तो राज्यपाल
संरक्षण देता है और जो पीड़ित व्यक्ति अपराधी का विरोध कर रहा है,
उसका उत्पीड़न किया जा रहा है?
मैं जगतगुरु के हाथ का लिखा पत्र सुश्री मायावती के संज्ञान में लाने के लिए
संलग्न कर रहा हूं। हम लोग वैदिक संस्कृति की रक्षा हेतु लड़ रहे हैं। जिन
लोगों ने सुश्री मायावती को उनके जन्मदिन पर अरबों रूपए दिए हैं-मेरे सारे
प्रयास के बाद उनके पास इतना साहस नहीं कि हमारी सहायता कर
सकें। स्वयं सुश्री मायावती ने भारतीय संविधान में आस्था व
निष्ठा व्यक्त की है। वे सोनिया से अपनी ही रक्षा
नहीं कर सकतीं। वे गुप्त रूप से आर्यावर्त सरकार की
सहायता कर सकती हैं। ईश्वर उनको सद्बुद्धि दे। ताकि मानव जाति का कल्याण हो व
युगों तक सुश्री मायावती को याद किया जाए। वे यह भी याद रखें
कि भारतीय संविधान ने उनकी स्थिति किसान के पशु से भी
बुरी कर रखी है। (देखें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31 व
39ग). जिस दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के अधीन सोनिया द्वारा
मनोनीत टी0वी0 राजेश्वर ने सुश्री
रीता व श्री वरुण गांधी को जेल भेजा है, उसी दंड
प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अधिकार से टी0वी0 राजेश्वर
जब चाहे सुश्री मायावती को जेल भेज देगा।
जो दलित कार्ड सुश्री मायावती खेल रही हैं,
वही उनके सर्वनाश का कारण बनेगा। राजतंत्र काल में सन 1835 तक मैकाले को पूरे भारत
में एक भी दलित या चोर नहीं मिला था। आज उसी भारत में दलितों
पर राजनीति हो रही है। वह भी 66 प्रतिशत कार्पोरेट
टैक्स लगाकर! जिसे अंततोगत्त्वा दलित ही देता है। स्वयं सोनिया आमेर खजाने
की चोरनी है, जिसने अपने मनोनीत भूमाफिया व
आतंकवादी राज्यपाल टी0वी0 राजेश्वर द्वारा हुतात्मा रामप्रसाद
बिस्मिल का स्मारक ही 33 करोड़ रू0 में बेंच डाला। सुश्री
मायावती इसलिए मुख्यमंत्री हैं कि वे प्रदेश को लूट रही
हैं। ईसा के शत्रुओं को कत्ल करा रही हैं। जिसदिन उनकी उपयोगिता
समाप्त हुई-सत्ता से बाहर होंगी। भगवान परशुराम ने आर्यावर्त सरकार व वैदिक
संस्कृति की स्थापना की है। जेल में बंद अमृतानंद ने आर्यावर्त सरकार के
महाराज का चयन कर लिया है। राजा धर्म का रक्षक होता है। अपना कल्याण चाहें तो
सुश्री मायावती कृपया महाराज के राज्याभिषेक में गुप्त सहयोग दें। अन्यथा
उनकी सम्पत्ति सोनिया लूट लेगी।
प्रेसीडेंट व राज्यपालों की सेवा शर्तें
मुझे प्रेसीडेंट व राज्यपालों पर तरस आता है। पद ग्रहण करने के पहले
ही इनको उस संविधान को बनाए रखने की शपथ लेनी
पड़ती है जिसका संकलन ही मानव जाति को डायनासोर की भांति
मिटाने के लिए किया गया है। प्रेसीडेंट व राज्यपाल अपनी ही
संस्कृति, सम्पत्ति, जीवन, दुधमुहों के जीवन व नारियों के सम्मान
की रक्ष़्ाा नहीं कर सकते, अपने नागरिकों को क्या बचाएंगे?
क्या आर्यों को नहीं लगता कि राज्यपाल सिक्खों के दसो गुरुओं, षिवाजी,
चंद्रषेखर व भगत सिंह के अतिरिक्त लाखों गुमनाम शहीदों का अपमान कर रहे हैं?
यदि गौ व नर भक्षी चोरनी एंटोनिया माइनो ही इस देष
की सुपर प्रधानमंत्री है तो विक्टोरिया में क्या बुराई थी व
एलिजाबेथ में क्या बुराई है? क्यों बहाए शहीदों ने रक्त?
सोनिया के ईसा के रूप में मृत्यु तुम्हारी छाती पर बैठी है
मानवों! विश्व में एक से बढ़ कर एक आध्यात्मिक त्रिकालदर्शी, योद्धा, समाज सुधारक, चिंतक
और संत पैदा हुए, लेकिन किसी ने मानवद्रोही संस्कृतियों
यहूदी, ईसाइयत, इस्लाम, मार्क्सवाद और प्रजातंत्र का विरोध नहीं किया।
दिखावे के लिए देश में प्रजातंत्र है। लेकिन वस्तुतः यहाँ भारतीय संविधान पर आधारित
सोनिया का एकतंत्र है। मताधिकार धोखा है। उपरोक्त स्थिति को बदला नहीं जा सकता।
चुनाव धोखा है!
चुनाव आयोग द्दोखेबाज है, जो प्रत्याषियों को हत्यारों, लुटेरों व बलात्कारियों की संहिता
भारतीय संविद्दान की शपथ दिलवाता है! नागरिक देष के सबसे खूंखार माफिया
दाउद इब्राहिम के विरुद्ध समाज, पुलिस और जज से षिकायत कर सकते हैं, प्रतिभा, मुलायम,
मायावती को सत्ता से वोट के द्वारा हटा सकते हैं। लेकिन नागरिक भारतीय
संविद्दान के अनुच्छेदों 29(1), 31 व 39सी को नहीं बदल सकते हैं ?
मानव मात्र के समूल नाश का प्रबंध तो अंग्रेजों की कांग्रेस के बनाए भारतीय
संविधान ने कर दिया है। ऐसे चुनाव/संविधान का विरोध मीडिया क्यों नहीं
करती?
अतः वह उद्देश्य ही, यानी नागरिकों के जान माल की रक्षा,
जिसके लिए राज्य की स्थापना की गई, पराजित हो चुका है। बल पूर्वक दूसरे
की सम्पत्ति व नारियों पर अधिकार करना, जो घृणित अपराध है व जिनके विरुद्ध
सभी राज्यों ने कानून बनाए हैं, मजहबी और सामाजिक कर्तव्य बन गए
हैं। अपराधी ईसाई, मुसलमान और मार्क्स के समाजवादी चेले निरपराधों के
सम्पत्ति और नारियों की लूट अनैतिक नहीं मानते।

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