भारतीय नागरिक

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24/12/2025
04/11/2025

📢 बेनीपट्टी-32 विधानसभा की जनता से अपील 🗳️

आपका एक वोट तय करेगा बेनीपट्टी का भविष्य,
जहाँ विकास होगा हर गाँव तक, और आवाज़ पहुँचेगी हर दिल तक 💪

🙏 डॉ. बी. झा मृणाल,
निर्दलीय उम्मीदवार, बेनीपट्टी-32 से आपका अपना प्रतिनिधि- आपका बेटा !

📅 11 नवम्बर को ‘आला छाप’ पर बटन दबाएँ
बेनीपट्टी के समग्र विकास के लिए —
सशक्त जनता, सशक्त बेनीपट्टी 🌾

13/09/2025

#पंडीत_नेहरु
भाई अपने को तो नेहरू का ये निर्णय बहोत पसन्द आया।

किसी भी विदेशी महिला से पैदा हुआ पुत्र भारत के किसी भी राज घराने का उत्तराधिकारी या वारिस नहीं बन सकता यह कानून खुद नेहरू ने बनाया था

बात है 1948 की जब होलकर राजघराने का वारिस चुनने की बात चली तो जाहिर है, बेटा ही वारिस बनेगा पर यहीं पेच फस गया।

यशवंतराव द्वितिय ने 2 विवाह किए थे एक भारतीय महिला से और एक अमेरिकन महिला से।

भरतीय महिला की बेटी थी उषा राजे होलकर।जबकि अमेरिकन महिला के बेटे थे शिवाजी राजे होलकर जो रिचर्ड होलकर के नाम से प्रसिध्द थे ।

रिचर्ड को वारिस बनाने का वक्त आया तब उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरू,गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल और राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने साथ मे बैठकर निर्णय किया कि होलकर का वारिस रिचर्ड नही बन सकता क्योंकि वो खुद एक विदेशी महिला की संतान है।

इस लिए वारिस बेटी उषा राजे होलकर को बनाया गया।

इसके लिए भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने एक विशेष राजपत्र जारी करके उसे पर दस्तखत किए थे

हालांकि रिचर्ड को सम्पति में हिस्सा मिला।

उनके बेटे का नाम यशवंत होलकर है।

जिनकी शादी गोदरेज घराने की बेटी से हुई है।

रिचर्ड की बेटी सबरीना की शादी गोआ के राजघराने में हुई है।

तन मन धन से भरतीय रिचर्ड को वारिस नही बनाया गया
क्योंकि उस वक्त के pm ने ये नही चाहा कि कोई विदेशी महिला की औलाद इस देश मे राजकाज करे ।

तो अब सवाल ये उठता है कि ये कोंग्रेसी किस मुह से राहुल गांधी को PM बनवाना चाहते है।
क्या वो भूल गए अपने खुद के दल के सुपर पावर अध्यक्ष ने क्या निर्णय लिया था ????????

🔴

05/09/2025
29/08/2025

राहुल गांधी (नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा) को अनुभवी भूतपूर्व सैनिक महिला द्वारा बहुत ही सुन्दर ढंग से लिखा गया पत्र । कृपया इसे पढ़ें और प्रसारित करें । फिक्शन!

विद्या सुब्रह्मण्यम:

श्री राहुल गांधी जी,

संसद में विपक्ष के नेता (एलओपी) का पद ग्रहण करने पर हार्दिक बधाई।

54 वर्ष की आयु में यह आपकी पहली सरकारी नौकरी है।
आपकी आयु में मैं सेना से सेवानिवृत्त हुई थी।

मेरी पहली नौकरी 15,500 फीट की ऊँचाई पर एक आउट पोस्ट पर थी, जहाँ भारत, चीन और भूटान की सीमाएँ मिलती हैं (ट्राईजंक्शन)।

आप भाग्यशाली हैं कि आपका जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जहाँ आप आवेदन कर सकते थे और सीधे सांसद का पद प्राप्त कर सकते थे।

मैं एक गैर-राजनीतिक अनुभवी हूँ और इसलिए मेरे विचार भारत के बेहतर भविष्य के लिए उम्मीदों वाले एक आम आदमी के विचार हैं।

भारत के लोगों ने वोट देकर आपकी पार्टी को 99 सीटें दीं।

क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं थी, जिसने आपकी पार्टी की सीटों की संख्या को लगभग दोगुना कर दिया और आपको एलओपी के पद के योग्य बना दिया?
फिर आपको क्यों लगता है कि लोकतंत्र से समझौता किया गया है और इसे बचाने की जरूरत है? क्या आपके लिए लोकतंत्र का मतलब सिर्फ अपनी पार्टी और परिवार के हित से है? कृपया भारत की जनता के फैसले का अपमान न करें।

देश ने मोदी जी को वोट दिया है और उन्हें एनडीए ने नेता चुना है और इस तरह उन्होंने पूर्ण प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है। क्या आपको वाकई लगता है कि भारत का संविधान अपने ही लोगों से खतरे में है? क्या आप वाकई मानते हैं कि भारत का संविधान हमेशा आपकी जेब में रहना चाहिए, जैसा कि आप जेब में रखते हैं? शायद इसी सोच ने आपको 28 सितंबर 2013 को अपनी ही सरकार के अध्यादेश को फाड़ने के लिए प्रेरित किया?

मुझे यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस ने संविधान के साथ किस तरह से व्यवहार किया है, उसमें संशोधन किया है और बार-बार उसमें हेराफेरी की है। दिल्ली में एक चर्च के बाहर मैंने ‘थॉट फॉर द डे’ पढ़ा, जिसमें कहा गया था, “हम उन चीजों की चिंता करते हैं जो वहां हैं ही नहीं”। कितना सच है। लगता है कि विपक्ष को आपके नेतृत्व से नहीं, बल्कि काल्पनिक भय और मोदी फोबिया से परेशानी हो रही है।

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अपने तीसरे प्रयास के बाद, आप कम से कम दूसरे स्थान पर आकर विपक्ष का नेता तो बन ही सकते थे। हाल ही में संसद सत्र के दौरान, आपसे बौद्धिक बहस के रूप में आतिशबाजी की उम्मीद थी। आखिरकार, यह एक सांसद और पूरे विपक्ष के नेता के रूप में याद किए जाने के लिए आपकी पहली यात्रा थी। अफसोस, ऐसा नहीं हुआ। क्या आपने विपक्ष के नेता को ‘विरोध का नेता’ मान लिया था? यह देखना दुखद था कि आपका नेतृत्व एक भीड़ के नेता से अधिक कुछ नहीं था, जिसके पास न तो अधिकार था और न ही जिम्मेदारी। क्या यह उस राजनीतिक परिवार में आपके 54 वर्षों का परिणाम है, जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं? या संसद में सांसद के रूप में 20 वर्षों का आपका अनुभव था? सशस्त्र बलों के लिए आपकी और आपकी पार्टी की चिंता, प्रामाणिक और वास्तविक नहीं लगती।

यह प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ही थे, जिन्होंने 1962 में बिना गोला-बारूद और बिना सर्दियों के कपड़ों के चीनियों से लड़ने के लिए सेना भेजी थी। 1973 में सैनिकों की पेंशन कम करने वाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ही थीं। उन्होंने ही बार-बार फील्ड मार्शल जनरल सैम मानेकशॉ का अपमान किया । 1971 की जीत के लिए वे भारत रत्न के हकदार थे, लेकिन उन्हें सम्मानजनक विदाई भी नहीं दी गई।

आपके पिता श्री राजीव गांधी ने ही बिना किसी खुफिया जानकारी के श्रीलंका में सैनिकों को भेजा था। आपकी मां श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने ही सैनिकों को OROP देने से इनकार किया था। आपने खुद हमेशा ही वीरता और वफादारी के उनके प्राणों को जोखिम में डालकर सशस्त्र बलों को अपमानित करने की कोशिश की है। क्या सशस्त्र बल कभी भी आपको सम्मान और गर्व के साथ सलाम करेंगे, भले ही आप कभी प्रधानमंत्री बन जाएं?

भारत के सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार में जन्मे, इतने अनुभव वाले और अब विपक्ष के नेता के रूप में आपसे संसदीय चर्चाओं और बहस में वांछित स्तर लाने की उम्मीद की गई थी। विपक्ष के नेता के रूप में अपने पहले भाषण में ही आपने अवसर खो दिया और बहस हार गए।

प्रधानमंत्री की बात सुनने से इनकार करना और विपक्षी सांसदों को सदन के वेल में जाकर हंगामा करने के लिए उकसाना, यह हमारी आपसे अपेक्षा नहीं थी। आपमें सभी हिन्दुओं को हिंसक कहने की हिम्मत है, लेकिन अपने शब्दों पर अड़े रहने का नैतिक साहस नहीं है। झूठे वादे, झूठ और बयानबाजी आपको यहां तक तो पहुंचा सकती है, लेकिन इससे आगे नहीं।

विपक्ष के नेता के रूप में आपकी भूमिका राष्ट्र के लिए रचनात्मक होनी चाहिए। सिस्टम में विपक्ष का नेता ‘नियंत्रण और संतुलन’ के लिए होता है, न कि सरकार के हर कदम का विरोध करने के लिए।

याद रखें, आप अपनी रैंक बढ़ा सकते हैं, लेकिन कोई भी रैंक आपको एक इंसान के रूप में नहीं बढ़ा सकती। प्रधानमंत्री बनना आपके हाथ में नहीं है, लेकिन एक अच्छा इंसान और एक अच्छा राजनेता बनना आपके हाथ में है।

चुनाव खत्म हो चुके हैं, अब कृपया लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को काम करने दें।

एक अनुभवी व्यक्ति का खुला पत्र

24/07/2025

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