शिक्षक स्वयं को जीवन भर जलाने वाला दीपक है । ताकि मानव जीवन प्रकाशित होता रहे। प्रथम गुरु जन्म दायिनी माता से लेकर जीवन की यात्रा में मिले समस्त गुरुओं एवम् समस्त गुरुओं ने विराजमान आदि गुरु महाकाल की विद्यमान ऊर्जा को सादर नमन करता हूं । आप सबको गुरु दिवस की अनंत शुभकामनाएं।
ASVJians conffessions and suggestions
ASVJ ians,
your confessions during your school time and
suggestions to upgrade school enviourment. Keep Smiling,
Cheers.....
:)
To all the ASVJ ians,
your confessions during your school time and
suggestions to upgrade school enviourment. There are ...other pages and groups of Alumini but it will be totally unbias. This page is genuinely for healthy confessions and healthy leg pulling.
... and offcourse healthy suggestions to upgrade our school...
Admin of this page assures that they do not get into any issues that hurt to anybody.
30/05/2020
CHINA KO JAWAAB | Sena degi bullet se, Naagrik dengey wallet se | Sonam Wangchuk, Ladakh AND USE YOUR WALLET POWER! Sonam Wangchuk appeals to all Indian citizens and people worldwide to boycott Chinese products and stop virtual...
We miss our school n college days...
Bachpan mai hum waha sona pasand karte the jaha se chand taare dikhe,aur aaj waha jaha charger laga sake,aisa nahi k ye zindagi buri hai par school or clg life ki baat kuch or thi.Aysa nahi k ab hasi nahi aati,par dosto mai beth kr khilkhilane wali baat kuch aur thi.Aisa nahi k ab tension se raat nahi guzarti,par exams ki raato mai jagne wali baat kuch aur thi.Aysa nahi k aage aa kr kuch hasil na kiya ho,par passing marks le kr party udane wali baat kuch aur thi.Aysa nahi hai ki ab logo ko jante pehchante nahi,but woh dur se 'KAMINE RUKK' bolke dost ko awaz dene ki baat he kuch aur thi.Aysa nahi ki ab khana share nahi karte,but canteen mai kisi aur ke plate se cheen ke khane ki baat kuch aur thi.Aysa nahi k ab zindagi nahi kat rahi hai,par DOSTON MAI ZINDAGI JINE KI BAAT HE KUCH AUR THI... Dedicated to all my Friends for your busy scedule in your job n business.
14/08/2019
08/08/2018
अपने अनुभव लिखे विद्यालय के बारे में...
प्रिय मित्रों,
मुझे अपने विद्यालय (ए० एस० वी० जे०) पर गर्व है, साथ ही अपने अध्यापको पर भी। मैं विद्यालय में छठी कक्षा से ग्यारवी कक्षा तक पढ़ा 1977 तक। आज मन कर रहा है कि मैं अपने सारे भाइयो को यह बताऊ की मुझे अपने स्कूल शिक्षा के दौरान इन सब अध्यापको ने बहुत ही अच्छी छाप छोड़ी जिन्हे मै आज भी याद करता हूं अपने मार्गदर्शको के रूप में ....
श्री रामनाथ जी,श्री नौबत राय जी,श्री गंगाशरण तृषित जी,श्री महेशचंद शर्मा जी,श्री रामानंद जी,श्री ईश्वरसिंह जी,श्री राजकुमार जी,श्री एस पी सिंह जी(जीव विज्ञान),श्री एस पी सिंह जी(भौतिक ज्ञान),श्री सहगल जी(रसायन ज्ञान), श्री प्रमोद सिंघल जी,श्री जे पी शर्मा जी,और श्री आर के त्रिपाठी जी।
आप सब दोस्तों से यही प्रार्थना है कि आप सबको जो भी विद्यालय की याद आने पर जिस भी वृतांत की याद आये हम सबके लिए यहाँ लिखे ताकि एक बार फिर थोड़े समय के ही लिए सही, हम बचपन को जी सके।
आप सबके साथ की कामना करता हूं।
धन्यवाद।।
बंगाल में एक भक्त हुआ। कभी मंदिर में नहीं गया। पिता बहुत धार्मिक थे। तो पिता चिंतित थे, स्वभावत:। लेकिन बेटा बड़ा ज्ञानी था, शास्त्रों का बड़ा ज्ञाता था। दूर—दूर तक बड़ी ख्याति थी। नव्य न्याय का, न्याय का, तर्क का बड़ा पंडित था। साठ वर्ष का हो गया, तो अस्सी वर्ष के पिता ने कहा कि अब बहुत हो गया, अब तू भी का हो गया, अब मंदिर जाना जरूरी है!
उस साठ वर्ष के के बेटे ने कहा, मंदिर तो मैं कई बार सोचा कि जाऊं, लेकिन पूरा मन कभी मैंने पाया नहीं कि मंदिर जाऊं। और अगर अधूरे मन से गया, तो मंदिर में जा ही कैसे पाऊंगा? आधा बाहर रह जाऊंगा, आधा भीतर जाऊंगा, तो जाना हो ही नहीं पाएगा। और फिर मैं आपको भी रोज मंदिर जाते देखता हूं वर्षों से, चालीस वर्ष का तो कम से कम मुझे स्मरण है; लेकिन आपकी जिंदगी में मैंने कोई फर्क नहीं देखा। तो मैं मानता हूं कि आप मंदिर अभी पहुंच ही नहीं पाए हैं। आप जाते हैं, आते हैं, लेकिन पूरा मंदिर और पूरा मन कहीं मिल नहीं पाते। तो आपको देखकर भी मेरी हिम्मत टूट जाती है। जाऊंगा एक दिन जरूर, लेकिन उसी दिन, जिस दिन पूरा मन मेरे पास हो।
और दस वर्ष बीत गए। बाप मरने के करीब पहुंच गया। अभी तक वह प्रतीक्षा कर रहा है कि किसी दिन उसका बेटा जाएगा। सत्तरवीं उसकी वर्षगांठ आ गई। और बेटा उस दिन सुबह बाप के, पैर छूकर बोला कि मैं मंदिर जा रहा हूं।
बेटा मंदिर गया। घड़ी, दो घड़ी, तीन घड़ी बीती। बाप चिंतित हुआ; बेटा मंदिर से अब तक लौटा नहीं है! फिर आदमी भेजा। मंदिर के पास तो बड़ी भीड़ लग गई है। फिर का बाप भी पहुंचा। पुजारियों ने कहा कि इस बेटे ने क्या किया, पता नहीं! इसने आकर सिर्फ एक बार राम का नाम लिया और गिर पड़ा!
एक पत्र वह अपने घर लिखकर रख आया था। जिसमें उसने लिखा था कि एक बार राम का नाम लूंगा, पूरे मन से। अगर कुछ हो जाए, तो ठीक, अगर कुछ न हो, तो फिर दुबारा नाम न लूंगा। क्योंकि फिर दुबारा लेने का क्या प्रयोजन है?
एक ही बार राम का नाम पूरे मन से लिया गया, वह शरीर से मुक्त हो गया! लेकिन पूरे मन से तो हम कुछ ले नहीं पाते। पूरे मन का मतलब ही होता है कि मन समाप्त हुआ। मन का कोई अर्थ ही नहीं होता, जब मन पूरा हो जाए।
जहां पूरा हो जाता है मन, वहां मन समाप्त हो जाता है। जब तक अधूरा होता है, तभी तक मन होता है। इसे हम ऐसा समझें कि अधूरा होना, मन का स्वभाव है। अपने ही भीतर बंटा होना, मन का स्वभाव है। अपने ही भीतर लड़ते रहना, मन का स्वभाव है। द्वंद्व, कलह, खंडित होना, मन की नियति और प्रकृति है।
आपने जीवन में बहुत बार निर्णय लिए होंगे, रोज लेने पड़ते हैं, लेकिन मन से कभी कोई निर्णय पूरा नहीं लिया जाता। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, संन्यास हमें लेना है, लेकिन अभी सत्तर प्रतिशत मन तैयार है; अभी तीस प्रतिशत मन तैयार नहीं है। कोई आता है, वह कहता है, नब्बे प्रतिशत मन तैयार है; अभी दस प्रतिशत मन तैयार नहीं है। जब मेरा पूरा मन तैयार हो जाएगा, तब मैं संन्यास में छलांग लगाऊंगा। मैं उनसे कहता हूं कि पूरा मन तुम्हारा किसी और चीज में कभी तैयार हुआ है?
पूरा मन कभी तैयार होता ही नहीं। और जब कोई व्यक्ति पूरा तैयार होता है, तो मन शून्य हो जाता है; मन तत्क्षण विदा हो जाता है। अधूरे आदमी के पास मन होता है, पूरे आदमी के पास मन नहीं होता। बुद्ध, या राम, या कृष्ण जैसे व्यक्तियों के पास मन नहीं होता। और जहां मन नहीं होता, वहीं आत्मा के दर्शन, वहीं परमात्मा की झलक मिलनी शुरू होती है। 🐾
मंझली भाभी
आज मनुआ को देखने और उसके परिवार से मिलने लड़की वाले पटना के मौर्या होटल में आने वाले थे ।मनुआ ने फ़ोन पर भइया और मंझली भाभी को अच्छे से सारी तैयारी कर लेने के लिए बोला था।इंजीनियरिंग करने के बाद मनु दिल्ली के बडी कंपनी में एक साल से नौकरी कर रहा था ।
इधर मंझली भाभी और भइया बड़े चिंता में थे क्योंकि भाभी के पास एक अच्छी सी साड़ी और भइया के पास अच्छा से कुर्ता तक न था।
सात साल पहले मंझली भाभी छोटे घर से बेरोजगार मंझले भइया से व्याह कर आईं थीं।।बड़े भइया को डॉक्टरी पढ़ाने में पिताजी की छोटी से जमा पूंजी भी ख़त्म हो गयी थी और डॉक्टर बनने के बाद बड़े भइया एक डॉक्टरनी से खुद शादी कर लिए। बड़की भाभी ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवार देख सबसे उनका रिश्ता नाता भी तोड़वा दिया था।
फिर मंझले भइया किसी तरह परीक्षा पास कर बड़ा बाबू हो गए । माँ बाप को गाँव मे रखकर पटना में एक कमरे का छोटा सा घर किराए पर लेकर छोटे भाई मनुआ को पढ़ाने लगे।मनुआ को कंप्यूटर इंजीनियर बनने का बड़ा शौक था।
ऊपरी आमदनी कुछ थी नहीं।पटना जैसे महँगे शहर में रहने छोटे भाई मनुआ को कॉलेज और ट्यूशन का पैसा वहन करने और माँ बाप को भी कुछ पैसे भेजने के बाद गृहस्थी की गाड़ी बड़ी मुश्किल से चल रही थी।उनका तीन साल का एक छोटा सा बच्चा भी था।
फिर भी मंझले भईया ने कभी भी उफ्फ तक नहीं की। मंझली भाभी ने तो जैसे अपने शौक को बलिदान कर दिया था मनुआ की पढ़ाई की खातिर घूमना फिरना और जेवर सोना तो दूर की बात, आज तक एक नई साड़ी तक कि जिद न की।पढ़ने के लिए घर मे जो एक ही कमरा था वो भी दे देतीं और बच्चे से पढ़ाई में कोई बाधा न हो बच्चे को लेकर पड़ोस में चली जाती।खुद और भइया तो कम दूध वाली फीकी चाय पीते ही अपने बच्चे को भी थोड़ा दूध कम देतीं लेकिन मनुआ को खाने पीने में कोई कमी न होने देतीं।
मनुआ के बहुत अच्छे रिजल्ट के बाद एक सप्ताह के भीतर इंजिनीरिंग कॉलेज में नामांकन के लिए पचास हजार रुपये की जरूरत थी कोई उपाय न सूझ रहा था।अंत में बड़े भाई को फ़ोन लगाया गया पर पैसे की कोई कमी ना होने के बाद भी बडी भाभी ने पैसे की कमी का रोना शुरू कर दिया।
अब कल ही नामांकन का आखिरी दिन था ।उसी वक़्त मंझली भाभी ने अपना मंगलसूत्र और शरीर के सारे गहने उतारकर भइया के हाथ में रख दीं और कसम दे दी थी।इसके बाद भी पढ़ाई पूरी होने तक मनुआ की सारी जिम्मेवारियों को मंझले भाई और भाभी ने उठाया।
बर्षों बाद आज मंझली भाभी और भइया मनुआ के रिश्ते के लिए आए लड़की वालों से इतने बड़े होटल में कैसे और किस हाल मिलेंगे ये सोच ही रहे थे कि अचानक से मनुआ हाथ में कई पैकेट्स लिए आ गया।
सबसे पहले भाई के पैर छूते हुए एक सूट पैंट निकाला और बोला "जरा पहन कर दिखाइये भइया" फिर भतीजे का सुंदर सा ड्रेस दिया और बोला" तुम्हारी पढ़ाई की सारी जिम्मेवारी मेरी अब तुम मेरे साथ रहकर पढ़ाई करोगे और छुट्टीयो में हम सब एक साथ रहकर खूब मस्ती करेंगे" ये सुनकर वो खुशी से नाचने लगा फिर अंत में मंझली भाभी के छुड़ाकर लाये पुराने गहनों के अलावा कई नए गहने और साड़ियां देकर पैरों में गिरकर बोला " ना मत कहना मंझली भाभी मुझे नही पता देवी कैसी होती है पर वो आपके जैसी ही होती होगी मंझली भाभी......"
"माँ-बेटा"
अपने पुश्तैनी घर का गेट खोलकर मैं घर के अंदर हुआ तो जालीदार दरवाजे से मैंने माँ को बैड पर बैठे देखा। आंखों पर मोटे लैंस का चश्मा लगाए,माला फेरते हुए।
"कौन है ?" मां ने अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाजे की ओर देखते हुए कहा। बुढ़ापे के हमले ने माँ की आंखों की रोशनी पर गहरा असर डाला था।
पर बुढ़ापा माँ की सुनने की शक्ति के आगे बेबस था, कदमो की आहट से वो किसी की आमद ताड़ गयी थी।
मैं वहीं दरवाजे पर इस आस में खड़ा रहा कि माँ मुझे मेरे कदमो की आहट से पहचान जाएगी।
परिवार के किसी भी सदस्य के घर मे घुसने से पहले ही उसकी आमद का सही अंदाज़ा लगा लेने की कला मे माँ का कोई सानी न था।
बचपन में उसकी इसी कला से हम भाई बहिन पिता जी की डांट खाने से बच जाते थे।
"चलो टी वी बन्द कर किताबे खोल लो तेरे पिता जी गेट खोल रहे हैं"
"टिंकू आ रहा है ,आते ही चाय मांगेगा" मां चाय का पानी अंगीठी पर चढ़ाते हुए कहती। और मां के कयास के अनुरूप ही 30 सेकंड बाद मेरा बड़ा भाई टिंकू आता और आते ही चाय मांगता।
कमाल की थी माँ !
हम भाई बहिन जहां कोई आहट न सुन पाते वहीं मां कैसे न सिर्फ छोटी से छोटी आहट सुन लेती ये हमारे लिए हमेशा रहस्य ही रहा ।मां पूछने पर बस मुस्कुरा देती और कहती बेटा "सुनने के लिए बस दिमाग चाहिए।इंसान के कदमो की आहट तीन चार बार सुन लो। फिर अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं।" माँ हमे समझाने की गरज से कहती।
"हां अगर इंसान की चाल ढाल बदल जाये फिर अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल होता है" माँ कहकर अपने काम मे लग जाती और हम अपने कान खुजाते रह जाते।
इधर जब भी मैं अपने पुश्तैनी घर माँ से मिलने जाता तो पाता कि माँ अब मेरी आमद का अंदाज़ा मेरे कदमो की आहट से न लगा पाती।
आज भी इसी आस में दरवाजे पर रुक गया कि शायद माँ मुझे मेरे कदमो से ही पहचान ले।
"अरे बहु देख तो कौन है?" माँ ने मेरी भाभी को आवाज देते हुए कहा।
"अरे मैं, टिल्लू माँ" माँ के पांव छूते हुए मैने कहा।
"अरे टिल्लू मेरे बेटे" माँ ने मेरे माथे पर स्नेह बरसाया।
"कैसा है तू?"
"बहु पानी ला, मेरा टिल्लू आया है ।"
"और बहु कैसी है बाल बच्चे कैसे हैं"माँ के
सवाल वही थे जो वो हर बार मेरे मिलने पर पूछती थी और मेरे जवाब भी वही घिसे पिटे "सब ठीक हैं,बढ़िया हैं" टाइप थे।
आज भी अपने पुश्तैनी घर मे मैं अपने व्यक्तिगत काम से अपना बैंक एकाउंट बन्द कराने आया था। बस अब माँ बाप से मुलाकात इसी तरह किसी अपने काम के सिलसिले में ही होती थी।
मां के सवालों से बेखबर मैं अपनी सोच में गुम था "मां को भी लगता है बुढ़ापे का जंग मार गया है जो अब मेरी आमद मेरे कदमों से पहचान नहीं पाती।"
ऐसा नहीं था कि मेरी माँ के सुनने की शक्ति कम हो गयी थी। स्त्री सुलभ दूर से ही फुसफुसाहटों को सुन लेने का गुण अभी भी उसमे कायम था। इसीलिए मैं समझ गया कि बुढ़ापा मेरी माँ को आगोश में ले चुका था जो वो अपनी दूसरी कलाओं को भूल रही थी ।
"बच्चे कौन कौन से क्लास में पढ़ रहे हैं टिल्लू?" मां के सवाल जारी थे ।
मैंने भी कोई जवाब दे दिया माँ को।
मैं सोच की दुनिया में व्यस्त था और माँ थी कि लगातार बतिया रही थी -
"अपनी सेहत का ख्याल रखा कर। ज्यादा टी वी मत देखा कर ।"मानो मैं अभी भी 10 साल का बच्चा होऊं ।
"विमला के पोती हुई है, बिल्कुल पर बाप पर गयी है" । अब ये विमला कौन थी मैंने पूछने की जहमत नहीं उठाई। जब हम जिनको जानते है उनका कोई फिक्र ध्यान नहीं रखते तो फिर अजनबियों के बारे में जानकर क्या करना?
"रघु का दादा अस्पताल में भर्ती है दमे से, इतनी सिगरेट पीता था कि एक दिन ये होना ही था"
"तेरी बुआ आई थी मिलने अभी पिछले महीने, अपने बेटे रिंकू की शादी का न्योता देने,"
मैं भी अपनी माँ की बातों का जवाब "हां',"अच्छा","ओह" कहकर दे रहा था।
माँ मानों मुझे सबकुछ बता देना चाहती थीं। वो शायद अपने बेटे से मुलाकात के छोटे से वक्त के हर लम्हे को नचोड़ लेना चाहती थी ।
"अब तेरे डैडी रोज़ लड़ने लगे हैं मुझ से। लगता है सठिया गए हैं। अब कल की बात सुनो...." I "अरे ....आ जा, आ जा मेरी:. टिन्नी रानी, तेरे लिए टाफी है मेरे पास"
अपनी माँ का यूँ बीच मे दूसरी बात शुरू कर देना मुझे अजीब लगा। टिन्नी मेरे छोटे भाई की तीन साल की बेटी थी जो कि दूसरे कमरे में सो रही थी। और जहाँ हम बैठे थे उस के आस पास मुझे कोई आहट तक सुनाई नहीं दी थी , माँ इतनी रफ्तार से बतिया जो रही थी।
"अरे माँ टिन्नी दूसरे कमरे में सो....." इस से पहले कि मैं अपनी बात पूरी कर पाता, टिन्नी कमरे में आ कर अपनी दादी के पास खड़ी थी।
"देख टिन्नी तेरे ताऊ आये हैं"माँ ने टिन्नी के गाल पर स्नेह बरसाते हुए मेरी ओर इशारा करते हुए कहा।
उधर टिन्नी शर्मा कर अपनी दादी के अंक में सिमटी और इधर मैं अपनी सोच को समेट कर वास्तविकता के धरातल पर जोर से गिर गया ।
थोड़ा सोचने के बाद मन मे कुलबुलाता सवाल मैंने माँ से पूछ ही लिया।
"माँ आप मेरी आमद का तो अंदाजा लगा नहीं पाती फिर टिन्नी की आमद का अंदाजा कैसे लगा लिया"।
"अरे बस अब कभी कभी कान दग़ा दे जाते हैं लगता है बुढ़िया गयी हूँ"। अपना चेहरा अपनी पोती की ओर घुमाते हुए मां ने कहा।
मेरी माँ यूँ तो दुनियावी मामलों में बहुत स्मार्ट थी पर झूठ बोलने की कला में नौसिखिया ही थी आज तक ! इस बुढ़ापे के सफर तक। झूठ बोलते ही चेहरा घुमा लेने की उसकी आदत अब तक जस की तस बरकरार थी।
"अरे बस अब कभी कभी कान दग़ा दे जाते हैं लगता है बुढ़िया गयी हूँ"।कितना सफेद झूठ इतनी आसानी से बोल गई माँ।
बचपन की तरह आज भी माँ ने मेरी कमियों को ढांप लिया था ।
माँ आज भी वही माँ ही थी। उम्र में बेशक बड़ि हुई हों पर भावनात्मक रूप से वहीं थी जहां बरसों पहले थी पर उसका बेटा शायद भावनात्मकता की ज़मीन से कहीं ऊपर उठ चुका था ।
मैं जान गया कि माँ के कान सही थे और कदमों से दूसरों की आमद का अंदाज लगाने की कला में भी रत्ती भर बदलाव नहीं आया था।
बदलाव आया था तो शायद उसके बेटे के स्वार्थ निहित व्यवहार में और व्यवहार कैसे चाल ढाल पर असर डालता है ये जानने के लिए कोई मनो विज्ञानी होने की जरूरत नहीं थी मुझे।
"बेटा कभी बहु बच्चों को भी साथ लाया कर।बरसों बीत गए उन्हें देखे।"माँ ने मेरा हाथ अपने हाथ मे लेकर कहा।
"अगली बार लाऊंगा साथ में।" हर बार की तरह इस बार भी झूठ बोल दिया मैंने।
कुछ झूठ बोलना और सुनना हमारी ज़िंदगी का वैसे ही हिस्सा बन जाता है जैसे अपनी स्वार्थ परायण ज़िन्दगी में कुछ रिश्तों को झेलना।
भाभी द्वारा रखी कब की ठंडी हो चुकी चाय को एक ही बार मे गटक कर मैं भारी अपराध बोध के साथ खड़ा हो गया।
"अच्छा माँ चलता हूँ," कहकर मैने माँ के पैर छुए और भारी कदमो से घर से निकल गया !!
19/10/2017
दीपमालाओं की तरह ही आपका जीवन सदैव समृद्धि और खुशियों से जगमग करता रहे इसी मनोकामना के साथ प्रकाश पर्व दीपावली के शुभ अवसर पर आपको परिवार सहित बहुत बहुत शुभकामनाएं!! 🙏🏻
03/09/2017
Dream for my school
in creative move...
10/02/2017
प्रिय मित्रों,
मुझे अपने विद्यालय (ए० एस० वी० जे०) पर गर्व है, साथ ही अपने अध्यापको पर भी। मैं विद्यालय में छठी कक्षा से ग्यारवी कक्षा तक पढ़ा 1977 तक। आज मन कर रहा है कि मैं अपने सारे भाइयो को यह बताऊ की मुझे अपने स्कूल शिक्षा के दौरान इन सब अध्यापको ने बहुत ही अच्छी छाप छोड़ी जिन्हे मै आज भी याद करता हूं अपने मार्गदर्शको के रूप में ....
श्री रामनाथ जी,श्री नौबत राय जी,श्री गंगाशरण तृषित जी,श्री महेशचंद शर्मा जी,श्री रामानंद जी,श्री ईश्वरसिंह जी,श्री राजकुमार जी,श्री एस पी सिंह जी(जीव विज्ञान),श्री एस पी सिंह जी(भौतिक ज्ञान),श्री सहगल जी(रसायन ज्ञान), श्री प्रमोद सिंघल जी,श्री जे पी शर्मा जी,और श्री आर के त्रिपाठी जी।
आप सब दोस्तों से यही प्रार्थना है कि आप सबको जो भी विद्यालय की याद आने पर जिस भी वृतांत की याद आये हम सबके लिए यहाँ लिखे ताकि एक बार फिर थोड़े समय के ही लिए सही, हम बचपन को जी सके।
आप सबके साथ की कामना करता हूं।
धन्यवाद।।
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