"अग्नि गुलाब"
धूप के विशाल तवे पर तप कर
जब मेरा शरीर
तुम्हारी ममता की शीतलता में
कुछ देर ठहर पाता है
इस दुनिया के सारे सुकून
हवाओं में घुल कर
मेरे दिल के पोर-पोर में
तुम्हारा चेहरा बनकर
खिल उठता है|
बिल्कुल आग की तरह खिलता है
तुम्हारा चेहरा अग्नि गुलाब
लेकिन तपिश नहीं होता उसमें
सूरज की तरह
पल्लवित करता है वह
मेरे सच्चे अरमानों को
इसलिए लौट आता हूँ मैं
तुम्हारी आग की शीतलता में|
हो सकता है मैं
अब तक भस्म हो चुका हूँ
और विलीन हो गया हूँ
तुम्हारी मुस्कान के तूफ़ान में
पर मुझे फिर भी
उसी शीतलता का एहसास है
जिसने मेरा अस्तित्व मिटाया है|
मेरे बाद भी तुम्हारे पास
कई पक्षी उड़ कर आएंगे
उदित होगा फिर एक
तपिश विहीन नया सूरज
तुम फिर खिलना इसी तरह
मेरे अग्नि गुलाब
और देना सबको
शीतलता का एहसास|
(जाहिदुल दीवान)
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"चयन"
सही हो या गलत
चयन ही जीवन है|
आत्मा को मानते हो तो
शरीर धारण करना चयन है,
चयन के कारण ही सुख है
चयन के कारण है दुःख|
सब कुछ मन को पता है
कितना और क्या,
क्यों चाहिए तुम्हें
फिर भी भटकते हो अगर
यही अज्ञान है|
दोषी नहीं है कोई दूसरा
अगर तुम्हीं ने चुना है गलत तो,
आधे-अधूरे तो सिर्फ
मन का एक भ्रम है|
चयन ही जिसका गलत है
जीवन उसी का नरक है|
(जाहिदुल दीवान)
24/03/2024
अब डर लगता है
सिर्फ समय की गति से,
पछाड़ न दे मुझे वह
जिंदगी की कुश्ती में|
'भीड़ की कामयाबी'
चाणक्य और चन्द्र गुप्त
समाहित हैं एक में,
दिल-ओ-दिमाग में भी
कोई भेद नहीं|
पढ़ कर देखा है बार-बार
चमकती हुईं चेहरों को,
शिकन से लिखा है जिन पर
कामयाबी की दास्तां!
सिर्फ शब्द ही हैं,
फिर भी ज़माने से
कोई आवाज़ नहीं आती?
जीत तो पक्की है
कहते रहें सब,
पर सुनते कोई नहीं|
दब गयी आवाज़ सबकी
अपने ही चेहरे के बीच में,
आखिर किसने क्या पाया?
कोई जानते भी नहीं||
(जाहिदुल दीवान)
'नई राह'
मिट रहीं हैं हजारों दास्ताएँ,
आहें बन रहे हैं अब इतिहास|
फिर से एक बार
भीड़ के चेहरों में
खुद को ढूंढने निकला हूँ|
(जाहिदुल दीवान)
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं|
मंगल भवन अमंगल हारी|
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी||
"हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥"
"मैं राज्य भोगने नहीं, भुगाने आया,
हंसों को मुक्ता-मुक्ति चुगाने आया।
भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया,
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया!
सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।"
छोटा सा प्रश्न:
मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'नर हो, न निराश करो मन को' उनके किस काव्य संकलन में संकलित है और वह कब प्रकाशित हुआ था?🙏
'Gallery' का हिंदी पारिभाषिक शब्द क्या?
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