Inder Singh

Inder Singh Founder Member- Inder Mehra,

31/12/2016

वो कल भी भूखा सोया था फुटपाथ में
अचानक खूब पटाखे चले रात में
झूमते चिल्लाते नाचते लोगों को देखा तो हर्षाया
पास बैठी ठिठुरती मां के पास आया
बता न माई क्या हुआ है क्या बात है
मां बोली बेटा आज साल की आखरी रात है
कल नया साल आएगा
बेटा बोला मां क्या होता है नया साल
अरे सो जा मेरे लाल
मैं भीख मांगती हूँ तू हर रोज़ रोता है
साल क्या हम जैसों की ज़िन्दगी में कुछ भी नया नहीं होता है

01/08/2016

वंदे मातरम्, वंदे मातरम्!
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्,
शस्यश्यामलाम्, मातरम्!
वंदे मातरम्!
शुभ्रज्योत्सनाम् पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदाम् वरदाम्, मातरम्!
वंदे मातरम्, वंदे मातरम्॥.

31/07/2016

बम

उस घर पर बम ना गिराना कि वहाँ भी एक बेटा रहता हैं
खटिया पर खांसता हुआ एक बुढा भी लेटा रहता हैं !

एक धमाका खामोश कर देता हैं मुस्कान कई माँऔ की
क्या बम बनाने वाले नहीं जानते कि माँ का भी कलेजा रहता हैं !

जहाँ बम नहीं गिर रहे वहाँ बन्दूके निकल आई हैं
मजहब के नाम पर मौत की संदूके निकल आई हैं !

मैं जानता हूँ मेरे दरवाजे पर किसी धमाके की आवाज़ नहीं आती हैं
देखते हैं कब तक मेरा शहर इस गूंज से महफूज़ रहता हैं !

शान से कह देते हैं हम लोग कि हमें क्या करना हैं
हर कायर इस मुल्क में मासूम बनकर रहता हैं !

हर सुबह “ठाकुर” खुद से ये सवाल पूछता रहता हैं
अख़बार की इन सुर्खियों पर तू कैसे चाय की चुस्किया लेता रहता हैं !

14/07/2016

A poor child thought in this poem

काश! हमें भी मिल जाते
खूब सारे पैसे
सच हो जाते फिर तो मन के
सपने कैसे कैसे।
खाते लड्डू, पेड़े, बर्फी
रसगुल्ले की मिठाई
चॉकलेट और टॉफी के संग
करते मौज मनाई।
नए-नए खिलौने लाते
हम तो करते मस्ती
हाथ कटोरा लेकर फिर ना
फिरते बस्ती बस्ती।
कूड़े और कचरे में हम ना
बचपन अपना खोते
आधी सूखी रोटी खाकर
भूखे हम ना सोते।
स्कूल पढ़ने जाते हम भी
नया-नया बस्ता लेकर
पढ़ लिखकर बन जाते अफसर
नहीं मारता कोई ठोकर।
जाते पिकनिक सैर, सपाटा
कुल्लू और मनाली
जेबे रहती गरम-गरम
कभी ना होती खाली।

12/07/2016

मैं उस व्यक्ति पर दया नहीं करता जो कठिन परिश्रम करता है . मैं उसकी प्रशंशा करता हूँ . मैं उन पर दया करता हूँ जो काम नहीं करते , चाहे वो खुद को समाज के जिस अस्तर पर समझे .

11/07/2016

By
Maithili Sharan Gupt.

नर हो, न निराश करो मन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।

10/07/2016

Do not waste a single moment in your life.
Be simple but look stylish
Be tough but look soft
Be tensed but look cool
Be a beginner but look winner.
That is the way of life
Life has no pause buttons.

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