01/03/2026
“ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?”
*“ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?”*
ये गुरु दत्त की _"प्यासा"_ फिल्म के गाने के बोल हैं..
यह उस दुनिया पर प्रश्न है
जिसे हमने सामान्य मान लिया है।
*तथ्य आँखो के सामने हैं -*
📊 राजधानी का AQI (फ़रवरी 2026) *~230+*, अधिकांश दिन *‘खराब’ से ‘बेहद खराब’ श्रेणी में*
📉 *21वी सदी के शुरुआती दो दशकों में 1 करोड़+ महिलाएं गायब – लिंग-चयन आधारित गर्भपात (UNFPA)
📊 दुनिया भर में *हर 5 में 1 लड़की* और *हर 13 में 1 लड़का* बचपन में यौन शोषण का शिकार (अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टस)
📉 दुनिया हर साल लगभग *1 करोड़ हेक्टेयर जंगल* खो रही है (FAO)
*हम विकास के नाम पर*
*अपना ही आधार काट रहे हैं।*
*अब प्रश्न*
हम यह सब जानते हैं।
फिर भी हम सामान्य कैसे बने रहते हैं?
घिन्न क्यों नहीं उठती?
या उठती है - पर क्षण भर के लिए?
समस्या केवल व्यवस्था की नहीं है। *समस्या आंतरिक वृत्ति की है।*
_सुविधा > सत्य_
_लाभ > विवेक_
_भीड़ > चेतना_
जब तक व्यक्तिगत स्वार्थ सुरक्षित है,
व्यवस्था चाहे कितनी भी क्रूर क्यों न हो —
हम उसे स्वीकार कर लेते हैं।
यही वह बिंदु है जहाँ आचार्य जी की शिक्षा प्रासंगिक हो जाती है।
*“नहीं चाहिए ऐसी व्यवस्था”* - कहना आसान है।
पर उसके लिए अपने भीतर की मिलीभगत तोड़नी पड़ेगी।
और इसी बदलाव के लिए आज आचार्य जी संघर्षरत हैं।
वे आज अरबों लोगों तक पहुँच रहे हैं - एक अद्वितीय बोध-संपदा के माध्यम से 🔥
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वे दिन-रात प्रयासरत हैं, ताकि हम सबके जीवन में रोशनी फैल सके।
लेकिन सीमित संसाधनों के साथ ऐसा परिवर्तन संभव नहीं है।
*यथासंभव सहयोग दें*
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_क्योंकि दुनिया बदलने से पहले_
_मानव-चेतना बदलनी होगी।_
~ PrashantAdvait Foundation, on Acharya Prashant's Gita Mission App.