19/01/2013
युग बदल गए .... समय बदल गया ..... परंतु विक्रमादित्य के स्वभाव में थोडासा भी फर्क नहीं पड़ा था !..... नाही उसका जिद्दीपन कम हुआ था !
हमेशा की तरह ...उस अमावस्या के रात में भी अपने हाथों में नंगी तलवार लेके निकल पड़ा ...... घन घोर अंधेरा था .... काँटों से भरे .... जंगली जानवरों से भरे जंगल में अपना रास्ता निकाल कर चल रह था .... सभी संकटो का सामना करके अंतिमतः समशान में आ पहुंचा ! ..... विक्रमादित्य पेड़ पर लटक रहे शव को जमीन पे उतार लाता है. उसे अपने कंधे पर उठाकर फिर से आये रस्ते पर चल पड़ता है !
"विक्रम, .... सच में तुझ जैसा जिद्दी इंसान सारे त्रिभुवन में ढुंडने पर भी नहीं मिलेगा ! " उस शव में छिपकर बैठे हुए वेताल ने अपना मुंह खोला, '" अरे क्यू बेकार में मेरे पीछे पड़ा है ? आज तक अनगिनत बार तूने मुझे पकडनेकी कोशिश की ..... पर में ना कभी तेरे हाथ लगा न लगने की संभावना है ! फिर भी तू तेरा हट छोड़ने को तैय्यार नहीं है .... जाने दे व्यर्थ में बड़बड़ाने का कोई लाभ नहीं ! इससे तुझपर कोई फर्क ...नहीं पड़ने वाला , चल अब इतना लंबा रास्ता चलना है तो तेरा थोडा मनोरंजन करने के लिए तुझे एक कथा सुनाता हु .... सुन .... 'एक परिवार' था 121 करोड़ की आबादी पर 60 साल से राज कर रहा था ............ चल अब बता 'एकही परिवार 121 करोड़ जनता पे कैसे राज कर रहा था ?' अगर तूने गलत जवाब दिया तो तेरे सर के तुकडे तुकडे हो जायेंगे !!!'" एकही वाक्य में कथा समाप्त करके वेताल ने सवाल पूछ लिया !......
" क्यू के जनता मुर्ख थी ...." विक्रम ने उत्तर देने के लिए क्षणभर की भी देरी नहीं की !!!!!
और दुसरे ही क्षण वेताल शव के साथ ही विक्रम के कंधेपर से भाग गया ! '