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I am a native of Bihar(India), and I earned my bachelor's degree in electrical engineering from Raj

I've always been an engineer devoted to the potential of advanced technologies. Like most engineers, I have a keen sense of curiosity and a deep desire to learn. Garmin was my first entrepreneurial endeavour, and it has been an incredible journey. Read more at https://www.brainyquote.com/authors/min-kao-quotes

08/12/2025

Girls' Dark Secrets
First secret -
They can love someone for years without telling anyone, and the other person will never even know.
Second secret
If someone has hurt them very deeply, they will forgive... but will never forget it for their entire life.
Third secret
When they are broken inside, they still smile the most, because they do not want to show their weakness to anyone.
Fourth secret
They express love through behavior, not words. If they are growing distant, then something in their heart is definitely broken.
Fifth secret -
Girls always remember the person who understood them with a true heart

31/10/2025

1857 के संग्राम में लखनऊ की पासी वीरांगना उदा देवी ने अपने साहस से इतिहास रच दिया था। जब ब्रिटिश सेना ने सिकंदरबाग पर हमला किया, तो उन्होंने इमली के पेड़ पर चढ़कर दर्जनों अंग्रेज़ सिपाहियों को मार गिराया।

बाद में जब उनका शव मिला, तो सैनिक यह जानकर दंग रह गए कि वह एक महिला थीं — जिन्होंने सिपाही का वेश धारण कर देश की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी थी।

उदा देवी ने अपने पति मक्का पासी की शहादत के बाद बदला लेने की कसम खाई थी और बेगम हज़रत महल के नेतृत्व में महिलाओं की एक सेना ‘दलित वीरांगनाएँ’ बनाई थी।

आज भी 16 नवंबर को लखनऊ में ‘उदा देवी शहीद मेला’ मनाया जाता है, जो उनके बलिदान और दलित साहस की मिसाल को जीवित रखता है।

31/10/2025

🤯 दोगलापन की पराकाष्ठा! 🇮🇳
आज देश में ईसाईयों के नियम "बाइबल" से, मुसलमानों के नियम "कुरान" से तय होते हैं। लेकिन हिंदुओं के लिए नियम कौन तय कर रहा है? "सुप्रीम कोर्ट"! यह कैसा दोहरा मापदंड है? क्या हमारे देश में ही ऐसी विसंगति देखने को मिलेगी? एक तरफ धार्मिक स्वतंत्रता, दूसरी तरफ एक समुदाय के मामलों में कानूनी दखलंदाजी। क्या यह न्यायसंगत है? इस दोगलेपन पर सवाल उठाना ज़रूरी है!

🤔 धर्मनिरपेक्षता या छलावा?
यह तस्वीर और नीचे लिखा संदेश एक बड़ी सच्चाई बयां करता है। जो नेता खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं, उनके राज में ही यह फर्क क्यों? क्या देश का संविधान सभी धर्मों के लिए एक समान नियम नहीं चाहता? जब बात पर्सनल लॉ की आती है, तो कुछ धर्मों को छूट क्यों? देश को बांटने वाली यह मानसिकता आखिर किसकी देन है? हमें सोचना होगा कि देश किस दिशा में जा रहा है।

😡 देश के गद्दार कौन?
इस तरह का भेदभाव सिर्फ हमारे देश में क्यों? क्या यह सब उन नेताओं और पार्टियों की देन नहीं है, जिन्होंने अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए देश को इस तरह की दोहरी नीति में उलझा दिया? देश की एकता और अखंडता को चोट पहुँचाने वाले ऐसे फ़ैसले "गद्दारी" से कम नहीं हैं। देश की जनता को अब जागना होगा और इस पाखंड को ख़त्म करना होगा। इन नेताओं की सचाई को घर-घर पहुँचाना हमारा कर्तव्य है।

🚨 अब बस! आवाज़ उठाओ! ✊
अगर आप इस भेदभाव से सहमत नहीं हैं, तो अपनी आवाज़ बुलंद करें! देश में सभी नागरिकों के लिए, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, एक समान कानून (UCC) होना चाहिए। यह देश की समानता और एकजुटता के लिए आवश्यक है। इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें ताकि यह सच्चाई सब तक पहुँच सके। सत्यमेव जयते!

24/08/2024

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06/10/2023

इतिहास में छुपाया गया एक सच ....वीर सावरकर जी ।

45 साल के महात्मा गाँधी 1915 में भारत आते हैं, 2 दशक से भी ज्यादा दक्षिण अफ्रीका में बिता कर। इससे 4 साल पहले 28 वर्ष का एक युवक अंडमान में एक कालकोठरी में बन्द होता है। अंग्रेज उससे दिन भर कोल्हू में बैल की जगह हाँकते हुए तेल पेरवाते हैं, रस्सी बटवाते हैं और छिलके कूटवाते हैं। वो तमाम कैदियों को शिक्षित कर रहा होता है, उनमें राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ प्रगाढ़ कर रहा होता है और साथ ही दीवालों कर कील, काँटों और नाखून से साहित्य की रचना कर रहा होता है। उसका नाम था- विनायक दामोदर सावरकर।

उन्हें कई बार आत्महत्या के ख्याल आते। उस खिड़की की ओर एकटक देखते रहते थे, जहाँ से अन्य कैदियों ने पहले आत्महत्या की थी। पीड़ा असह्य हो रही थी। यातनाओं की सीमा पार हो रही थी। अंधेरा उन कोठरियों में ही नहीं, दिलोदिमाग पर भी छाया हुआ था। दिन भर बैल की जगह कोल्हू घुमाते रहो, रात को करवट बदलते रहो। 11 साल ऐसे ही बीते। कैदी उनकी इतनी इज्जत करते थे कि मना करने पर भी उनके बर्तन, कपड़े वगैरह धो देते थे, उनके काम में मदद करते थे। सावरकर से अँग्रेज बाकी कैदियों को दूर रखने की कोशिश करते थे। अंत में बुद्धि को विजय हुई तो उन्होंने अन्य कैदियों को भी आत्महत्या से विमुख किया।
लेकिन नहीं, महा गँवारों का कहना है कि सावरकर ने मर्सी पेटिशन लिखा, सॉरी कहा, माफ़ी माँगी।
अरे मूर्खों, काकोरी कांड में फँसे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने भी माफ़ी माँगी थी, तो? उन्हें भी 'डरपोक' करार दोगे? बताओ। उन्होंने भी माफ़ी माँगी थी अंग्रेजों से। क्या अब इस कसौटी पर क्रांतिकारियों को तौला जाएगा? शेर जब बड़ी छलाँग लगाता है तो कुछ कदम पीछे लेता ही है। उस समय उनके मन में क्या था, आगे की क्या रणनीति थी- ये आज कुछ लोग अपने घरों में बैठे-बैठे जान जाते हैं।
कौन ऐसा स्वतंत्रता सेनानी है जिसे 11 साल कालापानी की सज़ा मिली हो। नेहरू? गाँधी? .....कौन?
नानासाहब पेशवा, महारानी लक्ष्मीबाई और वीर कुँवर सिंह जैसे कितने ही वीर इतिहास में दबे हुए थे। 1857 को सिपाही विद्रोह बताया गया था। तब इसके पर्दाफाश के लिए 20-22 साल का एक युवक लंदन की एक लाइब्रेरी का किसी तरह एक्सेस लेकर और दिन-रात लग कर अँग्रेजों के एक के बाद एक दस्तावेज पढ़ कर सच्चाई की तह तक जा रहा था, जो भारतवासियों से छिपाया गया था। उसने साबित कर दिया कि वो सैनिक विद्रोह नहीं, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। उसके सभी अमर बलिदानियों की गाथा उसने जन-जन तक पहुँचाई। भगत सिंह सरीखे क्रांतिकारियों ने मिल कर उसे पढ़ा, अनुवाद किया।
दुनिया में कौन सी ऐसी किताब है जिसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था? अँग्रेज कितने डरे हुए थे उससे कि हर वो इंतजाम किया गया, जिससे वो पुस्तक भारत न पहुँचे। जब किसी तरह पहुँची तो क्रांति की ज्वाला में घी की आहुति पड़ गई। कलम और दिमाग, दोनों से अँग्रेजों से लड़ने वाले सावरकर थे। दलितों के उत्थान के लिए काम करने वाले सावरकर थे। 11 साल कालकोठरी में बंद रहने वाले सावरकर थे। हिंदुत्व को पुनर्जीवित कर के राष्ट्रवाद की अलख जगाने वाले सावरकर थे। साहित्य की विधा में पारंगत योद्धा सावरकर थे।
आज़ादी के बाद क्या मिला उन्हें? अपमान नेहरू व मौलाना अबुल कलाम जैसों ने तो मलाई चाटी सत्ता की, सावरकर को गाँधी हत्या केस में फँसा दिया। गिरफ़्तार किया। पेंशन तक नहीं दिया। प्रताड़ित किया। 60 के दशक में उन्हें फिर गिरफ्तार किया, प्रतिबंध लगा दिया। उन्हें सार्वजनिक सभाओं में जाने से मना कर दिया गया। ये सब उसी भारत में हुआ, जिसकी स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अपना जीवन खपा दिया। आज़ादी के मतवाले से उसकी आज़ादी उसी देश में छीन ली गई, जिसे उसने आज़ाद करवाने में योगदान दिया था। शास्त्री जी PM बने तो उन्होंने पेंशन का जुगाड़ किया।
वो कालापानी में कैदियों को समझाते थे कि धीरज रखो, एक दिन आएगा जब ये जगह तीर्थस्थल बन जाएगी। आज भले ही हमारा पूरे विश्व में मजाक बन रहा हो, एक समय ऐसा होगा जब लोग कहेंगे कि देखो, इन्हीं कालकोठरियों में हिंदुस्तानी कैदी बन्द थे। सावरकर कहते थे कि तब उन्हीं कैदियों की यहाँ प्रतिमाएँ होंगी। आज आप अंडमान जाते हैं तो सीधा 'वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट' पर उतरते हैं। सेल्युलर जेल में उनकी प्रतिमा लगी है। उस कमरे में प्रधानमंत्री भी जाकर ध्यान धरते हैं, जिसमें वीर सावरकर को रखा गया था।

नमन वीर सावरकर जी 🙏

21/09/2023

बात उन दिनों की है जब Bollywood के महानायक अमिताभ बच्चन अपने करियर के चरम पर थे और
हवाई जहाज से किसी यात्रा पर कहीं जा रहे थे।

उनकी बगल वाली सीट पर एक साधारण से सज्जन व्यक्ति बैठे थे, जिसने एक साधारण शर्ट और पैंट पहन रखी थी। देखने से वह मध्यम वर्ग का लग रहा था, और बेहद शिक्षित दिख रहा था।

अन्य यात्री अमिताभ बच्चन को पहचान रहे थे कि ये कौन हैं लेकिन वो सज्जन Big B की उपस्थिति के प्रति अंजान लग रहे थे
... सर झुकाकर वो अपना पेपर पढ़ रहे थे और खिड़की से बाहर देख रहे थे, और जब चाय परोसी गई, तो उन्होंने इसे चुपचाप पी लिया ।

उस व्यक्ति को देख अमिताभ बच्चन के मन में बातचीत शुरू करने की जिज्ञासा पैदा हुई और उसके साथ बातचीत करने की कोशिश में अमिताभ उन्हें देख मुस्कुराएं। वो आदमी अमिताभ बच्चन की ओर देख विनम्रता से मुस्कुराया और 'हैलो' कहा।

उन दोनों में बातचीत शुरू हुई और अमिताभ ने सिनेमा और फिल्मों से जुड़े हुए विषय को जान बूझकर छेड़ा और पूछा, 'क्या आप फिल्में देखते हैं?'

आदमी ने जवाब दिया, 'ओह, बहुत कम। मैंने कई साल पहले एक फिल्म देखा था। '

अमिताभ ने उल्लेख किया कि मैं फिल्म उद्योग में काम किया है।

आदमी ने जवाब दिया .. "ओह, यह अच्छा है। आप क्या करते हैं?"

अमिताभ बच्चन ने जवाब दिया, 'मैं एक अभिनेता हूं'

आदमी ने सिर हिलाया, 'ओह, यह अद्भुत है!' तो यह बात हैं ...

जब वो दोनों हवाई जहाज से उतरे, तो दोने हाथ मिलाते हुए कहा, "आपके साथ यात्रा करना अच्छा था। वैसे, मेरा नाम अमिताभ बच्चन है!"

उस आदमी ने हाथ मिलाते हुए मुस्कुराया, "थैंक्यू ... आपसे मिलकर अच्छा लगा..मैं जे आर डी टाटा (टाटा ग्रुप का चेयरमैन) हूं!"

है न कमाल का वाकया!

उस प्रसंग से एक सीख मिलती है वो ये कि आप चाहे कितने भी बड़े हो।हमेशा आप से कोई !! बड़ा !! होता है।
और
बड़े लोग अपने बड़प्पन को अपने व्यवहार में भी लाते हैं
नम्र बनो, इसमें कुछ भी खर्च नहीं है। ये सीख भी पाते हैं

22/11/2022

जिन्हें #जंगलराज के बारे में कुछ नहीं पता....वो अपने घर के बड़े लोगों से 18 मार्च 1999 की घटना के बारे में पूछ लें

हल्की हल्की ठंढ।
#जहानाबाद बिहार के #सेनारी गांव में लोग खाना खाकर सोने की तैयारी कर रहे थे कि अचानक सबके दरवाजे खड़खड़ाने की आवाज होने लगी। पूरे गांव में जाग होने लगी ।

लोग घबरा कर उठ गये । कुछ लोग बाहर निकल आए तो देखा कि पूरे गांव को 500 600 नक्सलियों ने घेर लिया है ।
सिर्फ और सिर्फ #भूमिहारों के घरों को घेरा गया है । घरों में घुस कर सभी जवान मर्दों को बंदूक की नोक पर बाहर निकाल कर करीब के तालाब के किनारे एक बूढ़े बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा किया गया। सभी लोगों को तीन ग्रूप में बांटा गया। एक ग्रूप में 15 - 16 साल के लड़कों को खड़ा किया गया

दूसरे ग्रूप में 15 - 16 साल से 40 साल के युवकों को खड़ा किया गया ।

तीसरे ग्रूप में 40 साल से ऊपर के लोगों को खड़ा किया गया।
सेनारी गांव में सारे किसान गरीबी रेखा से नीचे वाले लघु एवं सीमांत किसान थे मगर वे सामंती सोच के माने गए थे क्योंकि वे जाति के भूमिहार थे और लालू यादव को वोट नहीं देते थे ।

फिर कंगारु कोर्ट ने फैसला किया कि सभी को 6 इंच छोटा कर दिया जाए ।मतलब गला काट दिया जाए । ताकीद किया गया कि मरे चाहे नहीं मगर पेट की अंतड़ियों को बाहर निकाला जाए ।

लोग चीखने लगे , घिघियाने लगे मगर उन्मादी भीड़ नारे लगाती रहे और हवा में गोलियां चलाती रही ।एक एक कर गर्दनें कटती रहीं , अंतड़ियों को बाहर निकाला गया । फिर जब लाशों का ढेर लग गया तो उस पर नक्सलियों ने चढ़कर नाच किया और फिर पूरे गांव में घूम घूम कर पुआल के ढेर में आग लगा दिया और चले गए

थाने से दरोगा जी जब चार सिपाहियों के साथ घटना स्थल पर एक घंटे के बाद पहुंचे तो वहां कुल 38 लाशों का ढेर था,रोती विधवांए थीं , बिलखते बच्चे थे , रंभाती हुई गांए थीं और था एक मनहुस सन्नाटा......
दूसरे दिन पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार श्री पी एन सिंह ,जो इसी गांव के निवासी थे , घटना स्थल पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनके पिता जी ,चाचा जी, तीन भाई और तीन भतीजों के गर्दन कटे हुए हैं और अंतड़ियां बाहर निकल आई हैं ।घर के कुल आठ लाशों को देख कर उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे वहीं गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गई।

विधानसभा में जब हंगामा हुआ और विपक्ष ने मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से घटना स्थल पर जाने की मांग रखी तो राबड़ी देवी ने ऐतिहासिक बयान दिया कि
भूमिहार हमारे वोटर नहीं हैं तो हम क्यों जांए?

आज कुछ हरामखोर चंद रुपये लेकर उसी जंगल राज की वापसी की पैरवी और दुआ कर रहे हैं ।

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