03/01/2026
🌹★ یومِ ولادت مولا علی علیہ السلام مبارک ہو ★🌹
The Centre of Reality and Research. An Islamic Research And Education Center.
(Special Study About Sufism, Tasawwuf And Spiritual Science)
Established On 16th June 1994
In The Memory Of SARKAAR E MEEMHINDI HAZRAT SHAH MOHAMMAD AFZAL HUSSAIN HINDI "AJAL" Rhm..
03/01/2026
🌹★ یومِ ولادت مولا علی علیہ السلام مبارک ہو ★🌹
🌹💐 Dawat Nama 📜✨
🌙⭐ Jashn-e-Sarkar MeemHindi (Rahmatullah Alaihi) 🌙⭐
😊🎉 Biradaran-e-Islam aur Ahl-e-Tasawwuf Hazraat, Assalamu Alaikum Wa Rahmatullah Wa Barkatuhu. Bade Hi Musarrat Aur Shadmani Ke Saath Aap Ko Ittila Di Jaati Hai Ki Markaz-e-Afzaliya Education Trust Ke Zer-e-Ehtmaam Har Saal Ki Tarah Is Saal Bhi Nawada (Bihar) Me Jashn-e-Sarkar MeemHindi (Rahmatullah Alaihi) Ka Ineqaad Bade Dhoom Dhaam Se Kiya Ja Raha Hai. Yeh Ba-Waqaar Taqreeb Teen Din Aur Do Raaton Tak Jaari Rahegi Aur Aap Ki Shirkat Hamare Liye Baais-e-Izzat Hogi. 🙏💫
📋 Program Ki Tafseelat:
🌺 1. Pahla Din
🌹 Chadar Poshi aur Gul Poshi — Baad Zuhr
🕌 Ba-Maqaam: Rauza Mubarak, Datraul Shareef
📅 Ba-Tareekh: 28 December 2025
🌙 2. Doosri Raat:
❤ Ishq-o-Marifat Conference
📿 Hamd, Naat, Manqabat aur Sufiya Ekraam ki Khusoosi Taqreerein
📅 Ba-Tareekh: 29 December 2025
🍲 Langar Aam: Shaam 7 Baje Se
⏰ Aaghaaz-e-Majlis: Raat 10 Baje Se Subah 4 Baje Tak
🌙 3. Teesri Raat:
🎵 Mehfil-e-Samaa Ka Khusoosi Programme
🎶 Khusoosi Qawwali Ki Mahfil
📅 Ba-Tareekh: 30 December 2025
🍲 Langar-e-Aam: Shaam 7 Baje Se
⏰ Aaghaaz-e-Majlis: Raat 10 Baje Se Subah 4 Baje Tak
🤲✨ Aap Hazraat Se Purkhuloos Guzarish Hai Ki Is Ba-Barkat Mahfil Me Shirkat Farmakar Mahzooz Hon aur Auliya Allah wa Sufia Ekraam Ke Mission Ko Aage Badhaane Mein Hamari Madad Karein. 🙏💫
✍ Min Jaanib:
🏛 Markaz-e-Afzaliya Education Trust
📍 Address: Raza Nagar Bhadauni, Nawada (Bihar) India
📱 Mobile Number +919572089210
04/10/2025
🌹 گیارویں شریف مبارک 🌹
Jahan Me jo Bhi Nemat Hai Wo Nemat Fatima Ki Hai | By Meraj Afzaly
19/06/2025
مُنکشف راز میم ہندیؒ اگر ہو جائے،
چھوڑ کر سب کو زمانہ ہی اِدھر ہو جائے۔
मुनकशिफ़ राज़ मीमहिन्दी अगर हो जाए,
छोड़कर सबको ज़माना ही इधर हो जाए।
پیر و مرشد کی بھلا تم سے کیا تعریف کروں؟
دیکھ لو تم بھی اگر تم کو نظر ہو جائے۔
पीरो मुर्शिद की भला तुम से क्या तारीफ़ करूं?
देख लो तुम भी अगर तुमको नज़र हो जाए।
عرش و کرسی پہ ہے ہر سمت ہی چرچہ اُن کا،
غیر ممکن ہے کوئی اُن سا بشر ہو جائے۔
अर्सो कुर्सी पे है हर सिमत ही चर्चा उनका,
ग़ैर मुमकिन है कोई उन सा बशर हो जाए।
آپ ظاہر میں ہیں کچھ اور ہیں باطن میں اور،
یا الٰہی یہ بات سب کو خبر ہو جائے۔
आप ज़ाहिर में हैं कुछ और हैं बातिन में और,
या इलाही ये बात सबको ख़बर हो जाए।
التجا پیر و مرشد سے ہے یہ ائے معراؔج،
ساری دنیا میں خاص آپ کا در ہو جائے۔
इल्तिजा पीर व मुर्शिद से है ये ऐ "मेराज",
सारी दुनिया में ख़ास आपका दर हो जाए।
کلام :- معراؔج افضلی
پیشکش :- مرکزِ افضلیہ ایجوکیشن ٹرسٹ
نوادہ بہار (انڈیا)
कलाम :- मेराज अफ़ज़ली
पेशकश :- मरकज़ ए अफ़ज़लिया ऐजुकेशन ट्रस्ट
नवादा बिहार (इण्डिया)
17/06/2025
ائے میرے افضل پیاؒ جی کیا کروں؟ کیا نہ کروں؟
جی نہیں لگتا کہیں بھی تو ہی بتا کیسے جیوں؟
ائے میرے مرشد پیا جی کیا کروں؟ کیا نہ کروں؟
ऐ मेरे अफ़ज़ल पिया जी क्या करूं? क्या न करूं?
जी नहीं लगता कहीं भी तूही बता कैसे जिऊं?
ऐ मेरे मुर्शिद पिया जी क्या करूं? क्या न करूं?
کیا شریعت؟ کیا طریقت؟ تزکیہ کیا تصفیہ؟
کیا طریقۂ مولویت؟ کیا رَوشِ اصفیاء؟
میں نے تو بس تجھکو چاہا، تجھ پہ جیوں تجھ پہ مروں۔۔
क्या शरीअत? क्या तरीक़त? तज़्किया क्या तस्फ़िया?
क्या तरीक़ा ए मौलवियत? क्या रविशे अस्फ़िया?
मैंने तो बस तुझको चाहा, तुझपे जिऊं तुझपे मरूं।।
کیا خلافت؟ کیا اجازت؟ کیا ولایت قطبیت؟
اپنی زندہ باد محبت تیری ہے کافی انسیت۔
شیخ صاحب، پیر صاحب، میں تو نہ ہرگز بنوں۔۔
क्या ख़िलाफ़त? क्या इजाज़त? क्या विलायत क़ुतबियत?
अपनी ज़िन्दाबाद मोहब्बत तेरी है काफ़ी उनसियत।
शैख़ साहब, पीर साहब मैं तो न हरगिज़ बनूं।।
کارہائے دین و دنیا کا ہے تجھ پر ہی مدار،
کچھ خودی باقی نہیں ہے بس خدا پر انحصار۔
میں نہیں ہوں تو وہی ہے کیا کہوں؟ کیا نہ کہوں؟؟
कारहाए दीनो दुनिया का है तुझ पर ही मदार,
कुछ ख़ुदी बाक़ी नहीं है बस ख़ुदा पर इन्हिसार।
मैं नहीं हूं तो वही है क्या कहूं? क्या न कहूं??
تذکرۂ عشق و حُسن ہی ٹھیک لگتا ہے مجھے،
دل تڑپ جائے لرز جائے کوئی ایسا ملے۔
کوئی تو ایسا حُسنِ پیکر کردے مجھکو سرنگوں۔۔
तज़्किरा ए इश्क़ ओ हुस्न ही ठीक लगता है मुझे,
दिल तड़प जाए लरज़ जाए कोई ऐसा मिले।
कोई तो ऐसा हुस्ने पैकर करदे मुझको सर नगुं।।
ہے گزارش آپ سے بس لاج رکھ لینا میرا،
آخرت میں یہ میاں معراؔج ہے کہہ دینا میرا،
میں یہ چاہوں کہ وہاں بھی آپؒ ہی کے سنگ رہوں۔۔
है गुज़ारिश आप से बस लाज रख लेना मेरा,
आख़िरत में ये मियां "मेराज" है कह देना मेरा।
मैं ये चाहूं कि वहां भी आप ही के संग रहूं।।
ربّ ارنی برق تجلی یا شبِ معراج ہو،
معاملاتِ عشق ہو یا غمزہ حُسنِ ناز ہو۔
اپنا اپنا ہے لطیفہ ائے معراؔج کیا کروں؟؟
ائے میرے افضل پیاؒ جی کیا کروں؟ کیا نہ کروں؟
रब्बे अरनी बर्क़ तज्जली या शबे मेराज हो,
मामलाते इश्क़ हो या ग़मजा हुस्न नाज़ हो
अपना अपना है लतीफ़ा ऐ "मेराज" क्या करूं??
ऐ मेरे अफ़ज़ल पिया जी क्या करूं? क्या न करूं?
کلام :- معراؔج افضلی
پیشکش :- مرکزِ افضلیہ ایجوکیشن ٹرسٹ
نوادہ بہار (انڈیا)
कलाम :- मेराज अफ़ज़ली
पेशकश :- मरकज़ ए अफ़ज़लिया ऐजुकेशन ट्रस्ट
नवादा बिहार (इण्डिया)
15/06/2025
اپنا بنالے مجھکو ائے پیر میم ہندیؒ۔
جلوہ دکھا دے مجھکو ائے پیر میم ہندیؒ۔
अपना बना ले मुझको ऐ पीर मीमहिंदी।
जलवा दिखा दे मुझको ऐ पीर मीमहिंदी।
تجھ پہ یہ دل فدا ہے تجھکو ہی چاہتا ہے،
ذلت بجا ہے مجھکو ائے پیر میم ہندیؒ۔
तुझपे ये दिल फ़िदा है तुझको ही चाहता है,
ज़िल्लत बजा है मुझको ऐ पीर मीमहिंदी।
کوئی دنیا کا دیوانہ کوئی عقبیٰ کا دیوانہ،
نہ غرض کسی سے مجھکو ائے پیر میم ہندیؒ۔
कोई दुनिया का दीवाना कोई उक़्बा का दीवाना,
न ग़रज़ किसी से मुझको ऐ पीर मीमहिंदी।
ساری دنیا سے گھبرایا تیرے پاس بھاگ آیا،
قربت میں لے لے مجھکو ائے پیر میم ہندیؒ۔
सारी दुनिया से घबराया तेरे पास भाग आया,
क़ुरबत में लेले मुझको ऐ पीर मीमहिंदी।
یہ تیرا آستانہ قربِ خدا میں جانا،
یہ کہا ہے دل نے مجھکو ائے پیر میم ہندیؒ۔
ये तेरा आस्ताना क़ुर्ब-ए-ख़ुदा में जाना,
ये कहा है दिल ने मुझको ऐ पीर ए मीमहिंदी।
معراؔج تیرا درماں کیسے ہو اب بتانا،
توہی بتا دے مجھکو ائے پیر میم ہندیؒ۔
"मेराज" तेरा दरमां कैसे हो अब बताना,
तू ही बता दे मुझको ऐ पीर मीमहिंदी।
کلام :- معراؔج افضلی
پیشکش :- مرکزِ افضلیہ ایجوکیشن ٹرسٹ
نوادہ بہار (انڈیا)
कलाम :- मेराज अफ़ज़ली
पेशकश :- मरकज़ ए अफ़ज़लिया ऐजुकेशन ट्रस्ट
नवादा बिहार (इण्डिया)
13/06/2025
میرے مرشد میرے ہمدم میرے میر و پیر۔
توی من دانم، توی من دانم، میرے میر و پیر۔
मेरे मुर्शिद, मेरे हमदम, मेरे मीर व पीर।
तुई मन दानम, तुई मन दानम, मेरे मीर व पीर
میں کیا چیز ہوں، میں نا چیز ہوں، جو ہے سو تو ہے۔
جانِ جگر ہے، جانِ جانم، میرے میر و پیر۔
मैं क्या चीज़ हूं, मैं नाचीज़ हूं ,जो है सो तू है।
जान ए जिगर है, जान ए जानम, मेरे मीर व पीर।
تیری صورت، شکلِ محمدؐ، اللہ ھو اللہ۔
من میں بسے ہیں، دل میں قائم، میرے میر و پیر۔
तेरी सूरत, शक्ल ए मोहम्मद,अल्लाह हु अल्लाह।
मन में बसे हैं, दिल में क़ायम, मेरे मीर व पीर।
سارے دکھ کو ہر لو میرا، اپنے ہی رنگ میں رنگ لو۔
کیا ہے دکھ سکھ اور کیسا غم، میرے میر و پیر
सारे दुख को हर लो मेरा, अपने ही रंग में रंग लो।
क्या है दुख सुख और कैसा ग़म, मेरे मीर व पीर।
کیا فانی ہے؟ کیا باقی ہے؟ یہ سب میں کیا جانوں؟
ساتھ تیرے معراؔج ہو ہر دم، میرے میر و پیر۔
क्या फ़ानी है? क्या बाक़ी है? ये सब मैं क्या जानूं?
साथ तेरे "मेराज" हो हरदम, मेरे मीर व पीर।
کلام :- معراؔج افضلی
پیشکش :- مرکزِ افضلیہ ایجوکیشن ٹرسٹ
نوادہ بہار (انڈیا)
कलाम :- मेराज अफ़ज़ली
पेशकश :- मरकज़ ए अफ़ज़लिया ऐजुकेशन ट्रस्ट
नवादा बिहार (इण्डिया)
11/06/2025
ہے کیا شان ہمارے مرشد کا یاروں، نہ سمجھا ہے کوئی نہ سمجھے گا یاروں۔
है क्या शान हमारे मुर्शीद का यारों, न समझा है कोई न समझेगा यारों।
منقبت شیخ کی میں کسے کیا سناؤں، کہ سجدہ کروں میں یا کہ حمد ان کا گاؤں؟
دوست اللہ کا دوست میرا ملا، زہے قسمت کہ اپنا بنایا ہے یاروں.
نہ سمجھا ہے کوئی نہ سمجھے گا یاروں۔
मनक़बत शैख की मैं किसे क्या सुनाऊं, कि सजदा करूं मैं या के हम्द उनका गाऊं।
दोस्त अल्लाह का दोस्त मेरा मिला, ज़हे क़िस्मत कि अपना बनाया है यारों।
न समझा है कोई न समझेगा यारों।
ذاتِ مرشد کی کیا ہے کسے کیا پتا ہے، وہی ہے نبیؐ میرا وہی تو خدا ہے۔
ایک عجیب بات ہے کیا تیری ذات ہے، راز و حکمت اسی نے بتایا ہے یاروں۔
نہ سمجھا ہے کوئی نہ سمجھے گا یاروں۔
ज़ात-ए-मुर्शिद की क्या है किसे क्या पता है, वही है नबी मेरा वही तो ख़ुदा है।
एक अजीब बात है क्या तेरी ज़ात है, राज ओ हिक़मत उसी ने बताया है यारों।
न समझा है कोई न समझेगा यारों।
لوگ کہتے ہیں کہ میں دیوانہ ہوگیا ہوں، کہ عالم سے بالکل ہی بیگانہ ہوگیا ہوں۔
میں وہی تو وہی تو جو ہے میں وہی، سب میں اپنا ہی جلوہ پایا ہے یاروں۔
نہ سمجھا ہے کوئی نہ سمجھے گا یاروں۔
लोग कहते हैं कि मैं दीवाना हो गया हूं, कि आलम से बिल्कुल ही बेगाना हो गया हूं।
मैं वही तू वही तू जो है मैं वही, सब में अपना ही जलवा पाया है यारों।
न समझा है कोई न समझेगा यारों।
جسکو میرے مرشد سا رہنما مل گیا ہے، اسے سب ملا اور خدا مل گیا ہے۔
نور و ظلمت میں ہر ایک کی ذات میں، ذاتِ حق کی نظر ہرسو آیا ہے یاروں۔
نہ سمجھا ہے کوئی نہ سمجھے گا یاروں۔
जिसको मेरे मुर्शिद सा रहनुमा मिल गया है, उसे सब मिला और ख़ुदा मिल गया है।
नूर व ज़ुल्मत में हर एक की ज़ात में, ज़ात-ए-हक़ की नज़र हरसू आया है यारों।
न समझा है कोई न समझेगा यारों।
ائے معراؔج اس کی باتوں کی کوئی حد ہے، کہ جو خود ہی احمدؐ خود ہی احد ہے۔
حق ہی ہے باالیقیں بجز حق کچھ نہیں، میں نے حق ہی ابھی سب سنایا ہے یاروں۔
نہ سمجھا ہے کوئی نہ سمجھے گا یاروں۔
ऐ "मेराज" उसकी बातों की कोई हद है, कि जो ख़ुद ही अहमद ख़ुद ही अहद है।
हक़ ही है बिलयकीं बजुज़ हक़ कुछ नहीं, मैंने हक़ ही अभी सब सुनाया है यारों।
न समझा है कोई न समझेगा यारों।
کلام :- معراؔج افضلی
پیشکش :- مرکزِ افضلیہ ایجوکیشن ٹرسٹ
نوادہ بہار (انڈیا)
कलाम :- मेराज अफ़ज़ली
पेशकश :- मरकज़ ए अफ़ज़लिया ऐजुकेशन ट्रस्ट
नवादा बिहार (इण्डिया)
09/06/2025
اب نظر میں کوئی اور جنچتا نہیں، ایک تیری شکل کو دل میں آنے کے بعد۔
اب تصور میں بھی تو چلے آیئے، جب ضرورت پڑے تو بلانے کے بعد۔
अब नज़र में कोई और जंचता नहीं, एक तेरी शक्ल को दिल में आने के बाद।
अब तसव्वुर में भी तू चले आईए, जब ज़रूरत पड़े तो बुलाने के बाद।
تیری تصویر دل میں بساتے ہیں ہم، تیری نغمۂ الفت ہی گاتے ہیں ہم۔
کوئی ذکر و فکر اور عبادات کی، کچھ ضرورت نہیں گنگنانے کے بعد۔
तेरी तस्वीर दिल में बसाते हैं हम, तेरी नग़्मा-ए-उल्फ़त ही गाते हैं हम।
कोई ज़िक्र ओ फ़िक्र और इबादात की, कुछ ज़रूरत नहीं गुनगुनाने के बाद।
میری باتوں پہ واعظ نہ حیران ہو، پہلے تو خادمِ اہلِ قرآن ہو۔
بات میری سمجھ میں تب آجائے گی، انکے چوکھٹ پہ سر کو جھکانے کے بعد۔
मेरी बातों पे वाइज़ न हैरान हो, पहले तू खादिम-ए-अहले क़ुरआन हो।
बात मेरी समझ में तब आ जाएगी, उनके चौखट पे सर को झुकाने के बाद।
پیر کامل سے ہرگز تو ٹھٹھا نہ کر، اپنی بربادیوں کو اکٹھا نہ کر۔
سوچ لے آگیا جو غضب میں خدا، پھر نہ مانے گا ہرگز منانے کے بعد۔
पीर कामिल से हरगिज़ तू ठठ्ठा न कर, अपनी बर्बादियों को इकट्ठा न कर।
सोच ले आ गया जो ग़ज़ब में ख़ुदा, फिर न मानेगा हरगिज़ मनाने के बाद।
اپنی نظروں میں ہم کو جگہ دیجئے، مجھکو بھی اپنا ہمدم بنا لیجئے۔
میری نظروں میں تو، تیری نظروں میں میں، اور کیا چاہیئے یہ ہو جانے کے بعد۔
अपनी नज़रों में हमको जगह दीजिए, मुझको भी अपना हमदम बना लीजिए।
मेरी नज़रों में तू, तेरी नज़रों में मैं, और क्या चाहिए ये हो जाने के बाद।
ائے معراؔج سنو اب نہ تارے گنو، دین و دنیا کی چھوڑو نہ موتی چنو۔
اب کسی چیز کی بھی ضرورت نہیں، یار حسنِ سراپا کو پانے کے بعد۔
ऐ "मेराज" सुनो अब न तारे गिनो, दीन ओ दुनिया की छोड़ो न मोती चुनो।
अब किसी चीज़ की भी ज़रूरत नहीं, यार हुस्न-ए-सरापा को पाने के बाद।
کلام :- معراؔج افضلی
پیشکش :- مرکزِ افضلیہ ایجوکیشن ٹرسٹ
نوادہ بہار (انڈیا)
कलाम :- मेराज अफ़ज़ली
पेशकश :- मरकज़ ए अफ़ज़लिया ऐजुकेशन ट्रस्ट
नवादा बिहार (इण्डिया)