25/12/2025
तमिलनाडु की 23 साल की आदिवासी युवती वी. श्रीपति की कहानी हिम्मत, जिम्मेदारी और सपने—तीनों को एक साथ जीने की मिसाल है। परीक्षा से दो दिन पहले डिलीवरी, 200–250 किमी दूर जाकर एग्जाम देना और फिर राज्य की पहली आदिवासी महिला सिविल जज बनना—यह सफर किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगता।
पहाड़ी आदिवासी बस्ती से कोर्टरूम तक
श्रीपति तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई ज़िले की जवाधु या येलागिरि पहाड़ियों के पास बसे पुलियूर गांव की मलयाली जनजाति से आती हैं, जहां शिक्षा और सुविधाएं आज भी सीमित हैं। पिता कलियाप्पन और मां मल्लिगा साधारण किसान‑मज़दूर पृष्ठभूमि से हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद बेटी की पढ़ाई नहीं रुकने दी। गांव के स्कूल से पढ़कर उन्होंने येलागिरि हिल्स में आगे की पढ़ाई पूरी की, फिर बीए और बैचलर ऑफ लॉ किया और तमिल माध्यम से ही तमिलनाडु लोक सेवा आयोग (TNPSC) की सिविल जज परीक्षा की तैयारी शुरू की।
डिलीवरी के दो दिन बाद इंटरव्यू
27 नवंबर 2023 को श्रीपति ने बेटी को जन्म दिया। ठीक दो दिन बाद उनका सिविल जज भर्ती प्रक्रिया का अहम चरण—इंटरव्यू/मुख्य परीक्षा—चेन्नई में तय था, जो उनके गांव से लगभग 200–250 किमी दूर है। डॉक्टरों और परिजनों ने हालात देखते हुए उन्हें घर पर रहने की सलाह दी, लेकिन श्रीपति जानती थीं कि यह मौका खोना मतलब सालों की मेहनत दांव पर लगाना होगा। उन्होंने अपनी सेहत और मौसम की चिंता से ऊपर उठकर जोखिम उठाया और परिवार की मदद से चेन्नई पहुंचीं।
डिलीवरी के बाद कमजोरी, दर्द और नवजात की जिम्मेदारी के बावजूद उन्होंने इंटरव्यू में पूरे आत्मविश्वास के साथ हिस्सा लिया। बाद में उन्होंने कहा कि उस दिन दिमाग में सिर्फ एक बात थी—“अगर आज हिम्मत नहीं की, तो अपनी बेटी के लिए वो भविष्य नहीं बना पाऊंगी जो मैं चाहती हूं।”
पहली आदिवासी महिला सिविल जज
रिज़ल्ट आने पर श्रीपति का नाम सिलेक्टेड कैंडिडेट्स की सूची में देखकर परिवार और पूरा गांव खुशी से झूम उठा। वे तमिलनाडु की पहली आदिवासी महिला सिविल जज बनीं और देश की सबसे कम उम्र की महिला जजों में भी उनका नाम शामिल हो गया। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और अन्य नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ की और इसे “वंचित पहाड़ी गांव की बेटी की ऐतिहासिक उपलब्धि” बताया।
गांव में ढोल‑नगाड़ों, माला और जुलूस के साथ उनका स्वागत किया गया; लोग उन्हें कंधों पर बैठाकर लेकर गए, ताकि बाकी लड़कियां भी देख सकें कि पहाड़ों से निकलकर अदालत की कुर्सी तक पहुंचना संभव है।
इस कहानी से क्या सीखें?
परिस्थितियां नहीं, फैसले मायने रखते हैं: डिलीवरी, दूरी और आर्थिक तंगी के बावजूद श्रीपति ने परीक्षा छोड़ी नहीं, बल्कि उसे अपनी बेटी का भविष्य समझकर दी।
मातृत्व और करियर साथ‑साथ संभव हैं: उन्होंने दिखाया कि सही सपोर्ट सिस्टम और जिद हो तो मां बनना और जज बनना—दोनों सपने पूरे किए जा सकते हैं।
आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा: दूरदराज के जनजातीय इलाकों में रहने वाली लड़कियों के लिए श्रीपति इस बात की मिसाल हैं कि सरकारी परीक्षा और ऊंचे पद सिर्फ शहरों के लिए नहीं, उनके लिए भी हैं।
श्रीपति की सफलता इस बात का प्रमाण है कि अगर लक्ष्य साफ हो और हिम्मत मजबूत, तो 250 किमी की दूरी, तमिलनाडु की पहाड़ियां या डिलीवरी के बाद का दर्द भी किसी आदिवासी लड़की को देश की न्यायपालिका तक पहुंचने से नहीं रोक सकता।