21/03/2026
भारत आज तक विकसित देश क्यों नहीं बन पाया, इसका एक बड़ा कारण हमारी सोच में छिपा है।
हमारे समाज में यह गलत धारणा बहुत गहरी जड़ें जमा चुकी है कि जिसे अच्छी अंग्रेजी आती है, वही सबसे होशियार और सफल होता है। अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति तुरंत "स्मार्ट", "काबिल" और "उच्च वर्ग का" माना जाता है। वहीं दूसरी तरफ, जिसे अंग्रेजी नहीं आती, उसे अक्सर "अनपढ़", "कम योग्य" या "कुछ नहीं जानने वाला" समझ लिया जाता है — भले ही वह अपने क्षेत्र में कितना भी माहिर क्यों न हो।
इस सोच के कारण लाखों-करोड़ों लोग खुद को कमतर समझने लगते हैं। वे सोचते हैं — "मुझे अंग्रेजी नहीं आती, तो मैं कुछ कर ही नहीं सकता।" नतीजा? वे नई कोशिश छोड़ देते हैं, सपने दबा देते हैं, और जिंदगी भर सिर्फ गुजारा करने में लग जाते हैं।लेकिन सच्चाई यह है कि अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा है — कोई जादुई कुंजी नहीं।
यह कोई जन्मजात प्रतिभा नहीं है, बल्कि एक स्किल है जिसे कोई भी सीख सकता है — चाहे उम्र कितनी भी हो, बैकग्राउंड कैसा भी हो। दुनिया के कई विकसित देशों में लोग अपनी मातृभाषा में ही काम करते हैं, पढ़ते हैं, सोचते हैं और सफल होते हैं। अंग्रेजी उनके लिए सिर्फ एक अतिरिक्त टूल है, न कि सफलता की शर्त। जब तक हम अंग्रेजी को "बुद्धिमत्ता का पैमाना" मानते रहेंगे, तब तक करोड़ों प्रतिभाएँ दबती रहेंगी।
विकास तभी होगा, जब हम ज्ञान, कौशल, मेहनत और नवाचार को असली मापदंड बनाएँगे। न कि सिर्फ भाषा को।अंग्रेजी सीखना अच्छी बात है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर किसी की सफलता की पहली शर्त बने। असली बदलाव तब आएगा, जब हम हर भारतीय को,चाहे वह हिंदी, तमिल, मराठी, गुजराती,बंगाली या किसी भी भाषा में सोचे,अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा मौका देंगे।