जलजीत हनुमान भगत

जलजीत हनुमान भगत सनातन धर्म की जय
जय सनातन
जय श्री राम🙏🙏
जय महादेव जय कैलाशि
जय अविनासी
जय महा काल

🙏 जय श्री माता रानी की 🙏"हमारा लक्ष्य भले ही छोटा हो पर उसे पाने का संकल्प बड़ा होना चाहिये..!!!"  जय शिव शंभु जय हो गुर...
16/04/2024

🙏 जय श्री माता रानी की 🙏

"हमारा लक्ष्य भले ही छोटा हो पर उसे पाने का संकल्प बड़ा होना चाहिये..!!!"
जय शिव शंभु
जय हो गुरु अर्जुन गिरी जी महाराज की

कोय  #किसे का 🙅  #कोनी उरे....लोगा💀  #अर्थी 🚶पाछे भी.... #हाज़री 👥 लाण  #आवे हैं............🔜🔜🔝🔚🔚..........जय श्री राम जय...
06/01/2024

कोय #किसे का 🙅 #कोनी उरे....
लोगा💀 #अर्थी 🚶पाछे भी....
#हाज़री 👥 लाण #आवे हैं............🔜🔜🔝🔚🔚..........

जय श्री राम
जय शिव शंभु

"खुशी के लिये बहुत कुछ इकट्ठा करना पड़ता है ऐसा हम समझते है किन्तु हकीकत में खुशी के लिए बहुत कुछ छोड़ना पड़ता हैं  ऐसा अनु...
14/01/2023

"खुशी के लिये बहुत कुछ इकट्ठा करना पड़ता है ऐसा हम समझते है किन्तु हकीकत में खुशी के लिए बहुत कुछ छोड़ना पड़ता हैं ऐसा अनुभव कहता है...!!!"जय श्री राम!!! जय भोले नाथ !!!""

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:!!!!!!!जानें, ‘शांति पाठ’ के नाम से प्रसिद्ध इस श्लोक के भाव कितने गूढ़ हैं ? क्...
20/09/2022

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:!!!!!!!

जानें, ‘शांति पाठ’ के नाम से प्रसिद्ध इस श्लोक के भाव कितने गूढ़ हैं ? क्यों परमात्मा को इस तरह की प्रार्थना करने वाले मनुष्य पसंद हैं ?

मानव जीवन की दो प्रधान भावनाएं हैं—स्वार्थ भावना और परहित भावना । स्वार्थ भावना मनुष्य के हृदय को संकीर्ण और निम्न स्तर का बना देती है; लेकिन परहित की भावना मनुष्य के हृदय को उज्ज्वल कर विशाल बना देती है । दूसरों के दु:ख दूर करने से स्वयं में आनन्द का आभास होता है । परमात्मा को भी ऐसे ही मनुष्य अत्यंत प्रिय होते हैं । इस प्रकार की प्रार्थना करने वाले मनुष्यों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं ।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत् ।।
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कामये दुखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ।।

अर्थात्—संसार में सभी प्राणी सुखी हों । सब निरोगी रहें । सभी अच्छे दिन देखें । जगत में कोई भी दु:ख का भागी न हो । मैं न राज्य की कामना करता हूँ, न स्वर्ग और मोक्ष की, मैं जन्म लेकर पुन: सांसारिक भोग भी नहीं चाहता हूँ । मेरी सिर्फ यह इच्छा है कि दु:खों से पीड़ित प्राणियों के क्लेश दूर कर सकूँ ।

ये श्लोक ‘शान्ति मंत्र’ या ‘शांति पाठ’ के नाम से जाने जाते हैं ।

इस प्रकार की प्रार्थना करने वाले मनुष्यों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं । उन पर भगवान की कृपा हर क्षण बरसती रहती है । क्योंकि—
जो जग, सो जगदीश, ईश नहिं जग से न्यारा ।
करिये सब से प्रेम, प्रेम भगवत को प्यारा ।।

‘सर्वे भवन्तु सुखिन:‘ की भावना रखने वाला परमात्मा को कैसा लगता है, इसी को दर्शाती एक कथा है—

एक व्यक्ति सदैव दूसरों की भलाई के कार्यों में लगा रहता था; लेकिन मन में भगवान को सदा साथ रखता और उनका शुक्रिया करना नहीं भूलता था । इस कारण वह कभी भी पूजा-पाठ, जप आदि नहीं कर पाता था ।

एक दिन उसकी भेंट त्रिलोकी में घूमने वाले नारद जी से हो गई ।

नारद जी ने उससे पूछा—‘तुम क्या काम करते हो । अपने लोक-परलोक को सुधारने के लिए तुमने कुछ किया है ?’

उस व्यक्ति ने कहा—‘महाराज ! मैं दिन-रात दीन-दु:खियों, अपाहिजों, रोगियों की सेवा में लगा रहता हूँ । भगवान की पूजा-पाठ और जप-ध्यान के लिए मुझे समय ही नहीं मिलता है । क्या इससे मेरा परलोक सुधर जाएगा ? मेरी अंत गति कैसी होगी ? यदि आप को पता हो तो मुझे बताइए ।’

नारद जी के हाथ में साधारण और विशिष्ट—दो बहियां थी । जब उन्होंने साधारण बही देखी तो उसमें उस व्यक्ति का कहीं भी नाम अंकित नहीं था । दूसरी बही उच्चकोटि के कार्य करने वाले भगवान के विशेष कृपापात्रों की थी ।

नारद जी ने जब दूसरी बही खोली तो उसमें उस व्यक्ति का नाम सबसे ऊपर लिखा था । नारद जी ने उस व्यक्ति के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—‘तू ही सबसे बड़ा भाग्यशाली और कर्मयोगी है ।’ क्योंकि—

जीना है उसका भला, जो औरों के लिए जिये ।
मरना है उसका भला, जो अपने लिए जिये ।।

मानव जीवन की दो प्रधान भावनाएं हैं—स्वार्थ भावना और परहित भावना । स्वार्थ भावना मनुष्य के हृदय को संकीर्ण और निम्न स्तर का बना देती है; लेकिन परहित या परोपकार की भावना मनुष्य के हृदय को उज्ज्वल कर विशाल बना देती है । दूसरों के दु:ख दूर करने से स्वयं में आनन्द का आभास होता है । परमात्मा को भी ऐसे ही मनुष्य अत्यंत प्रिय होते हैं ।

श्रीमद्भागवत (११।२९।१९) में भगवान श्रीकृष्ण उद्धव जी से कहते हैं—‘मेरी प्राप्ति के जितने भी साधन हैं, उनमें मैं तो सबसे श्रेष्ठ साधन यही समझता हूँ कि समस्त प्राणियों और पदार्थों में मन, वचन और शरीर से मेरी ही भावना करके भगवद्बुद्धि से सबकी सेवा की जाए ।’

भगवान की प्रसन्नता का सर्वश्रेष्ठ और सबसे सरल साधन है ‘सेवा’ ।

निष्काम-भाव से की गई दीन-हीन, निर्बल, रोगी व असहाय लोगों की सेवा को ‘नारायन-सेवा’ के समान महत्व दिया गया है । भगवान को चिन्ता सबकी रहती है, पर विशेष चिन्ता उन्हें दीनों व निर्बलों की होती है । सभी प्राणी ईश्वर की संतान हैं; परन्तु दीनजन तो प्रभु के विशेष बालक हैं । अत: जो भगवान के विशेष बालकों की सेवा करता है, वही सच्चा कर्मयोगी और भगवान का विशेष कृपापात्र होता है । ऐसे व्यक्ति के पास समस्त सुख-सम्पत्ति बिन बुलाये आती है।

श्री रामचरितमानस (३।३१।९) में तुलसीदास जी ने कहा है—

परहित बस जिन्ह के मन माहीं ।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।

ऋग्वेद में तो यह कहा गया है कि परमार्थ के कार्यों में निन्दा, लांछन या उपहास की भी चिन्ता नहीं करनी चाहिए; बल्कि भगवान से सदैव यही प्रार्थना करनी चाहिए—

बनूँ सदा रोगी की औषध निपुण वैद्य मैं नाशक रोग ।
बनूँ सदा आतुर का आश्रय, दु:खभोगी के सुख का भोग ॥
बनूँ सदा निर्बल का बल मैं, बनूँ नित्य भूखे का अन्न ।
बनूँ पिपासित का पानी मैं, हों मुझसे उल्लसित विपन्न ।।
बनूँ सभी का निकट कुटुम्बी करुँ, सभी की सेवा नित्य ।
बनूँ कष्ट में साथी सबका, झेलूँ उनके कष्ट अनित्य ।।
जय श्री राम
सनातन धर्म की जय
अपने माता पिता की जय

24/04/2022

*एक चूहा एक कसाई के घर में बिल बना कर रहता था।*

*एक दिन चूहे ने देखा कि उस कसाई और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं। चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है।*

*उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी।*
*ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है।*

*कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?*

*निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया।*

*मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई.. ये मेरी समस्या नहीं है।*

*हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।*

*उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई, जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था।*

*अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस कसाई की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डस लिया।*

*तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने हकीम को बुलवाया। हकीम ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी।*

*कबूतर अब पतीले में उबल रहा था।*

*खबर सुनकर उस कसाई के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन उसी मुर्गे को काटा गया।*

*कुछ दिनों बाद उस कसाई की पत्नी सही हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो बकरे को काटा गया।*

*चूहा अब दूर जा चुका था, बहुत दूर ……….।*

_*अगली बार कोई आपको अपनी समस्या बतायेे और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है, तो रुकिए और दुबारा सोचिये।*

*अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये। स्वयं तक सीमित मत रहिये। सामाजिक बनिये..*
*_✍🏻किसी की भी समस्या को अपनी समस्या मान के उसका निराकरण कराये,सहयोग करे।*
*एक रहे,संगठित रहे,संयमित रहे ।*
*संगठन में शक्ति ह*

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

*🙏जय श्री राम ~ जय श्री कृष्णा🙏*

हनुमान जी की पत्नी के साथ दुर्लभ फोटो============================कहा जाता है कि हनुमान जी के उनकी पत्नी के साथ दर्शन करन...
27/02/2022

हनुमान जी की पत्नी के साथ दुर्लभ फोटो
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कहा जाता है कि हनुमान जी के उनकी पत्नी के साथ दर्शन करने के बाद घर में चल रहे पति पत्नी के बीच के सारे तनाव खत्म हो जाते हैं।

आंध्रप्रदेश के खम्मम जिले में बना हनुमान जी का यह मंदिर काफी मायनों में खास है। यहां हनुमान जी अपने ब्रह्मचारी रूप में नहीं बल्कि गृहस्थ रूप में अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान है।

हनुमान जी के सभी भक्त यही मानते आए हैं की वे बाल ब्रह्मचारी थे और वाल्मीकि, कम्भ, सहित किसी भी रामायण और रामचरित मानस में बालाजी के इसी रूप का वर्णन मिलता है। लेकिन पराशर संहिता में हनुमान जी के विवाह का उल्लेख है। इसका सबूत है आंध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले में बना एक खास मंदिर जो प्रमाण है हनुमान जी की शादी का।

यह मंदिर याद दिलाता है रामदूत के उस चरित्र का जब उन्हें विवाह के बंधन में बंधना पड़ा था। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भगवान हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी नहीं थे। पवनपुत्र का विवाह भी हुआ था और वो बाल ब्रह्मचारी भी थे।

कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण ही बजरंगबली को सुवर्चला के साथ विवाह बंधन में बंधना पड़ा। दरअसल हनुमान जी ने भगवान सूर्य को अपना गुरु बनाया था।

हनुमान, सूर्य से अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। सूर्य कहीं रुक नहीं सकते थे इसलिए हनुमान जी को सारा दिन भगवान सूर्य के रथ के साथ साथ उड़ना पड़ता और भगवान सूर्य उन्हें तरह-तरह की विद्याओं का ज्ञान देते। लेकिन हनुमान जी को ज्ञान देते समय सूर्य के सामने एक दिन धर्मसंकट खड़ा हो गया।
कुल 9 तरह की विद्या में से हनुमान जी को उनके गुरु ने पांच तरह की विद्या तो सिखा दी लेकिन बची चार तरह की विद्या और ज्ञान ऐसे थे जो केवल किसी विवाहित को ही सिखाए जा सकते थे।

हनुमान जी पूरी शिक्षा लेने का प्रण कर चुके थे और इससे कम पर वो मानने को राजी नहीं थे। इधर भगवान सूर्य के सामने संकट था कि वह धर्म के अनुशासन के कारण किसी अविवाहित को कुछ विशेष विद्याएं नहीं सिखला सकते
थे।

ऐसी स्थिति में सूर्य देव ने हनुमान जी को विवाह की सलाह दी। और अपने प्रण को पूरा करने के लिए हनुमान जी भी विवाह सूत्र में बंधकर शिक्षा ग्रहण करने को तैयार हो गए। लेकिन हनुमान जी के लिए दुल्हन कौन हो और कहां से वह मिलेगी इसे लेकर सभी चिंतित थे।

सूर्य देव ने अपनी परम तपस्वी और तेजस्वी पुत्री सुवर्चला को हनुमान जी के साथ शादी के लिए तैयार कर लिया। इसके बाद हनुमान जी ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गई।

इस तरह हनुमान जी भले ही शादी के बंधन में बंध गए हो लेकिन शारीरिक रूप से वे आज भी एक ब्रह्मचारी ही हैं।
पाराशर संहिता में तो लिखा गया है की खुद सूर्यदेव ने इस शादी पर यह कहा की – यह शादी ब्रह्मांड के कल्याण के लिए ही हुई है और इससे हनुमान जी का ब्रह्मचर्य भी प्रभावित नहीं हुआ।।।।।।

20/02/2022

जय श्री राम

द्वादश ज्योतिर्लिंग
11/01/2022

द्वादश ज्योतिर्लिंग

07/01/2022

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