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LIFE At PAF ❣️
08/03/2026

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 संग महाशिवरात्रि 🪔❣️..आचार्य प्रशांत के अनुसार, 'शिव' का वास्तविक अर्थ शुद्ध चेतना और आनंदमय स्वरूप है, जो मन, बुद्धि, ...
26/02/2025

संग महाशिवरात्रि 🪔❣️..

आचार्य प्रशांत के अनुसार, 'शिव' का वास्तविक अर्थ शुद्ध चेतना और आनंदमय स्वरूप है, जो मन, बुद्धि, अहंकार, इंद्रियाँ, और पंच महाभूतों से परे है। शिव किसी विशेष रूप, रंग, या आकार में सीमित नहीं हैं; वे निराकार, निर्विकल्प, और सर्वव्यापी हैं। इसलिए, शिव को मन, बुद्धि, या इंद्रियों के माध्यम से समझा या अनुभव नहीं किया जा सकता। वे समस्त द्वंद्वों से परे, सदा समत्व में स्थित, और बंधन-मुक्ति की अवधारणाओं से अतीत हैं।

इस संदर्भ में, आदि शंकराचार्य के 'निर्वाण षट्कम्' का उल्लेख महत्वपूर्ण है, जिसमें वे आत्मा के शुद्ध, अनंत, और आनंदमय स्वरूप का वर्णन करते हैं, जो शिव का ही प्रतीक है। इस दृष्टिकोण से, शिव किसी विशेष कथा, रूप, या प्रतीक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समस्त सृष्टि की आधारभूत चेतना हैं।

अतः, शिव का वास्तविक अर्थ उस शाश्वत, निराकार, और अनंत चेतना से है, जो सभी रूपों और नामों से परे है।

कुछ दिनों से मैं रिपोर्ट्स पढ़ रहा था आत्महत्या को लेकर और उन आत्महत्याओं के संदर्भ में मुझे यह पता चला कि 9 से 10 फ़ीसद...
14/02/2025

कुछ दिनों से मैं रिपोर्ट्स पढ़ रहा था आत्महत्या को लेकर और उन आत्महत्याओं के संदर्भ में मुझे यह पता चला कि 9 से 10 फ़ीसदी जो होती है वह संबंध टूटने के कारण ही होती हैं संबंध उनके पीछे ही जिम्मेदार है तो इस पर ही मैंने कुछ लिखा है कि क्यों संबंध जो है वह इस तरीके से दूषित होते हैं।................

यह जो स्थिति है यह हो रही है समाज में। हम पढ़ रहे हैं हम देख रहे हैं तो इस पर मैंने यह सब लिखा है..---

चार पन्नों का एक लेटर लिखकर ।।

चार पन्नों का एक लेटर लिखकर,
एक फंदे से वह झूल गया,
गिनकर सारी मजबूरी के किस्से,
इस दुनिया को अलविदा कह गया।

बेशक, माँ का लाड़ला और पिता का सहारा था,
भाई का आदर्श और बहन का भी दुलारा था। कामनाओं की गठरी इतनी भारी,
कि अपना ही ख्याल भूल गया।

हाँ, वह एक फंदे से झूल गया। # # #

**क्यों लाया था पत्नी घर में?** ज़रा सुनिए, उसकी मानसिकता के बारे में—

**"हाँ, तुम्हें इसलिए लाया हूँ..."** जब जाऊँगा ऑफिस, तो नाश्ता तुम बनाओगी,
दोपहर को आऊँगा, तो लंच तुम खिलाओगी।
कपड़े धोओगी, उनमें प्रेस करोगी,
शाम को आऊँगा, तो चाय-कॉफी पिलाओगी।

रात का खाना खाकर, अपनी भूख मिटाऊँगा,
और बची भूख तुम्हारी देह से बुझाऊँगा।

सुबह की चाय के साथ मेरी नींद खुलवाओगी,
नहाना होगा, तो पानी लेकर आओगी।

हाँ, मैं तुम्हें इसलिए लाया हूँ... माँ-बाप की सेवा करके स्वर्ग का फल तुम पाओगी,
ना रहा मेरा सहारा, तो घर का सहारा तुम बन जाओगी।

सच कहूँ—ऊपर के सारे काम तो महज़ बहाने थे,
मुझे तो तुमसे बस अपना कुल-कुनबा बढ़वाने थे। # # # **और फिर...**

उम्र ढल गई तुम्हारी, अब तुममें रस आता नहीं,
सोचा, छोड़ दूँ तुम्हें, पर यह समाज को भाता नहीं।

ना रहने का साथ अब, द्वंद्व यहीं से शुरू हो जाता है,
या तो मैं फाँसी लगा लेता हूँ,
या फिर तुम टुकड़ों में बाँट दी जाती हो।

**हाँ, चार पन्नों का एक लेटर लिखकर,
एक फंदे से वह झूल गया,
गिनकर मजबूरी के किस्से,
दुनिया से अलविदा कह गया।** ---

आचार्य जी की शिक्षाएं क्यों हर एक इंसान तक पहुंचे हर एक युवा तक पहुंचे। यह बात आप सब पढ़कर समझ ही गए होगे।हम सब का प्रयास यही होना चाहिए की कैसे भी हम करें। हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को आचार्य जी की शिक्षाओं से जोड़ें क्योंकि बस यही एक तरीका हैं ,यही एक उपाय अब इस विनाश को रोक सकता हैं।👏👏👏🪔🪔

आचार्य जी की शिक्षाएं जीवन में जो बदलाव ला रही हैं वो सामने दिख रहा हैं ।
03/01/2025

आचार्य जी की शिक्षाएं जीवन में जो बदलाव ला रही हैं वो सामने दिख रहा हैं ।

१०/११/२०२४, दिन-रविवार,चेतना उत्थान पुस्तक स्टॉल, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।👁️ ये पुस्तके कोई साधारण पुस्तक नहीं है यह पुस...
11/11/2024

१०/११/२०२४, दिन-रविवार,चेतना उत्थान पुस्तक स्टॉल, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।
👁️ ये पुस्तके कोई साधारण पुस्तक नहीं है यह पुस्तके सिर्फ कागज के पन्नों का संग्रह नहीं है।

✍️ये पुस्तके है किसी के दशकों की की गई मेहनत का संग्रह,यह पुस्तक हैं किसी के द्वारा किए गए दशकों के, घोर तप, घर संघर्ष और घोर साहस का परिणाम।

✍️ ये पुस्तके है समाज के विकृत मन,समाज के दूषित मन की दवा। ये पुस्तके है घोर अंधकार में किरण की एक रोशनी की तरह।

✍️ यह आपको तभी समझ आएगा जब आप इन बुकों के साथ कुछ समय बिताएंगे, गहरे उतरेंगे। एक चीज हो सकती है कि इन बुको को पढ़ने में आपको अरुचि पैदा हो , ऊब पैदा हो क्योंकि यह कोई साधारण बुक है ही नहीं ,यह हमारे विकृत , टूटे हुए, छितरे हुए मन को एकत्रित करने का काम करती हैं। दर्द तो होगा ही साहब।

✍️ आज की शिक्षा ही कल व्यवस्था को सही कर सकती हैं।
यह लाइन मुझे कल बुक स्टॉल पर आए छोटे-छोटे नन्हे नन्हे बच्चों के हाथों में आचार्य जी की बुक को देखकर याद आया कि आज की शिक्षा ही कल की व्यवस्था को सही कर सकती है।पैदा तो हम जानवर ही होते हैं एकमात्र शिक्षा ही है ज्ञान ही है जो उस जानवर को इंसान बना देती है बिना शिक्षा के पशु और मानव में कुछ अंतर है ही नहीं।

10/नवंबर/ 2024 ,दिन रविवार को प्रयागराज में चेतना उत्थान टीम के सभी बंधुओं ने मिलकर जन-जन तक आचार्य जी की शिक्षा पहुंचे इसी उद्देश्य से एक बार फिर गोविंदपुर में पुस्तक स्टॉल लगाया।☘️क्या आप चाहते हैं आपके जीवन में कुछ ऊंचा हो?

☘️क्या आप चाहते हैं आपके समाज में बदलाव आए?
☘️क्या आप चाहते हैं भारत में फैल रही धर्म और जात पात के नाम पर हिंसा का अंत हो?
☘️क्या आप चाहते हैं भारत फिर से विश्वगुरु बने?
☘️क्या आप चाहते हैं घर घर में हो रहे कलह, मारपीट, झगड़े का अंत हो?
☘️ क्या आप चाहते हैं पशुओं पर हो रही क्रूरता का अंत हो, पेड़ पौधों को कटने से रोका जाए?यदि जवाब "हैं" हैं तो फिर देर किस बात की। साथ आए, आचार्य जी की शिक्षाओं को एक एक घर तक, एक एक लोग तक पहुंचाने में हमारी मदद करे 👏।

कोई दूसरा समाधान हैं ही नहीं। सिर्फ एक समाधान के अलावा और वो आप सब जानते हैं।आप जिस भी शहर से हैं आप जहां से भी हैं आप वही के बुक स्टॉल पर जाकर अपनी भागीदारी दे और ज्यादा से ज्यादा इस काम को आगे बढ़ाने के लिए आगे आए जिम्मेदारियां ले।धन्यवाद 👏 👏



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