29/03/2020
पातंजलयोगदर्शनमें चित्त-शुद्धिके चार हेतु बताये गये हैं—
'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यापुण्य- विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्।’ (१। ३३)
'सुखियोंके प्रति मैत्री,
दु:खियोंके प्रति करुणा,
पुण्यात्माओंके प्रति मुदिता (प्रसन्नता) और
पापात्माओंके प्रति उपेक्षाके
भावसे चित्तमें निर्मलता आती है।’
श्रीमद्भगवद्गीता
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी॥ १३॥
सन्तुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय:।
मय्यॢपतमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय:॥ १४॥
सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहितऔर मित्रभाववाला (तथा) दयालु भी (और) ममतारहित, अहंकाररहित, सुख-दु:खकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मुझमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।
सर्वभूतानाम्=सब प्राणियोंमें अद्वेष्टा=द्वेषभावसे रहितच=और मैत्र:=मित्रभाववाला (तथा) करुण:=दयालु एव=भी (और) निर्मम:=ममतारहित, निरहङ्कार:=अहंकाररहित, समदु:खसुख:=सुख-दु:खकी प्राप्तिमें सम, क्षमी=क्षमाशील, सततम्=निरन्तर सन्तुष्ट:=सन्तुष्ट, योगी=योगी, यतात्मा=शरीरको वशमें किये हुए, दृढनिश्चय:=दृढ़ निश्चयवाला, मयि=मुझमें अर्पित-मनोबुद्धि:=अर्पित मन-बुद्धिवाला य:=जो मद्भक्त:=मेरा भक्त है, स:=वह मे=मुझे प्रिय:=प्रिय है।
'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’—अनिष्ट करने- वालोंके दो भेद हैं—(१) इष्टकी प्राप्तिमें अर्थात् धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी प्राप्तिमें बाधा पैदा करनेवाले और (२) अनिष्ट पदार्थ, क्रिया, व्यक्ति, घटना आदिसे संयोग करानेवाले। भक्तके शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सिद्धान्तके प्रतिकूल चाहे कोई कितना ही, किसी प्रकारका व्यवहार करे—इष्टकी प्राप्तिमें बाधा डाले, किसी प्रकारकी आर्थिक और शारीरिक हानि पहुँचाये, पर भक्तके हृदयमें उसके प्रति कभी किंचिन्मात्र भी द्वेष नहीं होता। कारण कि वह प्राणिमात्रमें अपने प्रभुको ही व्याप्त देखता है, ऐसी स्थितिमें वह विरोध करे तो किससे करे—
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिंबिरोध॥
(मानस ७। ११२ ख)
इतना ही नहीं; वह तो अनिष्ट करनेवालोंकी सब क्रियाओंको भी भगवान्का कृपापूर्ण मंगलमय विधान ही मानता है!
प्राणिमात्र स्वरूपसे भगवान्का ही अंश है। अत: किसी भी प्राणीके प्रति थोड़ा भी द्वेषभाव रहना भगवान्के प्रति ही द्वेष है। इसलिये किसी प्राणीके प्रति द्वेष रहते हुए भगवान्से अभिन्नता तथा अनन्यप्रेम नहीं हो सकता। प्राणिमात्रके प्रति द्वेषभावसे रहित होनेपर ही भगवान्में पूर्ण प्रेम हो सकता है। इसलिये भक्तमें प्राणिमात्रके प्रति द्वेषका सर्वथा अभाव होता है।
'मैत्र: करुण एव च’—भक्तके अन्त:करणमें प्राणिमात्रके प्रति केवल द्वेषका अत्यन्त अभाव ही नहीं होता, प्रत्युत सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवद्भाव होनेके नाते उसका सबसे मैत्री और दयाका व्यवहार भी होता है। भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं—'सुहृदं सर्वभूतानाम्’
(गीता ५। २९)। भगवान्का स्वभाव भक्तमें अवतरित होनेके कारण भक्त भी सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् होता है— 'सुहृद: सर्वदेहिनाम्’ (श्रीमद्भागवत ३। २५। २१)। इसलिये भक्तका भी सभी प्राणियोंके प्रति बिना किसी स्वार्थके स्वाभाविक ही मैत्री और दयाका भाव रहता है—
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
(मानस ७। ४७। ३)
अपना अनिष्ट करनेवालोंके प्रति भी भक्तके द्वारा मित्रताका व्यवहार होता है; क्योंकि उसका भाव यह रहता है कि अनिष्ट करनेवालेने अनिष्टरूपमें भगवान्का विधान ही प्रस्तुत किया है। अत: उसने जो कुछ किया है, मेरे लिये ठीक ही किया है। कारण कि भगवान्का विधान सदैव मंगलमय होता है। इतना ही नहीं, भक्त यह मानता है कि मेरा अनिष्ट करनेवाला (अनिष्टमें निमित्त बनकर) मेरे पूर्वकृत पापकर्मोंका नाश कर रहा है; अत: वह विशेषरूपसे आदरका पात्र है।
साधकमात्रके मनमें यह भाव रहता है और रहना ही चाहिये कि उसका अनिष्ट करनेवाला उसके पिछले पापोंका फल भुगताकर उसे शुद्ध कर रहा है। जब सामान्य साधकमें भी अनिष्ट करनेवालेके प्रति मैत्री और करुणाका भाव रहता है, फिर सिद्ध भक्तका तो कहना ही क्या है? सिद्ध भक्तका तो उसके प्रति ही क्या, प्राणिमात्रके प्रति मैत्री और दयाका विलक्षण भाव रहता है।