अग्नि देव की प्रार्थना
हमें क्या-क्या प्राप्त हों?
इडामग्ने पुरुससनिं गोः शश्वत्त्तमहर्वमानाय साध। स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे॥
यजु० १२।५१
हे अग्नि! हे अग्रनायक तेजस्वी परमेश्वर ! हम आपसे कुछ याचना कर रहे हैं, करबद्ध होकर प्रार्थना कर रहे हैं, वह हमारी प्रार्थना कृपा करके आप पूर्ण कीजिए। क्या कहते हो? अपने आचार्य के वचन सुनो-”यही प्रार्थना का मुख्य सिद्धान्त है कि जैसी प्रार्थना करे वैसा ही कर्म करे।७।। अतः जो कुछ माँगते हो उसे पाने का स्वयं पुरुषार्थ करो। पुरुषार्थ तो हम करेंगे भगवन्, किन्तु पहले आपका आशीर्वाद तो ले लें । प्रार्थना द्वारा आपसे दृढ़ सङ्कल्प, कर्म के प्रति तत्परता, उत्साह, प्रेरणा, सफलता का आशीर्वाद आदि प्राप्त होते हैं। प्रार्थना करके हम उन्हें ही प्राप्त करना चाहते हैं। फिर कृतकार्य होने के लिए पुरुषार्थ में जुट जायेंगे और आपके आशीर्वाद से प्रार्थित वस्तुओं को प्राप्त करके ही रहेंगे। पहली वस्तु, जो हम माँगते हैं, वह है ‘इडा’। इडा का अर्थ है भूमि, अन्न और गाय । हमें निवास के लिए, खेती करने के लिए, बाग-बगीचे लगाने के लिए, कल-कारखाने खोलने के लिए और शिक्षणालय, औषधालय आदि चलाने के लिए भूमि दीजिए। अन्न, अर्थात् सकल शुद्ध आरोग्यकारी भोज्य पदार्थ दीजिए और दूध-दही-माखन आदि की पूर्ति के लिए दुधारू गाय दीजिए। दूसरी हमारी प्रार्थित वस्तु है ‘गोः सनिः’। वाणी की देन भी हमें चाहिए। वाणी पुरुदंसाः’ है, अनेक कार्यों को सिद्ध करनेवाली है। वेदादि शास्त्रों की वाणी, गुरुजनों की वाणी, अनुभवी संन्यासियों की वाणी मूर्ख को भी विद्वान्, अधार्मिक को भी धर्मात्मा, आतङ्कवादी को भी मित्र बना देती है। वाणी की यह देन नैरन्तर्य के साथ हमें प्राप्त होती रहे। हम कभी वाणी से और वाणी के लाभों से वञ्चित न हों। तीसरी वस्तु हम यह माँगते हैं कि हमारा पुत्र ‘तनय’ हो, वंश के यश का विस्तार करनेवाला हो। वह ‘विजावा’ अर्थात् विविध ऐश्वर्यो का जनक भी हो। धन-सम्पदा का ऐश्वर्य, वीरता का ऐश्वर्य, विद्या का ऐश्वर्य, प्रताप का ऐश्वर्य, अहिंसा का ऐश्वर्य, सत्य का ऐश्वर्य, ब्रह्मचर्य का ऐश्वर्य आदि ऐश्वर्यों की उसके पास झड़ी लगी हो।
हे अग्निदेव! हे तेजस्वी परमेश! ऐसी आपकी सुमति हमारे ऊपर रहे कि हम समस्त वांछित वस्तुओं को पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त करते रहें और संसार में सर्वाधिक समुन्नत होकर जीवनयापन करें।
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अग्नि देव से प्रार्थना
ऋषिः अवत्सारः । देवता अग्निः । छन्दः आर्षी त्रिष्टुप् ।
तुनूपाऽअग्नेऽसि तुन्वं मे पाह्यायुर्दाऽअग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्षोदाऽ अग्नेऽसि वर्षों में देहि।अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनं तन्मऽआपृण।।
-यजु० ३ । १७
हे अग्नि! तू शरीरों का रक्षक है, मेरे शरीर की भी रक्षा कर। संसार में जितने भी जड़-चेतन शरीर हैं, वे सब ईश्वरीय छत्रछाया से ही रक्षित– पालित हो रहे हैं, अतः ईश्वर की वह छत्रछाया मेरे शरीर को भी प्राप्त होती रहे। इसके अतिरिक्त भौतिक अग्नि भी शरीरों की रक्षा कर रहा है। आग, बिजली और सूर्य हमारे कितने अधिक काम आने वाले तत्त्व हैं। कल्पना कीजिए ये तीनों हमसे छिन जाएँ तो न हम भोजन पका सकेंगे, न घरों, कारखानों आदि में विद्युत् का प्रकाश पा सकेंगे, न हमें दिन में सूर्य का प्रकाश मिलेगा, सदा हम रात्रि से ही घिरे पड़े रहेंगे। इन तीनों प्रकार की अग्नियों का प्रयोग करके सदा हम पालित-रक्षित होते रहें। साथ ही यदि शत्रु हमारी हिंसा करने का मनसूबा बाँधे, तो आग्नेयास्त्रों से उन्हें पराजित करके भी हम रक्षित होते रहें।
हे अग्नि! तू दीर्घायुष्य देनेवाला है, मुझे भी दीर्घायुष्य प्रदान कर। जगदीश्वररूप अग्नि के नियमों का हम पालन करते रहें, तो भी हमें दीर्घायुष्य प्राप्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त उपर्युक्त तीनों प्रकार की भौतिक अग्नियों से लाभान्वित होकर भी हम दीर्घायु हो सकते हैं। अल्पायु होने में शारीरिक और मानसिक रोग बहुत बड़े कारण हैं। वैज्ञानिकों ने तीनों अग्नियों द्वारा रोगनिवारण के अनेक उपाय आविष्कृत किये हैं। चिकित्सकों द्वारा उन उपायों को अपने शरीर पर प्रयोग करवा कर भी हम दीर्घायुष्य पा सकते हैं। हे अग्नि! तू वर्चस् को देनेवाला है, मुझे भी वर्चस्विता प्रदान कर। वर्चस् में ब्राह्म तेज, आत्मबल, विद्या और विद्वत्ता का तेज आदि आते हैं। परमेश्वराग्नि सब वर्चस्विताओं का स्रोत और पुञ्ज है। उसकी वर्चस्विताओं को अपना आदर्श बना कर हम भी वर्चस्वी बन सकते हैं। आग, विद्युत् और सूर्य के बल और प्रकाश का चिन्तन भी हमें वर्चस्वी बना सकता है। हे अग्नियो ! मेरे शरीर में, शारीरिक अङ्गों में, रक्तसंस्थान, पाचनसंस्थान, मलविसर्जनसंस्थान, मन, मस्तिष्क आदि में जो कोई न्यूनता आ गयी है, बुद्धिबल, शौर्य आदि की कमी हो गयी है, उसे भी तुम दूर कर दो, जिससे मेरा शरीर संस्कृत, निर्दोष, सबल और प्रफुल्ल होकर अपने आत्मा को भी उपकृत करता रहे और परोपकार में भी संलग्न रहे।
27/06/2025
सनातन धर्म के 16 संस्कार
🔥सोलह संस्कारों का प्रयोजन ॥
🌷१:- गर्भाधान संस्कार - युवा स्त्री-पुरुष उत्तम् सन्तान की प्राप्ति के लिये विशेष तत्परता से प्रसन्नतापूर्वक गर्भाधान करे।
🌷२:- पुंसवन संस्कार - जब गर्भ की स्थिति का ज्ञान हो जाए, तब दुसरे या तीसरे महिने में गर्भ की रक्षा के लिए स्त्री व पुरुष प्रतिज्ञा लेते है कि हम आज ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे जिससे गर्भ गिरने का भय हो।
🌷३:- सीमन्तोन्नयन संस्कार - यह संस्कार गर्भ के चौथे मास में बच्चे की मानसिक शक्तियों की वृद्धि के लिए किया जाता है इसमें ऐसे साधन प्रस्तुत किये जाते है जिससे स्त्री प्रशन्न रहें।
🌷४ :- जातकर्म संस्कार - यह संस्कार बालक के जन्म लेने पर होता है। इसमें पिता या वृद्ध सोने की सलाई द्वारा घी या शहद से जिह्वा पर ओ३म् लिखते हैं और कान में 'वेदोऽसि' कहते है।
Aacharya Amit Sharma
🌷५:- नामकरण संस्कार- जन्म से ग्यारहवें या एक सौ एक या दुसरे वर्ष के आरम्भ में बालक का नाम प्रिय व सार्थक रखा जाता है।
🌷६:- निष्क्रमण संस्कार - यह संस्कार जन्म के चौथे महिने में उसी तिथि पर जिसमें बालक का जन्म हुआ हो किया जाता है। इसका उद्देश्य बालक को शुद्ध उ द्यान की शुद्ध वायु का सेवन और सृष्टि के अवलोकन का प्रथम शिक्षण है।
🌷७:- अन्नप्राशन संस्कार - छठे व आठवें महिने में जब बालक की शक्ति अन्न पचाने की हो जाए तो यह संस्कार होता है।
🌷८ :- चूडाकर्म- मुंडन संस्कार - पहले या तीसरे वर्ष में बालक के बाल कटाने के लिये किया जाता है।
🌷९ :- कर्णवेध संस्कार - कई रोगों को दूर करने के लिए बालक के कान बींधे जाते है।
🌷१० :- उपनयन संस्कार - जन्म से आठवें वर्ष में इस संस्कार द्वारा लडके व लड़की को यज्ञोपवीत ( जनेऊ) पहनाया जाता है।
🌷११ :- वेदारम्भ संस्कार - उपनयन संस्कार के दिन या एक वर्ष के अन्दर ही गुरूकुल में वेदों का आरम्भ गायत्री मंत्र से किया जाता है।
🌷१२ :- समावर्तन संस्कार - जब ब्रह्मचारी व्रत की समाप्ति कर वेद- शास्त्रों के पढ़ने के पश्चात गुरूकुल से घर आता है तब यह संस्कार होता है।
🌷१३ :- विवाह संस्कार - विद्या प्राप्ति के पश्चात् जब लड़का,लड़की भली भांति पूर्ण योग्य बनकर घर जाते है तब विवाह दोनों का गुण,कर्म स्वभाव देखकर किया जाता है।
🌷१४ :- वानप्रस्थ संस्कार - इसका समय ५० वर्ष के उपरान्त है जब घर में पुत्र का पुत्र हो जाए, तब गृहस्थ के धन्धे में फंसे रहना अधर्म है । उस समय यह संस्कार होता है।
🌷१५ :- सन्यास संस्कार - वानप्रस्थी वन में रह कर जब सब इन्द्रियों को जीत ले, किसी में मोह व शोक न रहें तब केवल संस्कार हेतू संन्यास आश्रम में प्रवेश किया जाता है।
🌷१६ :- अन्त्येष्टि संस्कार - मनुष्य शरीर का यह अन्तिम संस्कार है जो मृत्यु के पश्चात् शरीर को जलाकर किया जाता है।
ईश्वर-स्तुति प्रार्थना उपासना मंत्र
ॐ विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि परासुव । यद् भद्रं तन्न आ सुव ।। (यजुर्वेदः 30.3)
अर्थात् हे सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्य युक्त, शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर ! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को दूर कर दीजिए । जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, वह सब हमको प्राप्त कीजिये ।
स्वस्तिवाचन
प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है, विवाह मण्डप और अन्य शुभ प्रसंगों में हम जो स्वस्ति वाचन करते है, शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है. यह एक गहरा विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
इंद्र यानी सामूहिक चेतना . कहा जाता है की इंद्र के सहस्त्र अक्ष यानी आँखें होती है. यह एक विशाल जन समूह जिसकी एक चेतना हो ; उसका प्रतीक है. साधारण जन समूह किसी ना किसी मनोरंजन , राग रंग जैसे की क्रिकेट मैच , डांस या गाने का शो आदि में एकाग्र होता है. जैसे इंद्र को नृत्य गान आदि पसंद है , वैसे ही सामूहिक जन चेतना ऐसी ही गतिवधियों में एकाग्र चित्त होती है. यह मॉब मेंटालिटी का प्रतीक है. साधु- संत -महात्मा , ऋषि-मुनि उच्च चेतना युक्त होते है , पर एकाकी और एकांत वासी होते है. देश और समाज के कल्याण के लिए सामूहिक जन चेतना उच्च चेतना युक्त महात्मा का अनुकरण करे , सामाजिक आन्दोलन शुभ दिशा में हो ; यह प्रार्थना स्वस्ति वाचन से की जाती है. विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें; अरिष्टों (कष्टों, विपदाओं) का निवारण करनेवाले, चक्र के समान प्रबल गरूडदेव हमारे लिए कल्याणकारी हों; वाणी के अधिष्ठाता बृहस्पति हमारे लिए कल्याणप्रद हों. ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः= हे परमात्मन् हमारे त्रिविध ताप की शान्ति हो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
कानों से हम कल्याणकारक शुभ भाषण सुनें. आँखों से हम कल्याणकारक वस्तु देखें। स्थिर सुदृढ़ अवयवों से युक्त शरीरों से हम तुम्हारी स्तुति करते हुए, जितनी हमारी आयु है, वहाँ तक हम देवों का हित ही करें अर्थात देवत्व को प्राप्त करे , सत्व गुणों को बढाते चले. समाज में बुराई आटे में नमक के बराबर हो तो चलता है ; पर जब बुराई इतनी बढ़ जाए की नमक में आटा हो तो दुनिया में त्राहि त्राहि हो जाती है. उससे रक्षा करने की भावना जगाने वाला यह मन्त्र है.
इस भावना से जोड़ कर रोज़ स्वस्ति वाचन पाठ किया जाए तो आत्म कल्याण और समाज का कल्याण अवश्य होगा।
*कलाई पर बांधा जाने वाला कलावा कितनी बार लपेटना चाहिए?*
*हिंदू धर्म में पूजा-पाठ या कोई मांगलिक कार्य हो कलाई पर मौली या कलावा बांधा जाता है. रक्षा सूत्र या मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है. यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही चली आ रही है, कलावा को संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में बांधे जाने की वजह पौराणिक ग्रंथों में उल्लेखित है.*
*पौराणिक कथा के अनुसार, असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था. इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, इसे बांधने के क्या नियम हैं आइए जानते हैं-*
*कितने दिन तक पहने कलावा*
अक्सर हम सभी कलावा बांधने के बाद उसे निकालना भूल जाते हैं और वो लंबे समय तक हाथ में बंधा रह जाता है. इस तरह वो कलावा हमें अपनी ऊर्जा देना बंद कर देता है. इसलिए शास्त्रों में इसे कितने दिनों तक पहनना चाहिए इसका वर्णन किया गया है. हाथ में कलावा सिर्फ 21 दिन के लिए बांधना चाहिए. 21 दिन इसलिए क्योंकि अमूमन तौर पर इतने दिन में कलावे का रंग उतरने लगता है और कलावा कभी भी उतरे हुए रंग का नहीं पहनना चाहिए.
*ऐसा कलावा मानते हैं अशुभ*
रंग उतरता कलावा बांधना अशुभ माना जाता है. इसलिए इसे उतार देना ही उचित होता है. 21 दिनों के बाद फिर किसी अच्छे मुहुर्त में हाथ पर कलावा बंधवा सकते हैं. साथ ही ऐसा भी कहा गया है कि कलावा जब भी हाथ से उतारा जाता है तो वह आपके भीतर और आपके आसपास की नकारात्मकता को लेकर ही उतरता है. इसलिए उस कलावे को दौबारा नहीं पहनना चाहिए. हाथ से उतारा हुआ कलावा किसी बहती नदी में प्रवाहित कर देना शुभ होता है.
*मौली या कलावा बांधने के नियम*
1. पुरुषों और अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए.
2. विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है.
3. जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हैं उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए.
4. कलावा बंधवाते समय दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए.
5. मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रखे रक्षासूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए।
cp
वृक्ष तथा उनका महत्त्व: वैदिक वास्तु
Part 1
भारतीय संस्कृति में “एक एव आत्मा सर्वभूतेषु गूढः" की भावना हमें दृष्टिगोचर होती है। ईश्वर का ही अंश इस सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है और यह ईश्वरीय अंश वृक्षों में भी विद्यमान है। इसलिए ही भारतीय संस्कृति में वृक्षों में भी देवत्व की कल्पना की गई है। हम वृक्षारोपण को एक धार्मिक कार्य मानते हैं। बृहत्संहिता में निर्दिष्ट है कि- वृक्ष लगाने से पहले व्यक्ति स्नान करके पवित्र होकर चन्दन आदि से वृक्ष की पूजा करे, फिर एक स्थान से दूसरे स्थान पर लगाये। एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के पूर्व घृत, तिल, शहद, दूध, गोबर इन सबको पीसकर मूल से लेकर अग्रपर्यन्त लेपकर वृक्ष को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जा सकते हैं। ऐसा करने से पत्तों से युक्त वृक्ष पुष्पित और पल्लवित होता है। दुर्गासप्तशती में वृक्षों का महत्व बताते हुए कहा गया है कि-
यावद् भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत् तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी।
आगे वाले आने वाली पोस्ट में हम आपको अवगत कराएंगे की कौन सा पौधा आप घर में लगा सकते हैं और कौन सा घर के बाहर होना चाहिए और सनातन धर्म ग्रंथो के अनुसार उस वृक्ष या पौधे का क्या फल एवं महत्व है। क्रमशः
भाई दूज का मुहूर्त बताने वाले विद्वान जनों
से प्रार्थना है कि इस इस त्योहार को मुहूर्त की सीमा में ना बांधे ।
यहां पर बहन बेटियों को आना भी पड़ता है और दूसरी जगह जाना भी पड़ता है। आपके बताएं एक-दो घंटे के मुहूर्त में यह सब स्थितियां संभव नहीं होती यह पूरे दिन का त्यौहार है पूरे दिन मनाने दीजिए।
ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्र्म' इसका मतलब यह हुआ कि ग्रह (ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि) और समय का ज्ञान कराने वाले विज्ञान को ज्योतिष अर्थात ज्योति प्रदान करने वाला विज्ञान कहते हैं। एक तरह से यह रास्ता बतलाने वाला शास्त्र है। जिस शास्त्र से संसार का ज्ञान, जीवन-मरण का रहस्य और जीवन के सुख-दुःख के संबंध में ज्योति दिखाई दे वही ज्योतिष शास्त्र है। इस अर्थ में वह खगोल से ज्यादा अध्यात्म और दर्शनशास्त्र के करीब बैठता है।
ऐसा माना जाता है कि ज्योतिष का उदय भारत में हुआ, क्योंकि भारतीय ज्योतिष शास्त्र की पृष्ठभूमि 8000 वर्षों से अधिक पुरानी है। भारतीय ज्योतिष के प्रमुख ज्योतिर्विद और उनके द्वारा लिखे गए खास-खास ग्रंथ-
1. पाराशर मुनि वृहद पाराशर, होरा शास्त्र
2. वराह मिहिर वृहद संहिता, वृहत्जातक, लघुजातक
3. भास्कराचार्य सिद्धांत शिरोमणि
4. श्रीधर जातक तिलक
ज्योतिष शास्त्र के कुछ और जाने-माने ग्रंथ इस प्रकार हैं-
1. सूर्य सिद्धांत
2. लघु पाराशरी
3. फल दीपिका
4. जातक पारिजात
5. मान सागरी
6. भावप्रकाश
7. भावकुतूहल
8. भावार्थ रत्नकारा
9. मुहूर्त चिन्तामणि
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सन 2001, वैदिक ज्योतिषीय सलाह में कार्यरत।
ज्योतिष प्रतिबिंब
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