07/04/2015
माता रमाई का जन्म महाराष्ट्र
के दापोली के निकट वानाड गावं
में ७ फरवरी 1898 में हुआ था.
पिता का नाम भीकू वालंगकर था.
रमाई के बचपन का नाम रामी था.
रामी के माता-पिता का देहांत
बचपन में ही हो गया था. रामी की
दो बहने और एक भाई था. भाई का
नाम शंकर था. बचपन में ही माता-
पिता की मृत्यु हो जाने के
कारण रामी और उसके भाई-बहन
अपने मामा और चाचा के साथ
मुंबई में रहने लगे थे. रामी का
विवाह 9 वर्ष की उम्र में
सुभेदार रामजी सकपाल के
सुपुत्र भीमराव आंबेडकर से सन
1906 में हुआ था. भीमराव की
उम्र उस समय 14 वर्ष थी. तब, वह 5
वी कक्षा में पढ़ रहे थे.शादी
के बाद रामी का नाम रमाबाई हो
गया था. भले ही डॉ. बाबासाहब
आंबेडकर को पर्याप्त अच्छा
वेतन मिलता था परंतु फिर भी वह
कठीण संकोच के साथ व्यय किया
करते थे. वहर परेल (मुंबई) में
इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट की चाल में
एक मजदूर-मुहल्ले में, दो कमरो
में, जो एक दुसरे के सामने थे
रहते थे. वह वेतन का एक निश्चित
भाग घर के खर्चे के लिए अपनी
पत्नी रमाई को देते थे. माता
रमाई जो एक कर्तव्यपरायण,
स्वाभिमानी, गंभीर और
बुद्धिजीवी महिला थी, घर की
बहुत ही सुनियोजित ढंग से
देखभाल करती थी. माता रमाईने
प्रत्येक कठिनाई का सामना
किया. उसने निर्धनता और
अभावग्रस्त दिन भी बहुत साहस
के साथ व्यत्तित किये. माता
रमाई ने कठिनाईयां और संकट
हंसते हंसते सहन किये. परंतु
जीवन संघर्ष में साहस कभी नहीं
हारा. माता रमाई अपने परिवार के
अतिरिक्त अपने जेठ के परिवार
की भी देखभाल किया करती थी.
रमाताई संतोष,सहयोग और
सहनशीलता की मूर्ति थी.डा.
आंबेडकर प्राय: घर से बाहर रहते
थे.वे जो कुछ कमाते थे,उसे वे
रमा को सौप देते और जब
आवश्यकता होती, उतना मांग लेते
थे.रमाताई घर खर्च चलाने में
बहुत ही किफ़ायत बरतती और कुछ
पैसा जमा भी करती थी.
क्योंकि, उसे मालूम था कि डा.
आंबेडकर को उच्च शिक्षा के
लिए पैसे की जरुरत होगी. रमाताई
सदाचारी और धार्मिक प्रवृति
की गृहणी थी. उसे पंढरपुर जाने
की बहुत इच्छा रही.महाराष्ट्र
के पंढरपुर में विठ्ठल-रुक्मनी
का प्रसिध्द मंदिर
है.मगर,तब,हिन्दू-मंदिरों में
अछूतों के प्रवेश की मनाही
थी.आंबेडकर, रमा को समझाते थे
कि ऐसे मन्दिरों में जाने से
उनका उध्दार नहीं हो सकता
जहाँ, उन्हें अन्दर जाने की
मनाही हो. कभी-कभार माता रमाई
धार्मिक रीतीयों को संपन्न
करने पर हठ कर बैठती थी, जैसे कि
आज भी बहुत सी महिलाए
धार्मिक मामलों के संबंध में
बड़ा कठौर रवैया अपना लेती है.
उनके लिये कोई चांद पर पहुंचता
है तो भले ही पहुंचे, परंतु
उन्होंने उसी सदियों पुरानी
लकीरों को ही पीटते जाना है.
भारत में महिलाएं मानसिक
दासता की श्रृंखलाओं में
जकडी हुई है. पुरोहितवाद-बादरी,
मौलाना, ब्राम्हण इन
श्रृंखलाओं को टूटने ही नहीं
देना चाहते क्योंकि उनका हलवा
माण्डा तभी गर्म रह सकता है यदि
महिलाए अनपढ और रुढ़िवाद से
ग्रस्त रहे. पुरोहितवाद की
शृंखलाओं को छिन्न भिन्न करने
वाले बाबासाहब डॉ. आंबेडकर ने
पुरोहितवाद का अस्तित्त्व
मिटाने के लिए आगे चलकर बहुत
ही मौलिक काम किया.
बाबासाहब डॉ. आंबेडकर जब
अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई
ने बहुत कठिण दिन व्यतीत किये.
पति विदेश में हो और खर्च भी
सीमित हों, ऐसी स्थिती में
कठिनाईयां पेश आनी एक साधारण
सी बात थी. रमाबाई ने यह कठिण
समय भी बिना किसी शिकवा-
शिकायत के बड़ी वीरता से हंसते
हंसते काट लिया. बाबासाहब
प्रेम से रमाबाई को "रमो" कहकर
पुकारा करते थे. दिसंबर १९४० में
डाक्टर बाबासाहब बडेकर ने जो
पुस्तक "थॉट्स ऑफ पाकिस्तान"
लिखी व पुस्तक उन्होंने अपनी
पत्नी "रमो" को ही भेंट की.