12/03/2024
R.S.Mundle English School
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12/03/2024
(संस्कृत ---देव भाषा) प्रिय मित्रों संस्कृत भाषा शिक्षण द्वारा अपने हिंदु धर्म ज्ञान और संस्कार समझे। संस्कृत शिक्षा अत्यंत सुलभ और सरल हे।
===============================
संस्कृत विद्वानों के अनुसार सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां निकलती हैं और ये चारों ओर से अलग-अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गईं। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इस तरह सूर्य की जब 9 रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनकी पृथ्वी के 8 वसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की 9 रश्मियां और पृथ्वी के 8 वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं, वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गईं। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित हैं।
ब्रह्मांड की ध्वनियों के रहस्य के बारे में वेदों से ही जानकारी मिलती है। इन ध्वनियों को अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के संगठन नासा और इसरो ने भी माना है।
कहा जाता है कि अरबी भाषा को कंठ से और अंग्रेजी को केवल होंठों से ही बोला जाता है किंतु संस्कृत में वर्णमाला को स्वरों की आवाज के आधार पर कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अंत:स्थ और ऊष्म वर्गों में बांटा गया है।
ॐ .... संस्कृत से संबंधित प्राथमिक ज्ञान...
> संस्कृत वणॅमाला मे ६३ वणॅ होते है।
२२ स्वर , ३३ व्यञ्जन और ८ अयोगवाह ...... होते है ।
स्वर :- ( कुल सङ्ख्या = २२ )
***************
> स्वर को बोलते समय किसी अन्य वणॅ की सहायता नही लेनी पडती ।
स्वर तीन प्रकार के हैं –
***************
१. हस्व या लघु स्वर - अ, इ, उ, ऋ, लृ ..... ( ५ )
२. दीर्घ स्वर - आ, ई, ऊ, ॠ , ए, ऐ, ओ, औ ..... ( ८ )
३. प्लुत स्वर – अ३, इ३, उ३, ऋ३, लृ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३ ..... ( ९ )
व्यञ्जन :- ( कुल सङ्ख्या = ३३ )
***************
> " व्यञ्जन " को बोलते समय किसी भी " एक स्वर " की सहायता लेनी पडती है ।
जैसे - ग - ग् + अ , क - क् + अ
> व्यञ्जन तीन प्रकार के होते हैं और पाँच प्रकार के वगॅ होते है ।
प्रकार : -
***************
१. स्पर्श व्यञ्जन ;
२. अन्तस्थ: व्यञ्जन ;
३. उष्म व्यञ्जन
वर्ग : -
***************
क , च , ट , त , प वगॅ
१. स्पर्श व्यञ्जन –
***************
क वर्ग -- क् ख् ग् घ् ङ्
च वर्ग -- च् छ् ज् झ् ञ्
ट वर्ग -- ट् ठ् ड् ढ् ण्
त वर्ग -- त् थ् द् ध् न्
प वर्ग -- प् फ् ब् भ् म्
२. अन्त्स्थः व्यञ्जन –
***************
य् र् ल् व्
३. उष्म व्यञ्जन –
***************
श् ष् स् ह्
नरम व्यंजन अर्थात् अल्पप्राण वर्ण हैँ - कचटतप ,गजडदब ,ङञणनम ।
कठिन व्यंजन अर्थात् महाप्राण वर्ण हैँ - खछठथफ , घझढधभ , शषसह ।
> " व्यञ्जन " के अंत मे जो भी " स्वर " आता है उसे उस " स्वर का कारांत " कहते है जैसे --
( ०१ ) गति - ग् + अ + त् + इ ( इकारांत )
( ०२ ) मातृ - म् + आ + त् + ऋ ( ऋकारांत )
( ०३ ) कमल - क् + अ + म् + अ + ल् + अ ( अकारांत )
> व्यञ्जन को बोलते समय मुँह के पाँच भागो का प्रयोग होता है ।
१) कण्ठस्थ २) तालव्य ३) मुधॅन्य ४) दन्तस्थ ५) ओष्ठस्थ
> अयोगवाह :– ( कुल सङ्ख्या = ०८ )
***************
( ०१ ) अनुस्वार - अं ( ं ) ,
( ०२ ) विसर्ग - अ: ( : )
( ०३ ) अनुनासिक
( ०४ ) जिह्वामूलीय
( ०५ ) उपध्मानीय
( ०६ ) ह्रस्व
( ०७ ) दीर्घ
( ०८ ) ळ
> विशेष वणॅ –
***************
क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
" पठ " धातु के रूप सीखे और इसी तरह अन्य धातु के रूप लिखे .... जैसे .....
लिख - लिखना,
खाद - खाना,
वद - बोलना,
पश्य - देखना,
उपविश - बैठना इत्यादि ......
हर दिन अभ्यास करे और संस्कृत मे लिखना शुरू करे.... शुरू मे कठिन लगेगा पर धीरे धीरे बहुत आसान लगेगा ... रटने की कोई जरूरत नहीं.... लिखने और बोलने मे संस्कृत का प्रयोग आज से शुरू कर दो ...
*******************
आओ मिलकर नया सुनहरा, स्वच्छ, सुंदर, स्वर्णिम भारत का निर्माण करे......
ॐ शांति || जय हिन्दी || जय संस्कृतस्य संरक्षणम्
(संस्कृत ---देव भाषा) प्रिय मित्रों संस्कृत भाषा शिक्षण द्वारा अपने हिंदु धर्म ज्ञान और संस्कार समझे। संस्कृत शिक्षा अत्यंत सुलभ और सरल हे।
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संस्कृत विद्वानों के अनुसार सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां निकलती हैं और ये चारों ओर से अलग-अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गईं। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इस तरह सूर्य की जब 9 रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनकी पृथ्वी के 8 वसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की 9 रश्मियां और पृथ्वी के 8 वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं, वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गईं। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित हैं।
ब्रह्मांड की ध्वनियों के रहस्य के बारे में वेदों से ही जानकारी मिलती है। इन ध्वनियों को अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के संगठन नासा और इसरो ने भी माना है।
कहा जाता है कि अरबी भाषा को कंठ से और अंग्रेजी को केवल होंठों से ही बोला जाता है किंतु संस्कृत में वर्णमाला को स्वरों की आवाज के आधार पर कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अंत:स्थ और ऊष्म वर्गों में बांटा गया है।
ॐ .... संस्कृत से संबंधित प्राथमिक ज्ञान...
> संस्कृत वणॅमाला मे ६३ वणॅ होते है।
२२ स्वर , ३३ व्यञ्जन और ८ अयोगवाह ...... होते है ।
स्वर :- ( कुल सङ्ख्या = २२ )
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> स्वर को बोलते समय किसी अन्य वणॅ की सहायता नही लेनी पडती ।
स्वर तीन प्रकार के हैं –
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१. हस्व या लघु स्वर - अ, इ, उ, ऋ, लृ ..... ( ५ )
२. दीर्घ स्वर - आ, ई, ऊ, ॠ , ए, ऐ, ओ, औ ..... ( ८ )
३. प्लुत स्वर – अ३, इ३, उ३, ऋ३, लृ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३ ..... ( ९ )
व्यञ्जन :- ( कुल सङ्ख्या = ३३ )
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> " व्यञ्जन " को बोलते समय किसी भी " एक स्वर " की सहायता लेनी पडती है ।
जैसे - ग - ग् + अ , क - क् + अ
> व्यञ्जन तीन प्रकार के होते हैं और पाँच प्रकार के वगॅ होते है ।
प्रकार : -
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१. स्पर्श व्यञ्जन ;
२. अन्तस्थ: व्यञ्जन ;
३. उष्म व्यञ्जन
वर्ग : -
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क , च , ट , त , प वगॅ
१. स्पर्श व्यञ्जन –
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क वर्ग -- क् ख् ग् घ् ङ्
च वर्ग -- च् छ् ज् झ् ञ्
ट वर्ग -- ट् ठ् ड् ढ् ण्
त वर्ग -- त् थ् द् ध् न्
प वर्ग -- प् फ् ब् भ् म्
२. अन्त्स्थः व्यञ्जन –
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य् र् ल् व्
३. उष्म व्यञ्जन –
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श् ष् स् ह्
नरम व्यंजन अर्थात् अल्पप्राण वर्ण हैँ - कचटतप ,गजडदब ,ङञणनम ।
कठिन व्यंजन अर्थात् महाप्राण वर्ण हैँ - खछठथफ , घझढधभ , शषसह ।
> " व्यञ्जन " के अंत मे जो भी " स्वर " आता है उसे उस " स्वर का कारांत " कहते है जैसे --
( ०१ ) गति - ग् + अ + त् + इ ( इकारांत )
( ०२ ) मातृ - म् + आ + त् + ऋ ( ऋकारांत )
( ०३ ) कमल - क् + अ + म् + अ + ल् + अ ( अकारांत )
> व्यञ्जन को बोलते समय मुँह के पाँच भागो का प्रयोग होता है ।
१) कण्ठस्थ २) तालव्य ३) मुधॅन्य ४) दन्तस्थ ५) ओष्ठस्थ
> अयोगवाह :– ( कुल सङ्ख्या = ०८ )
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( ०१ ) अनुस्वार - अं ( ं ) ,
( ०२ ) विसर्ग - अ: ( : )
( ०३ ) अनुनासिक
( ०४ ) जिह्वामूलीय
( ०५ ) उपध्मानीय
( ०६ ) ह्रस्व
( ०७ ) दीर्घ
( ०८ ) ळ
> विशेष वणॅ –
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क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
" पठ " धातु के रूप सीखे और इसी तरह अन्य धातु के रूप लिखे .... जैसे .....
लिख - लिखना,
खाद - खाना,
वद - बोलना,
पश्य - देखना,
उपविश - बैठना इत्यादि ......
हर दिन अभ्यास करे और संस्कृत मे लिखना शुरू करे.... शुरू मे कठिन लगेगा पर धीरे धीरे बहुत आसान लगेगा ... रटने की कोई जरूरत नहीं.... लिखने और बोलने मे संस्कृत का प्रयोग आज से शुरू कर दो ...
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आओ मिलकर नया सुनहरा, स्वच्छ, सुंदर, स्वर्णिम भारत का निर्माण करे......
ॐ शांति || जय हिन्दी || जय संस्कृतस्य संरक्षणम्
ओ३म् #आओ संस्कृत सीखें।
संस्कृत वाक्य अभ्यासः
~~~~~~~~~~~~
माता - वत्स ! तव मुष्टिकायां किम् अस्ति ?
= बेटा ! तुम्हारी मुट्ठी में क्या है ?
पुत्रः - खाद्य-पदार्थः अस्ति
= खाने की चीज है ।
माता - कीदृशः खाद्य-पदार्थः ?
= कैसा खाद्य पदार्थ ?
पुत्रः - दर्शयामि , पूर्वं नेत्रे निमीलयतु
= पहले आँख बन्द करिये ।
पुत्रः - आम् मातः , खादतु
= हाँ माँ , खाईये ।
माता - ओह केवलं द्वे कणे एव
= ओह केवल दो दाने
पुत्रः - किम् अस्ति एतद् ?
= क्या है ये ?
माता - भूचणकः अस्ति
= मूंगफली है ।
माता - कुतः आनीतवान् ?
= कहाँ से लाए ?
पुत्रः - अहं गृहवाटिकायां भूचणकं वपितवान्
= मैंने घर के बगीचे में मूंगफली बोई थी ।
पुत्रः - अद्य भूचणकाः अजायन्त
= आज मूंगफलियाँ पैदा हुई हैं ।
माता - तर्हि त्वम् अपि खाद
= तो फिर तुम भी खाओ ।
सामान्य वाक्यानि
प्रयत्नं करोमि | = I try (प्रयास करता हूँ ।)
न शक्यते भो: | = No, I can't (नहीं हो सकता यार)
तथा न वदतु | = Don't say that (वैसा मत बोलो)
तत्र कोSपि सन्देहः नास्ति | = there is no doubt about it (वहां पर कोई सन्देह नहीं है ।)
तद् अहं न ज्ञातवान् | = I don't know that (वह मैं नहीं जान पाया ।)
कदा ददाति ? = When are you going to give me? (कब दोगे ।)
अहं कथं वदामि 'कदा इति' ? = How can i say (मैं कैसे बताऊँ कब है ?)
तथा भवति वा? = Can that be so? (क्या वैसा होता है?)
भवतः समयावकाशः अस्ति वा? = Are you free? ( क्या आप मुक्त हो?)
अद्य भवतः कार्यक्रमः कः ? = What are your programs for today (आज आपका कार्यक्रम क्या है ?)
अरे ! पादस्य / हस्तस्य किं अभवत् ? = Oh! what happened to your legs / arms? (अरे पैर और हाथ का क्या हुआ?)
बहुदिनेभ्यः ते परिचिता: | = I have known him for long (बहुत दिनों से वे परिचित है ।)
तस्य कियद् धैर्यं / धार्ष्टयम् ? = How dare he is? (उसका कितना धैर्य है ?)
भवान् न उक्तवान् एव | = You have not told me (आपने बोला ही नहीं?)
अहं किं करोमि ? = What can i do? (मैं क्या करूँ?)
अहं न जानामि | = i do not know (मैं नहीं जानता हूँ )
यथा भवान् इच्छति तथा | = As you wish / say (जैसा आप चाहते हो वैसा?)
भवतु, चिन्तां न करोतु | = Yes, do not bother (रहने दो, चिन्ता मत करो)
तेन किमपि न सिध्यति | = There is no use (उससे कुछ नहीं होता)
सः सर्वथा अप्रयोजकः | = He is good for nothing (वह हमेशा बिना उपयोगाय है)
पुनरपि एकवारं प्रयत्नं कुर्मः | = Let us try once more (फिर से एकबार प्रयास करते हैं)
मौनमेव उचितम् | = Better be quiet (मौन रहना ही उचित है ।)
तत्र अहं किमपि न वदामि | = No comments / I don't want to say anything in this regard. (वहां मैं कुछ नहीं बोलता ।)
तर्हि समीचीनम् | = O.K. if that is so. (फिर ठीक है ।)
एवं चेत् कथम् ? = How to get on, if it is so? (ऐसा तो कैसे?)
मां किञ्चित् स्मारयतु | = Please remind me. (कुछ मत याद करवाओ)
तं अहं सम्यक् जानामि | = I know him well. (मैं उसे अच्छे से जानता हूँ)
तदानीमेव उक्तवान् किल ? = Haven't I told you already? (उस समय ही बोला था न?)
जयतु संस्कृतं जयतु भारतम् ।।
08/05/2021
***********************
प्रथम पुरुष ( First person ) :--
***********************
पुल्लिंग ~~ स:, तौ, ते
( वह , वह दोनों , वे सब )
एषः , एतौ , एते
( यह , यह दोनों , ये सब )
स्त्रीलिंग ~~ सा , ते , ताः
( वह , वह दोनों , वे सब )
एषा , एते , एताः
( यह , यह दोनों , ये सब )
नपुंसकलिंग ~~ तत् , ते , तानि
( वह , वह दोनों , वे सब )
एतत् , एते , एतानि
( यह , यह दोनों , ये सब )
***************************
मध्यम पुरुष ( Second person ) :--
***************************
त्वम् , युवाम् , यूयम्
( तुम , तुम दोनों, तुम सब )
************************
उत्तम पुरुष ( Third person ) :--
************************
अहम् , आवाम् , वयम्
( मैं, हम दोनों, हम सब )
हरि:ॐतत्सत् !
श्रीगुरुदेवाय नम:!
सर्वेभ्यो भक्तेभ्यो नमो नम:!
"""वदतु संस्कृतम् वदतु संस्कृतम्"""""
🔴संस्कृत भाषा बोलने के
चिकित्सीय लाभ
संस्कृत में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं।
( ०१ ) अनुस्वार (अं ) और विसर्ग(अ:) :-
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग।
पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं —
यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि। और
नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं—
यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।
अब जरा ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।
उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भौंरे की तरह गुंजन करना होता है, और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जावेगा।
कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि स्वामी रामदेव जी जैसे संतों ने सिद्ध करके सभी को बता दिया है। मैं तो केवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।
जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- '' राम फल खाता है``
इसको संस्कृत में बोला जायेगा- '' राम: फलं खादति"
राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।
संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना।
२- शब्द-रूप :-
संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार २५ रूप बनते हैं।
यथा:- रम् (मूल धातु)
राम: रामौ रामा:
रामं रामौ रामान्
रामेण रामाभ्यां रामै:
रामाय रामाभ्यां रामेभ्य:
रामत् रामाभ्यां रामेभ्य:
रामस्य रामयो: रामाणां
रामे रामयो: रामेषु
हे राम! हेरामौ! हे रामा:!
ये २५ रूप सांख्य दर्शन के २५ तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है। और इन २५ तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है।
सांख्य दर्शन के २५ तत्व निम्नानुसार हैं।-
आत्मा (पुरुष)
(अंत:करण ४ ) मन बुद्धि चित्त अहंकार
(ज्ञानेन्द्रियाँ ५ ) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण
(कर्मेन्द्रियाँ ५) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्
(तन्मात्रायें ५ ) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द
( महाभूत ५ ) पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश
३- द्विवचन :-
संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है।
जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।
४ सन्धि :-
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐंसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।
''इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।
यथा:- १ इत्यहं जानामि।
२ अहमिति जानामि।
३ जानाम्यहमिति ।
४ जानामीत्यहम्।
इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं निरोगी हो जाता है।
इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे अमृतवाणी कहते हैं।
🙏🏻🌹🙏🏻
02/04/2020
Best English Grammar Notes👌
15/03/2020
500 Mathematics Formula Collection 👌
29/02/2020
English grammar
29/02/2020
👌
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