प्राचीन भारतीय वैदिक गणित पाठशाला Ancient Indian Vedic Mathematics School

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11/12/2025

श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित

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श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★
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बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★
📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★
📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★
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राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★
📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★
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महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★
📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★
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कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★
📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★
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हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★
📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★
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शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★
📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★
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विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★
📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★
📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★
📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★
📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★
📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★
📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★
📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★
📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★
📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★
📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★
📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★
📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★
📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★
📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★
📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★
📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★
📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★
📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★
📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★
📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★
📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★
📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★
1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★
📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★
📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★
📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★
📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★
📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★
📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★
📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★
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तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★
📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★

📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

जय श्री राम🙏

04/12/2025

दण्डक्रम करने से समाज को क्या लाभ हुआ ?
अथवा पचास दिन वेद पढ़ने से के फ़ायदा हुआ जी , जैसे प्रश्न मुझे भी किया गया ।
और इसी से मिलती जुलती बकवास वे शक्तियां जो वेदों में अश्रद्धा रखती हैं उनका भी विलाप शुरू हो चुका है ।
तो उन्हें अथवा हर शंकालु को बता दिया जाये कि दण्डक्रम केवल मेधा ही नहीं यह गणित भी है । और आधुनिकतम टेक्नोलॉजी भी इससे लाभान्वित हो रही है ।
गणित , विज्ञान और कंप्यूटर से तो समाज को लाभ होता है न ?
तो , दण्डक्रम (Dandakrama) वैदिक पाठ की गणितीय विधि को समझा जाये । और आधुनिक कम्प्यूटर इस विधि का कैसे उपयोग करता है वह भी समझा जाये ।
दण्डक्रम वैदिक संहिताओं के विकृतिपाठों (varied/modified recitation styles) में से एक है। इसमें मंत्रों या शब्दों को एक विशेष क्रम में इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि एक दण्ड (|) की तरह क्रम बन जाता है , अर्थात आगे बढ़ना और फिर पीछे लौटना।
यह पूरा क्रम गणितीय पैटर्न (Mathematical Patterning) पर आधारित होता है। इसे एक प्रकार का क्रमचयन (combinatorial sequencing) माना जाता है, जहाँ शब्दों के समूहों का निर्माण निश्चित नियम से आगे–पीछे चलता है।
आधुनिक कंप्यूटिंग में, संयोजन तर्क (लॉजिक गेट्स के मूल "क्रम") के प्राथमिक लाभ इसकी गति, सरलता और निर्धारित व्यवहार में निहित हैं। ये सर्किट मूल प्रसंस्करण कार्यों के लिए आवश्यक, उच्च-गति वाले बिल्डिंग ब्लॉक्स बनाते हैं।
मुख्य लाभ ( आधुनिकतम कम्प्यूटर में भी )
संचालन की उच्च गति से संयोजन सर्किट वर्तमान इनपुट के आधार पर तत्काल आउटपुट उत्पन्न करते हैं, जो केवल गेट्स के माध्यम से प्रसार विलंब तक सीमित होते हैं। उन्हें क्रमिक सर्किट्स की तरह परिवर्तनों को सिंक्रनाइज़ करने के लिए क्लॉक सिग्नल की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती है। यह उन्हें प्रोसेसर के भीतर समय-महत्वपूर्ण कार्यों के लिए आदर्श बनाता है।
सरलता और डिजाइन में सहजता , ये सर्किट डिजाइन और कार्यान्वयन में सरल होते हैं क्योंकि उनमें मेमोरी तत्व (फ्लिप-फ्लॉप की तरह) और फीडबैक लूप्स का अभाव होता है। उनके व्यवहार को सत्य सारणी और बूलियन बीजगणित का उपयोग करके आसानी से वर्णित किया जा सकता है, जिससे डिबगिंग और परीक्षण सरल हो जाता है।
निर्धारित और पूर्वानुमेय व्यवहार , आउटपुट केवल वर्तमान इनपुट का शुद्ध फलन होता है। इनपुट के समान सेट दिए जाने पर, आउटपुट हमेशा समान रहेगा, जिससे उनका संचालन विश्वसनीय और मजबूत हो जाता है।
आवश्यक बिल्डिंग ब्लॉक्स , संयोजन सर्किट मौलिक घटक होते हैं जिनका उपयोग अधिक जटिल प्रणालियों के निर्माण के लिए किया जाता है, जिसमें कंप्यूटर के सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (सीपीयू) में पाए जाने वाले अंकगणितीय तर्क इकाइयां (एएलयू) सम्मिलित हैं, जो गणितीय और तार्किक संचालन करती हैं।
आधुनिक कंप्यूटिंग में प्रमुख अनुप्रयोग
अंकगणितीय तर्क इकाइयाँ (एएलयू) , किसी भी सीपीयू का मूल संयोजन सर्किट्स (जैसे एडर और सबट्रैक्टर) का उपयोग जोड़ और घटाव जैसी तात्कालिक गणना करने के लिए करता है।
डेटा हैंडलिंग और रूटिंग में मल्टीप्लेक्सर (एमयूएक्स) और डी-मल्टीप्लेक्सर (डीईएमयूएक्स), जो संयोजन सर्किट हैं, सिस्टम के भीतर डेटा का कुशलतापूर्वक चयन और रूटिंग करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जिससे संचार चैनलों और बैंडविड्थ का अनुकूलन होता है।
कोड रूपांतरण और डिकोडिंग , डिकोडर और एनकोडर का उपयोग सीपीयू के भीतर निर्देश कोड को विशिष्ट नियंत्रण सिग्नल में परिवर्तित करने या विशिष्ट मेमोरी स्थानों (मेमोरी डिकोडर) का चयन करने जैसे कार्यों के लिए किया जाता है।
तार्किक संचालन , इनका उपयोग डिजिटल सिस्टम के भीतर विभिन्न निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में किया जाता है जहां वर्तमान स्थितियों के आधार पर तत्काल आउटपुट की आवश्यकता होती है, जैसे कि डेटा भंडारण और संचरण में त्रुटि पहचान और सुधार प्रणालियाँ।
अंततः, आधुनिक कंप्यूटिंग सिस्टम संयोजन और अनुक्रमिक तर्क सर्किट दोनों के संयोजन पर निर्भर करते हैं: तात्कालिक, डेटा-प्रोसेसिंग कार्यों के लिए संयोजन सर्किट, और उन स्मृति और नियंत्रण कार्यों के लिए अनुक्रमिक सर्किट जिनके लिए पिछली स्थितियों के भंडारण की आवश्यकता होती है।
अब लाभ पढ़ लिया तो गणितीय संरचना भी समझ ली जाये ।
दण्डक्रम की गणितीय संरचना
मान लीजिए किसी मंत्र में 3 शब्द हैं:
A B C
दण्डक्रम में इनका क्रम इस प्रकार बनता है:
1. A
2. A B
3. A B C
4. B C
5. C
इसे देखने पर पता चलता है कि यह क्रम
• पहले 1 से n तक बढ़ता है
• फिर n से 1 तक घटता है
इसलिए इसका नियम (Rule) यह है:
Rule:
यदि शब्दों की संख्या = n हो, तो दण्डक्रम की कुल पंक्तियाँ होती हैं:
(1 + 2 + ... + n) + (n - 1 + ... + 1)
अर्थात्:
= \frac{n(n+1)}{2} + \frac{(n-1)n}{2}
= n^2
दण्डक्रम हमेशा n² पंक्तियों वाला होता है। यह इसकी गणितीय पहचान है ।
उदाहरण , 4 शब्दों का दण्डक्रम
शब्द: A B C D
Total lines = 4² = 16
क्रम:
1. A
2. A B
3. A B C
4. A B C D
5. B
6. B C
7. B C D
8. C
9. C D
10. D
ऊपर की शृंखला को पूरी 16-पंक्तियों में विस्तृत किया जा सकता है , यह एक दण्ड के समान ऊपर बढ़ता और नीचे उतरता पैटर्न बनाता है।
तो , गणितीय दृष्टि से दण्डक्रम क्या है?
यह सन्निवेश (Nested Sequences) की प्रक्रिया है।
इसमें दो त्रिभुजाकार (triangular number sequences) एक साथ मिलकर n^2 का वर्ग बनाते हैं।
इसलिए इसे वैदिक पाठ का “square-pattern chanting” भी कहा जा सकता है।
संहितापाठ, पदपाठ, दंडक्रमपाठ, जटापाठ, घनपाठ, उभयतापाठ, रेखा पाठ और ध्वज / शिखा / रथ पाठ । अर्थात् इन पाठ-पद्धतियों की कारण ही वेद न केवल शब्दशः, बल्कि स्वरशः और नादशः आज तक सुरक्षित हैं ।
यह विश्व की सबसे प्राचीन और सुदृढ़ मौखिक ज्ञान-परंपरा का चमत्कार है।
संसार में इसके समकक्ष और कोई उदाहरण नहीं है । पाठ के अनेक प्रकार इनके अर्थ को भी बिगाड़ने का अवसर नहीं देते ।
और यही है भारत की श्रौत परंपरा , जो आतंकियों द्वारा नालंदा के दहन से भी नहीं जली, और अनादि काल से अनेक ढंग के पाठों के रूप में सूक्ष्म वेदपरंपराओं को जीवित रखे हुए है।
श्रुति की रक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि ब्राह्मणों की मेधा-परंपरा और गुरु-शिष्य संबंधों की अखंड साधना से हुई है।
इसी परंपरा का अद्भुत प्रमाण हैं 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे जी, जिन्होंने बिना किसी पुस्तक के, मात्र स्मरण-शक्ति के आधार पर शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन शाखा) के 2000 मंत्रों वाले ‘दण्डकर्म पारायणम्’ का 50 दिनों तक अखंड, शुद्ध और विधि-पूर्वक पाठ किया।
यह उपलब्धि न केवल उनकी मेधा शक्ति और तपस्या का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का आलोक भी है।
काशी की पवित्र भूमि जो मेरी मातृभूमि भी है में सम्पन्न इस साधना पर गर्व है।
देवव्रत जी, उनके परिवार, आचार्यों, संतों, विद्वानों और सभी सहयोगी संस्थाओं तथा गुरु शिष्य परंपरा को कोटि-कोटि नमन।
वैदिक परंपरा सनातन धर्म को आलोकित करती रहे , वैदिक परंपरा गणित और विज्ञान को अनंत काल तक दिशा देती रहे और पूरे संसार का कल्याण करती रहे , श्रुति भगवती की जय हो ।

28/11/2025

व्यक्ति विशेष:
हम न्यूटन को जानते हैं, स्वामी ज्येष्ठदेव को नहीं...

आप न्यूटन को जानते हैं, बचपन से पढ़ते आ रहे हैं...

लेकिन क्या आप स्वामी माधवन या ज्येष्ठदेव को जानते हैं? नहीं जानते होंगे...

इन सभी वैज्ञानिकों से कई वर्षों पूर्व पंद्रहवीं सदी में दक्षिण भारत के स्वामी ज्येष्ठदेव ने ताड़पत्रों पर गणित के ये तमाम सूत्र लिख रखे हैं।

इनमें से कुछ सूत्र ऐसे भी हैं, जो उन्होंने अपने गुरुओं से सीखे थे। यानी गणित का यह ज्ञान उनसे भी पहले का है, परन्तु लिखित स्वरूप में नहीं था।

“मैथेमेटिक्स इन इण्डिया” पुस्तक के लेखक किम प्लोफ्कर लिखते हैं कि, “तथ्य यही हैं सन 1660 तक यूरोप में गणित या कैलकुलस कोई नहीं जानता था। जेम्स ग्रेगरी सबसे पहले गणितीय सूत्र लेकर आए थे।

जबकि सुदूर दक्षिण भारत के छोटे से गाँव में स्वामी ज्येष्ठदेव ने ताड़पत्रों पर कैलकुलस, त्रिकोणमिति के ऐसे ऐसे सूत्र और कठिनतम गणितीय व्याख्याएँ तथा संभावित हल लिखकर रखे थे, कि पढ़कर हैरानी होती है”।

इसी प्रकार चार्ल्स व्हिश नामक गणितज्ञ लिखते हैं कि...

“मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि शून्य और अनंत की गणितीय श्रृंखला का उदगम स्थल केरल का मालाबार क्षेत्र है”।

स्वामी ज्येष्ठदेव द्वारा लिखे गए इस ग्रन्थ का नाम है “युक्तिभाष्य”, जो जिसके पंद्रह अध्याय और सैकड़ों पृष्ठ हैं।

यह पूरा ग्रन्थ वास्तव में चौदहवीं शताब्दी में भारत के गणितीय ज्ञान का एक संकलन है, जिसे संगमग्राम के तत्कालीन प्रसिद्ध गणितज्ञ स्वामी माधवन की टीम ने तैयार किया है।

स्वामी माधवन का यह कार्य समय की धूल में दब ही जाता, यदि स्वामी ज्येष्ठदेव जैसे शिष्यों ने उसे ताड़पत्रों पर उस समय की द्रविड़ भाषा (जो अब मलयालम है) में न लिख लिया होता।

इसके बाद लगभग 200 वर्षों तक गणित के ये सूत्र “श्रुति स्मृति” के आधार पर शिष्यों की पीढी से एक दुसरे को हस्तांतरित होते चले गए।

भारत में श्रुति स्मृति (गुरु के मुंह से सुनकर उसे स्मरण रखना) परंपरा बहुत प्राचीन है।

इसलिए सम्पूर्ण लेखन करने (रिकॉर्ड रखने अथवा दस्तावेजीकरण) में प्राचीन लोग विश्वास नहीं रखते थे।

जिसका नतीजा हमें आज भुगतना पड़ रहा है, कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में संस्कृत भाषा के छिपे हुए कई रहस्य आज हमें पश्चिम का आविष्कार कह कर परोसे जा रहे हैं।

जॉर्जटाउन विवि के प्रोफ़ेसर होमर व्हाईट लिखते हैं कि संभवतः पंद्रहवीं सदी का गणित का यह ज्ञान धीरे धीरे इसलिए खो गया, क्योंकि कठिन गणितीय गणनाओं का अधिकाँश उपयोग खगोल विज्ञान एवं नक्षत्रों की गति इत्यादि के लिए होता था। सामान्य जनता के लिए यह अधिक उपयोगी नहीं था।

इसके अलावा जब भारत के उन ऋषियों ने दशमलव के बाद ग्यारह अंकों तक की गणना एकदम सटीक निकाल ली थी, तो गणितज्ञों के करने के लिए कुछ बचा नहीं था।

ज्येष्ठदेव लिखित इस ज्ञान के “लगभग” लुप्तप्राय होने के सौ वर्षों के बाद पश्चिमी विद्वानों ने इसका अभ्यास 1700 से 1830 के बीच किया।

चार्ल्स व्हिश ने “युक्तिभाष्य” से सम्बंधित अपना एक पेपर “रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड” की पत्रिका में छपवाया।

चार्ल्स व्हिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के मालाबार क्षेत्र में काम करते थे, जो आगे चलकर जज भी बने।

लेकिन साथ ही समय मिलने पर चार्ल्स व्हिश ने भारतीय ग्रंथों का वाचन और मनन जारी रखा।

व्हिश ने ही सबसे पहले यूरोप को सबूतों सहित “युक्तिभाष्य” के बारे में बताया था।

वरना इससे पहले यूरोप के विद्वान भारत की किसी भी उपलब्धि अथवा ज्ञान को नकारते रहते थे और भारत को साँपों, उल्लुओं और घने जंगलों वाला खतरनाक देश मानते थे।

ईस्ट इण्डिया कंपनी के एक और वरिष्ठ कर्मचारी जॉन वारेन ने एक जगह लिखा है कि “हिन्दुओं का ज्यामितीय और खगोलीय ज्ञान अदभुत था। यहाँ तक कि ठेठ ग्रामीण इलाकों के अनपढ़ व्यक्ति को मैंने कई कठिन गणनाएँ मुँहज़बानी करते देखा है”।

26/11/2025

देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि संस्कृत भाषा में जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।

देखते हैं -

*"चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।*
*यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।"*

बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है !
इसका अर्थ है -

यदि वर्ग की भुजा 2a हो
तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a
ये क्या है ?

अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता है

शायद ईसा के जन्म से पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था।हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे , जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है ,
इस श्लोक का उल्लेख किया है -

*परे पूर्णमिति।*
*उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।*
*तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।*
*तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।*
*तत्र परे कोष्ठे यत् वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्ठयोः पूर्णं निवेशयेत्।*

शायद ही किसी आधुनिक शिक्षा में maths मे B. Sc. किये हुए भारतीय छात्र ने इसका नाम भी सुना हो , जबकि यह "मेरु प्रस्तार" है।
परंतु जब ये पाश्चात्य जगत से "पास्कल त्रिभुज" के नाम से भारत आया तो उन कथित सेकुलर भारतीयों को शर्म इस बात पर आने लगी कि भारत में ऐसे सिद्धांत क्यों नहीं दिये जाते।


*"चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।*
*अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥"*

ये भी कोई पूजा का मंत्र ही लगता है लेकिन ये किसी गोले के व्यास व परिध का अनुपात है। जब पाश्चात्य जगत से ये आया तो संक्षिप्त रुप लेकर आया ऐसा π जिसे 22/7 के रुप में डिकोड किया जाता है।

उक्त श्लोक को डिकोड करेंगे अंकों में तो कुछ इस तरह होगा-
(१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६

*ऋगवेद में π का मान ३२ अंक तक शुद्ध है।*

*गोपीभाग्य मधुव्रातः श्रुंगशोदधि संधिगः |*
*खलजीवितखाताव गलहाला रसंधरः ||*

इस श्लोक को डीकोड करने पर ३२ अंको तक π का मान 3.1415926535897932384626433832792… आता है।


#चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल:

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के गणिताध्याय के क्षेत्रव्यवहार के श्लोक १२.२१ में निम्नलिखित श्लोक वर्णित है-

*स्थूल-फलम् त्रि-चतुर्-भुज-बाहु-प्रतिबाहु-योग-दल-घातस् ।*
*भुज-योग-अर्ध-चतुष्टय-भुज-ऊन-घातात् पदम् सूक्ष्मम् ॥*

अर्थ:

त्रिभुज और चतुर्भुज का स्थूल (लगभग) क्षेत्रफल उसकी आमने-सामने की भुजाओं के योग के आधे के गुणनफल के बराबर होता है तथा सूक्ष्म (exact) क्षेत्रफल भुजाओं के योग के आधे में से भुजाओं की लम्बाई क्रमशः घटाकर और उनका गुणा करके वर्गमूल लेने से प्राप्त होता है।

#ब्रह्मगुप्त_प्रमेय:

चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण यदि लम्बवत हों तो उनके कटान बिन्दु से किसी भुजा पर डाला गया लम्ब सामने की भुजा को समद्विभाजित करता है।

ब्रह्मगुप्त ने श्लोक में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-

*त्रि-भ्जे भुजौ तु भूमिस् तद्-लम्बस् लम्बक-अधरम् खण्डम् ।*
*ऊर्ध्वम् अवलम्ब-खण्डम् लम्बक-योग-अर्धम् अधर-ऊनम् ॥*
(ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, गणिताध्याय, क्षेत्रव्यवहार १२.३१)


#वर्ग_समीकरण का व्यापक सूत्र:

ब्रह्मगुप्त का सूत्र इस प्रकार है-

*वर्गचतुर्गुणितानां रुपाणां मध्यवर्गसहितानाम् ।*
*मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोद्धृतं मध्यः ॥*
ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत - 18.44

अर्थात :

व्यक्त रुप (c) के साथ अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित गुणांक (4ac) को अव्यक्त मध्य के गुणांक के वर्ग (b²) से सहित करें या जोड़ें। इसका वर्गमूल प्राप्त करें तथा इसमें से मध्य अर्थात b को घटावें।
पुनः इस संख्या को अज्ञात ञ वर्ग के गुणांक (a) के द्विगुणित संख्या से भाग देवें।
प्राप्त संख्या ही अज्ञात "त्र" राशि का मान है।

श्रीधराचार्य ने इस बहुमूल्य सूत्र को भास्कराचार्य का नाम लेकर अविकल रुप से उद्धृत किया —

*चतुराहतवर्गसमैः रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत् ।*
*अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् ॥* -- भास्करीय बीजगणित, अव्यक्त-वर्गादि-समीकरण, पृ. - 221

अर्थात :-

प्रथम अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित रूप या गुणांक (4a) से दोनों पक्षों के गुणांको को गुणित करके द्वितीय अव्यक्त गुणांक (b) के वर्गतुल्य रूप दोनों पक्षों में जोड़ें। पुनः द्वितीय पक्ष का वर्गमूल प्राप्त करें।☺️

#आर्यभट्ट की ज्या (Sine) सारणी:

आर्यभटीय का निम्नांकित श्लोक ही आर्यभट की ज्या-सारणी को निरूपित करता है:

*मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व ।*
*घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झश ङ्व क्ल प्त फ छ कला-अर्ध-ज्यास् ॥*

#माधव की ज्या सारणी:

निम्नांकित श्लोक में माधव की ज्या सारणी दिखायी गयी है। जो चन्द्रकान्त राजू द्वारा लिखित *'कल्चरल फाउण्डेशन्स आफ मैथमेटिक्स'* नामक पुस्तक से लिया गया है।

*श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।*
*तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।*
*धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।*
*म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।*
*मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।*
*अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।*
*तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।*
*शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।*
*छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।*
*रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखो बली।।*
*धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।*
*कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।*
*तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।*
*स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।।*
(२.९.५)


#संख्या_रेखा की परिकल्पना (कॉन्सेप्ट्)

*"एकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा दशेयं, शतेयं, सहस्रेयं इति ग्राहयति, अवगमयति, संख्यास्वरूम, केवलं, न तु संख्याया: रेखातत्त्वमेव।"*
Brhadaranyaka Aankarabhasya (4.4.25)

जिसका अर्थ है-

1 unit, 10 units, 100 units, 1000 units etc. up to parardha can be located in a number line. Now by using the number line one can do operations like addition, subtraction and so on.

ये तो कुछ नमूना हैं , जो ये दर्शाने के लिये दिया गया है कि संस्कृत ग्रंथो में केवल पूजा पाठ या आरती के मंत्र नहीं है बल्कि तमाम विज्ञान भरा पड़ा है।

दुर्भाग्य से कालांतर में व विदेशी आक्रांताओं के चलते संस्कृत का ह्रास होने के कारण हमारे पूर्वजों के ज्ञान का भावी पीढ़ी द्वारा विस्तार नहीं हो पाया और बहुत से ग्रंथ आक्रांताओं द्वारा नष्ट भ्रष्ट कर दिए गए ।

26/07/2025

ब्रह्मगुप्त कौन थे?

जीवनकाल: 598 ई. - 665 ई. के बाद

जन्मस्थान: संभवतः उज्जैन (आधुनिक मध्य प्रदेश, भारत), जो शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था।

मुख्य कार्य: ब्रह्मस्फुटसिद्धांत (628 ई. में रचित)

शून्य के क्षेत्र में उनका योगदान:

ब्रह्मगुप्त पहले ज्ञात गणितज्ञ थे जिन्होंने शून्य को केवल एक स्थानापन्न के बजाय एक संख्या के रूप में माना। उन्होंने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं से संबंधित अंकगणितीय संक्रियाओं को परिभाषित किया, जो क्रांतिकारी था।

ब्रह्मस्फुटसिद्धांत में, उन्होंने:

शून्य को स्वयं में से किसी संख्या को घटाने के परिणाम के रूप में परिभाषित किया।

शून्य से परे योगदान:

ऋणात्मक संख्याओं और उनके नियमों का परिचय दिया।

द्विघात समीकरणों के हल दिए।

ज्यामिति, अंकगणितीय प्रगति और खगोल विज्ञान पर काम किया।

उन्होंने प्रक्षेप और ग्रहणों की गणना के तरीकों का वर्णन किया।

✨ विरासत:

शून्य की उनकी समझ ने आधुनिक अंकगणित और बीजगणित की नींव रखी।

उनके कार्यों का अरबी में अनुवाद होने के बाद, बाद के इस्लामी और यूरोपीय गणितज्ञों पर उनका प्रभाव पड़ा।

11/06/2025

हम न्यूटन को जानते हैं, स्वामी ज्येष्ठदेव को नहीं..

क्या आप न्यूटन को जानते हैं??

जरूर जानते होंगे, बचपन से पढ़ते आ रहे हैं...

लेकिन क्या आप स्वामी माधवन या ज्येष्ठदेव को जानते हैं?

नहीं जानते होंगे... तो अब जान लीजिए.

अभी तक आपको यही पढ़ाया गया है कि न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक ही कैलकुलस, खगोल विज्ञान अथवा गुरुत्वाकर्षण के नियमों के जनक हैं,

लेकिन वास्तविकता यह है कि इन सभी वैज्ञानिकों से कई वर्षों पूर्व पंद्रहवीं सदी में दक्षिण भारत के *स्वामी ज्येष्ठदेव* ने ताड़पत्रों पर गणित के ये सारे सूत्र लिख रखे हैं.

इनमें से कुछ सूत्र ऐसे भी हैं, जो उन्होंने अपने गुरुओं से सीखे थे। यानी गणित का यह ज्ञान उनसे भी पहले का है, परन्तु लिखित स्वरूप में नहीं था.

“मैथेमेटिक्स इन इण्डिया”पुस्तक के लेखक किम प्लोफ्कर लिखते हैं कि, “तथ्य यही हैं सन 1660 तक यूरोप में गणित या कैलकुलस कोई नहीं जानता था। जेम्स ग्रेगरी सबसे पहले गणितीय सूत्र लेकर आए थे.

जबकि सुदूर दक्षिण भारत के छोटे से गाँव में स्वामी ज्येष्ठदेव ने ताड़पत्रों पर कैलकुलस, त्रिकोणमिति के ऐसे-ऐसे सूत्र और कठिनतम गणितीय व्याख्याएँ तथा संभावित हल लिखकर रखे थे, कि पढ़कर हैरानी होती है.

इसी प्रकार चार्ल्स व्हिश नामक गणितज्ञ लिखते हैं कि.....

“मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि शून्य और अनंत की गणितीय श्रृंखला का उदगम स्थल केरल का मालाबार क्षेत्र है”.

स्वामी ज्येष्ठदेव द्वारा लिखे गए इस ग्रन्थ का नाम है “युक्तिभाष्य”, जो जिसके पंद्रह अध्याय और सैकड़ों पृष्ठ हैं.

यह पूरा ग्रन्थ वास्तव में चौदहवीं शताब्दी में भारत के गणितीय ज्ञान का एक संकलन है, जिसे संगमग्राम के तत्कालीन प्रसिद्ध गणितज्ञ स्वामी माधवन की टीम ने तैयार किया है.

स्वामी माधवन का यह कार्य समय की धूल में दब ही जाता, यदि स्वामी ज्येष्ठदेव जैसे शिष्यों ने उसे ताड़पत्रों पर उस समय की द्रविड़ भाषा (जो अब मलयालम है) में न लिख लिया होता.

इसके बाद लगभग 200 वर्षों तक गणित के ये सूत्र “श्रुति-स्मृति” के आधार पर शिष्यों की पीढी से एक-दुसरे को हस्तांतरित होते चले गए.

भारत में श्रुति-स्मृति (गुरु के मुंह से सुनकर उसे स्मरण रखना) परंपरा बहुत प्राचीन है.

इसलिए सम्पूर्ण लेखन करने (रिकॉर्ड रखने अथवा दस्तावेजीकरण) में प्राचीन लोग विश्वास नहीं रखते थे.

जिसका नतीजा हमें आज भुगतना पड़ रहा है, कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में संस्कृत भाषा के छिपे हुए कई रहस्य आज हमें पश्चिम का आविष्कार कह कर परोसे जा रहे हैं.

जॉर्जटाउन विवि के प्रोफ़ेसर होमर व्हाईट लिखते हैं कि संभवतः पंद्रहवीं सदी का गणित का यह ज्ञान धीरे-धीरे इसलिए खो गया, क्योंकि कठिन गणितीय गणनाओं का अधिकाँश उपयोग खगोल विज्ञान एवं नक्षत्रों की गति इत्यादि के लिए होता था. सामान्य जनता के लिए यह अधिक उपयोगी नहीं था.

इसके अलावा जब भारत के उन ऋषियों ने *दशमलव* के बाद ग्यारह अंकों तक की गणना एकदम सटीक निकाल ली थी, तो गणितज्ञों के करने के लिए कुछ बचा नहीं था.

ज्येष्ठदेव लिखित इस ज्ञान के “लगभग” लुप्तप्राय होने के सौ वर्षों के बाद पश्चिमी विद्वानों ने इसका अभ्यास 1700 से 1830 के बीच किया.

चार्ल्स व्हिश ने “युक्तिभाष्य” से सम्बंधित अपना एक पेपर “रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड” की पत्रिका में छपवाया.

चार्ल्स व्हिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के मालाबार क्षेत्र में काम करते थे, जो आगे चलकर जज भी बने.

लेकिन साथ ही समय मिलने पर चार्ल्स व्हिश ने भारतीय ग्रंथों का वाचन और मनन जारी रखा.

व्हिश ने ही सबसे पहले यूरोप को सबूतों सहित “युक्तिभाष्य” के बारे में बताया था.

वरना इससे पहले यूरोप के विद्वान भारत की किसी भी उपलब्धि अथवा ज्ञान को नकारते रहते थे और भारत को साँपों, उल्लुओं और घने जंगलों वाला खतरनाक देश मानते थे.

ईस्ट इण्डिया कंपनी के एक और वरिष्ठ कर्मचारी जॉन वारेन ने एक जगह लिखा है कि “हिन्दुओं का ज्यामितीय और खगोलीय ज्ञान अदभुत था. यहाँ तक कि ठेठ ग्रामीण इलाकों के अनपढ़ व्यक्ति को मैंने कई कठिन गणनाएँ मुँहज़बानी करते देखा है”.

स्वाभाविक है कि यह पढ़कर आपको झटका तो लगा होगा, परन्तु आपका दिल सरलता से इस सत्य को स्वीकार करेगा नहीं, क्योंकि हमारी आदत हो गई है कि जो पुस्तकों में लिखा है, जो इतिहास में लिखा है अथवा जो पिछले सौ-दो सौ वर्ष में पढ़ाया-सुनाया गया है, केवल उसी पर विश्वास किया जाए.

हमने कभी भी यह सवाल नहीं पूछा कि पिछले दो सौ या तीन सौ वर्षों में भारत पर किसका शासन था?

किताबें किसने लिखीं?
झूठा इतिहास किसने सुनाया?
किसने हमसे हमारी संस्कृति छीन ली?
किसने हमारे प्राचीन ज्ञान को हमसे छिपाकर रखा?

लेकिन एक बात ध्यान में रखें कि पश्चिमी देशों द्वारा अंगरेजी में लिखा हुआ भारत का इतिहास, संस्कृति हमेशा सच ही हो, यह जरूरी नहीं.

आज भी ब्रिटिशों के पाले हुए पिठ्ठू, भारत के कई विश्वविद्यालयों में अपनी “गुलामी की सेवाएँ” अनवरत दे रहे हैं.

सोचिये, क्या भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री, जो अरब में जन्में एक मुसलमान थे, हमें ये ज्ञान प्राप्त करने देते ?

और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री तो खुद भारत की खोज में लगे हुये थे, फिर भी ये ज्ञान को आपके सामने आने से रोका।

हमें तो बाबा "ब्लैक शीप और ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार" रटाते रहे और अंग्रेज हमसे ज्यादा पढ़े लिखे ज्ञानी हैं, समझाते रहे।

#साभार

04/02/2025

१ मार्च २०२५ पासून शिक्षकांसाठी वैदिक गणिताचा वर्ग सुरु होत आहे. रोज १ तासाच वर्ग असेल. ४०- तासांचा अभ्यासक्रम आहे.
१५ फेब्रुवारी २०२५ पर्यंत वर्गात प्रवेश घेऊ शकता . इच्छुकांनी संपर्क करावा.

अंकगणित :- २०दिवस,
बीजगणित :- १० दिवस,
त्रिकोणमिती (Trigonometry) :- १० दिवस

◆ *Vedic Arithmetic*
Addition, Subtraction, Multiplication(4 types), Division, Square, Cube, Squareroot, Cuberoot, Tables, HCF, LCM, Fraction, Viniculum and verification of answer.
◆ *Vedic Algebra*
Addition, Subtraction, Multiplication, Division, Square, Cube, Factorisation and verification of answer.
◆ *Vedic Geometry*
Trigonometry
शेफाली जोशी
9403591500
7276151373

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