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  यदि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा   की कमी  का मुख्य कारण जाना जाए तो , बच्चों की परवरिश में कमी यानि माता पिता द्वारा ...
31/12/2025


यदि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी का मुख्य कारण जाना जाए तो , बच्चों की परवरिश में कमी यानि माता पिता द्वारा अपनी नैतिकता में अभाव ।।
संस्कार जनरेट करना , अपने बच्चों के पेंशन को पहचानना , अपनी जिम्मेदारियों को बच्चो के प्रति पूरा करना , सही मार्गदर्शन , इन सबका अभाव।।
🌹इसमें सबसे मुख्य चीज यह है कि अपने बच्चों की अच्छी तरीके से परवरिश करना ।
यदि बच्चे की बचपन से ही अच्छी तरीके से परवरिश हो गई यानि बेहतरीन अखलाक दे दिए गए तो समझो उसका आगामी जीवन शिक्षा के क्षेत्र में , पारिवारिक क्षेत्र में ओर सामाजिक क्षेत्र में संवर जाएगा, और समाज ओर अभिभावकों के लिए बेहतरीन साबित हो सकेगा ।। में विश्वास पूरक कह सकता हूं कि वो जीवन में कभी असफल नहीं हो सकता है जिस कि परवरिश बचपन से ही अच्छी हो गई हो ।।यह नहीं कि वो सरकारी नौकरी लगे तो ही सफल , बिना सरकारी नौकरी के भी अपने क्षेत्र में सफल बन सकता है , इस दौर में बिना सरकारी नौकरी वाले को हमारा समाज सफल नहीं मानता है ।
में तो कहता हूं अपने आप में बेहतरीन संस्कार नहीं है तो आपकी सरकारी नौकर (जिसे समाज सफल मानते हैं) होने का कोई लाभ नही समाज को ।।
🚨शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए बेहतरीन अखलाक , अच्छी परवरिश बहुत आवश्यक है
वैसे आप कितनी भी बड़े इंस्टीट्यूट से पैसे देके , डिग्रियां खरीद लो , आप मे जब तक नैतिकता नहीं आएगी तब तक कोई शिक्षा का आशय नहीं है
यदि बचपन में बच्चे कोई अच्छा काम करे तो उसकी सराहना निश्चित तौर पर होनी चाहिए , विशेष तौर से पढ़ाई के क्षेत्र में, यानि बचपन से ही परवरिश के मामले में मनोबल चरम सीमा पर रहना चाहिए है
🚨इस पूरफितन दौर में अपने बच्चों को मोबाइल फोन से दूर , व्हीकल के लालच से दूर , नशे पते से दूर रखे तो ही फायदा है बाद में बड़े होने के बाद वही बात पैसों के बदले डिग्रियां खरीदते रहना , कही पर भी आपको काबिलियत ओर संस्कार नहीं मिलेंगे |
✍️ बाबू खान शेरानी

परिवार प्रेम, सुरक्षा, और अपनत्व का पहला विद्यालय है। यह वह प्राथमिक इकाई है जहाँ हम जन्म लेते हैं और बड़े होते हैं।परिव...
17/12/2025

परिवार प्रेम, सुरक्षा, और अपनत्व का पहला विद्यालय है। यह वह प्राथमिक इकाई है जहाँ हम जन्म लेते हैं और बड़े होते हैं।
परिवार मनुष्य की सामाजिक और भावनात्मक रूप से सबसे आधारभूत आवश्यकता है।परिवार हर सदस्य को भावनात्मक और भौतिक सुरक्षा प्रदान करता है, खासकर मुश्किल समय में ,
हम परिवार से ही सबसे पहले समाज के नियम, मूल्य, और संस्कार(अख्लाक )सीखते हैं (जैसे: आदर, साझा करना, सहयोग)।
यह वह स्थान है जहाँ बिना किसी शर्त के प्रेम (Unconditional Love) मिलता है। यह तनाव और निराशा को दूर करने का सबसे बड़ा माध्यम है।परिवार,,
परिवार वो ताकत या वो क्षमता है कि जो आपको शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूती प्रदान करता है , यदि कोई अपने आप में परिवार की गहरी समझ रखता है तो वो कभी नहीं चाहेगा के मेरे परिवार पीछे रह जाए वो व्यक्ति हमेशा अपने परिवार को संगठित करके आगे बढ़ाने के लिए दिन रात प्रयास करेगा और अपने परिवार को हमेशा आगे बढ़ाने के लिए सदैव अपने प्यार अपनेत्व को उच्चारित करता रहेगा और हमेशा खुद भी आगे बढ़ेगा और परिवार भी आगे बढ़ेगा , ।
कुछ कुछ परिवार में अपवाद भी होते है जिनमें एक परिवार की समझ नहीं होती है और रिश्ते बिगाड़ना जाते है , ओर वो खुद को स्वार्थी या चालक की के कारण हमेशा पीछे रह जाते हैं और परिवार को आगे नहीं बढ़ने देते है जिससे खुद का व्यव्हार विनाश होता हुआ नज़र आता है और आने वाले बच्चों का भी व्यवहार बिगड़ ता हुआ नज़र आता है
यदि अपने परिवार को एक भी व्यक्ति समझने वाला होता है तो उस परिवार को गठबंधन के रूप में अच्छी तरीके से आगे बढ़ा सकता है हमे चाहिए अपनी परिवार को हमेशा संगठित करके आगे बढ़ाए और अपने आप में परिवार के प्रति गहरी समझ प्राप्त करे ,
परिवार वो संगठन या गठबंधन है जो आपको ऐसी ताकत देता है जो आपको ओर कहीं से क्षमता नहीं मिलती जो आपको परिवार प्रोवाइड करवाता है दोस्तो इस क्षमता को हमेशा सदुपयोग करना सीखे न कि दुरुपयोग करना यदि दुरुपयोग करोगे तो कही पीढ़ियों तक इसके नुकसान को झेलना पड़ेगा
इसलिए जितना हो सका अपने परिवार से बनाए रखे ओर उसका सदुपयोग ले ज्यादा से ज्यादा , ।
यदि परिवार से सही रिश्ते रहेंगे तो आपकी कामयाबी पर भी पूरा परिवार गर्व कर सकेगा और आपकी खुशी भी उनकी खुशी होगी।।
यदि परिवार से सही नहीं बना के रखोगे तो आपकी खुशी में भी पूरे परिवार को दुख होगा और आपसे हमेशा जलन रखने लगेगे ओर आपको कभी भी आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते है आपको हमेशा गिराने में लगे हुए रहेंगे ।।
आगे कमेंट बॉक्स में.....

शिक्षा का मक़सद ( यह  कलम ग्रामीण समाज की ओर)बड़ा  अचंभित हो जाता हूं जब अपने  समाज  में लोगों को ये कहते हुए सुना जाता ह...
07/12/2025

शिक्षा का मक़सद ( यह कलम ग्रामीण समाज की ओर)
बड़ा अचंभित हो जाता हूं जब अपने समाज में लोगों को ये कहते हुए सुना जाता है की शिक्षा ग्रहण करने से क्या लाभ , नौकरी तो मिलने से रही
मतलब ये है की नौकरी न मिले तो आपकी उच्च शिक्षा बेकार है
ये कितनी गिरी हुई ओर सतही सोच है , यही सोच एक समाज को कभी आगे नहीं बढ़ने देती
दोस्तो Education का तात्पर्य नौकरी या पैसा नहीं होता है,
शिक्षा होती है क़ाबिल बनने यानि योग्य बनने के लिए अपने आप में लोगों एंव समाज के प्रति हमारी प्रक्रिया
पैसा कामयाबी नौकरी किसी को भी मिल सकती है, यानि बिना पढ़े लिखे लोग भी अच्छा बिजनेस करके , कम्पनियां ओपन करके पैसे कमा सकते है , मगर क़ाबलियत केवल शिक्षित लोगों के पास होती है,
ये समाज (ग्रामीण क्षेत्र) तब तक अपना सही लक्ष्य और कामयाबी प्राप्त नहीं कर सकता ,जब तक समाज के अंदर उच्च शिक्षित लोगों की संख्या ज़्यादा न हो जाए,
और रही बात नौकरी की, तो पहले अपने आप में योग्यता विकसित कीजिए , नौकरी का क्या है... मिले ही जाए गी, न भी मिली तो आप आने वाली जनरेशन की अच्छी परवरिश , सही मार्गदर्शन , सही ढंग सिखा सकते हो , यानि शिक्षा के मैदान में आने वाली जनरेशन के कदम मजबूत कर सकते हो ,
इस लिए मेरा मानना है की सब से पहले शिक्षा के मैदान में अपने क़दम मज़बूत कीजिए , नौकरी मिले या न मिले इस की परवाह नहीं
और इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता , यदि आप शिक्षित है तो आप के लिए दुनिया भर के सारे रास्ते रोज़गार के लिए खुले हैं
🌷Education तो जीने का ढंग सिखाती है, ज़िन्दगी के हर मोड़ हर मुशकिल में रहनुमाई करती है, बड़ों ओर छोटों के प्रति मान सम्मान सिखाती है
तो दोस्तो तालीम का मक़सद काबलियत होना चाहिये, नौकरी नहीं
यदि अपने आप में अच्छी प्रकार से शिक्षा ग्रहण करके समाज भी अपना काम ओर बाते तर्क के साथ प्रेषित कर सकोगे
बाकी जहां पर भी ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा में विकास आया तो वहां की प्रगति भी आपके सामने है ,,

क़ाबिल बनिए कामयाबी झक मार के आपके पीछे भागेगी।
बाकी आवेश में ज्यादा लिखा या गलत लिख दिया तो क्षमा

✍️ बाबू खान शेरानी

आज के इस आधुनिक समय में यदि सबसे ज्यादा गोर ओ फिक्र किसी पर करने की  हमें आवश्यकता है तो वो  है ,शिक्षा , बढ़ती  हुई दुन...
29/11/2025

आज के इस आधुनिक समय में यदि सबसे ज्यादा गोर ओ फिक्र किसी पर करने की हमें आवश्यकता है तो वो है ,शिक्षा , बढ़ती हुई दुनिया में शिक्षा के विकास की गति यदि ग्रामीण क्षेत्रों में देखा जाए तो बहुत ही धीमी है विशेषकर जो ग्रामीणों क्षेत्रों से संबंध रखते है ।। यदि आपके पास शिक्षा होगी तो व्यक्ति को सामाजिक , आर्थिक व पारिवारिक रूप से मजबूती प्रदान करेगी ।।
🚨इस आधुनिक युग में अपने बढ़ते हुए शादियों , बर्थडे सेलिब्रेशन, होटलों के खानों के खर्चों को कम करके अपने पेसो को शिक्षा पर खर्च करना सबसे श्रेष्ठ है , ओर अपने पेसो का सबसे अच्छा निवेश अपने बच्चों की तालीम ओर परवरिश पर खर्च करना । ओर वो एक व्यक्ति के जीवन में सदैव काम आएगी मरते दम तक ।।
🌹शिक्षा से व्यक्ति रोजगार , सम्मान , या पिछड़े हुए समुदाय से आता है तो उसको आगे बढ़ाने में , नई पीढ़ी को जागरूक करना , अंधकार से प्रकाश की ओर , अज्ञान से जागृति की ओर , सही गलत की समझ देती है , नैतिकता जगाती है
शिक्षा असमानता , गरीबी, अंधविश्वास को कम करती है /
नशे अपराध से हटाकर सम्मानजनक जीवन की ओर ले जाती है। शिक्षा से ईमान ओर दुनियावी जिंदगी की गहरी समझ प्राप्त कर सकते हैं
✍️✍️ बाबू खान शेरानी

आज इस छायाचित्र को 8 साल पूर्ण  होने को है शायद यह 12 मार्च 2018 का लिये हुए छायाचित्र है। जब हम अपने बीते हुए समय में ए...
27/11/2025

आज इस छायाचित्र को 8 साल पूर्ण होने को है शायद यह 12 मार्च 2018 का लिये हुए छायाचित्र है। जब हम अपने बीते हुए समय में एक क्षण देखते है तो हमें ये महसूस होता है कि हम अपने जीवन में किस तरह आगे बढ़ रहे है और हर पुरानी चीजों को वही पर छोड़ आते है । इस फोटो में कुछ बच्चे है जिनकी इच्छा थी बड़ा होना। वो सोचते थे कि बड़े होने के बाद जीवन के सारे सुख मिल जायेगे और पाबंदियों की सारी जंजीरें खत्म हो जाएंगी परन्तु उनको क्या पता था की बड़े होने के बाद तुमने जो ये सोचा था कि ऐसे करेंगे वो करेंगे जैसे चाहे वैसे जिएंगे ये सब एक कल्पना तक ही सीमित था और इसी कल्पना करते करते कब बड़े हो गए एहसास तक न हुआ। हमारी जिंदगी में एक बचपन का समय ही ऐसा होता है जिसमें हम अपने जीवन को जी सकते है परंतु बड़े होने की चाहत में उसी को भी पूर्ण रूप से नहीं जी पाते है आज भी अपनी जिंदगी के इन सुनहरे पलों को याद करते है तो बड़े भावुक हो जाते है मजबूत गठबंधन के रूप में 8 लड़के पढ़ाई लिखाई से दूर ,ज्यादा खेल व लड़ाई का ध्यान रखते थे किसी से कोई ज्यादा लगाव नहीं था बस विद्यालय आना जाना , खेलना
बाकी सारी परिकल्पना आज वास्तविक कल्पना में बदल गई है
यह छायाचित्र अपने ग्राम (दांता) के विद्यालय में कक्षा 8 वीं के विधाई समारोह की है ,
फोटो का क्रेडिट

आज में एक छात्र जीवन में आने वाली समस्याओं ओर उन समस्याओं को पार करते हुए कैसे सफलता पाई जाती है उन पर विचार करना चाहूंग...
25/11/2025

आज में एक छात्र जीवन में आने वाली समस्याओं ओर उन समस्याओं को पार करते हुए कैसे सफलता पाई जाती है उन पर विचार करना चाहूंगा। एक बच्चे को शुरुआती दौर में उसके माता पिता के द्वारा पाल पोषकर बड़ा किया जाता है । ओर उसको बड़ा ओर थोड़ा बहुत समझदार होने पर विधालय भेजा जाता है । शुरुआती दिनों में तो हम उसको अपने गांव के विधालय में भेजते है । वहीं से वो संसारिक ज्ञान की ओर आगे बड़ता चलता साकारात्मक विचारो के साथ । तीन या चार साल के बाद जब व बड़ा हो जाता है तो उसको ऐसे विधालय में भेजते है जहां पर उनके हिसाब से अच्छी पड़ाई चलती है । ओर कुछ के माता पिता अपने बच्चों पर ध्यान नहीं देते है वो जो पढ़े लिखे लोग नहीं होते है । इनका बच्चों की तरफ ध्यान बिल्कुल भी नहीं होता है । ओर इनही कारणों से एक बच्चा अपनी आगामी पढ़ाई ओर भविष्य को बर्बाद होता हुआ देखता है । ओर कुछ के माता पिता अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पड़ने के भेजते है जहां पर उनके बच्चो को अनोपचारिक शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है जो एक निश्चित समय तक ही सीमित रहती है । में यह नहीं कहना चाहता की आप अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में मत भेजो । क्योंकि कई निजी विधालय भी बहुत अच्छे होते है जहां उनको एक ओपचारिक रूप से शिक्षा दी जाती है । इसी प्रकार कुछ बच्चे अपनी शिक्षा में अच्छी रुचि जगा लेते है ओर कई अपनी शिक्षा में अच्छी प्रकार से रुचि नहीं जगा पाते है । ओर यहीं से उनमें कई लड़के काफी अनुभवी हो जाते है ओर कई लड़के ग्वार रह जाते है । फिर भी वो लड़के जो पड्डाई में कमजोर रहा जाते घर वालो के दबाव से आठवीं या दंसवी तक बड़ी मुश्किलों से पहुंच जाते है । ओर वो लड़के अगर घर की आर्थिक स्थिति अच्छी हो तो अवारा गर्दी करना शुरू कर देते है ओर कुछ लड़के जिनकी आर्थिक स्थिति अविकसित या अच्छी नहीं होती है वो लड़के किसी काम या धंधे पर लग जाते । ओर जो कुछ लड़के उनमें से आगे अपनी शिक्षा को बरकरार रखते हैं । ओर फिर उम्र के हिसाब से समझ या दिमाग़ भी विकसित होता है ओर कुछ लड़के पढ़ाई को एक तरह से आफत या समस्या मानकर छोड़ देते है । तथा कुछ लड़के बचपन कमजोर थे ओर बड़ा होने के बाद समझ विकसित होने के साथ आगे पड़ना निरंतर अपना प्रयास जारी रखते है । ओर इन्हीं में से कुछ लड़के 12th किसी भी प्रकार से पास कर है लेते है । यहीं से उनकी जिंदगी का दौर शुरू होता है या यह कह सकते है कि उनकी जिंदगी की मुख्य पढाई शुरू होती है । ... आगे कॉमेंट बॉक्स में

Nature view 🌱🌿
17/08/2025

Nature view 🌱🌿

07/06/2025
फूटी कौड़ी एक ज़माने में करेंसी हुआ करती थी जिसकी क़ीमत सबसे कम होती थी तीन फूटी कौड़ियों से एक कौड़ी बनती थी और दस कौड़...
16/11/2024

फूटी कौड़ी एक ज़माने में करेंसी हुआ करती थी जिसकी क़ीमत सबसे कम होती थी तीन फूटी कौड़ियों से एक कौड़ी बनती थी और दस कौड़ियों से एक दमड़ी
आज कल के बोल चाल में फूटी कौड़ी को मुहावरे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है

करंसी की क़ीमत इस तरह थी
3 फूटी कौड़ी- 1 कौड़ी
10 कौड़ी - 1 दमड़ी
02 दमड़ी - 1.5 पाई
1.5 पाई - 1 धैला
2 धैला - 1 पैसा
3 पैसे - 1 टका
2 टके - 1 आना
2 आने - दोअन्नी
4 आने - चवन्नी
8 आने - अठन्नी
16 आने - 1 रुपया

जब तक ख़िलाफ़त मूव्मेंट और असहयोग आंदोलन चलता रहा देश में हिंदू मुस्लिम एकता के नारे लगते रहे; लेकिन जैसे ही ये दोनो तहर...
23/10/2024

जब तक ख़िलाफ़त मूव्मेंट और असहयोग आंदोलन चलता रहा देश में हिंदू मुस्लिम एकता के नारे लगते रहे; लेकिन जैसे ही ये दोनो तहरीक ने दम तोड़ा, आर्य समाज ने शुद्धी के नाम पर सर उठाया, शुद्धी की लहर में हिंदू मुस्लिम एकता जल कर ख़ाक हो गयी और कई जगह दंगे खड़े हो गए।

देश के इसी माहौल में कुछ बलवाई ने मुसलमानो को मंदिर तोड़ने के लिए उकसाया, जब लोग मंदिर तोड़ने के लिए जमा होने लगे तो एक नौजवान भीड़ के सामने खड़ा होता है, जेब से पिस्टल निकाल कर बुलंद आवाज़ में कहता है ‘तुम एक मंदिर पर हमला करने नही जा रहे बल्के हिंदुस्तान पर हमला करने जा रहे हो, तुम्हारे दुश्मन हिंदू नही है, तुम ख़ुद अपने साथ साथ तमाम मुसलमानो के साथ ग़द्दारी कर रहे हो, तुम ग़रीब और भोले भाले मुसलमानो को बहका रहे हो, अगर हिम्मत है तो सामने आओ‘ ?

बलवाई भीड़ में से कोई सामने नही आया और भीड़ तितर बितर हो गई। वो नौजवान कोई और नही था, इस मुल्क की आज़ादी के ख़ातिर मर मिटने वाला शाहजहाँपूर का अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान था।

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान की पैदाईश 22 अक्तुबर 1900 को शाहजहाँपूर मे हुई, वालिद साहब पुलिस डिपार्टमेंट में थे, लेकिन अश्फ़ाक़उल्लाह ख़ान पर बहुत जल्द ही यतिमी का साया पड़ गया, उनकी माँ को अख़बार पढ़ने का बड़ा शौक़ था, जब फ़र्स्ट वर्ल्ड वार की लड़ाई शुरू हुई और जब ब्रिटिश और तुर्की आमने सामने आ गए तो हिंद के हर मुसलमान की दिली ख़्वाहिश थी के किसी तरह तुर्की ब्रिटिश को हरा दे लेकिन हुआ इसके उलट।

अश्फ़ाक के अंदर हिब्बूल वतनी का ये जज़्बा माँ से विरासत में मिला यही वजह थी की ख़िलाफ़त आंदोलन से पहले अश्फ़ाक काबुल निकलना चाह रहे थे मगर किसी के समझाने पर नही गए।

अश्फ़ाक को शायरी का बहुत शौक़ था , वारसी और हसरत तख़ल्लुस के तौर पर इस्तेमाल करते थे। कहते हैं इसी शायरी ने अश्फ़ाक को बिस्मिल के क़रीब कर लेकर गया था लेकिन मंदिर वाली घटना ने बिस्मिल के दिल पर गहरी छाप छोड़ी थी।

हिंदुस्तान रिपब्लिक असोसीएशन का मक़सद मुल्क की आज़ादी थी, और गांधी जी अपने आंदोलन वापस लेने के बाद इस असोसीएशन ने फ़ैसला किया की आज़ादी हम बंदूक़ के दम पर लेंगे, बंदूक़ के लिए पैसे चाहिए थे; इसलिए इन्होंने ये भी फ़ैसला कर रखा था के हम हिंदुस्तान के किसी ज़मींदार या रईस को नही लूटेंगे।

जर्मनी से बंदूक़ आनी थी और उसके लिए पैसे हर हाल में चाहिए थे, फ़ैसला हुआ के अंग्रेज़ी माल लूटा जाए अश्फ़ाक इसके फ़ेवर में नही थे; वो नही चाहते थे कि इतनी जल्दी हम अंग्रेज़ो के नज़र पर आ जाएँ। लेकिन बाक़ी साथी ने इंकार कर दिया, ख़ैर जब ट्रेन से सरकारी ख़ज़ाने को लूटने पर ही आम सहमति बनी तो अश्फ़ाक शामिल हो गए।

ककोरी से चली ट्रेन को लखनऊ पहुँचने से पहले लूटा गया, लेकिन जिसका डर अश्फ़ाक को था वही हुआ, पुलिस ने एक दो के इलावा सबको पकड़ लिया। अश्फ़ाक चौकन्ने थे पुलिस गाँव पहुँची उससे पहले निकल गए, अश्फ़ाक डॉल्टॉनगंज आ गए। वहाँ भेस बदल कर एक एंजिनीरिंग फ़र्म में नौकरी करने लगे बाक़ी साथियों से राबता टूट चुका था। लगभग एक साल तक अश्फ़ाक डॉल्टॉन गंज में रहे।

शायरी का शौक़ था इसलिए हज़ारीबाग़ और प्लामु में होने वाले मशायरे में भी जाते रहे, एक साल बाद तंग आकर उन्होंने मुल्क छोड़ कर अफ़ग़ान निकलना चाहा ताकि वहाँ से कुछ हथियार मिल सके।

अश्फ़ाक इसके लिए दिल्ली गए और वहाँ एंजिनीरिंग की पढ़ाई करने के बहाने मुल्क से बाहर निकलने का इंतेज़ाम करने लगे।

अश्फ़ाक वहाँ अपने स्कूल के दोस्त से मिलते हैं, अश्फ़ाक के सर पर दो हज़ार का ईनाम था उस दोस्त ने ग़द्दारी की और अश्फ़ाक पकड़े गए, अश्फ़ाक की ग़ैरत ने कभी ये गावारा नही किया के अपने उस स्कूल के दोस्त का नाम दुनिया में लाए, इसलिए लोग आजतक नही जानते की अश्फ़ाक की मुख़बरी करने वाले का नाम क्या था।

अश्फ़ाक पर जेल की चार दिवारी के अंदर ज़ुल्म के पहाड़ तोड़े गए ताकि वो अपने जुर्म को क़बूल कर ले मगर अंग्रेज़ी पुलिस नाकाम रही , ख़ैर मुक़दमा चलाया गया , बिस्मिल को पहले ही फाँसी की सज़ा सुनाई जा चुकी , वक़्त गुज़रा अश्फ़ाक के लिए भी अदालत ने फाँसी का फ़रमान सुनाया, 19 दिसम्बर 1927 को अश्फ़ाक को फाँसी की सज़ा दे दी गयी।

ये अश्फ़ाक की ही फाँसी थी की मौलाना आज़ाद को अपने अख़बार ‘हिलाल’ में “इंसानियत मौत के दरवाज़े पर” नाम से मज़मून लिखना पड़ा, जिसमें उन्होंने शायद स्याही नही अपने ख़ून का इस्तेमाल किया था, अश्फ़ाक के जनाज़े में दस हज़ार से ज़्यादा लोग मौजूद थे।

अश्फ़ाक की शायरी के दो शेर हैं :—

सुनाए किसे अपने ग़म की कहानी
हमें तो अपने सता रहे हैं
हमेशा वो सुबह शाम दिल पर
सितम के ख़ंजर चला रहे हैं।

ना कोई इंग्लिश, ना कोई राशियन,
ना कोई जर्मन, ना कोई तुर्की
मिटाने वाले है अपने हिंदी
जो आज हमको मिटा रहे हैं।

आप ये जानकार हैरान हो जाएँगे की मुल्क की ख़ातिर ख़ुद को क़ुर्बान कर देने वाले अश्फ़ाक के नाम पर उनके मुल्क में कुछ भी नही है। अगर आप ग़ौर करें तो एक बात आपको सोचने पर मजबूर कर देगी की इस देश में अश्फ़ाक उल्लाह खान के नाम पर कोई शोध संस्थान नही है, शोध संस्थान छोड़ीए कोई सड़क, पार्क, पुल नदी कुछ भी नही है।

अश्फ़ाक के नाम पर पहली डाक टिकट भी आज़ादी के पचास साल बाद जारी की गयी थी, अभी तो सत्तर साल हुए, देखिए इंतेज़ार कीजिए, इस मुल्क की हुकूमत कब अश्फ़ाक को याद करती है, कब उनके साथ इंसाफ़ करती है।

आप मोलवी सलामत अली है . 1857 की क्रांति के नायक नाना साहब के साथी है.आप कानपुर की मस्जिद के इमाम थे  आपने अंग्रेजो के खि...
30/09/2024

आप मोलवी सलामत अली है . 1857 की क्रांति के नायक नाना साहब के साथी है.
आप कानपुर की मस्जिद के इमाम थे आपने अंग्रेजो के खिलाफ जंग को फर्ज बताया था . आपको जून 1857 में अंग्रेजो ने गिरफ्तार कर लिया , तब आपकी उम्र 104 वर्ष की थी तथा अपना जीवन देश के प्रति समर्पित कर दिया था लेकिन आज इनको इतिहास के पन्नो से मिठाया जा रहा है.

बाबू खान Sherani

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