04/08/2026
# # # **भाग 2: प्रतिशोध और पिपासा**
करण की मौत को एक हफ्ता बीत चुका था। पुलिस ने मामले को 'अज्ञात जंगली जानवर का हमला' बताकर फाइल बंद कर दी थी, क्योंकि करण के शरीर में खून की एक बूंद भी नहीं बची थी। लेकिन दिल्ली में बैठी उसकी मंगेतर, **अनामिका**, इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थी। वह खुद एक पैरानॉर्मल इंवेस्टिगेटर (अदृश्य शक्तियों की शोधकर्ता) थी। करण के कैमरे का क्लाउड बैकअप चेक करते वक्त उसे आखिरी रात की कुछ तस्वीरें मिली थीं—तस्वीरों में करण के साथ एक धुंधली, लाल साड़ी वाली परछाईं दिख रही थी।
अनामिका समझ गई कि मामला कुछ और है। वह अपनी जान की परवाह किए बिना नीलगिरि की उस खौफनाक हवेली के लिए निकल पड़ी।
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# # # **नया शिकार, वही जाल**
उसी रात, हवेली के आसपास एक और शख्स भटक रहा था। उसका नाम था **विक्रम**—एक स्थानीय ट्रेकर, जो रास्ता भटक गया था। तेज बारिश और कड़कती बिजली के बीच उसे वह पुरानी हवेली दिखाई दी। डर और ठंड से कांपता हुआ विक्रम हवेली के भारी दरवाजे को धकेलकर अंदर आ गया।
"कोई है?" विक्रम की आवाज़ खाली हॉल में गूंज उठी।
तभी हवा में मोगरे की वही मदहोश कर देने वाली खुशबू तैरने लगी। सीढ़ियों से पायलों की छनक सुनाई दी। विक्रम ने ऊपर देखा और देखता ही रह गया। लाल पारदर्शी साड़ी में लिपटी रूपा नीचे उतर रही थी। बारिश के पानी से भीगे विक्रम के बदन को देखकर रूपा की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।
"भटके हुए मुसाफिरों का इस हवेली में स्वागत है," रूपा ने अपनी जादुई आवाज़ में कहा और विक्रम की छाती पर अपना हाथ रख दिया।
विक्रम रूपा के हुस्न और उसकी छुअन के सम्मोहन में ऐसा फंसा कि अपनी सारी थकान और डर भूल गया। रूपा उसे उसी आलीशान बेडरूम की तरफ ले गई। बिस्तर पर लेटते ही वासना का खेल फिर शुरू हो गया। रूपा ने विक्रम की कमीज के बटन खोले और उसके जिस्म को चूमने लगी। विक्रम कामुकता के चरम पर था, वह भूल चुका था कि वह एक मौत के जाल में है। रूपा के होठ जैसे ही विक्रम की गर्दन पर पहुंचे, उसके दांत नुकीले होने लगे... वह उसका खून चूसने ही वाली थी कि तभी—
**"रुक जाओ, शैतान!"**
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# # # **अनामिका का प्रवेश**
कमरे का दरवाजा एक जोरदार धमाके के साथ खुला। अनामिका हाथ में एक प्राचीन तांबे का त्रिशूल और पवित्र गंगाजल की बोतल लिए खड़ी थी।
अचानक हुए इस हमले से रूपा चौंक गई। उसने मुड़कर देखा, उसका चेहरा गुस्से से भयानक होने लगा था। "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे खेल में खलल डालने की?" रूपा की आवाज़ में चीख गूंजी।
अनामिका ने तुरंत गंगाजल की कुछ बूंदें रूपा पर फेंकी। जैसे ही पवित्र जल रूपा के बदन पर गिरा, उसके जिस्म से धुआं निकलने लगा और वह दर्द से चिल्ला उठी। विक्रम सम्मोहन से बाहर आया और अपनी हालत देखकर डर के मारे कमरे के कोने में दुबक गया।
"तूने मेरे करण को मारा है! आज मैं तेरी इस वासना की भूख को हमेशा के लिए मिटा दूँगी!" अनामिका चिल्लाई।
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# # # **रूहानी जंग**
रूपा का असली भयानक रूप सामने आ चुका था। उसकी खूबसूरत त्वचा काली पड़ गई थी और बाल हवा में लहरा रहे थे। वह हवा में उड़ते हुए अनामिका की तरफ झपटी। रूपा की ताकत बहुत ज्यादा थी, उसने एक ही झटके में अनामिका को दीवार से दे मारा। अनामिका के हाथ से त्रिशूल छूट गया।
रूपा अनामिका की गर्दन दबाने आगे बढ़ी। "तुम इंसान बहुत कमजोर हो। तुम्हारी वासना ही मेरी ताकत है। जितने मर्द यहाँ आएंगे, मेरा हुस्न उन्हें खींच लाएगा और मैं अमर रहूंगी!" रूपा जोर से हंसी।
अनामिका का दम घुट रहा था, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसकी नजर पास ही गिरे त्रिशूल पर पड़ी। उसने अपनी पूरी ताकत समेटी, पैर से त्रिशूल को उछाला और उसे हाथ में पकड़कर सीधे रूपा के सीने के पार कर दिया। यह कोई साधारण त्रिशूल नहीं था, इस पर पवित्र मंत्र लिखे थे।
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# # # **अंतिम अंत या...**
त्रिशूल लगते ही रूपा के सीने से काले रंग का खून बहने लगा। वह दर्द से कराह उठी। उसका पूरा शरीर धीरे-धीरे राख में बदलने लगा। हवा में उसकी आखिरी चीख गूंजी—*"तुमने मुझे नष्ट तो कर दिया... लेकिन इस हवेली की मिट्टी में मेरी प्यास हमेशा रहेगी..."*
कुछ ही पलों में रूपा पूरी तरह राख हो गई। कमरा एकदम शांत हो गया।
अनामिका ने राहत की सांस ली और विक्रम को संभाला। दोनों तुरंत उस मनहूस हवेली से बाहर निकल आए। सुबह की पहली किरण के साथ वे गाँव की तरफ बढ़ रहे थे। अनामिका को लगा कि उसने करण का बदला ले लिया है।
लेकिन... हवेली के उस बेडरूम में, जहाँ रूपा की राख बिखरी थी, हवा का एक तेज झोंका आया। वह राख धीरे-धीरे हवा में उड़कर फिर से एक आकृति बनाने लगी... एक बेहद खूबसूरत, लाल साड़ी वाली औरत की आकृति। उसकी आँखें खुलीं, और वह धीरे से मुस्कुराई।
हवेली का खेल अभी खत्म नहीं हुआ था।
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