08/04/2024
ब्रह्मा ज्ञानी गुरु नाभा दास जी श्री रामानंद परम्परा के महान संत हैं।उनका जन्म 1537 को 8 अप्रैल को भद्राचल (तेलंगाना) गोदावरी नदी के पास माता सरस्वती जानकी देवी और पिता श्री राम दास जी के घर हुआ था।आप जन्म से दृष्टि विहीन (जन्मांध) थे उनका नाम नारायण दास था।उनका परिवार भगवान राम का उपासक था। उनका संगीत ( गाने बजाने)और टोकरी बनाने का काम करता था। जब आप पांच साल के थे तो पिता जी स्वर्ग सिधार गए।
एक बार आप अपनी मां के साथ जंगल में लकड़ी लेने गए थे तो उनकी भेंट जंगल से गुजर रहे संत अगर देव जी और गुरु कीहल दास से हुई। गुरु अगर दास जी द्वारा परिचय पूछने पर आपने अपना उत्तर परमात्मा का अंश और पांच तत्वों से वना मनुष्य बताया। मानव की सेवा अपने जीवन का उद्देश्य बताया। स्वामी अगर दास उत्तर सुनकर बहुत खुश हुये। उन्होंने अपने कमंडल से जल लेकर उनके मुख पर छिड़का तो उनकी आंखों की रोशनी लौट आई। गुरु अगर दास जी आपको अपने साथ जयपुर राजस्थान गलता गद्दी ले आए। उन्होंने आपका नाम नारायण से नाभा दास रख दिया,जिसका अर्थ होता है उत्तम,नभ के समान आभा वाला,अथाह,आकाश। 1565 से 1568 तक संत तुलसीदास के साथ आपने भिन्न भिन्न स्थानों पर गोष्ठीयों में भाग लिया। 1576 में राजा मानसिंह के सहयोग से सीकर नगर में रैवासधाम की स्थापना की। 1585 में आपने भगतमाल ग्रंथ की रचना की जिसमें 200 से ज्यादा संतों भक्तों के जीवन चरित्र का वर्णन है। इसी तरह 1592 तक संतवाणी, मूल भगतमाल, राम ओषटाम, हितोपदेश, राम चरित्र पर काव्य गद्य और पद्य व्रज भाषा में रचित किये।1595 में इनकी रचनाओं के लिए आप को गोस्वामी की पदवी प्रदान की। 1642 को आप ब्रह्मालीन हो गये।
आपने अपने जीवन में विभिन्न स्थानों की यात्राएं की, मानव सेवा का उपदेश दिया। पंजाब, जम्मू, हिमाचल, राजस्थान में वड़ी संख्या में आपके उपासक आपकी शिक्षा का प्रचार प्रसार करते हुए आपका जन्म दिन धूमधाम और श्रद्धा भाव से मना रहे हैं।