14/03/2026
युद्ध, सत्ता और जलवायु अपराध
(War, Power and Climate Crime)
आज का वैश्विक नेतृत्व एक खतरनाक विरोधाभास में जी रहा है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेट-जीरो, कार्बन न्यूट्रैलिटी और सस्टेनेबिलिटी की प्रतिज्ञाएँ ली जाती हैं, वहीं दूसरी ओर युद्ध और सैन्य प्रतिस्पर्धा के माध्यम से उसी पृथ्वी के अस्तित्व को खतरे में डाला जा रहा है।
भूगोल के दृष्टिकोण से यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं है, बल्कि पृथ्वी प्रणाली (Earth System) पर एक प्रत्यक्ष हमला है। आधुनिक युद्ध न केवल मानवीय त्रासदी पैदा करते हैं, बल्कि वे पृथ्वी के कार्बन चक्र, पारिस्थितिक तंत्र और जलवायु स्थिरता को भी गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।
1. क्या राष्ट्रीय सुरक्षा, ‘ग्रहीय सुरक्षा’ से बड़ी है?
राजनीतिक रणनीतिकार अक्सर युद्ध को “राष्ट्रीय हित” के नाम पर उचित ठहराते हैं। लेकिन पृथ्वी के भौतिक भूगोल के सामने यह तर्क बहुत छोटा पड़ जाता है।
जब किसी युद्ध में तेल रिफाइनरी जलती है, शहर नष्ट होते हैं या हजारों मिसाइलें दागी जाती हैं, तो उससे निकलने वाला कार्बन किसी एक देश की सीमा में नहीं रुकता।
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार दुनिया की सेनाएँ और सैन्य गतिविधियाँ वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 5.5% उत्पन्न करती हैं। यदि विश्व की सभी सेनाओं को एक देश माना जाए, तो वे चीन, अमेरिका और भारत के बाद चौथे सबसे बड़े उत्सर्जक होंगे।
एक युद्धक विमान (जैसे F-15) केवल एक घंटे में लगभग 6000 लीटर ईंधन जला सकता है, जिससे 15 टन से अधिक CO₂ उत्सर्जित होती है।
प्रश्न:
क्या किसी देश की सत्ता इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लिए पूरी मानवता के सीमित कार्बन बजट को जला दिया जाए?
यदि पृथ्वी ही रहने योग्य नहीं बचेगी, तो आपकी राष्ट्रीय सीमाएँ कहाँ रहेंगी?
2. सैन्य ‘इकोसाइड’ (Ecocide) पर चुप्पी क्यों?
अंतरराष्ट्रीय कानून में नरसंहार (Genocide) को अपराध माना जाता है, लेकिन प्रकृति की हत्या ‘इकोसाइड’ अभी भी स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में नहीं आती।
युद्ध के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को अक्सर वैश्विक जलवायु समझौतों में ठीक से दर्ज ही नहीं किया जाता। वास्तव में क्योटो प्रोटोकॉल और कई जलवायु समझौतों में सैन्य उत्सर्जन को काफी हद तक छूट दी गई थी, जिससे इस क्षेत्र का वास्तविक कार्बन प्रभाव छिपा रहता है।
कुछ उदाहरण देखें—
2001 के बाद अमेरिका के युद्धों ने लगभग 1.2 अरब टन CO₂ उत्सर्जन जोड़ा।
रूस-यूक्रेन युद्ध से लगभग 230 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन का अनुमान लगाया गया है।
आधुनिक युद्धों में एक टॉमहॉक मिसाइल के विस्फोट से लगभग 800 किलोग्राम CO₂ निकल सकती है।
प्रश्न:
क्या आधुनिक युद्धों को स्पष्ट रूप से “जलवायु अपराध (Climate Crime)” की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए?
क्या उन नेताओं और नीतिनिर्माताओं पर वैश्विक स्तर पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जो शांतिपूर्ण समाधान के बजाय युद्ध का रास्ता चुनते हैं?
3. मरणोन्मुख उपभोक्तावाद और सैन्य लाभ
हथियार उद्योग शांति से नहीं, बल्कि अशांति और भय से फलता-फूलता है।
2024 में वैश्विक सैन्य खर्च लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जो इतिहास में सबसे अधिक है।
अर्थशास्त्रीय अध्ययन बताते हैं कि जब सैन्य खर्च बढ़ता है, तो कुल कार्बन उत्सर्जन बढ़ जाता है
नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश घट सकता है
और हरित तकनीकी नवाचार धीमा पड़ सकता है।
इसका परिणाम यह होता है कि जलवायु संकट से जूझ रही दुनिया में कुछ उद्योग युद्ध को लाभ के अवसर के रूप में देखते हैं।
प्रश्न:
क्या यह नैतिक है कि दुनिया के एक हिस्से में लोग जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित हो रहे हैं, जबकि दूसरे हिस्से में हथियार निर्माता युद्ध से मुनाफा कमा रहे हैं?
यह वास्तव में जलवायु अन्याय (Climate Injustice) का सबसे क्रूर रूप है।
4. युद्ध और जलवायु टिपिंग पॉइंट्स
आज पृथ्वी कई जलवायु टिपिंग पॉइंट्स के करीब पहुँच चुकी है—
ग्रीनलैंड आइस शीट का पिघलना
अमेज़न वर्षावन का पतन
प्रवाल भित्तियों का विनाश
पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना
ऐसी स्थिति में युद्ध केवल मानवीय संकट नहीं बढ़ाते, बल्कि वे पृथ्वी के फीडबैक लूप्स को तेज कर सकते हैं—
जैसे अधिक कार्बन उत्सर्जन → अधिक तापमान → अधिक पारिस्थितिक अस्थिरता → अधिक संघर्ष।
एक भूगोलवेत्ता और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ के रूप में मुझे यह स्पष्ट दिखता है कि युद्ध अब केवल राजनीतिक घटनाएँ नहीं हैं; वे पृथ्वी प्रणाली के लिए अस्तित्वगत खतरा बन चुके हैं।
यदि मानवता को सचमुच जलवायु संकट से बचना है, तो उसे एक नया नैतिक सिद्धांत स्वीकार करना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा तभी सार्थक है, जब पृथ्वी सुरक्षित हो।
इतिहास बताता है कि युद्ध की घोषणा करने वाले नेता अक्सर सुरक्षित कमरों में बैठे होते हैं। लेकिन उसकी जलवायु सज़ा उन निर्दोष लोगों और भविष्य की पीढ़ियों को भुगतनी पड़ती है जिनका उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं होता।
Dr. J. Lal
Head, Department of Geography
R.B. College, Dalsinghsarai, Samastipur