Dr J Singh

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You tube- Dr J Lal
विभागाध्यक्ष,भूगोल
लेखक,वक्ता,शोधकर्ता,अपने संघर्षों की कहानियां समेट रहा हूं..✍️
For UPSC, PCS, BPSC, UGC-NET/JRF, CTET/ STET, SSC, Sub Inspector, Railway, Poli
You tube- Dr J Lal

14/03/2026

युद्ध, सत्ता और जलवायु अपराध

(War, Power and Climate Crime)

आज का वैश्विक नेतृत्व एक खतरनाक विरोधाभास में जी रहा है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेट-जीरो, कार्बन न्यूट्रैलिटी और सस्टेनेबिलिटी की प्रतिज्ञाएँ ली जाती हैं, वहीं दूसरी ओर युद्ध और सैन्य प्रतिस्पर्धा के माध्यम से उसी पृथ्वी के अस्तित्व को खतरे में डाला जा रहा है।

भूगोल के दृष्टिकोण से यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं है, बल्कि पृथ्वी प्रणाली (Earth System) पर एक प्रत्यक्ष हमला है। आधुनिक युद्ध न केवल मानवीय त्रासदी पैदा करते हैं, बल्कि वे पृथ्वी के कार्बन चक्र, पारिस्थितिक तंत्र और जलवायु स्थिरता को भी गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।

1. क्या राष्ट्रीय सुरक्षा, ‘ग्रहीय सुरक्षा’ से बड़ी है?

राजनीतिक रणनीतिकार अक्सर युद्ध को “राष्ट्रीय हित” के नाम पर उचित ठहराते हैं। लेकिन पृथ्वी के भौतिक भूगोल के सामने यह तर्क बहुत छोटा पड़ जाता है।

जब किसी युद्ध में तेल रिफाइनरी जलती है, शहर नष्ट होते हैं या हजारों मिसाइलें दागी जाती हैं, तो उससे निकलने वाला कार्बन किसी एक देश की सीमा में नहीं रुकता।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार दुनिया की सेनाएँ और सैन्य गतिविधियाँ वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 5.5% उत्पन्न करती हैं। यदि विश्व की सभी सेनाओं को एक देश माना जाए, तो वे चीन, अमेरिका और भारत के बाद चौथे सबसे बड़े उत्सर्जक होंगे।

एक युद्धक विमान (जैसे F-15) केवल एक घंटे में लगभग 6000 लीटर ईंधन जला सकता है, जिससे 15 टन से अधिक CO₂ उत्सर्जित होती है।

प्रश्न:
क्या किसी देश की सत्ता इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लिए पूरी मानवता के सीमित कार्बन बजट को जला दिया जाए?
यदि पृथ्वी ही रहने योग्य नहीं बचेगी, तो आपकी राष्ट्रीय सीमाएँ कहाँ रहेंगी?

2. सैन्य ‘इकोसाइड’ (Ecocide) पर चुप्पी क्यों?

अंतरराष्ट्रीय कानून में नरसंहार (Genocide) को अपराध माना जाता है, लेकिन प्रकृति की हत्या ‘इकोसाइड’ अभी भी स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में नहीं आती।

युद्ध के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को अक्सर वैश्विक जलवायु समझौतों में ठीक से दर्ज ही नहीं किया जाता। वास्तव में क्योटो प्रोटोकॉल और कई जलवायु समझौतों में सैन्य उत्सर्जन को काफी हद तक छूट दी गई थी, जिससे इस क्षेत्र का वास्तविक कार्बन प्रभाव छिपा रहता है।

कुछ उदाहरण देखें—

2001 के बाद अमेरिका के युद्धों ने लगभग 1.2 अरब टन CO₂ उत्सर्जन जोड़ा।

रूस-यूक्रेन युद्ध से लगभग 230 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन का अनुमान लगाया गया है।

आधुनिक युद्धों में एक टॉमहॉक मिसाइल के विस्फोट से लगभग 800 किलोग्राम CO₂ निकल सकती है।

प्रश्न:
क्या आधुनिक युद्धों को स्पष्ट रूप से “जलवायु अपराध (Climate Crime)” की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए?
क्या उन नेताओं और नीतिनिर्माताओं पर वैश्विक स्तर पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जो शांतिपूर्ण समाधान के बजाय युद्ध का रास्ता चुनते हैं?

3. मरणोन्मुख उपभोक्तावाद और सैन्य लाभ

हथियार उद्योग शांति से नहीं, बल्कि अशांति और भय से फलता-फूलता है।

2024 में वैश्विक सैन्य खर्च लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जो इतिहास में सबसे अधिक है।

अर्थशास्त्रीय अध्ययन बताते हैं कि जब सैन्य खर्च बढ़ता है, तो कुल कार्बन उत्सर्जन बढ़ जाता है

नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश घट सकता है

और हरित तकनीकी नवाचार धीमा पड़ सकता है।

इसका परिणाम यह होता है कि जलवायु संकट से जूझ रही दुनिया में कुछ उद्योग युद्ध को लाभ के अवसर के रूप में देखते हैं।
प्रश्न:
क्या यह नैतिक है कि दुनिया के एक हिस्से में लोग जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित हो रहे हैं, जबकि दूसरे हिस्से में हथियार निर्माता युद्ध से मुनाफा कमा रहे हैं?

यह वास्तव में जलवायु अन्याय (Climate Injustice) का सबसे क्रूर रूप है।

4. युद्ध और जलवायु टिपिंग पॉइंट्स

आज पृथ्वी कई जलवायु टिपिंग पॉइंट्स के करीब पहुँच चुकी है—

ग्रीनलैंड आइस शीट का पिघलना

अमेज़न वर्षावन का पतन

प्रवाल भित्तियों का विनाश

पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना

ऐसी स्थिति में युद्ध केवल मानवीय संकट नहीं बढ़ाते, बल्कि वे पृथ्वी के फीडबैक लूप्स को तेज कर सकते हैं—
जैसे अधिक कार्बन उत्सर्जन → अधिक तापमान → अधिक पारिस्थितिक अस्थिरता → अधिक संघर्ष।

एक भूगोलवेत्ता और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ के रूप में मुझे यह स्पष्ट दिखता है कि युद्ध अब केवल राजनीतिक घटनाएँ नहीं हैं; वे पृथ्वी प्रणाली के लिए अस्तित्वगत खतरा बन चुके हैं।
यदि मानवता को सचमुच जलवायु संकट से बचना है, तो उसे एक नया नैतिक सिद्धांत स्वीकार करना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा तभी सार्थक है, जब पृथ्वी सुरक्षित हो।
इतिहास बताता है कि युद्ध की घोषणा करने वाले नेता अक्सर सुरक्षित कमरों में बैठे होते हैं। लेकिन उसकी जलवायु सज़ा उन निर्दोष लोगों और भविष्य की पीढ़ियों को भुगतनी पड़ती है जिनका उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं होता।

Dr. J. Lal
Head, Department of Geography
R.B. College, Dalsinghsarai, Samastipur

21/02/2026

किसी क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए...

01/02/2026

संत रविदास भले ही आधुनिक अर्थों में जलवायु परिवर्तन शब्द से परिचित न रहे हों, लेकिन उनका दर्शन आज की पर्यावरणीय संकटग्रस्त दुनिया के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। जलवायु परिवर्तन केवल तापमान या कार्बन उत्सर्जन का प्रश्न नहीं है, यह न्याय, सामाजिक असमानता, अंधविश्वास और मानवीय संवेदना के संकट से भी गहराई से जुड़ा हुआ है और यहीं संत रैदास का विचार सीधे हस्तक्षेप करता है।

1. बेगमपुरा और असमानता-मुक्त सतत समाज

रैदास का बेगमपुरा—“बिना दुख का शहर”—ऐसे समाज की कल्पना है जहाँ

शोषण नहीं है

संपत्ति का असमान संकेन्द्रण नहीं है

जाति, वर्ग और पेशे के आधार पर कोई ऊँच-नीच नहीं है

आज जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा बोझ वही लोग उठा रहे हैं जो पहले से ही सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं—गरीब, दलित, आदिवासी, महिलाएँ और ग्रामीण समुदाय। यानी आधुनिक दुनिया जलवायु के स्तर पर भी बेगमपुरा के ठीक उलट खड़ी है। रैदास का स्वप्न हमें यह समझने में मदद करता है कि पर्यावरणीय संकट दरअसल सामाजिक असमानता का ही विस्तार है, जिसे आज जलवायु न्याय (Climate Justice) कहा जाता है।

2. निजी लोभ, पूँजी और अंधविश्वास का गठजोड़

रैदास उस समाज की कल्पना करते हैं जहाँ संपत्ति पर निजी मालिकाना सर्वोपरि नहीं है।
आज जलवायु संकट का मूल कारण यही है—

> असीमित उपभोग, मुनाफ़ा-केंद्रित अर्थव्यवस्था और प्रकृति का वस्तुकरण

लेकिन इसके साथ एक और तत्व जुड़ा है—अंधविश्वास।
जब प्राकृतिक आपदाओं को “ईश्वरीय प्रकोप” कहकर सामाजिक-आर्थिक जिम्मेदारी से बचा जाता है,
जब सूखा, बाढ़ और महामारी को कर्म-फल बताकर सत्ता और व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाए जाते,
तो अंधविश्वास शोषण का वैचारिक औज़ार बन जाता है।

रैदास का दर्शन ऐसे हर भ्रम को तोड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने जातिगत श्रेष्ठता और धार्मिक पाखंड को नकारा।

3. ‘मन चंगा’ और वैज्ञानिक-नैतिक चेतना

“मन चंगा तो कठौती में गंगा” केवल आध्यात्मिक वाक्य नहीं, बल्कि अंधविश्वास-विरोधी और पर्यावरणीय नैतिकता का उद्घोष है।
इसका अर्थ है—

पवित्रता बाहरी कर्मकांड में नहीं

न जाति में

न दिखावटी धर्म में
बल्कि विवेक, करुणा और तर्क में है।

आज जलवायु समाधान केवल तकनीकी नहीं, बल्कि वैज्ञानिक चेतना और नैतिक साहस की माँग करते हैं। बिना विवेक के ग्रीन टेक्नोलॉजी भी विनाशक हो सकती है और बिना न्याय के विकास भी प्रदूषण बन जाता है।

4. श्रम की गरिमा, सादगी और टिकाऊ जीवन

जूता बनाने जैसे श्रमसाध्य पेशे से जुड़े संत रविदास श्रम, संसाधन और प्रकृति के वास्तविक मूल्य को समझते थे।
आज की जलवायु समस्या अति-उपभोग, उपभोक्तावादी संस्कृति और श्रम-विमुख जीवनशैली की देन है।

रैदास का दर्शन हमें सिखाता है—

> सादगी, श्रम की गरिमा और संतुलन ही स्थायित्व का आधार है।

यही दर्शन सामाजिक असमानता को भी चुनौती देता है, जहाँ एक वर्ग प्रकृति का अंधाधुंध उपभोग करता है और दूसरा वर्ग उसके दुष्परिणाम झेलता है।

5. बौद्ध करुणा, अंधविश्वास-विरोध और पारिस्थितिक चेतना

जिस तरह बौद्ध धर्म में करुणा केवल मानव तक सीमित नहीं है, वैसे ही रैदास की संवेदना भी समग्र जीवन—मनुष्य, प्रकृति और समाज—के पक्ष में खड़ी है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें

मनुष्य–प्रकृति द्वैत

जाति-आधारित ऊँच-नीच

और मानव-श्रेष्ठता के अंधविश्वास
तीनों को एक साथ तोड़ना होगा।

संत रविदास को आज के संदर्भ में पढ़ें, तो वे केवल भक्ति संत नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, वैज्ञानिक चेतना और जलवायु नैतिकता के दार्शनिक प्रतीत होते हैं।

जलवायु परिवर्तन का समाधान केवल COP सम्मेलनों या GDP-आधारित विकास से नहीं निकलेगा,
बल्कि एक ऐसे बेगमपुरा की ओर लौटने से निकलेगा
जहाँ करुणा, समता, तर्क, सीमित उपभोग और मानवीय गरिमा केंद्र में हों।

इस तरह यदि जलवायु संकट आधुनिक सभ्यता की परीक्षा है,
तो संत रविदास उसका नैतिक, सामाजिक और बौद्धिक पाठ्यक्रम हैं।

संत शिरोमणि को सत-सत नमन 🙏

26/01/2026

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳
आईए हम सब विचार, संवाद और कर्म तीनों में गणतंत्र को मजबूत करें, खासकर पर्यावरण, न्याय और समानता जैसे मुद्दों पर।
जय हिंद! 🇮🇳

26/12/2025

Inter tropical convergence zone(ITCZ)
Monsoon

22/12/2025

भूर्जपत्र पर लिखी उपलब्ध संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक " धम्मपद " है. मध्य एशिया के खोतन से मिली है. खरोष्ठी लिपि में लिखी गई है. भाषा गंधारी प्राकृत है. यह ईसा की प्रथम-दूसरी सदी की है.
Dr Rajendra Prasad Singh

16/12/2025

आप असिस्टेंट प्रोफेसर हैं फिर क्यों ऐसा

12/12/2025

पृथ्वी के इतिहास में पहले पाँचों महाविनाश प्राकृतिक कारणों से हुए कभी ज्वालामुखीय विस्फोट, कभी हिमयुग, कभी एस्टेरॉयड। इन घटनाओं का पृथ्वी पर किसी एक जीव द्वारा नियंत्रित किया जाना संभव नहीं था।
लेकिन छठे महाविनाश की खास बात यह है कि:

1. इसका मुख्य कारण स्वयं “मानव” है

पहली बार पृथ्वी की किसी प्रजाति ने अपने व्यवहार के कारण लाखों अन्य प्रजातियों को संकट में डाल दिया है।

वनों की कटाई

अत्यधिक औद्योगिकीकरण

प्रदूषण

ग्लोबल वार्मिंग

भूमि व जल संसाधनों का दोहन

ये सभी ऐसे कारण हैं जिनका स्रोत सीधे मानव गतिविधियाँ हैं।

2. वर्तमान महाविनाश की गति पहले सभी महाविनाशों से “कई गुना तेज” है

पिछले महाविनाश लाखों वर्षों में हुए।
लेकिन अभी:

प्रजातियों की नष्ट होने की दर 100 से 1000 गुना अधिक तेज है।

कई वैज्ञानिकों के अनुसार प्रतिदिन 50–150 प्रजातियाँ गायब हो रही हैं।

इस तेज़ गति का कारण भी मानव ही है।

3. जैव विविधता (Biodiversity) का नुकसान पृथ्वी की संतुलन प्रणाली को तोड़ रहा है

जब प्रजातियाँ खत्म होती हैं, तो:

खाद्य-श्रृंखला (food chain) टूटने लगती है

परागण (pollination) बाधित होता है

मिट्टी, जल और वायु की गुणवत्ता खराब होती है

रोग बढ़ते हैं

जलवायु असंतुलित होती है

यह सब मिलकर मानव जीवन को भी खतरे में डाल देता है।

4. छठा महाविनाश धीरे-धीरे नहीं, बल्कि “साइलेंट क्राइसिस” की तरह हो रहा है

पिछले महाविनाश अचानक हुए थे, इसलिए उनके अवशेष पृथ्वी के इतिहास में साफ दिखाई देते हैं।
लेकिन आज:

जंगल गायब हो रहे हैं,

नदियाँ मृत हो रही हैं,

कीट-पतंगे तेजी से खत्म हो रहे हैं,

समुद्री जीवन प्लास्टिक और तापमान से मर रहा है,

पर हम दैनिक जीवन में तुरंत इसका प्रभाव नहीं देखते, इसलिए यह “धीमी मौत (Slow Death)” जैसा लगता है।

5. अगर मानव व्यवहार नहीं बदला तो नुकसान ‘अपरिवर्तनीय’ (Irreversible) हो जाएगा

एक बार किसी प्रजाति का अंत हो गया—तो वह वापस नहीं आती।
यदि:

तापमान 1.5–2°C से ज्यादा बढ़ गया,

समुद्र अम्लीकरण बढ़ता रहा,

जंगल 30–40% और कट गए,

तो पृथ्वी की कई प्राकृतिक प्रणालियाँ स्थायी रूप से बदल जाएँगी, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य और सभ्यता की संरचना तक प्रभावित होगी।

6. फिर भी उम्मीद है—क्योंकि इस बार इंसान समस्या भी है और समाधान भी

पहले पाँचों महाविनाश में जीवों के पास विकल्प नहीं थे।
लेकिन आज:

संरक्षण (conservation)

पुनर्वनीकरण (reforestation)

नवीकरणीय ऊर्जा

प्राकृतिक खेती

प्रदूषण नियंत्रण

वन्यजीव संरक्षण

के माध्यम से हम इस महाविनाश की गति को धीमा और नियंत्रित कर सकते हैं।

छठा महाविनाश जारी है—और यह मानव-जनित (anthropogenic) है।
यदि हम पृथ्वी के संसाधनों का दोहन इसी गति से करते रहे, तो आने वाले कुछ दशकों में जैव विविधता का भारी नुकसान होगा।
लेकिन अगर मनुष्य वैज्ञानिक समझ, पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास को अपनाता है, तो मनुष्य इस महाविनाश को रोक भी सकता है।

यानी पहली बार पृथ्वी के इतिहास में कोई महाविनाश “रोकने योग्य” है—लेकिन यह पूरी तरह मनुष्य की इच्छाशक्ति पर निर्भर है।

Photos from Dr J Singh's post 10/12/2025

मानवाधिकार का अर्थ है मनुष्य होने के नाते मिलने वाले वे अधिकार, जिनके बिना मानव जीवन गरिमापूर्ण नहीं हो सकता।आज विश्व की चुनौतियाँ बदल रही हैं जैसे डिजिटल निगरानी, जलवायु परिवर्तन, प्रवासन संकट, लैंगिक हिंसा, संघर्ष, फेक न्यूज़ और साइबर बुलिंग, सूखे, बाढ़, गर्मी, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से गरीब और हाशिये पर खड़े समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

ये सब मानवाधिकार संरक्षण के नए आयाम बनकर उभर रहे हैं।

मनुष्य, जिसे सृष्टि का श्रेष्ठतम प्राणी कहा गया है, वही प्रायः अपने ही जैसे मनुष्यों का संहार करता रहा है। इतिहास गवाह है कि मानव ने मानव को अनेक आधारों पर मारा है धर्म, जाति, नस्ल, भाषा, क्षेत्र, राजनीति, संपत्ति, विचारधारा, भय, प्रतिशोध और अज्ञानता जैसे कारणों से।

धर्म के नाम पर लड़े गए युद्धों ने असंख्य प्राण लिए हैं। जातीय और नस्लीय भेदभाव ने समाज को विभाजित कर विनाश का मार्ग प्रशस्त किया है। भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता की रक्षा के नाम पर भी रक्त बहा है। सत्ता और धन की भूख ने भाई को भाई का शत्रु बना दिया। विचारों का संघर्ष तलवार की धार तक पहुँचा है। भय और असुरक्षा की भावना ने अविश्वास को जन्म दिया, जो अंततः हिंसा में बदल गया।

जब तक एक भी मनुष्य अपने अधिकारों से वंचित है, तब तक मानवाधिकार का औचित्य और प्रासंगिकता बना रहेगा। धन्यवाद!

Dr J Lal
RB College Dalsinghsarai Samastipur

06/12/2025

जिस दिन सम्राट असोक बौद्ध धम्म में बाकायदे दीक्षित हुए थे, ठीक उसी दिन बाबा साहब भी बौद्ध धम्म में बाकायदे दीक्षित हुए.

बाबा साहब ने धम्मदीक्षा के लिए प्राचीन बौद्ध - स्थल नागपुर को चुना.

बाबा साहब ने पुस्तकालय का नाम प्रथम बौद्ध संगीति स्थल राजगृह के नाम पर रखा.

बाबा साहब ने अपनी आखिरी किताब लिखने के लिए बुद्ध और उनके धम्म को चुना.

बाबा साहब ने धम्म पर लिखी किताब को अष्टांगिक मार्ग की भाँति आठ खंडों में विभाजित किया.

बाबा साहब को बौद्ध परंपराओं की बेहद गंभीर समझ थी.

भारत के राजनेताओं में सर्वाधिक पुस्तकें लिखने और पढ़ने का श्रेय बाबा साहब अंबेडकर को है.

उनका ज्ञान समुद्र की भाँति गहरा और आसमान की भाँति विस्तृत था.

पुरानी बाइबिल में 5642, नई बाइबिल में 4800, मिल्टन में 8000 और

डाॅ. अंबेडकर की अंग्रेजी में लगभग 8500 शब्दों का प्रयोग हुआ है.

आज बोधिसत्व बाबा साहब को विनम्र श्रद्धांजलि!

Dr Rajendra Prasad Singh

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