01/06/2026
बार-बार दोहराई जाने वाली बात (قند مکرر)
मदरसा सिस्टम के अंदरूनी ढांचे में चाहे कितनी ही कमियाँ क्यों न हों, लेकिन यह भी एक हकीकत है कि मुस्लिम समाज को फायदा पहुँचाने में उनका रोल सबसे आगे रहा है। वे अपने मकसद और अपने सिद्धांतों पर आज भी पूरे जोश और लगन के साथ काम कर रहे हैं। भारतीय उपमहाद्वीप (برصغیر) के कोने-कोने में मस्जिदों और मकतबों का जाल बिछाना और जगह-जगह मदरसे खोलना उनका एक शानदार कारनामा है। मदरसों ने समाज को मौलवियों के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बना दिया है। अब कौम को इमाम, मुअज़्ज़िन और निकाह पढ़ाने वालों की जरा भी कमी का सामना नहीं करना पड़ रहा है, बल्कि हर जगह इनकी एक बड़ी तादाद मौजूद है।
दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी के पढ़े-लिखे लोग कौम को कुछ देने में नाकाम रहे हैं। कौम की फिक्र और दीन के प्रति लगाव के मामले में उनका रोल बहुत निराशाजनक रहा है। हद तो यह है कि यूनिवर्सिटी के मुस्लिम प्रोफेसरों के अंदर जितनी बेदीनी, नास्तिकता और वैचारिक भटकाव पाया जाता है, उतना किसी अनपढ़ इंसान में भी नहीं मिलता। मॉडर्न बनने और आधुनिक सोच के चक्कर में वे कुरान और हदीस से कोसों दूर हो चुके हैं। नफ़्ल (अतिरिक्त नमाज़ों) और अच्छी आदतों की बात तो दूर, उनकी ज़िंदगी में इस्लाम के बुनियादी फर्ज़ों (जैसे नमाज़, रोज़ा) से भी आखिरी हद तक दूरी और बेज़ारी दिखाई देती है। उनकी नज़रों में इस्लाम की पहचान (जैसे दाढ़ी, हिजाब वगैरह) की कोई अहमियत ही नहीं है।
होना तो यह चाहिए था कि मदरसे के पढ़े-लिखे लोगों की तरह, ये यूनिवर्सिटी वाले भी गली-गली इस्लामिक स्कूलों का जाल बिछा देते और समाज के पिछड़े व वंचित तबके को आधुनिक शिक्षा (عصری تعلیم) से जोड़ने की मुहिम चलाते। लेकिन कड़वा सच यह है कि वे बैंक बैलेंस और अपने निजी फायदे से आगे बढ़कर कभी कौम के भले के लिए फिक्रमंद नहीं हो सके।
अगर इनमें से कुछ लोग इस तरफ आए भी, तो सिर्फ सेमिनारों और कॉन्फ्रेंसों (यानी सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों) तक सीमित रहे; वरना ज़मीनी तौर पर व्यावहारिक रूप से मदरसे के लोग ही कौम के फायदे के लिए अपनी जान खपाते रहे हैं।
यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिससे इनकार करना चमकते हुए सूरज को झुठलाने जैसा है। काश! मदरसों की तरह यूनिवर्सिटी के पढ़े-लिखे लोग भी कौम के मसलों को हल करने के लिए गंभीर कोशिशें करते, तो आज समाज को इन मुश्किल और गंभीर हालातों का सामना न करना पड़ता।
– अब्दुल मालिक बुलंदशहरी
7 फरवरी 2022