Retd. Principal, MPG College, Mussoorie

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Retd. Principal, MPG College, Mussoorie Municipal post graduate college situated at kincraige place is a multi faculty college in the city.

12/10/2025

📕Let us have right attitude for becoming wealthy ➡ सही मार्ग से 'धनी' बनना प्रशंसनीय है~
1. ✅यदि हम धन में आसक्त होकर उसी को 'साध्य' मान लें और उसकी प्राप्ति के लिए पाप-पुण्य का ध्यान भी छोड़ दें, उसका सर्वथा दुरूपयोग करें, उसे अनुचित/अवांछनीय कार्यों में व्यय करें- तो निश्चय ही धन 'नर्क का मार्ग' बन जायेगा-अन्यथा धन मानव-मात्र के लिए कल्याणकारी ही बना रहेगा।
2. ✅आत्मविश्वास के साथ लगनपूर्वक परिश्रम, संयमी जीवन, प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए पुरूषार्थ करने पर आर्थिक सफलता सहित - किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त होने में कोई सन्देह नहीं है।
3. ✅सबको अपनी योग्यता / निपुणता के अनुसार ही धन प्राप्त होता है। इसे जोड़- जोड़ कर विशाल राशि जमा करने में नहीं बल्कि उसका ठीक समय पर आवश्यक एवं उचित उपयोग कर लेने में बुद्धिमानी है।
4. ♦थोड़े प्रयत्न में अधिक धन कमाने के लिए लोग तरह-तरह के घृणित / निन्दनीय रास्तों का सहारा लेते हैं। इस प्रकार कमाये धन का उसी प्रकार अपव्यय भी होता है - साथ ही लोक -निन्दा, दण्ड, शत्रुता, घृणा / हिंसा - प्रतिहिंसा का भय सदैव बना ही रहता है।
5. 🆒परमात्मा ने हमें विवेक दिया है, जिसकी सहायता से हम उचित-अनुचित का विचार कर सकते हैं, अनुचित व्यसनों/खर्चों/विलासिता से बचकर अनेकों अपव्यय रोक सकते हैं।
6. ⏩अपनी आय वृद्धि करना हमारे अपने हाथ की बात है। जितना हम परिश्रम करेंगे, अपनी योग्यता बढ़ायेंगे, अपनी विद्या में निपुण बनेंगे- उसी अनुपात में हमारी आय भी बढ़ती जाएगा।
7. 🔺हमें मन के कोने- कोने से दरिद्रता/ विवशता/ क्षुद्रता/ दीन-हीनता जैसे निकृष्ट विचार मिटा कर मन में आशा- विश्वास, उमंग- उत्साह एवं उत्कृष्टता के बीज बोने चाहिए। फिर श्रम और मितव्ययिता के नियमों के अनुसार लक्ष्मी साधना में लगना चाहिए।
8. 🆘अत्याचार/ हिंसा/ अपहरण/ धोखेबाजी आदि से कमाया गया धन अन्ततः विनाश का ही कारण बनता है।
9. ✅आर्थिक समृद्धि में धनार्जन, इसका सदुपयोग, इसकी वृद्धि, धन हानि- अपव्यय को रोकना, बचत करने तथा इसे उत्पादक कार्यों में लगाने की कला - सभी कुछ सम्मिलित होता है।
10. 🔚हमें विवेक पूर्वक समृद्धि के प्रत्येक पक्ष पर सन्तुलित रूप से ध्यान देना चाहिए ।
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*🌹हमारी उपलब्धियों में*
*दूसरों का भी योगदान*
*होता है क्योंकि*
*समन्दर में भले ही*
*पानी अपार है पर सच*
*तो यही है कि वो*
*नदियों का उधार होता है !!*🌹

🙏Happy Good Evening🙏

♦कर्म और उनसे होने वाले परिणाम:(संचित कर्म, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्म)1.➡यदि हम अपने दिन भर के कामों का निरीक्षण करें तो...
29/06/2025

♦कर्म और उनसे होने वाले परिणाम:
(संचित कर्म, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्म)

1.➡यदि हम अपने दिन भर के कामों का निरीक्षण करें तो उन्हें तीन श्रेणियों में बाँट देना पड़ेगा।
▶कुछ तो ऐसे होते हैं जो अनजाने में होते हैं जैसे बुरे या भले लोगों के बीच उस मुहल्ले में रहने पर उसका प्रभाव गुप्त रूप से किसी अंश में अपने ऊपर भी पड़ जाता है - यद्यपि हमने उसे इच्छा पूर्वक स्वीकार नहीं किया इसलिए वह हल्का, निर्बल, एवं कम प्रभाव वाला होकर हमारी भीतरी चेतना के एक कोने में पड़ा रहा।

2.➡ ऐसे कमजोर प्रभाव वाले अनिच्छा से / विवशता में किए गए कर्मों के संस्कार संचित कर्म कहलाते हैं। जो कार्य लाचारी में/ विवशता में, दबाये जाने पर करने पड़ें परन्तु मन जिनके विरुद्ध विद्रोह करता रहे, उस कार्य का संस्कार भी कम प्रभाव वाला होता है। ऐसे संचित कर्मो के कमजोर संस्कार मनोभूमि के भीतर यों ही लम्बी अवधि तक पड़े रहते हैं। यदि उन्हें प्रकट होने का कोई अच्छा अवसर न मिले तो यों ही दबे हुए पड़े रहते हैं।

3.➡परन्तु यदि उन संचित संस्कारों
को लगातार विपरीत स्वभाव के बलवान कर्म संस्कारों के साथ रहना पड़े तो वे नष्ट भी हो जाते हैं।
🚩तीर्थ यात्रा आदि शुभ धर्म कार्य करने से वास्तव में इसी प्रकार के पूर्व जन्म के पाप/ संचित संस्कार नष्ट होते हैं।
🚩भले और बुरे दोनों ही प्रकार के संचित कर्म संस्कार, अनुकूल परिस्थिति पाकर फलदायक होते हैं एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में नष्ट भी हो जाते हैं।

4.♦ प्रारब्ध वे मानसिक कर्म होते हैं जो स्वेच्छापूर्वक, जानबूझकर तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किये जाते हैं।
➡क्योंकि इन्हें विशेष मनोयोग से किया जाता है इसलिए इनका संस्कार भी बहुत बलवान होता है।
➡हत्या, चोरी, डकैती, विश्वासघात, व्यभिचार जैसे प्रचण्ड क्रूर कर्मों की प्रतिक्रिया अन्तःकरण में बहुत ही तीव्र होती है।

5.♦हमारी अन्तःचेतना निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह हमारे हर काम को देखती रहती है और उसकी न्यूनता-अधिकता के परिणाम के अनुसार दण्ड की व्यवस्था भी करती रहती है।🔻
➡इसकी तैयारी में, दोनों पक्षों के लिए समुचित अवसर का (Combination) तलाशने में कभी -कभी बहुत समय लग जाता है - जो कई बार एक, दो या कई-कई जन्मों का समय भी हो सकता है।

6. 🚩प्रारब्ध फल सदैव आकस्मिक रूप से ही मिलते हैं जैसे रोग से मृत्यु, मकान गिर पड़ना, धन खो जाना, गिर पड़ने से चोट लगना, अंग-भंग हो जाना आदि।

7.♦जानबूझ कर व्यक्तियों द्वारा जो काम किए जा रहे हैं वे नवीन कर्म हैं परन्तु अनायास,आकस्मिक ढंग से जो कष्ट आ पड़ते हैं वे प्रारब्ध के भोग हैं।

8.♦क्रियमाण कर्म शारीरिक होते हैं, जिनका फल प्रायः साथ के साथ ही मिलता रहता है। शरीर जड़/भौतिक तत्वों से बना हुआ है और स्थूलता प्रधान है । अतः यथा शीघ्र फल मिल जाता है।
➡आग छूने पर हाथ जल जाना, विष खाने पर मृत्यु, शराब पीने पर नशे का उन्माद ।
➡नियम विरुद्ध आहार- विहार करने पर रोगी पर पीडा, निर्बलता का शीघ्र आक्रमण हो जाता है और उसकी शुद्धि भी शीघ्र हो जाती है। मजदूर परिश्रम के बदले मजदूरी पा जाता है।

9.♦जिन शारीरिक कर्मों के पीछे कोई मानसिक गुत्थी नहीं होती-केवल शरीर के लिए ही किए जाते हैं- वे क्रियमाण कर्म कहलाते हैं।
➡इनका फल मिलने में अधिक समय नहीं लगता।

10. 🔺स्पष्ट है कि संचित कर्मों का फल मिलना संदिग्ध होता है। यदि अवसर मिलता है तो वे फलित होते हैं अन्यथा विरोधी परिस्थितियों से टकरा कर नष्ट हो जाते हैं।
➡प्रारब्ध कर्मों का फल मिलना निश्चित है परन्तु उसके अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होने में कुछ समय लग जाता है।
➡परन्तु प्रारब्ध फल होते वही हैं जो अचानक घटित हों और जिसमें मनुष्य का कुछ वश न चले।
➡ पुरूषार्थ की अवहेलना से जो असफलता मिलती है उसे कदापि प्रारब्ध फल नहीं कहा जा सकता।

📕सबसे श्रेष्ठ गृहस्थ आश्रम📕✅जिस घर में आनंददायी वातावरण है, जिसके बच्चे गुणी है, जिसकी पत्नी मधुर वाणी बोलती है, जिसके प...
14/05/2025

📕सबसे श्रेष्ठ गृहस्थ आश्रम📕
✅जिस घर में आनंददायी वातावरण है, जिसके बच्चे गुणी है, जिसकी पत्नी मधुर वाणी बोलती है, जिसके पास जरूरते पूरा करने के लिए पर्याप्त धन है, जो अपनी पत्नी से सुखपूर्ण सम्बन्ध रखता है, जिसके नौकर उसका कहा मानते हैं।
जिसके घर में अतिथि का सत्कार होता है, जिसके घर में भगवान की पूजा रोज होती है, जहाँ स्वादिष्ट भोजन बनता है, जिसे भगवद भक्तो की संगति में आनंद आता है, सच में वही ईश्वर का सानिध्य सबसे पहले एवं सबसे सहजता से पाता है।
✅ ये सारे सुख सन्यासी को नहीं अपितु एक गृहस्थ को उपलब्ध हैं, अतः वही सबसे सुखी जीव और सबसे बड़ा भक्त है। इसलिए गृहस्थ आश्रम ही सर्वश्रेष्ठ है।

📘💃सम्मानित और सन्तुष्ट नारी अनेक सुविधाओं एवं सुव्यवस्थाओं का घर बन जाती है, उसके साथ गरीबी में भी अमीरी का आनन्द बरसता है।
📕अतः उसके समुचित आदर,सहयोग और सन्तोष का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए।

1. ✅गायत्री मन्त्र का सातवाँ अक्षर 'रे' गृह लक्ष्मी के रूप में नारी की प्रतिष्ठा की शिक्षा देता है। भगवान मनु के अनुसार जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। उक्त कथन का भावार्थ यही है कि जहां नारी को उचित सम्मान दिया जाता है- उस स्थान में सुख,शान्ति का निवास रहता है।

2.🔝नारी लक्ष्मी का अवतार है। धन,सम्पत्ति तो निर्जीव लक्ष्मी है, किन्तु स्त्री तो लक्ष्मी की सजीव प्रतिमा है।

3. ↪नारी में नर की अपेक्षा दयालुता, उदारता, सेवा, परमार्थ और पवित्रता की भावनाएं अधिक होती हैं।

4. 🔺नारी के द्वारा अनन्त उपकार और सहयोग प्राप्त करने के उपरान्त नर का यह पवित्र उत्तरदायित्व हो जाता है कि वह उसे स्वावलम्बी, सुशिक्षित, स्वस्थ, प्रसन्न और सन्तुष्ट बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। उसके साथ कठोर अथवा अपमान जनक व्यवहार किसी प्रकार उचित नहीं है।

5. 🆒नारी के सहयोग के बिना नर अपूर्ण है। स्त्री और पुरुष दोनों के मिलने से नर-नारी की स्वाभाविक अपूर्णता दूर होती है। जैसे धनात्मक और ऋणात्मक तत्वों के मिलने से विश्व बनता है, वैसे ही स्त्री और पुरुष दोनों के मिलने से 'मनुष्य' बनता है। यही पूरा मनुष्य, समाज के उत्तरदायित्वों को पूरा करता है।

6. 🆗इच्छाओं को उचित ढ़ंग से पूरा करने के स्थान पर उनका अनुचित रूप से दमन - मानसिक बीमारियाँ उत्पन्न करता है। अतः उचित शिक्षा एवं आध्यात्मिक विकास के पश्चात् किया हुआ विवाह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ठीक है। ➡साधारणतया आजन्म अविवाहित रहने से मन की अनेक कोमल भावनाओं का उचित विकास एवं परिष्कार नहीं हो पाता।

7. 📙विवाह वास्तव में पशुत्व से देवत्व की ओर बढ़ने का एक मार्ग है। बाल्यकाल के उपरान्त एकदम सन्यास धर्म में पहुँचना सबके लिए सरल नहीं और न अपेक्षित ही है।
🎁विवाह ही एक ऐसी बीच की अवस्था है जो मनुष्य को विरक्ति और भोग की अवस्था के ठीक बीचोंबीच रखकर त्याग के साथ साथ ही सुख भोग की शिक्षा देती है।

8.✅ मध्यम मार्ग इस वैवाहिक गृहस्थ जीवन में ही सम्भव है। यदि इसके मर्म को ठीक से समझ लिया जाए तो गृहस्थ जीवन से उत्तम और कोई स्थिति हो ही नहीं सकती।

🚨इसलिए विवाह एक पवित्र बन्धन है और विवाहित जीवन को योग्यता पूर्वक निबाहने में ही मनुष्य का आध्यात्मिक कल्याण है।

9. ♦विवाह को आत्म विकास और चरित्र विकास का एक बड़ा साधन माना गया है। सफल विवाहित जीवन मनुष्य के सुख की एक आधार शिला है।
✅ अपने वैवाहिक साथी की परिस्थिति से पूर्ण आत्मीयता तथा उसे निरन्तर उत्साहित करते रहने की तत्परता- दाम्पत्य जीवन की साधारण बाधाओं को सहज ही में दूर कर देती है।

10. 🆗लोग इसे मनोवैज्ञानिक आदेश की भाँति ग्रहण करें कि जिस भी व्यक्ति ने अपने स्त्री या पुरुष साथी पर प्रभुत्व जमाना चाहा या उसकी निन्दा की तथा उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई- उसने सदा के लिए अपने वैवाहिक आनन्द पर कुठाराघात कर लिया।

11. 🔝वास्तव में लोगों का वैवाहिक जीवन अधिक सफल होता यदि दम्पत्ति बाह्य आकर्षण और सुन्दरता पर आधारित प्रेम की बात कम सोचते तथा अपनी आर्थिक परिस्थिति, सन्तान पालन के सिद्धान्त, एक दूसरे की भावनाओं का समुचित ध्यान आदि आवश्यक विषयों पर गंभीर चिन्तन करके अपनी गृहस्थी चलाते।

12.🔚 विवाहित जीवन को सुखमय बनाने का सर्वोत्तम नियम यह है कि विवाह पूर्व पहले अपने साथी को भली-भांति समझ लीजिए और विवाह बाद उसे वही समझिए जो वह वास्तव में है और आदर्श कल्पना को त्याग कर उसी का सन्तोष पूर्वक प्रसन्नता के साथ उत्तम से उत्तम उपयोग कीजिए।

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M. P. G. College
Mussoorie
248179

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Tuesday 9am - 5pm
Wednesday 9am - 5pm
Thursday 9am - 5pm
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