17/11/2020
रावण रचित इस तांडव स्तोत्र के साथ हमेशा अज्ञानतावश अन्याय होता रहा है। शिव जी नित्य संध्या काल में आपने आनंद के लिए नित्य-तांडव करते हैं। ऐसे ही किसी दिन रावण शिव जी के नृत्य की मृदंग से संगत कर रहा था। उनके नृत्य की यतिगती के साथ ही रावण के मुख से अपने आराध्य की स्तुति में काव्य स्तोत्र फूट पड़ा। इसमें रावण भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करते हुए कल्याण की कामना करता है। इस प्रकार इस एक ही स्तोत्र में विभिन्न रसों का परिपाक अत्यंत उत्तम रीति से सम्पन्न हुआ है। अतः मेरे द्वारा इसको आसानी से समझ कर नृत्य करने के लिए इसका हिंदी काव्यानुवाद किया गया है। इस काव्यानुवाद ‘तांडव’ को मैं और विभा जी अगले माह 25-28 दिसम्बर को वर्क्शाप के माध्यम से सिखाने जा रहे हैं। इसके लिए श्री कार्तिक रमन संगीत की रचना कर रहे हैं। सीखने के लिए नीचे दिए गए नम्बरों पे सम्पर्क कर सकते हैं।