Mumbai Astrologer

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1. Date of Birth
2. Time of Bi

08/06/2020

*तिरुपति बालाजी की कथा! 🙏🏻🌹*

वैंकटेश भगवान को कलियुग में बालाजी नाम से भी जाना गया है। पौराणिक गाथाओं और परम्पराओं से जु़डा संक्षिप्त इतिहास यहां प्रस्तुत है-

प्रसिद्ध पौराणिक सागर-मंथन की गाथा के अनुसार जब सागर मंथन किया गया था तब कालकूट विष के अलावा चौदह रत्‍‌न निकले थे। इन रत्‍‌नों में से एक देवी लक्ष्मी भी थीं। लक्ष्मी के भव्य रूप और आकर्षण के फलस्वरूप सारे देवता, दैत्य और मनुष्य उनसे विवाह करने हेतु लालायित थे, किन्तु देवी लक्ष्मी को उन सबमें कोई न कोई कमी लगी।

अत: उन्होंने समीप निरपेक्ष भाव से खड़े हुए विष्णुजी के गले में वरमाला पहना दी। विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने वक्ष पर स्थान दिया।

यह रहस्यपूर्ण है कि विष्णुजी ने लक्ष्मीजी को अपने ह्वदय में स्थान क्यों नहीं दिया? महादेव शिवजी की जिस प्रकार पत्‍‌नी अथवा अर्धाग्नि पार्वती हैं, किन्तु उन्होंने अपने ह्वदयरूपी मानसरोवर में राजहंस राम को बसा रखा था उसी समानांतर आधार पर विष्णु के ह्वदय में संसार के पालन हेतु उत्तरदायित्व छिपा था। उस उत्तरदायित्व में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हो इसलिए संभवतया लक्ष्मीजी का निवास वक्षस्थल बना।

एक बार धरती पर विश्व कल्याण हेतु यज्ञ का आयोजन किया गया। तब समस्या उठी कि यज्ञ का फल ब्रम्हा, विष्णु, महेश में से किसे अर्पित किया जाए। इनमें से सर्वाधिक उपयुक्त का चयन करने हेतु ऋषि भृगु को नियुक्त किया गया। भृगु ऋषि पहले ब्रम्हाजी और तत्पश्चात महेश के पास पहुंचे किन्तु उन्हें यज्ञ फल हेतु अनुपयुक्त पाया।

अंत में वे विष्णुलोक पहुंचे। विष्णुजी शेष शय्या पर लेटे हुए थे और उनकी दृष्टि भृगु पर नहीं जा पाई। भृगु ऋषि ने आवेश में आकर विष्णु जी के वक्ष पर ठोकर मार दी। अपेक्षा के विपरीत विष्णु जी ने अत्यंत विनम्र होकर उनका पांव पक़ड लिया और नम्र वचन बोले- हे ऋषिवर! आपके कोमल पांव में चोट तो नहीं आई?

विष्णुजी के व्यवहार से प्रसन्न भृगु ऋषि ने यज्ञफल का सर्वाधिक उपयुक्त पात्र विष्णुजी को घोषित किया। उस घटना की साक्षी विष्णुजी की पत्‍‌नी लक्ष्मीजी अत्यंत क्रुद्व हो गई कि विष्णुजी का वक्ष स्थान तो उनका निवास स्थान है और वहां धरतीवासी भृगु को ठोकर लगाने का किसने अधिकार दिया?

उन्हें विष्णुजी पर भी क्रोध आया कि उन्होंने भृगु को दंडित करने की अपेक्षा उनसे उल्टी क्षमा क्यों मांगी? परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी विष्णुजी को त्याग कर चली गई। विष्णुजी ने उन्हें बहुत ढूंढा किन्तु वे नहीं मिलीं।

अंतत: विष्णुजी ने लक्ष्मी को ढूंढते हुए धरती पर श्रीनिवास के नाम से जन्म लिया और संयोग से लक्ष्मी ने भी पद्मावती के रूप में जन्म लिया। घटनाचक्र ने उन दोनों का अंतत: परस्पर विवाह करवा दिया। सब देवताओं ने इस विवाह में भाग लिया और भृगु ऋषि ने आकर एक ओर लक्ष्मीजी से क्षमा मांगी तो साथ ही उन दोनों को आशीर्वाद प्रदान किया।

लक्ष्मीजी ने भृगु ऋषि को क्षमा कर दिया किन्तु इस विवाह के अवसर पर एक अनहोनी घटना हुई। विवाह के उपलक्ष्य में लक्ष्मीजी को भेंट करने हेतु विष्णुजी ने कुबेर से धन उधार लिया जिसे वे कलियुग के समापन तक ब्याज सहित चुका देंगे।

ऐसी मानता है कि जब भी कोई भक्त तिरूपति बालाजी के दर्शनार्थ जाकर कुछ चढ़ाता है तो वह न केवल अपनी श्रद्धा भक्ति अथवा आर्त प्रार्थना प्रस्तुत करता है अपितु भगवान विष्णु के ऊपर कुबेर के ऋण को चुकाने में सहायता भी करता है। अत: विष्णुजी अपने ऐसे भक्त को खाली हाथ वापस नहीं जाने देते हैं।

जिस नगर में यह मंदिर बना है उसका नाम तिरूपति है और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला (श्री+मलय) कहते हैं।

तिरूमला को वैंकट पहाड़ी अथवा शेषांचलम भी कहा जाता है। यह पहड़ी सर्पाकार प्रतीत होती हैं जिसके सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं। इन सात चोटियों के नाम क्रमश: शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरू़डाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वैंकटाद्रि हैं।

तिरुपति बालाजी मंदिर के यह ग्यारह सच आप नहीं जानते हैं!!!!!!

देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में तिरुपति बालाजी मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। कई बड़े उद्योगपति, फिल्म सितारे और राजनेता यहां अपनी उपस्थिति देते हैं क्योंकि उनके चमत्कारों की कई कथाएं प्रचलित हैं। आइए जानें उनके ग्यारह आश्चर्यजनक चमत्कार....

1. मुख्यद्वार के दाएं और बालाजी के सिर पर अनंताळवारजी के द्वारा मारे गए निशान हैं। बालरूप में बालाजी को ठोड़ी से रक्त आया था, उसी समय से बालाजी के ठोड़ी पर चंदन लगाने की प्रथा शुरू हुई।

2. भगवान बालाजी के सिर पर आज भी रेशमी बाल हैं और उनमें उलझने नहीं आती और वह हमेशा ताजा लगते है।

3. मंदिर से 23 किलोमीटर दूर एक गांव है, उस गांव में बाहरी व्यक्ति का प्रवेश निषेध है। वहां पर लोग नियम से रहते हैं। वहां की महिलाएं ब्लाउज

नहीं पहनती। वहीं से लाए गए फूल भगवान को चढ़ाए जाते हैं और वहीं की ही अन्य वस्तुओं को चढाया जाता है जैसे- दूध, घी, माखन आदि।

4. भगवान बालाजी गर्भगृह के मध्य भाग में खड़े दिखते हैं मगर वे दाई तरफ के कोने में खड़े हैं बाहर से देखने पर ऎसा लगता है।

5. बालाजी को प्रतिदिन नीचे धोती और उपर साड़ी से सजाया जाता है।

6. गृभगृह में चढ़ाई गई किसी वस्तु को बाहर नहीं लाया जाता, बालाजी के पीछे एक जलकुंड है उन्हें वहीं पीछे देखे बिना उनका विसर्जन किया जाता है।

7. बालाजी की पीठ को जितनी बार भी साफ करो, वहां गीलापन रहता ही है, वहां पर कान लगाने पर समुद्र घोष सुनाई देता है।

8. बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं। हर गुरुवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है उस

चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छबि उस पर उतर आती है। बाद में उसे बेचा जाता है।

9. बालाजी के जलकुंड में विसर्जित वस्तुए तिरूपति से 20 किलोमीटर दूर वेरपेडु में बाहर आती हैं।

10. गर्भगृह मे जलने वाले चिराग कभी बुझते नही हैं, वे कितने ही हजार सालों से जल रहे हैं किसी को पता भी नही है।

11. बताया जाता है सन् 1800 में मंदिर परिसर को 12 साल के लिए बंद किया गया था। किसी एक राजा ने 12 लोगों को मारकर दीवार पर लटकाया था उस समय विमान में वेंकटेश्वर प्रकट हुए थे ऎसा माना जाता है।

जानिये प्रसिद्ध मंदिर तिरुपति बालाजी के लड्डू का रहस्य !!!!!!

तिरुपति में मौजूद बालाजी का मंदिर पूरी दुनिया में मशहूर है, बाबा के दर्शन के लिए आम लोगों से लेकर दुनिया भर के अमीर लोग यहां दर्शक को आते हैं। जितना खास ये मंदिर है उतना ही खास है यहां पर प्रसाद के रूप में मिलने वाला मंदिर। आखिर ये लड्डू क्यों इतना खास है हम आपको बताते हैं उसकी कहानी।

1. प्रसाद में मिलने वाले इस लड्डू का इतिहास 300 सालों से भी पुराना है। कहा जाता है कि पहली बार 2 अगस्त 1715 में इस लड्डू को प्रसाद के तौर पर दिया गया था, उसके बाद ये लड़्डू इस मंदिर का खास प्रसाद बन गया। 2. इस लड्डू को बनाने में आटा, चीनी, घृत, इलायची और मेवे आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद इन्हें वेंकटेश्वर मंदिर में पूजा के दौरान भगवान को अर्पित किया जाता है। 3. इस लड्डू की कीमत की कुछ खास ज्यादा नहीं है। साथ ही ये कई दिनों तक चलता है, इसलिए यहां आने वाला हर शख्स इस लड्डू को यहां से खरीदकर जरूर ले जाता है। 4. इस लड्डू को बनाने के लिए भी एक खास जगह है, जहां हर शख्स के जाने की इजाजत नहीं हैं। इस लड्डू को बनाने के लिए रसोईया भी खास है। एक दिन में करीब 3 लाख लड्डू तैयार किए जाते हैं और भगवान को प्रसाद में रोज ताजे लड्डू ही चढ़ाए जाते हैं।

5. यहां मिलने वाले लड्डू का जो स्वाद है हो आपको दुनिया में कही भी नहीं मिलेगा।

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

31/03/2020

इतनी मेहरबानी मेरे ईश्‍वर बनाये रखना, जो रास्ता सही हो उसी पर चलाये रखना।
ना दुखे दिल किसी का मेरे शब्दो से, इतना रहम तू मेरे भगवान मुझपे बनाये रखना!!

🙏सुप्रभात Good Morning 🌸आपका दिन शुभ हो🌸

18/03/2020

*बदला लेने की नहीं,*
*बदलाव लाने की,सोच रखिये!*

*दो पल के गुस्से से*
*प्यार भरा रिश्ता बिखर जाता हैं!*

*होश जब तक आता हैं*
*तब तक वक्त निकल जाता है*

🌻🌸 *ll सुप्रभात ll 🌸🌻*.

23/10/2019

*💚सुप्रभात संदेश💚*

*संगत मे शुद्ध विचार और•••*
*पंगत मे शुद्ध आहार न हो तो,*
*छोड़़ देने मे ही बुद्धिमानी है।*
🌱🌻🌱🌻🌱🌻🌱🌻🌱🌻

*🙇👏सुप्रभात मित्रों 🌞Good Morning

28/09/2019

शनि अमावस्या,शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय
कहा जाता है कि इस दिन कुंडली में शनि देव से जुड़े जितने भी दुष्प्रभाव होते हैं वो इस दिन उनकी पूजा पाठ करने से दूर होते हैं. ऐसे अगर आप भी इस शनि अमावस्या शनिदेव की कृपा पाना चाहते हैं तो अपनाएं ये उपाय.

शनि अमावस्या, शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय
प्रतीकात्मक फोटो
अमावस्या की तिथि शनिवार को पड़ रही है. जिसे धार्मिक दृष्टि से बेहद शुभ माना जा रहा है. शनिवार के दिन अमावस्या पड़ने को शनैश्चरी अमावस्या के नाम से पहचाना जाता है. बता दें, इस बार शनैश्चरी अमावस्या पड़ रही है. यह दिन शनि देव की उपासना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. कहा जाता है कि इस दिन कुंडली में शनि देव से जुड़े जितने भी दुष्प्रभाव होते हैं वो इस दिन उनकी पूजा पाठ करने से दूर होते हैं. ऐसे में अगर आप भी इस शनि अमावस्या शनिदेव की कृपा पाना चाहते हैं तो अपनाएं ये उपाय.

शनि अमावस्या के दिन ऐसे करें पूजा-

सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करें. इसके बाद घर या मंदिर में जाकर शनिदेव की पूजा करें. अगर आप भी इस मान्यता को मानते हैं कि घर में शनि देव की मूर्ति नहीं रखनी चाहिए तो सच्चे मन से शनि देव का ध्यान करें. याद रखें शऩि देव की पूजा करते समय हमेशा सरसों के तेल का दीया जलाएं. शनिदेव को नीले फूल अर्पित करने से भी वो शीध्र प्रसन्न होते हैं.

शनि अमावस्या पर करें इन मंत्रों का जप-

शनि के मंत्रों का जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें. शनि देव को प्रसन्न् करने के लिए उनके बीज मंत्र का जप करें. उनका मंत्र है- ओम प्रां प्रीं प्रौं शः शनैश्चराय नमः’

शनि अमावस्या के दिन इन चीजों का दान करने से मिलता है लाभ-

-शनि अमावस्या के दिन काली उड़द काले जूते, काले वस्‍त्र, काली सरसों का दान करें.

-800 ग्राम तिल तथा 800 ग्राम सरसों का तेल दान करें.

- काले कपड़े, नीलम का दान करें.

-हनुमानजी को चोला चढ़ाएं. हनुमान चालीसा का अधिक से अधिक दान करें. काले कपड़े में सवा किलोग्राम काला तिल भर कर दान करें. पीपल के वृक्ष पर सात प्रकार के अनाज चढ़ाकर बांट दें.

रोजगार से जुड़ी समस्या दूर करने के लिए-

- आपके तमाम प्रयासों के बावजूद आपकी नौकरी से जुड़ी परेशानी खत्म नहीं हो पा रही हों या आपको नई नौकरी नहीं मिल रही हो तो करें ये उपाय.

- शनि अमावस्या पर पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल के नौ दीपक जलाएं.

- इसके बाद वृक्ष की 9 परिक्रमा करें और नौकरी की समस्याओं की समाप्ति की प्रार्थना करें.

धन या संपत्ति से जुड़ी समस्या-

- अगर आपके तमाम प्रयासों के बावजूद आपका धन खर्च बढ़ता ही जा रहा हो तो करें ये उपाय.

- शनि अमावस्या पर काले वस्त्र में रखकर सिक्कों का दान करें.

- इस दिन "ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः" का तीन माला जाप करें.

स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या-

- अगर आपका स्वास्थ्य नियमित रूप से खराब रहता हो, कुछ न कुछ स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या चलती ही रहती हो तो करें ये उपाय.

- शनि अमावस्या पर एक काले कपडे में काला तिल,सरसों का तेल, और कुछ सिक्के रखकर , अपने सर पर से 9 बार घुमा लें .

- इसको किसी निर्धन व्यक्ति को दान कर दें.

08/09/2019

| #राहु_केतु_किन_राशियो_और_भाव_मे_सबसे_ज्यादा_शुभ ेंगे? राहु और केतु यह दोनों छाया ग्रह है दोनो ग्रहो में कई समानताए है लेकिन राशि और भाव इस संबंध में यह दोनों बिल्कुल विपरीत है होना भी स्वाभाविक है, करण क्योंकि दोनो एक दूसरे से सातवें स्थान पर होते है।अब किस राशि और भाव मे यह दोनों शुभ ज्यादा होते है और अशुभ योग आदि बनाने पर भी उसमे कमी कर देते है उस विषय पर बात करते है।राहु मिथुन,तुला, कुम्भ राशियो में और केतु मेष,सिंह,धनु राशियो में बेहद शुभ फल देता है कारण राहु वायु तत्व का कारक है और केतु अग्नि तत्व का कारक है मतलब राहु वायु प्रधान है और केतु अग्नि प्रधान है इसी कारण राहु वायु तत्व राशियो मिथुन, तुला, कुम्भ और केतु अग्नि तत्व राशियो मेष, सिंह, धनु राशियो में शुभ फल देता क्योंकि इन राशियो में यह ग्रह अत्याधिक बलवान और शुभ होते है और जब कोई ग्रह किसी एक ही राशि मे शुभ भी हो जाये और बलवान भी तो उस ग्रह की प्रशंसा के लिए शब्द ही कम पड़ जाते है यहाँ राहु वायु तत्व है तो केतु अग्नि और अपने तत्वों की राशियो में होने पर इनको बल और शुभता मिलती है जैसे कि भूखे को खाना खाने से और प्यासे को पानी पीने से बल और पुष्टि मिलती है।इसी तरह कुंडली मे 3,,11 भाव वायु प्रधान है और 6भाव राहु के सहयोगी बुध का कालपुरुष की कुंडली मे पक्का भाव है और 5, 9, भाव अग्नि तत्व प्रधान होते है साथ ही 12वा भाव कालपुरुष कुंडली मे केतु के गुरु, गुरु-बृहस्पति का कालपुरुष की कुंडली मे पक्का घर है इस कारण इन भाव और राशियो में यह ग्रह शुभ फल देते है यदि 3, 6,11भाव मे वायु तत्व की राशिया भी हो और राहु इन्ही किसी एक वायु तत्व राशि मे 3, 3,11भाव मे से किसी भाव मे हो और केतु अग्नि तत्व राशियो 1,5,9 में से किसी एक राशि मे भी यदि 5, 9,12भाव मे अग्नि तत्व की किसी भी राशि मे बैठा हो तब बेहद शुब परिणाम देगा यदि राहु केतु ऐसी स्थिति में वर्गोत्तम हो या किसी केंद्र-त्रिकोण दोनो के स्वामी के साथ इन्ही भाव और राशियो में हो तब बहुत सर्वश्रेष्ठ राजयोग जैसे, अच्छी कामयाबी, धन, शोहरत, जल्दी सफलता आदि अन्य कई शुभ फल देते है।जिन भी जातक/जातिकाओ की कुंडली मे राहु केतु की ऐसी स्थिति होगी और दशा राहु केतु में से किसी की भी आ जाय तो जातक बहुत भाग्यशाली बन जाता क्योंकि बहुत सारी स्थितियां जातक के पक्ष में हो जाती है।इसी कारण से राहु वायु तत्व की राशि मिथुन में उच्च और केतु अग्नि तत्व की राशि धनु में उच्च हो जाता है। #उदाहरण_अनुसार:- मकर लग्न की कुंडली मे छठे भाव मे वायु तत्व की राशि मिथुन आती है और बारहवे भाव मे अग्नि तत्व की राशि धनु आती है यहाँ अब राहु छठे भाव मे हो और केतु बारहवे भाव मे हो तब बेहद शुभ फल देंगे और यदि वर्गोत्तम हो जाये या योगकारक/कारक ग्रह शुक्र/बुध से संबंध बना ले तो बहुत ही ज्यादा शुभ परिणाम मिलेंगे क्योंकि ऐसी स्थिति में ओर भी ज्यादा शुभ हो जाएंगे।। इसके अलावा लग्न और सप्तम भाव को छोड़कर राहु केतु अपनी अपनी वायु तत्व राशियो, मिथुन, तुला, कुम्भ और केतु अग्नि तत्व राशियो मेष, सिंह ,धनु में भी यदि किसी भी भाव मे हो (सप्तम और लग्न को छोड़कर) तो उन भावों के फलो के लिए शुभ और राहु केतु की दशाएं भी बहुत अच्छा फल जातक को देंगी। #नोट:- राहु केतु बहुत अशुभ योग न बना रहे हो।

Best Astrologer in Pune | Best Astrologer in Mumbai | Astrologer in Delhi 19/06/2019

🌺 *GM have a blessed day* *ahead ,God Blessed You :)* *Tkcr Be Happy Always :)*

"परिवार"का हाथ पकड़ कर चलिये; लोगों के "पैर" पकड़ने की नौबत नहीं आएगी;

परिवार के प्रति जब तक मन में"खोंट" और दिल में "पाप" है; तब तक सारे"मंत्र" और "जाप" बेकार है;।

जीवन एक यात्रा है; रो कर जीने से बहुत लम्बी लगेगी; और हंस कर जीने पर कब पूरी हो जाएगी; पता भी नहीं चलेगा;।

"ईश्वर" से शिकायत क्यों है; ईश्वर ने पेट भरने की जिम्मेदारी ली है; पेटियां भरने की नहीं;

ह्रदय कैसे चल रहा है;, यह डाक्टर बता देंगे; परन्तु ह्रदय में क्या चल रहा है; यह तो स्वयं को ही देखना है;...!!

*😊 स्वस्थ, खुश एवं व्यस्त रहो ।।😊*

🙏🏻शुभ प्रभात🙏🏻
*आपका दिन शुभ हो...*
*ऐसी मंगलभावनाओं सहित सादर
🌞 *सुप्रभात* 🌞
🌹G⭕⭕D🌹
🌹〽⭕➰N❗NG🌹
🙏 *Astro Saaraansh* 🙏

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03/03/2019

महाश‍िवरात्र‍ि पर ऐसे करें महादेव को प्रसन्न।

कहते हैं कि महाशिवरात्रि में किसी भी प्रहर अगर भोले बाबा की आराधना की जाए, तो मां पार्वती और भोले त्रिपुरारी दिल खोलकर कर भक्तों की कामनाएं पूरी करते हैं। महाशिवरात्रि पर पूरे मन से कीजिए शिव की आराधना और पूरी कीजिए अपनी हर कामना।

कहते हैं कि महाशिवरात्रि में किसी भी प्रहर अगर भोले बाबा की आराधना की जाए। तो मां पार्वती और भोले त्रिपुरारी दिल खोलकर कर भक्तों की कामनाएं पूरी करते हैं। महाशिवरात्रि पर पूरे मन से कीजिए शिव की आराधना और पूरी कीजिए अपनी हर कामना।

महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. यह भगवान शिव के पूजन का सबसे बड़ा पर्व भी है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था।

प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। विश्वास किया जाता है कि तीनों लोकों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और पिशाचों से घिरे रहते हैं. उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकार ज्वाला उनकी पहचान है।

बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं। यह दिन जीव मात्र के लिए महान उपलब्धि प्राप्त करने का दिन भी है। बताया जाता है कि जो लोग इस दिन परम सिद्धिदायक उस महान स्वरूप की उपासना करता है। वह परम भाग्यशाली होता है।

इसके बारे में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मुख से कहलवाया है। 'शिवद्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहु मोहि नहिं भावा। यान जो शिव का द्रोह करके मुझे प्राप्त करना चाहता है, वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिए श्रावण मास में शिव आराधना के साथ श्रीरामचरितमानस पाठ का बहुत महत्व होता है।

शिव की महत्ता को 'शिवसागर' में और ज्यादा विस्तृत रूप में देखा जा सकता है। शिवसागर में बताया गया है कि विविध शक्तियां, विष्णु व ब्रह्मा, जिसके कारण देवी और देवता के रूप में विराजमान हैं। जिसके कारण जगत का अस्तित्व है, जो यंत्र हैं। मंत्र हैं। ऐसे तंत्र के रूप में विराजमान भगवान शिव को नमस्कार है।

दक्षिण भारत का प्रसिद्ध ग्रन्थ 'नटराजम्‌' भगवान शिव के सम्पूर्ण आलोक को प्रस्तुत करता है। इसमें लिखा गया है कि मधुमास यानी चैत्र माह के पूर्व अर्थात् फाल्गुन मास की त्रयोदशी को प्रपूजित भगवान शिव कुछ भी देना शेष नहीं रखते हैं। इसमें बताया गया है कि 'त्रिपथगामिनी’ गंगा, जिनकी जटा में शरण और विश्राम पाती हैं। त्रिलोक- आकाश, पाताल व मृत्युलोक वासियों के त्रिकाल यानी भूत, भविष्य व वर्तमान को जिनके त्रिनेत्र त्रिगुणात्मक बनाते हैं।

जिनके तीनों नेत्रों से उत्सर्जित होने वाली तीन अग्नि जीव मात्र का शरीर पोषण करती हैं। जिनके त्रैराशिक तत्वों से जगत को त्रिरूप यानी आकार, प्रकार और विकार प्राप्त होता है। जिनका त्रिविग्रह त्रिलोक को त्रिविध रूप से नष्ट करता है। ऐसे त्रिवेद रूपी भगवान शिव मधुमास पूर्वा प्रदोषपरा त्रयोदशी तिथि को प्रसन्न हों।

महाशिवरात्रि से जुड़ी कथा।
महाशिवरात्रि के दिन शिवभक्त बड़े धूमधाम से शिव की पूजा करते हैं। भक्त मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाकर पूजन करते हैं। साथ ही लोग उपवास तथा रात को जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास तथा रात्रि जागरण करना एक विशेष कर्म की ओर इशारा करता है। यह माना जाता है कि इस दिन शिव का विवाह हुआ था, इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है।

वास्तव में शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की याद दिलाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है।

शिवरात्रि पर सच्चा उपवास यही है। कि हम परमात्मा शिव से बुद्ध‍ि योग लगाकर उनके समीप रहे। उपवास का अर्थ ही है समीप रहना. जागरण का सच्चा अर्थ भी काम, क्रोध आदि पांच विकारों के वशीभूत होकर अज्ञान रूपी कुम्भकरण की निद्रा में सो जाने से स्वयं को सदा बचाए रखना है।

शिवरात्रि के पर्व पर जागरण का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा है। कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का उपाय बताया।

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है. परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया है। शिव का अर्थ है कल्याण. शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है।

ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं, जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। अब मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। जिससे कष्टों का सामना करना पड़ता है। चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। इसलिए चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है।

एक कथा यह भी बताती है कि महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है। इसलिए प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव अराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं। शिव आदि-अनादि है। सृष्टि के विनाश और पुन:स्थापन के बीच की कड़ी हैं। ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है।

कैसे करें महाशिवरात्रि में पूजा।
हम आपको बताते हैं कि इस दिन शिव की पूजा किस तरह से की जाती है। सबसे पहले मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ायें. हां एक उपाय और बताता हूं, अगर घर के आस-पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर भी उसे पूजा जा सकता है।

माना जाता है कि इस दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए। रात्रि को जागरण कर शिवपुराण का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है। इसके बाद अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

माना जाता है कि यह दिन भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इस व्रत को करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति आपके मन में दया भाव उपजता है. महाशिवरात्रि को दिन-रात पूजा का विधान है। चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर बेलपत्र चढ़ाने से शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है। साथ ही चार पहर रात्रि में वेदमंत्र संहिता, रुद्राष्टा ध्यायी पाठ ब्राह्मणों के मुख से सुनना चाहिए।

सूर्योदय से पहले ही उत्तर-पूर्व में पूजन-आरती की तैयारी कर लेनी चाहिए. सूर्योदय के समय पुष्पांजलि और स्तुति कीर्तन के साथ महाशिव रात्रि का पूजन संपन्न होता है। उसके बाद दिन में ब्रह्मभोज भंडारा के द्वारा प्रसाद वितरण कर व्रत संपन्न होता है।

शास्त्रों के अनुसार, शिव को महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी व समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं. शिव का एक अर्थ कल्याणकारी भी है। शिव की अराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है। इसीलिए, स्तुति गान कहता है- मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूं। अतः हे शिव, आप जिस रूप में भी हों उसी रूप को मेरा आपको प्रणाम।

शिव और शक्ति का सम्मिलित स्वरूप हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों का प्रदर्शक है। हमारे अधिकांश पर्व शिव-पार्वती को समर्पित हैं। शिव औघड़दानी हैं और दूसरों पर सहज कृपा करना उनका सहज स्वभाव है।

'शिव' शब्द का अर्थ है ‘कल्याण करने वाला’. शिव ही शंकर हैं। शिव के 'शं' का अर्थ है कल्याण और 'कर' का अर्थ है करने वाला। शिव, अद्वैत, कल्याण- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं। शिव ही ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा ही शिव हैं। ब्रह्मा जगत के जन्मादि के कारण हैं।

गरुड़, स्कंद, अग्नि, शिव तथा पद्म पुराणों में महाशिवरात्रि का वर्णन मिलता है। यद्यपि सर्वत्र एक ही प्रकार की कथा नहीं है। परंतु सभी कथाओं की रूपरेखा लगभग एक समान है। सभी जगह इस पर्व के महत्व को रेखांकित किया गया है। और यह बताया गया है कि इस दिन व्रत-उपवास रखकर बेलपत्र से शिव की पूजा-अर्चना की जानी चाहिए।

व्रत से क्या मिलता है फल।
हर कोई चाहता है कि वह भगवान की आराधना करे, उपवास रखे। साथ ही वह भगवान से अपनों के दुखों को दूर करने का भी वरदान मांगता है और जीवन में तरक्की की कामना करता है। हम आपको बताते हैं कि शिव की उपासना और व्रत रखने से क्या-क्या फल मिलते हैं। माना जाता है कि महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहूर्त में शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि और नौकरी में तरक्की मिलती है।

शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है। बीमारी से परेशान होने पर और प्राणों की रक्षा के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। याद रहे, महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से ही करें। मंत्र दिखने में जरूर छोटा दिखाई देता है, किन्तु प्रभाव में अत्यंत चमत्कारी है।

शिवरात्रि के दिन एक मुखी रुद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रुद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रख सकते हैं। मंत्र इस प्रकार है। ॐ नम: शिवाय।

सृष्टि से तमोगुण तक के संहारक सदाशिव की आराधना से लौकिक और परलौकिक दोनों फलों की उपलब्धता संभव है। तमोगुण की अधिकता दिन की तुलना में रात्रि में अधिक होने से भगवान शिव ने अपने लिंग के प्रादुर्भाव के लिए मध्यरात्रि को स्वीकार किया। यह रात्रि फाल्गुन कृष्ण में उनकी प्रिय तिथि चतुर्दशी में निहित है। वर्ष की तीन प्रमुख रात्रि में शिवरात्रि एक है। इस दिन व्रत करके रात्रि में पांच बार शिवजी के दर्शन-पूजन-वंदन से व्यक्ति अपने समस्त फल को सुगमता से पा सकता है।

इस पर्व का महत्व सभी पुराणों में वर्णित है। इस दिन शिवलिंग पर जल अथवा दूध की धारा लगाने से भगवान की असीम कृपा सहज ही मिलती है। इनकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है।

'जय-जय शंकर, हर-हर शंकर' का कीर्तन करना चाहिए। इस दिन सामर्थ्य के अनुसार रात्रि जागरण अवश्य करना चाहिए। शिवालय में दर्शन करना चाहिए। कोई विशेष कामना हो तो शिवजी को रात्रि में समान अंतर काल से पांच बार शिवार्चन और अभिषेक करना चाहिए। किसी भी प्रकार की धारा लगाते समय शिवपंचाक्षर मंत्र का जप करना चाहिए।

महाशिवरात्रि पर क्या करें भोजन?
भक्त इस बात का ख्याल रखें कि भगवान शंकर पर चढ़ाया गया नैवेद्य खाना निषिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि जो इस नैवेद्य को खाता है, वह नरक के दुखों का भोग करता है। इस कष्ट के निवारण के लिए शिव की मूर्ति के पास शालीग्राम की मूर्ति का रहना अनिवार्य है। यदि शिव की मूर्ति के पास शालीग्राम हो, तो नैवेद्य खाने का कोई दोष नहीं है।

व्रत के व्यंजनों में सामान्य नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग करते हैं। और लाल मिर्च की जगह काली मिर्च का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग व्रत में मूंगफली का उपयोग भी नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में आप मूंगफली को सामग्री में से हटा सकते हैं। व्रत में यदि कुछ नमकीन खाने की इच्छा हो, तो आप सिंघाड़े या कुट्टू के आटे के पकौड़े बना सकते हैं।

इस व्रत में आप आलू सिंघाड़ा, दही बड़ा भी खा सकते है। सूखे दही बड़े भी खाने में स्वादिष्ट लगते हैं। तो, जितने आपको सूखे दही बड़े खाने हों उतने दही बड़े सूखे रख लीजिए और जितने दही में डुबाने हों दही में डुबो लीजिये। इस दिन साबूदाना भी खाया जाता है। साबूदाना में कार्बोहाइड्रेट की प्रमुखता होती है। और इसमें कुछ मात्रा में कैल्शियम व विटामिन सी भी होता है। इसका उपयोग अधिकतर पापड़, खीर और खिचड़ी बनाने में होता है। व्रतधारी इसका खीर अथवा खिचड़ी बना कर उपयोग कर सकते हैं। साबूदाना दो तरह के होते हैं एक बड़े और एक सामान्य आकार के।

यदि आप बड़ा साबूदाना प्रयोग कर रहे हैं तो इसे एक घंटा भिगोने की बजाय लगभग आठ घंटे भिगोये रखें। छोटे आकार के साबूदाने आपस में हल्के से चिपके चिपके रहते हैं लेकिन बड़े साबूदाने का पकवान ज्यादा स्वादिष्ट होता है। यदि आप उपवास के लिए साबूदाने की खिचड़ी बनाते हुए उसमें नमक सा स्वाद पाना चाहते हैं।तो उसमें सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का प्रयोग करें।

09/11/2018
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