22/01/2024
प्राण प्रतिष्ठा पर समस्त भारतवर्ष को बहुत बहुत शुभकामनाएं।
अगर आपकी कुंडली में बिजनेस का योग है तो जानिए बिजनेस के भविष्य के बारे
22/01/2024
प्राण प्रतिष्ठा पर समस्त भारतवर्ष को बहुत बहुत शुभकामनाएं।
12/11/2023
असत्य पर सत्य, अत्याचार पर सदाचार, अंधकार पर प्रकाश की विजय के महापर्व दीपावली की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!
प्रभु श्री राम व माता जानकी की कृपा से यह पावन पर्व आप सभी के जीवन को सुख, समृद्धि, सौभाग्य एवं आरोग्यता के धवल प्रकाश से दीप्त करे।
घर में किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा नहीं होनी चाहिए.
#महाभारत_कालीन_दिव्य_विद्या #ज्योतिष #संकटमोचन #हनुमानजी
14/09/2023
14/09/2023
आपके पूजा और आध्यात्मिक आवश्यकताओं के लिए हम लाएं हैं सभी प्रकार की शुद्ध और सिद्ध पूजन सामग्री। आएं, अपने आध्यात्मिक साधना को और भी प्राकृतिक बनाने के लिए हमारे साथ जुड़ें।
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ज्योतिषाचार्यपंडित प्रदीप त्रिपाठी
तारा एस्ट्रोलॉजी, मुंबई, महाराष्ट्र
17/05/2016
17/05/2016
सिंहस्थ को कुंभ कहने के पीछे भी एक कारण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत कलश को पाने के लिए देवाताओं और दानवो में युद्ध हुआ। जिसमें अमृत की कुछ बूंदें धरती के चार स्थानों पर गिरीं यही चार स्थान कालांतर में कुंभ पर्व के योग्य बताए गए। इन चारों स्थानों में प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन प्रमुख है। इनमें से प्रयाग, नासिक और हरिद्वार में अर्धकुंभ का आयोजन भी किया जाता है। मगर उज्जैन में इस पर्व को सिंहस्थ के तौर पर बारह वर्षों में एक बार आयोजित किया जाता है।
स्कन्द महापुराण में सिंहस्थ का बहुत महत्वपूर्ण उल्लेख है।
पौराणिक आख्यानों से ज्ञात है कि साक्षात् शिव जी ने माता पार्वती को महाकाल वन और अवंति तीर्थ के रहस्य के बारे में बताया था। जिसमें उल्लेख किया गया था कि जब सिंह राशि में गुरू और मेष राशि में सूर्य होता है तो सिंहस्थ पर्व का योग बनता है।
साधू जो भस्म अपने शरीर पर लगाते हैं वो कोई यूँही मिट्टी या धूल नहीं है जैसा कि कम्मुनिस्ट या मुर्ख कौम प्रचारित करती है। ये भस्म मेहनत से बनायीं जाती है.... भभूत भस्म, भभूति या भभूत लम्बी प्रक्रिया के बाद तैयार होती है।
हवन कुंड में पीपल, पाखड़, रसाला, बेलपत्र, केला व गऊ के गोबर को भस्म (जलाना) करते हैं। इस भस्म की हुई सामग्री की राख को कपड़े से छानकर कच्चे दूध में इसका लड्डू बनाया जाता है। इसे सात बार अग्नि में तपाया और फिर कच्चे दूध से बुझाया जाता है। इस तरह से तैयार भस्मी को समय-समय पर लगाया जाता है। यही भस्मी नागा साधुओं का वस्त्र होता है।
यह भभूत उन्हें बहुत सारी आपदाओं से बचाती है, जैसे मच्छर या वायरल। ये कमाल का है। कोई भी गन्दगी से फैलने वाली बिमारी इनसे दूर रहती है। इसे नागा साधुओं का प्रमुख श्रृंगार कहा जाता है।