11/07/2025
आज ११ जुलाई है यानी बाबू जी की पुण्यतिथि। ११ जुलाई २०१६ को आज ही के तारीख को बाबू जी परलोकवासी हुए । जुलाई माह आरंभ होते ही उनकी स्मृतियां चित्त पर उभरने लगती हैं। स्वयं से ही संवाद होने लगता है। मन कभी विचलित होता है तो कभी अतीत को कुरेदता है।बहुत कुछ सोचने के बाद यही मन रह रह कर वर्तमान की परिस्थितियों पर चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है और कभी बाबू जी के आशीर्वाद की स्मृतियों में ले जाकर खड़ा कर देता है, तो कभी उनके दिलाए गए संकल्प और दिखाए गए मार्ग की ओर प्रेरित कर कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देने लगता है।
जब कई प्रकार के प्रश्न चित्त में उठने लगते हैं। तो ऐतरेय उपनिषद का एक अंश याद आता है कि यह आत्मा पुण्य कर्मों के लिए पिता का प्रतिनिधि होता है तथा वृद्ध होकर चल देता है। यहां से जाते ही फिर से जन्म लेता है और यही प्रक्रिया शाश्वत चलती रहती है। बाबू जी बस यह जीवन चल रहा है, बस आपकी कमी हमेशा बनी रहती है।
अंत में;
पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवता।।
रह रह कर सोचता हूं अपने ने जो यह खूबसूरत परिवार बनाया है, उसके लिए मैं हमेशा आपका आभारी रहूँगा। आपका प्यार हमारे बच्चों का मार्गदर्शन और सुरक्षा करता रहेगा।
बाबू जी की दसवीं पुण्यतिथि पर भावभीनी नमन!
01/06/2025
आज १ जून है। आज के ही दिन बाबू जी का जन्मदिन है। यदि आज बाबू जी हमारे साथ होते तो वह ८५ वर्ष के होते। हमने देखा है बाबू जी हर अच्छे बुरे समय में हमारे लिए ताकत का स्तंभ रहे । मुझमें, श्रेया और शौर्य में उनके व्यक्तित्व के कई गुण विरासत में मिले हैं उनमें से सबसे उल्लेखनीय है उनका जिद्दीपन और सीधापन, जिसमें असत्य और चालबाज़ियों के लिए कोई जगह नहीं रही। इस तरह के स्वभाव के कारण हमारे अपने जीवन में अनेक परेशानियों के अंबार आए जिसमें से कुछ तो चले गए तो कुछ आज भी जोर शोर से पीछा कर रहे हैं।
हमारा अनुभव है बाबू जी हमेशा रिश्तों और सिद्धांतों पर जीने वाले व्यक्ति रहे, जो आधुनिक दुनिया में दुर्लभ है। इसी कारण उनके पारिवारिक और पेशेवर दोनों जीवन में कई कठिन परिस्थितियाँ आई लेकिन उन्होंने सिद्धांतों से कभी भी मोल नहीं किया और न ही पैसों के पीछे भागे। सादगी, सरल और सहज जीवन उनका आधार रहा। हमेशा खुश रहिए, अपने में मस्त रहिए अच्छा या बुरा समय आता जाता है लेकिन अच्छे रिश्ते और दोस्त मुश्किल से मिलते हैं उन्हें अपना बनाने के गुण बाबू जी में था ।
बाबूजी कहा करते थे कि यह जिंदगी एक रोड के समान है। जो को भी इस दुनिया में आया है उसे इसी पर चलना है। कुछ लोगों को चलने के लिए वाहन अलग अलग हो सकते हैं तो वहीं कुछ पैदल भी। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपना रास्ता कैसे खोजते हैं और अपनी सवारी झंझावातों से बचाते हुए कैसे निकाल ले जाते हैं। यह वह रास्ता है जहां कोई हमे रास्ता खाली नहीं देता बल्कि हमे खुद ही तय करना है कि बिना नुकसान के हम अपनी राह चुन कर जीवन यात्रा पूरी करें।
आज सुबह से ही बाबू जी के साथ बीते हुए लम्हों को याद कर उनके जमाने की तमाम यादें पुनः इस मानस पटल के सामने चलचित्र की तरह चलते रहे, बस कमी महसूस करता रहा उस संघर्षों के देवता की जिन्होने ताउम्र सिखाई है जिंदगी के तमाम अपघातों से लड़ने की कला। लगता है बाबू जी विश्वसनीय हमराही की तरह आज भी हमारे साथ हैं। उनकी यादों के तमाम बेसकीमती सामानों में बाबू जी की छड़ी, बंद घड़ी, डायरी के साथ तमाम सामानों संग बहुत-सी यादों के खजाने आज भी हमारे पास हैं। इनको संजो कर हम दुनियां के उन धनी आदमी में हैं जिन्हें विरासत में मिली इन अमूल्य जायदाद पर नाज है।
बाबू जी के जन्मदिन पर उनको नमन !
14/01/2025
एक आध्यात्मिक यात्रा और महापर्व की कहानी....
माघ मकरगत रबि जब होई।
तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज किंनर नर श्रेनी।
सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।।
शास्त्रों में प्रयागराज को तीर्थ राज यानी तीर्थों का राजा कहा जाता है। कहते हैं पहला यज्ञ ब्रह्मा जी द्वारा यहीं किया गया था। आज के दिन गंगा स्नान जीवन को मोक्ष की ओर ले जाता है। यह वह पल है जब भगवान सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो गंगा जल अमृतमय हो उठता है। ऐसे में साधु-संत, तपस्वी, और गृहस्थ अपने मन, वचन और कर्म को शुद्ध करने के लिए इस पर्व पर संगम की ओर अनायास खिंचता चला आता है। जो किन्हीं कारणों से नहीं पहुंच पाते उसमें बहुतायत घर में रखे पवित्र गंगा जल से स्नान करते हैं। निहित मुहूर्त पर संगम में स्नान करना केवल परंपरा नहीं बल्कि आत्मा को ब्रह्मांड से जोड़ने की एक आध्यात्मिक यात्रा है।
आध्यात्म में कहते हैं भगवान सूर्य की छाया और संज्ञा नाम की दो पत्नियां थीं। जिसमें छाया से एक पुत्र हुए जिन्हें शनिदेव कहा गया। भगवान सूर्य और उनके पुत्र शनि के संबंध अच्छे नहीं थे और इसके पीछे का कारण यह था कि शनिदेव की माता छाया के प्रति सूर्य भगवान का व्यवहार अच्छा नहीं रहा । दरअसल, जब शनिदेव जन्म लिए तो उनका काला रंग देखकर भगवान सूर्य गुस्से से लाल पीला हो कर रह गए और बोले ऐसा मेरा पुत्र हो ही नहीं सकता और फिर शनि देव व उनकी माता छाया को अलग कर दिया। जिस घर में शनिदेव और उनकी माता छाया का निवास था, उसका नाम कुंभ था। सूर्य देव के इस व्यवहार से उनकी पत्नी छाया क्रोधित हो भगवान सूर्य को कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। पत्नी छाया के श्राप से क्रोधित हो भगवान सूर्यदेव ने छाया और शनिदेव का घर जला कर राख कर दिया।
भगवान सूर्य की अन्य पत्नी संज्ञा से जन्मे पुत्र यम ने सूर्य देव को छाया के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए यत्न करने लगे। यम ने भगवान सूर्य से निवेदन किए कि वह माता छाया और भाई शनि के प्रति अच्छा व्यवहार करें। जब सूर्य को स्वयं की गलती का अनुभूति हुआ तो वे पत्नी छाया और पुत्र शनिदेव से मिलने उनके घर पहुंचे और देखा वहां सब कुछ जलकर राख हो गया था। पिता भगवान सूर्य को देख शनिदेव प्रसन्न हो काले तिल से स्वागत किए ।शनिदेव के इस व्यवहार से भगवान सूर्य प्रसन्न हो कर एक नया घर भेंट किया जिसका नाम मकर था। सूर्य देव के आशीर्वाद से शनिदेव दो राशियां कुंभ और मकर के स्वामी बन गए।
पिता सूर्य ने पुत्र शनि को आशीर्वाद दिया कि वो जब भी उनसे मिलने उनके घर आएंगे तो उनका घर धन-धान्य से भर जाएगा। भगवान सूर्य ने कहा मकर संक्रांति के मौके पर जो भी उनको काले तिल अर्पित करेगा, उनके जीवन में खुशहाली आएगी। इसी कारण जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो महा पर्व मकर संक्रांति मनाया जाता है। मकर संक्रांति के मौके पर भगवान सूर्य की पूजा काले तिल से करने पर धन धान्य की कमी नहीं होती है।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार कपिल मुनि पर राजा सगर के पुत्रों ने देव इंद्र का घोड़ा चोरी करने का झूठा आरोप लगा दिया जिससे क्रोधित हो कपिल मुनि ने राजा सगर के ६० हजार पुत्रों को भस्म होने का श्राप दे दिया था। जब इंद्र देव ने राजा सगर के तरफ से कपिल मुनि से माफी मांगा तब जा कर उनका गुस्सा शांत हुआ और कपिल मुनि ने श्राप से छुटकारा पाने के उपाय कुछ इस तरह बताया कि इस श्राप से मुक्ति तभी मिलेगी जब मां गंगा को किसी भी तरह पृथ्वी पर लाया जाए l। राजा सगर के पोते अंशुमान और राजा भगीरथ की कठोर तपस्या के बाद पृथ्वी पर मां गंगा प्रकट हुईं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसके बाद जब राजा सगर के ६० हजार पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हुई, तब से हर साल मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है और मकर संक्रांति पर गंगा स्नान की मान्यता चली आ रही है।
दूसरी तरफ बताया जाता है कि कुंभ मेले का संबंध समुद्र मंथन से है।कहते हैं कि देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने के लिए १२ दिनों तक समुद्र मंथन किया था। तब जाकर अमृत का कलश प्राप्त हुआ था। उस अमृत कलश से कुछ बूंदें पृथ्वी पर चार पवित्र स्थान प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में गिरी थीं। यही वजह है कि सिर्फ़ इन्हीं दिव्य स्थानों में कुंभ मेला लगता है।
ज्योतिष शास्त्र की माने तो जब बृहस्पति ग्रह, वृषभ राशि में हों और इस दौरान सूर्य मकर राशि में आते हैं, तो कुंभ मेले का आयोजन प्रयागराज में होता है।
ऐसे ही जब गुरु और बृहस्पति कुंभ राशि में हों तो उस दौरान सूर्य मेष राशि में गोचर करते हैं तब कुंभ हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। इसके साथ ही जब सूर्य और बृहस्पति सिंह राशि में विराजमान हो तब महाकुंभ नासिक में आयोजित होता है। वहीं जब बृहस्पति सिंह राशि में हो और सूर्य मेष राशि में हो तो कुंभ का मेला उज्जैन में लगता है।
कहते हैं ६वी सदी में बैस क्षत्रिय कुल गौरव सम्राट हर्ष वर्धन के शासन में कुंभ मेले का आयोजन हुआ करता था। जिसमें वह अपने राजकोष को दान से खाली कर दिया करते थे। तत्कालीन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा के दौरान कुंभ मेले का ज़िक्र किया था। पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को जागृत करने के लिए संगम तट पर महादानी सम्राट हर्षवर्धन की एक विशाल प्रतिमा बनी हुई है।
दुनियां का सबसे बड़ा आध्यात्मिक मेला महाकुंभ सनातन से चली आ रही इस आध्यात्मिक महा पर्व में विश्वास रखने वाले लोगों की विरासत है। कहा जाता है कि देवताओं के बारह दिन मनुष्य के बारह सालों के समान होते हैं। यही वजह है कि प्रत्येक १२ साल बाद महाकुंभ लगता है।
इस बार इसका आयोजन १३ जनवरी से २६ फरवरी २०२५ तक उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हो रहा है। सरकारी अनुमानों के अनुसार इस बार करीब ४० करोड़ श्रद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र संगम तट पर डुबकी लगाएंगे। कहा जाता है कि इसमें एक बार स्नान करने से पापों का नाश हो मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मकर संक्रांति के पवित्र पर्व पर समस्त शुभ चिंतकों को दिली बधाई और शुभकामनाएं।
शेरू मेरे व्यावसायिक परिवार की निष्ठावान सदस्य है आज ६ वर्ष की उम्र में प्रवेश कर गई है। हम सभी उसके स्वास्थ्य जीवन और लंबी उम्र की कामना करते हैं।
01/10/2024
श्रेया , मुझे याद है कि बचपन में तुम किसी चीज को पाने के लिए जी जान लगा देती थी और फिर तुम्हे वो सब मिल जाता था जिसके लिए तुम्हे जुनून रहता था। जब भी मैं आपको समर्पण और जुनून के साथ अपने उद्देश्य के लिए संघर्ष करते देखता हूं तो मेरा दिल गर्व से भर जाता है। यही तुमको आने वाले समय में एक श्रेष्ठ नेतृत्व करने वाला बनाएगा ।
एक बेटी, एक छात्र और घर की लाडली के अलावा सबसे महत्वपूर्ण एक इंसान के रूप में तुम जो कुछ भी करती हो,उसमें तुम्हें अपना देखते हुए देखना बहुत खुशी महसूस होती है। तुम हमारे जीवन में जो खुशी लाई उसके लिए धन्यवाद। “जन्मदिन मुबारक हो, बेटी। आशा है कि तुम वह सब कुछ और भी बहुत कुछ हासिल करोगी जिसके लिए तुम सपना देखती हो।”
मेरे बाबूजी ने मुझे हमेशा अपने उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करना सिखाया, न कि अंत पर। जब तक आप अपने उद्देश्य की सवारी का आनंद ले रहे हैं जिस पर आप चल रहे हैं, तो आप अपना रास्ता खोज लेंगे।
मुंबई आने पर मेरे पास बहुत कुछ नहीं था, लेकिन मेरे पास एक चीज थी – मेरे अम्मा और बाबू जी के साथ मेरी बहनों का विश्वास, प्यार और आशीर्वाद।
अंत में, जन्मदिन की दिली बधाई एवं अनन्त शुभकामनाए बेटा , आप पूर्णायु , दीर्घायु , चिरायु हो , सदा स्वस्थ्य रहते हुए ,आप शतायु हो ,यही महादेव जी से प्रार्थना है ।
11/07/2024
कहा गया है जीवन मिलना भाग्य पर निर्भर है और मृत्यु का आना काल पर निर्भर है लेकिन मृत्यु के बाद अपनों के यादों में रहना कर्मों पर निर्भर है।
बाबू जी के साथ बिताए यादें, उनके दिए संस्कार, उसूल और सीख मेरे जीवन यात्रा में सदैव मार्गदर्शन देते आ रहे हैं। देखा जाए रोज दिन की शुरुवात उनसे बातचीत के बाद ही शुरू होती है, खूब बाते होती है। हमेशा बाबू जी एक अदृश्य छाया के रूप में हमारे साथ रहते हैं। बाबू जी का परिवार उनकी दी हुई शिक्षा रूपी विरासत को आगे बढ़ाने का पूरा प्रयास करते आ रहे हैं।
आज मेरे बाबू जी की नवीं पुण्यतिथि है, उनकी आत्मा की शान्ति के लिए हम सपरिवार भगवान से प्रार्थना करते हैं, बाबूजी आप हमेशा याद आते हैं..... बाबू जी को नमन !
21/06/2024
एक वो भी थी संस्कृति .....
अब गॉव में भी पत्तल, पॉत , भात , टाट, आदि वैवाहिक आयोजनों की जरुरत में नहीं रहे। पूर्वजों ने समय और जरूरतों का ध्यान रख कर सदियों पहले गांव में तमाम प्रजा को आश्रय दिया था। इसी क्रम में गांव के एक कोने में मुसहर बस्ती भी बसायी थी। जिसे गुतवन का मुसरहान कहते थे । आज से करीब तीस पैंतीस साल पहले और मेरे बचपन के समय डंगरा मुसहिन मुसरहाने की सबसे महत्वपूर्ण शक्स हुआ करती थी। कुल्हड़ जिसे हम गंवई में पूरवा कहते हैं उस पूरवा और कसोरा आदि का जिम्मा गांव के कोहांर संभालते तो पत्तल डंगरा मुसहीन।
ज्यादातर गॉव की शादियॉ गर्मियों में चैती के बाद होतीं। स्कूल की छुट्टियों में प्रायमरी और जूनियर हाईस्कूल के हेड मास्टर से टाट का जुगाड हो जाता। भात बनाने के लिए ईट के जोड़ और मिट्टी की मदद से या जमीन में गड्ढे खोद कर चूल्हा बनाया जाता और फिर बनाने के लिए गांव के पाक कला प्रेमी जिसमे टांडी पर के ब्राह्मण खुद ही जुट जाते, बाकी सब सामग्री टुन्नी, मोती या मूसे या दयाराम साव के यहां मिल जाते । रोशनी के लिए पुरषोत्तम कहार का उल्टे कर टॉगने वाला पेट्रोमैक्स। मनोरंजन के लिए गांव के ही बब्बू या अनेई की भॉड मंडली या फिर चांदा या जौनपुर की रण्डी की महफिल और मुजरा , क्या कहने। दूर दूर तक भीड़ जुटती थी।
डेरा, तंबू, चनवा लगाने को कुछ खूंटे और लकडी वाली चौकी जिसमे खूंटे जमुना लोहार गढ देते तो चौकी, खटिया, तोसक और तकिया सबके दुआर से मंगनी आ जाती । साधन संपन्न परिवार में गर्मियों को देखते बरफ की सिल्ली मड़ियाहूं या जौनपुर से मंगानी पडती। सिल्ली जूट के बोरी में लपेट कर भूसे में सुरक्षित की जाती परंतु लाख सफाई के बाद भी भूसे की एक दो पत्तियॉ कुल्हड में आ ही जातीं। प्रगतिशीलता पर कोई प्रभाव नहीं। हॉ, केवडा जल डालते ही कूए के जल का स्वाद अद्भुत बन पडता।
खैर, पत्तल का इंतजाम सबसे महत्व का था जिसमे डंगरा मुसहिन के यहॉ से उनके परिवार के लोगों को बुलाना और जब तक खाना पीना पूरा न हो तब तक दोना पत्तल की व्यवस्था के साथ भोजन के स्थान और घर की चौकीदारी विशेषतर कुत्तों को भोजन के स्थान से दूर बैठाना । भोजन के लिए घर रिश्तेदारों के साथ ही बिरादरी और प्रजा को जोड़ने पर लोग सबसे पहले दो चीजों का खर्चा बरुआ ,भत्तवान, हल्दी और मंटमंगरा से ही शुरू हो जाता जो पत्तल का खर्चा, क्या हाथ की कारीगरी होती थी पत्तलों और दोने बनाने की। जंगलों से तोड लाए पलाश के पत्तों में सीकें गुह कर ऐसा नढ दें कि भात में दाल और रसेदार भी परोस गया तो कण भी बह कर बाहर नहीं। पत्तलों के आपूर्तिकर्ता के लिए न कोई टेंडर और न ही नियम व शर्तें पर, मॉग व आपूर्ति में फर्क नहीं और न ही गुणवत्ता में। पत्तल के भुगतान में कई मन अनाज मुसहीन को मिल जाता ।
क्या है कि अब के प्रमोद सिंह टेंट वाले या रामदयालगंज या अन्य कोई कैटरिंग हो या सत्य नरायण हलवाई या बाकी के कैटरर्स हों,तब की तीन चार शादियों के खर्चे तो इनके फूल माला की सजावट में ही समा जाते हैं। सजा दिया प्लेटें, कोई इस काउंटर भाग रहा तो कोई उस। मॉड पसाकर मारकीन की चादर पर फैलाकर ठंडा किए भात या फिर हंडे में पकाए दाल का वह स्वाद कहॉ। ले पनीर, ले पनीर, पर जयनाथ चौबे जी के हाथ की बनी वह लुटपुटार तरकारी कहॉ?
रासायनिक भोजन का रस जो घुटनों को ही अंदर दबोच दे रहा। सो, पालथी मार टाट के ठाट को बेकार किए जा रहा है। गांव के भोजन प्रेमी जब टाट पर पालथी मार लें तो परोसने वालों की तबियत तर कर देते। किसी की सत्तर अस्सी पूडी की खुराक थी उनकी तो कोई तरकारी का दस बीस कसोरा तो वैसे ही गटक जाएं। गरम मसाले की छौंक से नाक का पानी बाहर न आए, एक हाथ लगातार गमछे पर। रायता, चटनी और कई दहेडी साफ हो जाती उन भोजन प्रेमियों को खिलाने में। बुक्का भर भर चीनी, ऊपर से बुनिया और फिर तसमई, उगर शुगर उनके दुश्मन को भाए, न घुटने की फिकर और न ही तोंद की। डकार लिया और सब खाया हजम। घंटे आधे घंटे बाद भी कोई पूछ ले तो दस बीस पूडी के लिए नहीं, नहीं बोल सकते। मूछ प्रेमियों की मूंछें नीचे हो रहीं, ऊपर हो रहीं, रसेदार का रसा मूंछों को भींगो रहा, कुर्ते की बॉह चढा सफा करते जा रहे हैं और परई खाली की खाली।
अभी भी गांवों में इस तरह के लोग भी हैं और उनकी संस्कृति भी पर मुंह बिचका लेते हैं गॉव में बुफे देखकर......
01/06/2024
आज १ जून है। आज के ही दिन बाबू जी का इस भौतिक दुनियां में आगमन हुआ था। यदि आज वह हमारे साथ होते तो उनकी उम्र ८४ वर्ष होती। वे संयुक्त परिवार में पले बढे थे। गांव की दुनियां से ही वह शहरी दुनियां में अपना कर्मभूमि बनाए और यहां पर संघर्ष भरे माहौल में ही हम सबका पालन पोषण किए। बाबू जी बड़े जिद्दी और जीवंत थे, धार्मिक, मार्मिक और सामयिक किस्से कहानियां खूब सुनते थे। वह कर्म पर विश्वास करते थे, कभी भी पैसे के लिए नहीं भटके । घर के अलावा उनके साथियों में भी उनका निर्णय ही अंतिम होता था। वह खाने खिलाने के बहुत शौकीन थे।
हमारे और बाबू जी के बीच एकाएक समय ने करवट बदला,मैने कभी सोचा नहीं था मुझे भी मायानगरी मुंबई आना पड़ेगा। सन ९० की दशक में एकाएक तब के बंबई और आज का मुंबई ने अपने चुंबकीय आकर्षण से न चाहते हुए मुझे यहां खींचा और आज हम एकल परिवार की तीसरी पीढ़ी से मुंबई में रमे हुए हैं।
बाबू जी की तरह मैं भी यहां अस्तता और व्यस्तता में खूब फला फूला लेकिन संजोग बस हमारी स्थिति में बहुत कुछ सुधार हुआ। हमने जिंदगी में तमाम उतार चढ़ाव देखे, एक निश्छल साथी की तरह बाबू जी हमेशा कहा करते थे कि मेरे पास देने के लिए कुछ नही है परंतु केवल सपने ही हैं कि तुम आगे बढ़ो, असफलता में भी सफलता की सीढी बनाओ, बड़ा सोचो और जहां तक हो सके लोगो के मददगार बनो।
प्रारंभिक समय मुझे जब कभी निराशा घेरती थी बाबू जी कहा करते थे परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हो एक ना एक दिन सवेरा होगा, समय बदलेंगा और अच्छे और बुरे दोनों समय को भी किसी दूसरे कालखंड, किसी दूसरे देश जाना पड़ेगा। निराश मत होना हिम्मत से डटे रहना, सफलता तुम्हारे साथ होगी।
बाबू जी के जाने के बाद और करोना महामारी के बाद एक समय हमारे जीवन में ऐसा आया कि मैं अकेला महसूस करने लगा, व्यवसाय में उम्मीदों ने एक ऐसे मुहाने पर लाया जहां बहुत कुछ हारा। ऐसा लगा अब मुझे मुंबई से दूर जाने का समय आ गया, अब मुझे किसी छोटे शहर में आशियाना बनाने के लिए झांकना पड़ेगा। बाबू जी जैसा मार्गदर्शन देने वाला नही मिला, ऐसे में एक समय ऐसा आया जब मैं बाबू जी के उन संघर्ष को सोच कर, उनकी बातों को याद कर मैं लगातार उनको अपने अंदर महसूस करता रहा। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है और फिर यह सोचकर आगे बढ़ा कि परेशानियाँ ज़िन्दगी का अहम हिस्सा हैं अगर परेशानियाँ नहीं होंगी तो हमे हमारी क्षमता का एहसास कैसे होगा।
कहते हैं ईश्वर हर किसी को उसकी क्षमता के अनुसार परिस्थितियाँ देता है। इसलिये जो परिस्थितियों हमे मिली है उसको स्वीकार करते हुए हैं आगे बढ़े, सच में यही जीवन है और फिर मैं उठकर दुबारा से खड़ा होना शुरू किया। हालात और परिस्थिती देख मुझे समझ आ गया कुछ चीजें समय पे छोड़ देनी चाहिये उनसे बहुत माथापच्ची नहीं करनी चाहिये। शायद समय हमसे ज़्यादा अच्छे तरीक़े से परिस्थितियों को डील करता है क्योंकि अन्तिम निर्णय तो उसको ही लेना है।
तमाम उतार चढ़ाव के बावजूद आज सब कुछ ठीक चल रहा है, बाबू जी की भौतिक रूप से उपस्थिति का न होना कभी कभी परेशान करता है लेकिन वह अपनी सीखों, संघर्ष और जीवटता के सपनों के रूप में हमेशा हममें ज़िन्दा रहेंगे। ईश्वर हर किसी को कठिन से कठिन हालातों में जीने का जज़्बा दे परंतु ईश्वर उस तरह के दिन किसी को न दिखाये जिस दौर से हम गुज़रें हैं और यदि दिखाये तो उसको सहन करने की शक्ति दे।
आज बाबू जी का जन्मदिन है। हम लोगों के लिए आज एक विशेष दिन है। हम सभी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, वह जहां भी हों सुखी, खुशहाल और स्वस्थ रहें। उनका आशीर्वाद हमारे साथ रहे। और उनकी अदृश्य शक्ति सदैव हमारे साथ रहे।
बाबू जी को उनके जन्मदिन पर उनके साथ बिताए सभी यादें सदैव हमारे साथ हैं।
पुण्य दिवस पर बाबू जी को नमन !
26/01/2024
शिक्षा को अपने साथ ले जाना बहुत आसान चीज़ है बस कड़ी मेहनत और लगन होनी चाहिए। एक मजबूत और खुशहाल भविष्य की यात्रा जहां सन २०२२ : २३ की एसएससी परीक्षा में बेटी श्रेया के स्कूल में उसके द्वारा प्राप्त अच्छे अंकों के लिए ७५वी गणतंत्र दिवस को पुरस्कृत किया गया, गर्व हुआ, देख कर अच्छा लगा !
02/06/2023
बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए तमाम तरीके होते हैं । इन्ही में इस साल की बोर्ड की परीक्षा में ९०.६० प्रतिशत की संख्या से उत्तीर्ण होने पर मेरी बिजनेस पार्टनर निधि श्रीवास्तव जी ने टेस्टी और खूबसूरत चॉकलेट केक घर पर भिजवा कर श्रेया को प्रोत्साहित की तो वही श्रेया के भाई श्याम सुन्दर भी इस मौके पर घर पर आ कर आउटिंग पार्टी के लिए जंबोकिंग के बर्गर के अलावा कई अन्य रेस्टोरेंट से खाद्य और पेय के साथ अपनी खुशी का इजहार किए।
02/06/2023
बोर्ड परीक्षा और श्रेया
आज महाराष्ट्र शिक्षा बोर्ड की सीनियर सेकेंडरी स्कूल की परीक्षा का परिणाम आने का दिन निश्चित था। श्रेया को करीब ९५ प्रतिशत परिणाम पाने की अभिलाषा थी। आज दोपहर जैसे ही एक बजे ऑनलाइन परीक्षा परिणाम घोषित हुआ, श्रेया ने बोर्ड के साइट पर ९०.६०% परिणाम देख घर में उछाल कूद के साथ ही सबके पैर छूने लगी। कड़ी मेहनत के बाद इतने समय बाद परिणाम देख आज उसके सुख का ठिकाना नहीं था। मेरा मानना है, जो अच्छा है वह निश्चय ही सुख है। सुख को समझने का सही तरीका है, जो भी है जैसा भी है खुश रहो।
वास्तव में जब हम खुश होते हैं तो हम बेहतर प्रदर्शन करते हैं। साथ ही आगे के जीवन की जो भी महत्वकांक्षा हैं उसमें बेहतर प्रदर्शन करने के लिए लग जाने का घंटी बजना होता है। आज और अब से बेहतर कोई समय नहीं है। सही समय पर आगे के लिए अभ्यास अभी से शुरू कर दो, वास्तव में यह कारगर है।
इस खुशी को साझा करने के लिए श्रेया के भाई व भाभी विशाल वर्षा और बहन शिवानी ने पेटिस, पनीर रोल और केक का ऑर्डर कर उसे प्रोत्साहित किया। श्रेया के खुशी की इस यात्रा और उसके इस परिणाम के लिए उसे बधाई !