भाग्य क्या निश्चितता नहीं दे सकता है ?
भाग्य, जिसे हम आमतौर पर किस्मत या संयोग कहते हैं, अक्सर जीवन के अनिश्चित और अप्रत्याशित पहलुओं से जुड़ा होता है। यह वह तत्व है जिसे हम नियंत्रित नहीं कर सकते, और इसे हमारे प्रयासों, निर्णयों, और कामों से अलग मानते हैं। कई लोग यह मानते हैं कि अगर किसी का भाग्य अच्छा है, तो उसे बिना मेहनत के भी सफलता मिल सकती है। लेकिन यह धारणा पूर्ण रूप से सही नहीं है। भाग्य के होते हुए भी, कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्हें यह कभी गारंटी नहीं कर सकता, और उनमें से सबसे महत्वपूर्ण है सफलता और उपलब्धि बिना मेहनत और प्रयास के।
1. सफलता का रास्ता केवल भाग्य से नहीं तय होता
भाग्य की भूमिका जीवन में अवश्य होती है, लेकिन यह एकमात्र घटक नहीं है। सफलता प्राप्त करने के लिए कई कारकों की आवश्यकता होती है, जिनमें मेहनत, योजना, अनुशासन, और दृढ़ संकल्प शामिल हैं। भाग्य आपको अवसर प्रदान कर सकता है, लेकिन यदि आप उन अवसरों का लाभ उठाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो वे व्यर्थ हो जाएंगे। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को एक महत्वपूर्ण काम का प्रस्ताव मिलता है, लेकिन वह इसके लिए कौशल, ज्ञान या मेहनत करने की क्षमता नहीं रखता, तो वह अवसर उसे आगे नहीं बढ़ा पाएगा। भाग्य केवल एक द्वार खोल सकता है, लेकिन उस द्वार से सफलतापूर्वक गुजरने के लिए प्रयास की आवश्यकता होती है।
2. मेहनत और तैयारी का अभाव
भाग्य यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि किसी व्यक्ति को बिना मेहनत के कुछ प्राप्त हो जाएगा। किसी भी क्षेत्र में, चाहे वह शिक्षा हो, व्यवसाय हो, खेल हो या कला, सफलता प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास, सीखना, और विकास की आवश्यकता होती है। यदि आप कठिन परिश्रम नहीं करते हैं, तो भाग्य की कितनी भी कृपा हो, आप दीर्घकालिक सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, एक छात्र जिसे परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने की उम्मीद है, वह केवल भाग्य पर निर्भर नहीं रह सकता। उसे पढ़ाई करनी होगी, अपनी कमजोरियों को सुधारना होगा और पूरी तैयारी के साथ परीक्षा में बैठना होगा। यदि वह केवल भाग्य पर निर्भर करता है, तो उसके सफल होने की संभावना बेहद कम हो जाएगी।
3. नैतिकता और चरित्र का निर्माण
भाग्य किसी व्यक्ति के नैतिक मूल्यों, आचरण, और चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता। अच्छे और नैतिक गुणों का विकास केवल सही आचरण, आत्म-नियंत्रण, और जिम्मेदारी के प्रति सजगता से होता है। भाग्य आपको बाहरी सफलताएँ प्रदान कर सकता है, जैसे धन, प्रसिद्धि या सामाजिक स्थिति, लेकिन आपका चरित्र केवल आपके कर्मों और आपके निर्णयों से आकार लेता है। अगर कोई व्यक्ति केवल भाग्य पर निर्भर रहते हुए अपने जीवन को दिशा देने की कोशिश करता है, तो वह आंतरिक रूप से कमजोर रह जाएगा।
4. स्वयं की पहचान और संतोष
भाग्य यह गारंटी नहीं दे सकता कि आप अपने जीवन में सच्चा संतोष और आत्म-समाधान प्राप्त करेंगे। संतोष और आत्म-संतुलन केवल तभी प्राप्त होते हैं जब आप अपने जीवन के हर पहलू में समर्पण, ईमानदारी और मेहनत का योगदान करते हैं। एक व्यक्ति जो केवल भाग्य पर निर्भर रहता है, उसे यह आंतरिक शांति प्राप्त नहीं हो सकती क्योंकि उसकी उपलब्धियाँ उसकी स्वयं की कोशिशों का परिणाम नहीं होतीं।
5. परिवर्तनशीलता और अस्थिरता
भाग्य का एक और पहलू इसकी अनिश्चितता और अस्थिरता है। भाग्य किसी को लंबे समय तक किसी एक स्थिति में नहीं रख सकता। किसी व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और यह निर्भर करता है कि वह इन चुनौतियों का सामना कैसे करता है। केवल भाग्य पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि जब भाग्य का साथ छूट जाता है, तो व्यक्ति अस्थिर महसूस कर सकता है। इसका मतलब यह है कि आपको हमेशा अपने कर्मों और प्रयासों के बल पर खड़ा होना चाहिए, न कि भाग्य की अस्थिरता पर।
अंततः, भाग्य की एक सीमित भूमिका होती है, और यह गारंटी नहीं दे सकता कि मेहनत और प्रयास के बिना सफलता मिलेगी। यह हमें अवसर प्रदान कर सकता है, लेकिन उन अवसरों का लाभ उठाने के लिए हमें पूरी तैयारी और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा। भाग्य की अस्थिरता के कारण, हमें हमेशा अपने कर्मों पर विश्वास रखना चाहिए, ताकि जीवन की चुनौतियों का सामना किया जा सके।
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ॐ शिवगोरक्ष योगी आदेश
|| बुराई सुनने से बचें ||
जो लोग आपके सामने दूसरों की बुराई करते हैं, निश्चित ही वो लोग दूसरों से आपकी बुराई भी करते होंगे। बुरा करना ही गलत नहीं है अपितु बुरा सुनना भी गलत है। किसी की बुराई सुनने से हमारे स्वयं के विचार भी दूषित हो जाते हैं। विचारों का प्रदूषण विज्ञान से नहीं अपितु स्वयं के अन्तः ज्ञान से ही मिटाया जा सकता है। विचारों का प्रदूषण फैलने का कारण हमारी वो आदतें हैं जिन्हें किसी की बुराई सुनने में रस आने लगता है।
बुराई को सुनना, बुराई को चुनना जैसा ही है क्योंकि जब हम बुराई सुनना पसंद करते हैं तो बुराई का प्रवेश हमारे जीवन में स्वतः होने लगता है। जो हम रोज सुनते हैं, देखते हैं, वही हम होने भी लग जाते हैं। उन लोगों से अवश्य ही सावधान रहने की आवश्यकता है, जो सदैव दूसरों की बुराई का बखान करते रहते हैं। दूसरों की बुराई सुनने की अपेक्षा स्वयं के जीवन से बुराई को मिटाने के लिए प्रयासरत रहें।
*कालाष्टमी 2024: नवंबर महीने में कब है कालाष्टमी? नोट करें सही दिनाँक एवं शुभ मुहूर्त*
*हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव देव की पूजा की जाती है। साथ ही मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए व्रत रखा जाता है। इस व्रत को करने से साधक को विशेष कार्य में सफलता और सिद्धि मिलती है।
*तंत्र विद्या सीखने वाले साधक कालाष्टमी पर काल भैरव देव की कठिन उपासना करते हैं। धार्मिक मत है कि काल भैरव देव की पूजा-उपासना करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। साथ ही सभी प्रकार के दुख और संकट हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं। अतः साधक भक्ति भाव से काल भैरव देव की पूजा-भक्ति करते हैं। आइए, मार्गशीर्ष माह की कालाष्टमी की तिथि एवं शुभ मुहूर्त जानते हैं-
*कालाष्टमी शुभ मुहूर्त*
वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 22 नवंबर को संध्याकाल 06 बजकर 07 मिनट पर शुरू होगी। इस तिथि का समापन 23 नवंबर को संध्याकाल 07 बजकर 56 मिनट पर होगा। काल भैरव देव की पूजा निशा काल में होती है। अतः 22 नवंबर को कालाष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन मासिक कृष्ण जन्माष्टमी भी मनाई जाएगी।
*कालाष्टमी शुभ योग*
भाद्रपद माह की कालाष्टमी पर ब्रह्म योग का निर्माण हो रहा है। इस योग का संयोग सुबह 11 बजकर 34 मिनट तक है। इसके बाद इंद्र योग का निर्माण हो रहा है। इसके अलावा, रवि योग का भी निर्माण हो रहा है। इन योग में भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव देव की पूजा करने से साधक को सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलेगी। इसके साथ ही सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। इस दिन कई अन्य मंगलकारी योग भी बन रहे हैं।
*पंचांग*
*सूर्योदय-* सुबह 05 बजकर 50 मिनट पर
*सूर्यास्त-* शाम 05 बजकर 25 मिनट पर
*चंद्रोदय-* रात 11 बजकर 41 मिनट पर
*चंद्रास्त-* दिन 12 बजकर 35 मिनट पर
*ब्रह्म मुहूर्त-* सुबह 05 बजकर 02 मिनट से 05 बजकर 56 मिनट तक
*विजय मुहूर्त-* दोपहर 01 बजकर 53 मिनट से 02 बजकर 35 मिनट तक
*गोधूलि मुहूर्त-* शाम 05 बजकर 22 मिनट से 05 बजकर 49 मिनट तक
*निशिता मुहूर्त-* रात्रि 11 बजकर 41 मिनट से 12 बजकर 34 मिनट तक
*ॐ शिवगोरक्ष योगी आदेश*
*मित्रो चौरासी लाख योनियों में परमात्मा ने सर्वश्रेष्ठ योनि मानव की बनाई मनुष्य को ईश्वर के द्वारा असीमित शक्तियां प्रदान की गई हैं और इन सभी शक्तियों में सबसे महत्वपूर्ण है,मनुष्य की वाक् शक्ति अर्थात वाणी की शक्ति मानव जीवन में वाणी का बहुत महत्व है इसे व्यक्तित्व का आभूषण कहा गया है,वाणी से जहां मनुष्य के व्यक्तित्व का परिचय मिल जाता है वही यह मनोभावों को अभिव्यक्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है,परंतु महत्वपूर्ण यह है कि हम अपनी वाणी का उपयोग किस प्रकार से करते हैं क्योंकि वाणी एक दुधारी तलवार की तरह होती है जिसके माध्यम से किसी को भी अपना मित्र या शत्रु बनाया जा सकता है,इस संसार में जितने भी मनुष्य है सभी अपनी वाणी का प्रयोग करते हैं परंतु कहां क्या और कितना बोलना चाहिए यह कला बहुत कम व्यक्तियों में देखने को मिलती है,हमारे मनीषियों ने शब्द को शिव और वाणी को शक्ति कहा है इनकी समझ व सदुपयोग एक तरह से व्यक्ति को अमृततत्व का अधिकारी बना देता है,एवं व्यक्तित्व की आध्यात्मिक संपदा से परिचय करवा देता है,कुल मिलाकर यह मान लिया जाय कि यही वाणी की शक्ति अपने अलौकिक स्वरूप से साधक के जीवन को कृतार्थ कर देती है,इस तरह शब्द मात्र कंठ और जिह्वा का उच्चारण भर नहीं बल्कि इसमें अजस्र शक्ति का भंडार भरा पड़ा है जिसका उच्चारण स्वयं को तथा दूसरों को प्रभावित करता है !*
कोई भी अच्छा परिवर्तन क्रोध
या ताकत से नहीं आता,
क्योंकि बोए कंकड़ और खिलें
फूल, ऐसा संभव नहीं है..।
इसलिये चाहे स्वयं को अच्छा
बनना हो या किसी और को,
"प्रेम" और "स्नेह" ही
एकमात्र विधि या उपाय है।
सम्पूर्ण कुंभो न करोति शब्दं ,अर्द्धोघटो घोषमुपैति नूनम्।
विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वं गुणैर्विहीना बहु जल्पयंति॥
जिस प्रकार आधा भरा हुआ घड़ा अधिक आवाज करता है,परन्तु पूरा भरा हुआ घड़ा जरा भी आवाज नहीं करता,उसी प्रकार विद्वान् अपनी विद्वत्ता पर घमण्ड नहीं करते,जबकि गुणविहीन लोग अपनी भाषा वर्तन स्वभाव व व्यवहार से स्वयं को गुणी सिद्ध करने में लगे रहते हैं,लेकिन पता नही की समाज मे उनकी कोई इज्जत नही रहती व उसे कोई सम्मान नही देता,अतः मनुष्य को अपनी कमियों को देखना होगा दुसरो के दोषों व कमियों को नही,
आध्यात्मिक संदेश
मित्रो आज के आधुनिक युग में मनुष्य को अधिक विकसित एवं समर्थ करने का प्रयास बहुत ही तेजी से चल रहा है,एक तरफ जहां विज्ञान के रूप में मनुष्य को ऐसा हथियार मिल गया है जिसके बल पर वह दूरगामी लक्ष्य को भी आसानी से शीघ्रता के साथ निशाना बना रहा है,जहां पहले मनुष्य के पास साधन का अभाव था पढ़ने लिखने की सुविधाएं सीमित थीं,सारा जीवन प्रयत्न करने पर भी कोई व्यक्ति किसी एक क्षेत्र में ही पहुंच पाता था वहींं आज स्थिति अलग है,थोड़ी सी सूझबूझ और थोड़ा सा पैसा मिलाकर व्यक्ति थोड़े से समय में ही चाहे तो अपने विचार और अपने निष्कर्ष हजारों लाखों नहीं करोड़ों तक पहुंचा सकता है,आज लाखों की संख्या में धर्मग्रंथ छप रहे हैं और हाथों हाथ बिक भी जा रहे हैं लोग उनका स्वाध्याय भी कर रहे हैं परंतु इतना सब होने के बाद भी पहले की अपेक्षा मनुष्य की आंतरिक चेतना में गिरावट आई है,क्योंकि पहले के लोग जहां धर्मग्रंथों की बात पढ़कर या सुनकर उन्हें आचरण में लाने का प्रयास करते थे,वहीं आज के युग में सत्संग स्वाध्याय केवल मनोरंजन या वाग्विलास का साधन बनकर रह गया है,जिस प्रकार चिकने घड़े पर पानी की बूंद भी नहीं ठहरती है उसी प्रकार लोगों के मनोभूमि में इतनी गिरावट आती जा रही है कि उन पर इन प्रेरणा का कोई असर होता नहीं दिख रहा है,पुस्तकें पढ़ लेने मात्र से कुछ नहीं होता है सत्संग सुन लेने मात्र से जीवन नहीं सुधरता है बल्कि सत्संग एवं पुस्तकों में वर्णित व्याख्यान को स्वयं के जीवन में उतारना पड़ता है,यही आज हम नहीं कर पा रहे हैं और दिग्भ्रमित हो करके जीवन यापन कर रहे हैं,यदि हमारे पूर्वज अनपढ़ होते हुए भी ज्ञानवान हो गए थे तो उसका कारण था कि वे कहीं से भी सुने हुए ज्ञान को आत्मसात कर लेते थे,परंतु आज का मनुष्य स्वयं इतना ज्ञानी हो गया है कि दूसरों की बात उसके हृदय में ठहरती ही नहीं है यही कारण है कि हम आधुनिक होते हुए भी अपने पूर्वजों से बहुत पीछे रह गये हैं |
आप के नाम में छुपा है राम का नाम! एक बार पूरा गणित लगाकर देख लें आश्चर्य चकित हो जाएंगे।
अदभुत गणितज्ञ "श्री.तुलसीदासजी से एक भक्त ने पूछा कि महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?
तुलसीदास बोले :- " हां "
भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???
तुलसीदास :- " हां अवश्य " ....तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!!
तुलसीदास जी ने कहा , ""अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.""
हर नाम के अंत में राम का ही नाम है।
इसे समझने के लिए तुम्हे एक "सूत्रश्लोक " बताता हूँ।
यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!
भक्त :-" कौनसा सूत्र महाराज ?"
तुलसीदास :- यह सूत्र है ---
"नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण
तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम!!"
इस सूत्र के अनुसार
अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें..
1)उस गिनती को (चतुर्गुण) 4 से गुणाकार करें
2) उसमें (पंचतत्व मिलन) 5 मिला लें
3) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें
4)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) 8 से विभाजित करें ।
"" संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा 2 शेष रहेगा!!!यह 2 ही राम है। यह 2 अंक ही राम अक्षर हैं।
विश्वास नहीं हों रहा है ना???चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं ! एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!!
उदाहरण के लिए :- निरंजन... 4 अक्षर
1) 4 से गुणा करिए 4x4=16
2)5 जोड़िए 16+5=21
3) दुगने करिए 21×2=42
4)8 से विभाजन करने पर 42÷8= 5 पूर्ण अंक , शेष 2 !!!
शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे 2 अर्थात् - "राम" !!!
विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है!!
1) चतुर्गुण अर्थात् 4 पुरुषार्थ :- धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष !!!
2) पंचतत्व अर्थात् 5 पंचमहाभौतिक :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश!!!
3) द्विगुण प्रमाण अर्थात् 2 माया व ब्रह्म !!!
4) अष्ट सो भागे अर्थात् 8 आठ प्रकार की लक्ष्मी (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योग
लक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति।
अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष 2 ही प्राप्त होगा ...!!
इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!
अगर आपका जमीर और नियत
साफ हैं तो इस बात से कोई फर्क
नही पड़ता के कोई भी आपको
अच्छा कहे या बुरा..॥
आप अपनी नियत से जाने
जाएंगे,
दूसरो की सोच से नही..॥
*!! समय की कीमत !!*
कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बैंक अकाउंट है और हर रोज सुबह उस बैंक अकाउंट में 86,400 रूपये जमा हो जाते है, जिसे आप उपयोग में ले सकते है। आप रूपयों को बैंक अकाउंट से निकाल कर अपनी तिजोरी में जमा करके नहीं रख सकते। इस बैंक अकाउंट में कैरी फोरवर्ड का सिस्टम नहीं है यानि कि जिन रूपयों को आप उपयोग में नहीं ले पाते, वह रूपये शाम को वापस ले लिए जाते है और आपका अब उन पर कोई अधिकार नहीं रहता। यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है। हो सकता है कि कल ही यह बैंक अकाउंट बंद हो जाए या फिर 2 वर्ष बाद या फिर 50 वर्ष बाद। लेकिन इतना तो निश्चित है कि यह बैंक अकाउंट एक दिन जरूर बंद होगा।
ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे? जाहिर है आप पूरे के पूरे 86,400 रूपयों का उपयोग कर लेंगे और इन 86,400 रूपयों का उपयोग अच्छे कार्यों के लिए करेंगे क्योंकि यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है। क्या आप जानते है कि ऐसा ही एक बैंक अकाउंट हमारे पास होता है जिसका नाम है “जिंदगी (Life)” और इस “जीवन” रुपी बैंक अकाउंट में प्रतिदिन 86,400 सेकंड्स जमा होते है जिनका उपयोग कैसे करना है यह हम पर निर्भर करता है। हम चाहें तो इन 86,400 सेकंड्स का उपयोग बेहतरीन कार्यों के लिए कर सकते है और अगर ऐसा नहीं करते तो यह व्यर्थ हो जाएंगे। यह जीवन रुपी बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है इसलिए देर मत कीजिए आपके जीवन का हर पल अमूल्य है इसलिए समय का सदुपयोग कीजिए।
अगर किसी को भी ऐसा बैंक अकाउंट दे दिया जाए जिसमें रोज 86,400 रूपये जमा हो तो वह व्यक्ति बहुत खुश हो जाएगा और एक रूपया भी व्यर्थ नहीं गवाएंगा। क्या हमारे जीवन के एक सेकंड की कीमत एक रूपये से भी कम है। हम कैसे अपने जीवन की सबसे अनमोल सम्पति को ऐसे ही व्यर्थ गँवा सकते है। खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ समय वापस नहीं आता। उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। हर एक दिन को व्यर्थ गंवाना आत्महत्या करने के समान है। बिना समय प्रबंधन के आज तक कोई भी सफल नहीं हुआ।
कबीर दास जी का यह छोटा सा दोहा, जीवन का सबसे बड़ा मंत्र बता देता है-
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै होयेगी, बहुरी करेगा कब।।
*शिक्षा:-*
बीते हुए कल को भूल जाइए, उसका आज कोई वजूद नहीं। आज आपका है, आज एक नयी शुरुआत कीजिए। “जो व्यक्ति अपने समय को नष्ट कर देते है, समय उन्हें नष्ट कर देता है।’’
22/07/2024
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