09/05/2026
शुभ प्रभात😊
ye aap sbka Sanskrit coaching ka page hai, Mai aasha krti hoo ki aap ko Sanskrit me hone wali sbhi pareshaniyo ko yha door krne ki Puri kosis ki jaygi. dhanywad
Sanskrit online coching k liye sampark KR skte hai mere number me
09/05/2026
शुभ प्रभात😊
09/05/2026
With DrRajeev Mohan – I just got recognized as one of their top fans! 🎉
05/05/2026
फेसबुक पर मिली एक ऐसी घटना जो हकीकत है, इसे आप पढ़ेंगे तो शायद जीवन के हकीकत को समझ पाए,
मेरा नाम विवेक शर्मा है। उम्र 32 साल। लोग जब पूछते हैं, तुम क्या करते हो, तो मैं कहता हूँ, किराना दुकान चलाता हूँ। वे हँसते हैं, क्योंकि उन्हें पता है मैं आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट था, और मेरे पास सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी का ऑफर लेटर आज भी अलमारी में रखा है, जिस पर सैलरी लिखी है 2,40,000 डॉलर सालाना।
मैंने वह लेटर कभी फाड़ा नहीं, पर कभी इस्तेमाल भी नहीं किया।
कहानी 1998 से शुरू होती है, कानपुर के किदवई नगर में। दो कमरे का घर, ऊपर टीन। पापा रेलवे में क्लर्क, माँ ट्यूशन पढ़ातीं। मैं इकलौता बेटा। पापा की सैलरी 8,000 रुपये। माँ की ट्यूशन से 2,000। हम मिडिल क्लास भी नहीं थे, लोअर मिडिल।
पर पापा का एक सपना था, बेटा बड़ा आदमी बने। उन्होंने कभी मुझसे नहीं कहा डॉक्टर बन, इंजीनियर बन। वह सिर्फ कहते, बेटा, जितना पढ़ना है पढ़, पैसे की चिंता मत कर।
मैं पढ़ता गया। दसवीं में 95 प्रतिशत, बारहवीं में 97। कोचिंग की फीस 1 लाख थी। पापा ने पीएफ निकाला। माँ ने अपनी चूड़ियाँ बेचीं। मैं कोटा गया। दो साल पंखे के नीचे पढ़ा, मच्छर खाए। 2012 में रिजल्ट आया, AIR 147। आईआईटी बॉम्बे, कंप्यूटर साइंस।
जिस दिन लेटर आया, पापा मिठाई का डिब्बा ले कर पूरे मोहल्ले में बाँट आए। माँ रो पड़ी। बोली, अब मेरा बेटा अमेरिका जाएगा।
आईआईटी में मैं उड़ा। कोडिंग, हैकाथॉन, इंटर्नशिप। तीसरे साल में गूगल समर इंटर्न, 1 लाख स्टाइपेंड। मैंने पहली सैलरी से पापा को फोन दिलाया, माँ को वॉशिंग मशीन। पापा ने फोन पर कहा, बेटा, अब तो रिटायरमेंट में आराम करूँगा।
फाइनल ईयर में प्लेसमेंट। मैं दिन रात तैयारी करता। दिसंबर 2015, मेरा इंटरव्यू हुआ एक कंपनी से, नाम था स्ट्राइप जैसी पेमेंट स्टार्टअप, बेस सैन फ्रांसिस्को। चार राउंड, आखिरी में सीटीओ ने कहा, वी वांट यू। ऑफर आया, 240k डॉलर, H1B, रीलोकेशन।
मैंने हॉस्टल में चिल्ला कर दोस्तों को बताया। रात को पापा को फोन किया। पापा चुप रहे, फिर बोले, बेटा, बहुत बड़ी बात है। माँ ने कहा, पासपोर्ट बनवा ले।
मैंने टिकट देखना शुरू किया, अगस्त 2016 जॉइनिंग।
मार्च 2016 में होली पर घर आया। पापा कमजोर लग रहे थे। खाँसी। मैंने कहा, डॉक्टर को दिखाओ। बोले, कुछ नहीं, ठंड लग गई। माँ भी थकी थकी। मैंने सोचा, उम्र है।
अप्रैल में फोन आया, माँ का। पापा गिर गए, अस्पताल में। मैं भागा। डॉक्टर ने कहा, लंग्स में इंफेक्शन, साथ में हार्ट की प्रॉब्लम। एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। खर्च, 3 लाख।
पापा के पास मेडिकल था, पर आधा ही कवर। मैंने अपनी इंटर्नशिप के पैसे, 2 लाख, निकाल कर दिए। ऑपरेशन हुआ। पापा बच गए।
मैं वापस बॉम्बे गया, फाइनल प्रोजेक्ट। मई में फिर फोन, माँ को चक्कर आए। जांच हुई, ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज 2। डॉक्टर ने कहा, कीमो शुरू करो, 6 साइकल, हर साइकल 80 हजार। कुल 5 लाख, प्लस सर्जरी।
मैं सुन्न। पापा रिटायर हो चुके थे, पेंशन 12 हजार। घर में सेविंग खत्म। मैंने दोस्तों से उधार माँगा, 1 लाख मिला। बाकी।
जून में मैं घर बैठा था, ऑफर लेटर हाथ में। वीजा इंटरव्यू 15 जुलाई को था। फ्लाइट 10 अगस्त की। माँ की पहली कीमो 20 जून को।
मैंने पापा से कहा, मैं लोन लेता हूँ। पापा बोले, कौन देगा, घर गिरवी रखना पड़ेगा। मैंने कहा, रख देंगे। पापा ने मना किया, बोले, ये घर तेरी माँ की निशानी है।
उस रात मैं छत पर बैठा। आसमान में प्लेन जा रहा था। मैंने सोचा, यही प्लेन मुझे ले जाएगा। दूसरी तरफ माँ नीचे दर्द में।
मैंने अपने मेंटर को मेल किया, क्या जॉइनिंग डिफर हो सकती है, 6 महीने। रिप्लाई आया, सॉरी विवेक, वी नीड पीपल नाउ। यू कैन रीअप्लाई नेक्स्ट ईयर।
मैंने फिर मेल किया, रिमोट पॉसिबल? रिप्लाई आया, नो।
14 जुलाई की रात। वीजा इंटरव्यू कल। माँ की दूसरी कीमो परसों। पापा दवाई लेने गए थे, लौटे तो पर्ची गिर गई, झुक कर उठा नहीं पाए। मैंने उठाई। उस वक्त समझ आया, मैं अगर चला गया तो ये दोनों कैसे रहेंगे।
पापा रिटायर्ड, बीमार। माँ कीमो पर। कोई भाई बहन नहीं। रिश्तेदार मदद नहीं करते। कौन अस्पताल ले जाएगा, कौन दवाई लाएगा, कौन रात को पानी देगा।
मैंने सुबह वीजा इंटरव्यू कैंसिल किया। कंपनी को मेल लिखा, थैंक यू फॉर ऑफर, ड्यू टू फैमिली मेडिकल इमरजेंसी आई एम अनेबल टू जॉइन।
दोस्तों ने फोन किया, पागल है क्या, 1.6 करोड़ की जॉब छोड़ रहा है। मैंने कहा, हाँ।
माँ को नहीं बताया। पापा को बताया। वह चुप रहे, फिर बोले, बेटा तेरा करियर। मैंने कहा, करियर फिर बन जाएगा, आप फिर नहीं मिलोगे।
मैंने कानपुर में ही नौकरी ढूंढी। एक लोकल सॉफ्टवेयर कंपनी, सैलरी 35 हजार। मैंने जॉइन कर ली। सुबह 9 से शाम 6 ऑफिस, शाम को अस्पताल। कीमो में माँ के बाल गए, वह रोती। मैं विग ले आया। पापा की दवाई टाइम पर देता।
2016 से 2018, दो साल ऐसे निकले। माँ की सर्जरी हुई, रिकवरी हुई। कैंसर रिमिशन में आया। पापा की तबीयत स्थिर। पर पैसे खत्म। मैंने लोन लिया, 7 लाख।
2018 में कंपनी बंद हो गई। मैं बेरोजगार। इंटरव्यू दिए, बेंगलुरु से ऑफर आया, 18 लाख। मैंने मना किया। पापा बोले, जा बेटा। मैंने कहा, अब नहीं छोड़ सकता। माँ को हर तीन महीने चेकअप, पापा को डायबिटीज। कौन देखेगा।
दोस्त बोले, तू अपना करियर मार रहा है। मैंने कहा, करियर मेरा है, माँ बाप भी मेरे।
मैंने घर के नीचे छोटी सी दुकान खोली, पापा के नाम पर, शर्मा जनरल स्टोर। कंप्यूटर छोड़ कर दाल चावल बेचने लगा। पहले दिन शर्म आई। आईआईटी का लड़का दुकान पर। फिर एक आंटी आईं, बोलीं, बेटा तुम्हारी माँ ने मुझे पढ़ाया था, तुम दुकान खोलो, हम यहीं से लेंगे।
धीरे धीरे दुकान चली। मैं सुबह 6 बजे होलसेल मंडी जाता, सामान लाता, दिन में दुकान, रात को फ्रीलांस कोडिंग। 500 डॉलर की वेबसाइट बनाता।
2019 में माँ पूरी तरह ठीक। डॉक्टर ने कहा, क्लियर। उस दिन मैं दुकान बंद कर के मंदिर गया। प्रसाद चढ़ाया। घर आया तो पापा बोले, बेटा, तूने हमारे लिए सब छोड़ दिया। मैंने कहा, छोड़ा नहीं, बदला है।
2020 लॉकडाउन। दुकान एसेंशियल में खुली। लोगों को राशन चाहिए था। मैंने होम डिलीवरी शुरू की। साइकिल पर जाता। पापा हिसाब लिखते। माँ पैकिंग करती। उस लॉकडाउन में हमने 2 लाख कमाए। मैंने लोन का आधा चुका दिया।
2021 में मैंने दुकान के साथ एक छोटा कंप्यूटर क्लास शुरू किया, बच्चों को कोडिंग सिखाने। फीस 500 महीना। 20 बच्चे आए। मुझे फिर से कोडिंग का मजा आया।
2022 में एक बच्चा, अंश, जो मेरे पास पढ़ता था, उसने नेशनल ओलंपियाड जीता। न्यूज में आया, 'कानपुर के किराना वाले आईआईटीयन से सीख कर जीता'। वह आर्टिकल वायरल हुआ।
उसी हफ्ते मुझे मेल आया, स्ट्राइप के उसी सीटीओ से। लिखा था, विवेक, आई सॉ योर स्टोरी। वी आर ओपनिंग इंडिया ऑफिस। वुड यू लाइक टू लीड एजुकेशन इनिशिएटिव, रिमोट, पार्ट टाइम।
मैंने हाँ कहा। अब मैं सुबह दुकान, दोपहर क्लास, शाम को यूएस टीम के साथ काम। सैलरी डॉलर में नहीं, पर इज्जत में बहुत।
पिछले महीने पापा 68 के हुए। मैंने छोटा सा फंक्शन रखा। दोस्त आए, वही जो कहते थे तूने करियर बर्बाद किया। पापा ने माइक ले कर कहा, मेरा बेटा अमेरिका नहीं गया, पर मेरे पास रहा। जब मैं अस्पताल में था, उसने मेरा हाथ पकड़ा। जब इसकी माँ के बाल गए, इसने चोटी बनाई। करियर तो बहुत लोग बनाते हैं, बेटा कोई कोई बनता है।
माँ ने धीरे से कहा, मुझे आज भी वह ऑफर लेटर याद है। तूने अलमारी में क्यों रखा। मैंने कहा, ताकि याद रहे मैंने क्या छोड़ा। बोली, तूने छोड़ा नहीं, तूने चुना।
आज दुकान पर बैठा हूँ। सामने स्कूल के बच्चे टॉफी ले रहे हैं। लैपटॉप पर कोड चल रहा है। पापा बगल में अखबार पढ़ रहे हैं, माँ काउंटर पर बैठी हैं।
कभी कभी रात को वह ऑफर लेटर निकालता हूँ। 240,000 डॉलर। फिर माँ की हँसी सुनता हूँ, पापा की खाँसी कम हुई है, देखता हूँ। और लेटर वापस रख देता हूँ।
लोग पूछते हैं, पछतावा होता है। मैं सच कहता हूँ, पहले होता था। जब दोस्त बेंगलुरु से फोटो डालते, यूएस ट्रिप की। अब नहीं। क्योंकि मैंने करियर का त्याग नहीं किया, मैंने करियर को रीडिफाइन किया।
मेरा करियर अब सिर्फ कोड नहीं, केयर है।
मैंने माता पिता के लिए अमेरिका छोड़ा, पर उनके साथ जिंदगी जी ली। पापा को हर सुबह चाय दे पाता हूँ, माँ के पैर दबा पाता हूँ। ये 2.4 करोड़ में नहीं मिलता।
अगर फिर से मौका मिले, तो मैं फिर वही करूँगा। वीजा कैंसिल, जॉब छोड़, दुकान खोल। क्योंकि कुछ त्याग घाटा नहीं होते, वे निवेश होते हैं, प्यार में।
और आज जब कोई बच्चा पूछता है, भैया आप आईआईटी करके दुकान क्यों, मैं हँस कर कहता हूँ, क्योंकि मेरे माता पिता मेरी सबसे बड़ी कंपनी हैं, और मैं उनका फुल टाइम सीईओ हूँ।
27/04/2026
Big shout out to my newest top fans! 💎 Jai Bhawani Jai Bhawani, Raj Namdev, Tribhuvan Nath Shrivastava, Kshama Pandey, Radhakanta Das, Ramveer Salar, Raka Chavan, DrRajeev Mohan, Basant Lal
Drop a comment to welcome them to our community,
* ध्यान देने योग्य कहानी* सत्य
मैं ओला चलाता हूँ।ज़्यादातर नाइट शिफ्ट करता हूँ। पिछले हफ्ते रात ग्यारह बजे एक बुज़ुर्ग सज्जन को उठाया। सफ़ेद पंजाबी धोती, आँखों में थकान—लेकिन आवाज़ में अजीब-सी दृढ़ता।*
गाड़ी में बैठते ही बोले,
*“आज रात मुझे पाँच जगहों पर ले चलना होगा । मैं तुम्हें 5000 रुपये दूँगा। नकद, लेकिन अंत तक कारण मत पूंछना।”*
यह कहकर एक कागज़ आगे बढ़ाया। उस पर पाँच पते लिखे थे ।
*पहला पड़ाव-*
दक्षिण कोलकाता का एक पुराना घर।
मैंने गाड़ी रोकी। वे उतरे नहीं। सिर्फ़ खिड़की का शीशा नीचे करके देखते रहे। दस मिनट तक।
आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं।
“चलो… अगला।”
*दूसरा पड़ाव-*
एक प्राथमिक विद्यालय। गेट बंद। अंदर अँधेरा मैदान।
वे उतरकर धीरे-धीरे झूले तक गए। एक झूले पर बैठकर हल्के-हल्के झूलने लगे।
बीस मिनट बाद लौटे। बोले -
“यहीं पढ़ाता था। तैंतालीस साल। ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यही था।”
*तीसरा पड़ाव-*
एक छोटा पुराना कॉफ़ी हाउस।
अंदर जाकर एक कप चाय मँगाई। कोने की मेज़ पर अकेले बैठे रहे। चाय को छुआ तक नहीं। बस चारों ओर देखते रहे।
पंद्रह मिनट बाद लौटकर हल्के से मुस्कुराए -
“यहीं, मेरी और मिताली (उनकी पत्नी) की पहली मुलाक़ात हुई थी। 1969 में।”
*चौथा पड़ाव-*
निमतला श्मशान घाट।
वे उतरे। चिताभस्म के पास एक फ़लक के सामने खड़े होकर धीमे-धीमे कुछ बोलते रहे। मैं सुन नहीं पाया।
आधे घंटे बाद लौटे। आँखें लाल थीं।
“आज तीन साल हो गए उसे गए।”
*पाँचवाँ पड़ाव-*
एक बड़ा सरकारी अस्पताल।
गाड़ी पार्क करने को कहा। फिर मेरी ओर देखा -
*“अब कारण बताता हूँ। मुझे चौथे स्टेज का कैंसर है। डॉक्टर ने कहा है— कुछ हफ़्ते… शायद कुछ दिन। आज मैं अपनी पूरी ज़िंदगी आख़िरी बार देख लेना चाहता था।”*
मैं स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगा।
उन्होंने कहा—
*“वो घर—जहाँ बच्चों को बड़ा किया।*
*वो स्कूल—जहाँ अपना उद्देश्य पाया।*
*वो कॉफ़ी हाउस—जहाँ प्यार हुआ।*
*वो श्मशान—जहाँ आख़िरी विदाई दी।*
*और ये अस्पताल—जहाँ आज भर्ती होऊँगा। अब घर वापसी नहीं होगी।”*
उन्होंने मेरे हाथ में 5000/- रुपये रख दिए।
*“धन्यवाद, तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी एक बार फिर घुमा दी। मेरे आख़िरी अजनबी इंसान...जिसने मेरे साथ कोमल व्यवहार किया।”*
मैंने कहा—
“नहीं, ये मैं नहीं ले सकता ।”
वे बोले—
*“लो, देने के लिए मेरा कोई नहीं। बच्चों ने इतनी दूरी बना ली है कि अब वो बात नहीं करते। यार-दोस्त कोई बचा नहीं, एक-एक करके सब विदा हो गये। तुमने तीन घंटे दिए—तीन घंटे की इंसानियत। उसकी कीमत पैसे से ज़्यादा है।”*
छोटा सूटकेस लेकर वे अंदर चले गए।
*अगले दिन मैं अस्पताल गया। पूछा—“श्री अनिरुद्ध मुखर्जी। केबिन 412”।*
फूल लेकर अंदर गया। मुझे देखकर मुस्कुराए —
“तुम आए?”
“आपको ऐसे छोड़ नहीं पाया।”
*दो घंटे बातें हुईं—मिताली देवी की, उनके छात्रों की, उनके रूठे हुए बच्चों की।*
मैं रोज़ जाने लगा। चाय ले जाता। अख़बार पढ़कर सुनाता। कभी चुपचाप बैठा रहता।
एक दिन बोले—
*“सोचता था अकेला मरूँगा। लेकिन तुम हो। आख़री वक़्त में एक अजनबी, परिवार बन गया। तुम्हें मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद।”*
मैंने उनका हांथ पकड़ा—
*“आप अकेले नहीं हैं।”*
*मंगलवार भोर 3 बजकर 17 मिनट पर वे स्वर्ग चले गए।*
*मैं उनका हांथ पकड़े बैठा था।*
आख़िरी शब्द थे—
*“सबसे कहना… अजनबियों की ओर देखना। सचमुच देखना। हम सब कहीं जा रहे हैं—कोई तेज़, कोई धीरे। जाते हुए राह में दया करना। तुमने की। तुमने मेरे आख़िरी दिनों को जीने लायक बना दिया।”*
मॉनिटर की आवाज़ सीधी रेखा बन गई।
*श्मशान में उनके दाह-संस्कार के समय थे—कुल छः लोग -*
मैं,
तीन नर्स,
एक वकील,
और एक पूर्व छात्र।
*तैंतालीस साल की शिक्षकी।*
*बावन साल का दांपत्य।*
*इक्यासी साल की ज़िंदगी।*
*छह लोग।*
मैंने कहा—
“अनिरुद्ध बाबू ने मुझे सिखाया-
*हर अजनबी किसी का पूरा संसार होता है।*
*हर यात्री एक कहानी है।*
*हर इंसान जी रहा है, मर रहा है, इंतज़ार कर रहा है—कोई उसे देखे।*
उन्होंने मुझे 5000/- रुपये दिए थे जीवन की सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए।
*लेकिन जो शिक्षा दी—उसकी कीमत पैसे से कहीं ज़्यादा है।*
"मानवता कोई *अतिरिक्त चीज़ नहीं। यही सब कुछ है।”*
आज भी वो 5000/- रुपये मेरे ग्लव बॉक्स में रखे हैं। खर्च नहीं किए।
*क्योंकि हर यात्री शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर हो। हर अजनबी शायद आख़िरी विदाई दे रहा हो।*
इसलिए अब मैं अलग तरह से गाड़ी चलाता हूँ।
*पूंछता हूँ। सुनता हूँ। लोगों को देखता हूँ।*
क्योंकि एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने *एक कोमल रात माँगी थी-और एक अजनबी रुक गया था।*
*निशब्द क्षण, अनकहा सत्य।*
23/04/2026
एक समय था जब हमारे समाज में मातृत्व के काल को बहुत ही सहज और मर्यादापूर्ण माना जाता था। उस समय महिलाएँ विशेष रूप से ढीले-ढाले वस्त्रों का चयन करती थी जो न केवल आरामदायक होते थे बल्कि देखने में अत्यंत शालीन लगते थे। उन वस्त्रों में एक विशेष प्रकार का संकोच और गरिमा बनी रहती थी, जिससे उस अवस्था की पवित्रता और भी बढ़ जाती थी। कई बार तो आस-पड़ोस को आभास तक नहीं होता था, और इसे ही हमारी संस्कृति की सुंदरता माना जाता था।
परंतु आज के दौर में, विशेषकर बॉलीवुड के प्रभाव में, जिस तरह के फोटोशूट सामने आ रहे हैं, उन्हें देखकर मन थोड़ा विचलित होता है। मेरा मानना है कि जीवन के कुछ पल और कुछ अवस्थाएँ परदे में ही अधिक सुंदर लगती हैं। हर चीज़ का सार्वजनिक प्रदर्शन करना अनिवार्य नहीं है।
हो सकता है कि आज की आधुनिक पीढ़ी को मेरी यह सोच पुरानी या पिछड़ी हुई लगे, लेकिन मुझे लगता है कि अंग-प्रदर्शन कभी भी शालीनता का पर्याय नहीं हो सकता। यह बात केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पुरुषों के लिए भी उतनी ही लागू होती है। सार्वजनिक स्थानों पर पहनावे का विवेक रखना हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है।
चिंता का मुख्य विषय हमारी आने वाली पीढ़ी है। अक्सर देखा जाता है कि आम जनता बिना सोचे-समझे इन फिल्मी सितारों का अंधानुकरण करने लगती है। जो आज एक ट्रेंड है, वह कल को समाज की सामान्य आदत बन जाती है। यदि ये चित्र आपकी व्यक्तिगत स्मृतियाँ हैं, तो इन्हें अपने निजी दायरे तक सीमित रखना कहीं ज्यादा उचित है।
विडंबना देखिए कि जो लोग गर्भावस्था के दौरान अंग-प्रदर्शन को कला मानते हैं, वही लोग बच्चे के जन्म के बाद उसका चेहरा मीडिया से इस तरह छुपाते हैं जैसे वह कोई बहुत गोपनीय बात हो।
अंत में, मैं बस इतना ही कहना चाहूँगी कि आधुनिक बनने की दौड़ में हमें अपनी शालीनता और सामाजिक गरिमा को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। संस्कार और मर्यादा ही हमारे समाज की असली पहचान हैं।
14/04/2026
कुछ स्त्रियां अब भी थोड़ी पुरानी स्त्रियां हैं
उनकी साड़ियां बहुत सुंदर होती हैं
लेकिन उनके ब्लाउज़ डीप कट वाले नहीं होते
वे नहीं दिखाती अपनी टांगें
वे शराब या सिगरेट नहीं पीतीं
फेसबुक पर अकाउंट तो बनाती हैं
लेकिन स्क्रीनशॉट स्क्रीनशॉट नहीं खेलतीं
वे ऐसी किसी भी बहस में हिस्सा नहीं लेतीं
कि स्त्रियों को पुरुष संतुष्ट कर पाते हैं या नहीं
उनके लिए शरीर शरीर जितना ही है
उनकी आत्मा आत्मा से भी बहुत सूक्ष्म है
वे अभी नहीं सीख सकी हैं कॉल रिकॉर्डिंग
उन्हें महिला थाने के नाम से भी डर लगता है
वे अपने बच्चों को तारक मेहता का उल्टा चश्मा दिखा रही हैं
उनके फोन उनके बच्चे और उनके पति भी चलाते हैं
वे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं
लेकिन उनके दोस्तों में सिर्फ़ कुछ परिजन हैं और बहुत जानकर लोग
उनके नंबर अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं
उनके फोन की गैलरी अपने बच्चों और पति की फोटोज से भरी पड़ी है
वे सुबह जल्दी उठ रही हैं
वे खाना बना रही हैं
वे टिफिन बांध रही हैं
वे बच्चों को स्कूल भेज रही हैं और पतियों को ऑफिस
वे इंतज़ार करते हुए झपकी ले रही हैं
वे ख़ुश हो रही हैं शाम को सब लोग घर पर लौट आए
वे किटी पार्टियों से दूर हैं
वे अब भी कथाएं सुन रही हैं
वे अब भी पीपल सींच रही हैं
वे अब भी गाय कुत्तों को रोटी दे रही हैं
वे अब भी रात को सबके साथ बैठकर कुछ देर टीवी देख रही हैं
लेकिन इन स्त्रियों को कुछ नहीं समझती
कुछ बहुत तार्किक स्त्रियां
वे ऐसी स्त्रियों को खा जाना चाहती हैं
पिछले कई दशकों से भड़का रही हैं वे स्त्रियों को
लेकिन भारत के परिवार हैं कि टूट ही नहीं रहे
यह स्त्रियों के भीतर की लड़ाई है
हम पुरुषों को इसे दूर से देखना चाहिए
लेकिन मैं क्यों नहीं बोलूंगा बीच में
अगर मुझे मेरा घर टूटता हुआ दिखाई दे
जिन स्त्रियों का परिवार नहीं बसा
वे उन स्त्रियों का परिवार उजाड़ देना चाहती हैं
जिनका परिवार बसा हुआ है
यह अजीब कुंठा है मगर यही सच है
मैं नहीं जानता इस लड़ाई का अंजाम क्या होगा
लेकिन मैं मेरी मां मेरी बहनें और मेरी भाभियाँ
अब भी एक "चेन" बनाकर खड़े हैं
इस जलजले के खिलाफ़
हम सारे एक कमरे में मिलकर खाना खा रहे हैं
और हमें इस बात से कोई मतलब नहीं
कि फेसबुक या व्हाट्सएप की दुनिया में क्या हो रहा है
हमारे घर की छतों पर साड़ियों के नीचे सूख रहे
मेरे घर की स्त्रियों के अंतर्वस्त्रों को जो स्त्रियां
घर के बरामदे में सबके सामने सुखाने की लड़ाई लड़ रही हैं -
वे इस लड़ाई से क्या जीत जाएंगी?
उनके पास न कल कोई जवाब था न अब
06/04/2026
एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवो में घूम रहा था। घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया। उसने अपने मंत्री को कहा कि, पता करो कि इस गाँव में कौन सा दर्जी हैं, जो मेरे बटन को सिल सके। मंत्री ने पता किया। उस गाँव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपडे सिलने का काम करता था।
उसको राजा के सामने ले जाया गया। राजा ने कहा, क्य़ा तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो?
दर्जी ने कहा, यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है। उसने मंत्री से बटन ले लिया। धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फोरन सी दिया, क्योंकि बटन भी राजा के पास था। सिर्फ उसको अपना धागे का प्रयोग करना था।
राजा ने दर्जी से पूछा कि, कितने पैसे दू? उसने कहा, महाराज रहने दो, छोटा सा काम था। उसने मन में सोचा कि बटन भी राजा के पास था, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया हैं।
राजा ने फिर से दर्जी को कहा, कि नहीं नहीं बोलो कितनीे माया दूँ। दर्जी ने सोचा कि 2 रूपये मांग लेता हूँ, फिर मन में सोचा कि कहीं राजा यह ने सोच लें कि बटन टाँगने के मुझ से 2 रुपये ले रहा हैं, तो गाँव वालों से कितना लेता होगा। क्योंकि उस जमाने में २ रुपये की कीमत बहुत होती थी।
दर्जी ने राजा से कहा कि महाराज जो भी आपको उचित लगे वह दे दो।
अब था तो राजा ही, उसने अपने हिसाब से देना था। कहीं देने में उसकी पोजीशन ख़राब न हो जाये।
उसने अपने मंत्री से कहा कि, इस दर्जी को २ गाँव दे दों, यह हमारा हुकम है।
कहाँ वो दर्जी सिर्फ २ रुपये की मांग कर रहा था और कहाँ राजा ने उसको २ गाँव दे दिए।
जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह अपने हिसाब से देते हैं। सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते है। देने वाला तो पता नही क्या देना चाहता हैं।
इसलिए संत-महात्मा कहते है, प्रभु के चरणों पर अपने आपको अर्पण कर दों। फिर देखो उनकी लीला.....
05/04/2026
गोविंदाय नमो नमः
05/04/2026
दुनिया की भागदौड़ और शोर-शराबे के बीच एक ऐसी हस्ती मौजूद है, जिसके लिए समय जैसे ठहर सा गया है। जोनाथन, जो एक विशालकाय कछुआ है, आज केवल एक जीव नहीं बल्कि इतिहास का एक जीवित दस्तावेज़ बन चुका है। वर्ष 1832 में जन्मा यह कछुआ आज 193 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, जो इसे दुनिया का सबसे उम्रदराज जीवित थल जीव बनाता है।
जोनाथन की जीवन यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं है। जब उसका जन्म हुआ था, तब दुनिया में न तो बिजली का बल्ब था और न ही मोटर गाड़ियाँ। उसने मानव सभ्यता के सबसे बड़े बदलावों को अपनी आँखों के सामने घटते देखा है। उसने दो विश्व युद्ध देखे, अनगिनत राजाओं और राष्ट्रपतियों के शासन को आते-जाते देखा और आज वह इंटरनेट के युग में भी उतनी ही शांति से जीवित है। दक्षिण अटलांटिक महासागर के सेंट हेलेना द्वीप पर रहने वाला जोनाथन आज एक वैश्विक पहचान बन चुका है।
बढ़ती उम्र के साथ जोनाथन की आँखों की रोशनी अब धुंधली हो गई है और उसकी सूंघने की शक्ति भी कम हो चुकी है। लेकिन प्रकृति का करिश्मा देखिए कि वह आज भी अपने देखभाल करने वालों की आवाज़ और उनके स्पर्श को पहचान लेता है। यह बात हमें याद दिलाती है कि रिश्तों की पहचान केवल आंखों से नहीं, बल्कि दिल के जुड़ाव से होती है। जोनाथन का अस्तित्व हमें यह संदेश देता है कि असली ताकत केवल गति में नहीं, बल्कि धैर्य और सहनशीलता में होती है।
आज जब हम हर काम को जल्दबाजी में पूरा करना चाहते हैं, तब जोनाथन की यह शांत और धीमी जीवनशैली हमें जीवन को गहराई से जीने की प्रेरणा देती है। वह हमें सिखाता है कि समय के थपेड़ों के बावजूद कैसे अडिग रहा जाता है। जोनाथन केवल एक कछुआ नहीं है, वह इस धरती की सहनशक्ति का प्रतीक है। वक्त गुजरता रहा, दुनिया बदलती रही, लेकिन जोनाथन अपनी मंद मुस्कान और धीमी चाल के साथ आज भी समय को चुनौती दे रहा है।
193 वर्षों का यह सफर वाकई में बेमिसाल है। आपने जिस धैर्य और शांति के साथ सदियों को गुजरते देखा है, वह हम सभी के लिए एक बड़ी सीख है। आप केवल एक जीव नहीं, बल्कि इस धरती की अटूट जीवंतता के प्रतीक हैं।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आप इसी तरह स्वस्थ रहें और आने वाले कई और वर्षों तक दुनिया को अपनी खामोश बुद्धिमत्ता से प्रेरित करते रहें। आप जैसे महानायक विरले ही होते हैं, जो वक्त की रफ्तार को थामने का माद्दा रखते हैं।
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