धम्म ( धर्म ) क्या है ? what is Dhamma ? Great Message of Tathagat Buddha
धम्म ( धर्म ) क्या है ? जाने तथागत बुद्ध का महान संदेश sakadagami 37
चार आर्य सत्य
तथागत बुद्ध का पहला धर्मोपदेश, बुद्ध ने चार आर्य सत्य बताये हैं।
१. दुःख
इस दुनिया में दुःख है। जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुःख है।
२. दुःख कारण
तृष्णा, या चाहत, दुःख का कारण है और फ़िर से सशरीर करके संसार को जारी रखती है।
३. दुःख निरोध
दुःख-निरोध के आठ साधन बताये गये हैं जिन्हें ‘अष्टांगिक मार्ग’ कहा गया है। तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है।
४. दुःख निरोध का मार्ग
तृष्णा से मुक्ति अष्टांगिक मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है।
अष्टांगिक मार्ग
बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य का आर्य अष्टांग मार्ग है दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :
1. सम्यक् दृष्टि- वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को जानना ही सम्यक् दृष्टि है।
2. सम्यक् संकल्प- आसक्ति, द्वेष तथा हिंसा से मुक्त विचार रखना ही सम्यक् संकल्प है।
3. सम्यक् वाक्- सदा सत्य तथा मृदु वाणी का प्रयोग करना ही सम्यक् वाक् है।
4. सम्यक् कर्मान्त- इसका आशय अच्छे कर्मों में संलग्न होने तथा बुरे कर्मों के परित्याग से है।
5. सम्यक् आजीव- विशुद्ध रूप से सदाचरण से जीवन-यापन करना ही सम्यक् आजीव है।
6. सम्यक् व्यायाम- अकुशल धर्मों का त्याग तथा कुशल धर्मों का अनुसरण ही सम्यक् व्यायाम है।
7. सम्यक् स्मृति- इसका आशय वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप के संबंध में सदैव जागरूक रहना है।
8. सम्यक् समाधि - चित्त की समुचित एकाग्रता ही सम्यक् समाधि है।
मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि।
Truth of Life Hindi
Truth of Life is channel which provide View of Life on Religion, History, Philosophy and Humanity
बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य का आर्य अष्टांग मार्ग है - दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :
सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूठ न बोलना
सम्यक कर्म : हानिकारक कर्म न करना
सम्यक जीविका : कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना
सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की कोशिश करना
सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
सम्यक समाधि : निर्वाण पाना
सम्यक कर्मांत : सम्यक कर्मांत का पहला अर्थ यह कि कोई भी हानिकारक कार्य न करें और दूसरा यह कि किसी भी कार्य को हाथ में लेकर उसे कुशलतापूर्वक करते हुए उसका समापन करें। सफलता प्राप्त करनी है तो सुंदर कार्यों और कर्मों का चयन करें। कुशलतापूर्वक और सुंदर तरीके से कार्य को शुरू करें और उसी तरह उसका समापन भी करें। हानिकारक कर्म क्या है? हानिकारक कर्म नहीं करना ही सम्यक कर्मांत है। बुद्ध कहते हैं कि कर्म चक्र से छूटने के लिए आचरण की शुद्धि होना जरूरी है। आचरण की शुद्धि क्रोध, द्वेष और दुराचार आदि का त्याग करने से होती है।
मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए। उसे दुराचार और भोग- विलास से दूर रहना चाहिए।
क्लेश
वेदना, मानसिक कष्ट, मानसिक अशांति, पीड़ित भावनाएं, विनाशकारी भावनाएं, अपवित्र भावनाएं, अशुद्धियाँ, असंगत भावनाएं, परेशान करने वाली भावनाएं, परेशान करने वाली भावनाएं और व्यवहार, नकारात्मक भावनाएं, असंगत मानसिक स्थिति, मन के जहर, सांसारिक इच्छाएं
Mental factors in Buddhism, are identified within the teachings of Buddhist psychology. They are defined as aspects of the mind that apprehend the quality of an object, and that have the ability to color the mind. Translations for mental factors include "mental states", "mental events", and "concomitants of consciousness"
कुशल कम्म, कुशल या अच्छा कर्म
अकुशल कार्य या बुरे कर्म
बुद्ध के अनुसार मनुष्य से तीन प्रकार के कर्म होते हैं, अर्थात् तीन शारीरिक, मौखिक और मानसिक।
Janiye ve kaun se mahan Karma hai Jinse Jeevan sukhi hota hai
जानिए वे कौन से महान कर्म है जिनसे जीवन सुखी होता है ? Sakadgami 34
The moral system will be bad or inefficient. Also, the karma performed by the doer (three types of physical, verbal and mental karma) without following the laws of nature from a scientific point of view will be bad or unskilled. So, according to the (kamma) karmaniyama and the three divisions of karma, the doer or sometimes someone else instead of the doer will get bad results.
If the moral system is bad or unskilled and man-made (three types of physical, verbal and mental karma) karmas are skilled according to nature from a scientific point of view, (kamma) according to the karma niyama and the three divisions of karma, the doer or sometimes the doer will get some bad results. But if the moral system is good or efficient, the doer or someone else instead of the doer will get good and efficient results.
If the moral system is good or skillful and man-made (three types of physical, verbal and mental karma) karma is skillful according to nature from a scientific point of view, then The result will be fruitful.
If the moral system is good or efficient and man-made (three types of physical, verbal and mental karma) karma is unskilled according to nature from a scientific point of view, then (kamma) according to the karma niyama and the three divisions of karma to the doer or sometimes to the doer a little better. However, if the moral system is bad or unskilled, the doer or the doer will have to suffer the consequences. Try to deal with skilled, unskilled deeds.
Then the benefit of skilled karma is given to every skilled karma performer. And no one can avoid the evil effects of unskilled karma. That is why Gautama Buddha says in his teachings, do good deeds so that humanity will benefit from a good moral system. Because only good deeds keep the moral system efficient. Do not do unskilled deeds. Because it harms the moral system. And humanity is miserable. Considering all these factors, since the law of karma of the Buddha (Kamma) is mandatory, it is not hindered anywhere. People come and go, but just as the moral system of the universe remains the same, the karmaniyam that makes this system remains unchallenged. In other religions, it is understood that God gives the fruit of karma. But instead of God in the Buddha Dhamma, that place has been given to Niti. That is, the fruit of karma gives this policy. And this policy is only for human beings.
सही साधना क्या है ? और कैसे सिद्ध करें ? चार सिद्धियां कैसे पाएं ? Sakadgami33
Sahi sadhana kya hai aur kaise siddha kare char siddhiya kaise paye Sakadgami 33
चार सिद्धियां रिद्धिपाद
1 छंद
इंद्रियों के विषयों में अनुराग, लोभ-मोह, काम-वासना, व्याकुल होना
2 वीर्य
वीर्य का अनुवाद "परिश्रम", "उत्साह", "प्रयास", "ऊर्जा", आदि के रूप में किया जाता है। और यह किसी को अच्छे या अच्छे कार्यों को पूरा करने के लिए कार्य करता है। ऐसा कहा जाता है कि जब परिश्रम या ऊर्जा का यह कारक होता है, तो यह हर उस चीज़ का एहसास कराता है जो आध्यात्मिक रूप से सकारात्मक है।
3 चित्त
जिसका उपयोग निकाय में मन को संदर्भित करने के लिए किया जाता है अन्य मानस और विनाश हैं । चित्त मुख्य रूप से किसी की मानसिकता, या मन की स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। यह शब्द समग्र रूप से मानसिक प्रक्रियाओं की गुणवत्ता को संदर्भित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
4 मीमांसा
अर्थ के विचार का नाम मीमांसा है
जांच, पूछताछ, विचार
इसका अर्थ है कारण और परिणाम को समझना।
The four Riddhipada are
1 Intention or purpose or desire or zeal (chanda)
2 Effort or energy or will (viriya)
3 Consciousness or mind or thoughts (citta)
4 Investigation or discrimination (mimansa)
1 प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन के स्रोत क्या है? वेद महाभारत को कब रचा गया भारत का इतिहास # 3 भाग1
https://youtu.be/IXJQzpDk2aI
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के स्रोत क्या है?
वेद कब रचे गए? वेद क्या है? चारो वेदो पर संक्षेप मे चर्चा करे? पुरातत्व क्या है? प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण पर चर्चा करे? सहित्यिक सहित्य क्या है? ब्राहमण आरण्यक उपनिषद वेदांग क्या है? सूत्र ग्रंथ मनुस्मृति नारदस्मृती याज्ञवल्क्य स्मृति की चर्चा करे? अर्थशास्त्र क्या है? रामायण और महाभारत कैसे रचे गए? पुराण क्या है? संगम सहित्य क्या है? बद्धाचरित किसने लिखा? कवी
कालिदास की रचनाये क्या है? पंचतंत्र क्या है ? हर्ष चरित किसने लिखा?
2 संस्कृत भाषा का सबसे पुराना शिलालेख कहा मिला है?प्राचीन भारत के इतिहास के स्रोत क्या है History 4 भाग2
https://youtu.be/UKBlvvaGiNs
बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ कौन से है ? त्रिपिटक क्या है?
सुत्त पिटक विनय पिटक और अभिधम्मा पिटक क्या है ?
जातक कथाये थेर गाथा थेरि गाथा मिलींद्पंहो व सिंहली ग्रंथो पर टिप्पणी लिखे?
जैन साहित्य क्या है? श्वेतांबर व दिगंबर साहित्य का वर्णन करे ?
पुरातात्त्विक स्त्रोत क्या है? सिक्के व मुद्रा शास्त्र का वर्णन करे?
शिलालेख पर विशेष टिप्पणी लिखे?
अशोक के शिलालेख
विदेशी स्रोतों पर विस्तार मे चर्चा करे?
bauddha sahitya tripitaka
jain text
rock edicts of Ashoka
oldest script for Sanskrit
Kya mantro ya kewal shabdo ke uchcharan karane se shakti milti hai ? aur Kya buddha Vedo ke khilaph the ?
क्या मंत्रों या केवल शब्दों के उच्चारण से शक्ति मिलती है ?और क्या बुद्ध वेदों के खिलाफ थे ? Sakadgami 32
भगवान बुद्ध धर्म कहते हैं कि ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है।
ब्राह्मण मैं उसे कहता हूँ, जो अपरिग्रही है, जिसने समस्त बंधन काटकर फेंक दिए हैं, जो भय-विमुक्त हो गया है और संग तथा आसक्ति से विरत है।
जो बिना चित्त बिगाड़े, हनन और बंधन को सहन करता है, क्षमा-बल ही जिसका सेनानी है, मैं उसी को ब्राह्मण कहता हूँ।
जो अक्रोधी है, व्रती है, शीलवान है, बहुश्रुत है, संयमी और अंतिम शरीर वाला है, उसे ही मैं ब्राह्मण कहता हूँ।
1 प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन के स्रोत क्या है? वेद महाभारत को कब रचा गया भारत का इतिहास # 3 भाग1
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क्या शरीर को अत्यधिक तप देने से रिद्धि और सिद्धि पाई जा सकती है ? जाने महावीर स्वामी से गौतम बुद्ध क्यों असहमत हुए
kya sharir ko atyadhik tap dene se riddhi siddhi pai ja sakati hai ? Jane Mahavir Swami se Gautam Buddha kyo Asahmat Huye ?
बौद्ध धर्म और जैन धर्म भारत के दो प्राचीन धर्म हैं जिनकी जन्मस्थली मगध वर्तमान समय का बिहार है तथा दोनों ही धर्म आज भी फल-फूल रहे हैं। प्रायः जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी तथा बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध दोनों समकालिक माने जाते हैं। दोनों धर्मों की बहुत सी मूलभूत बातें समान हैं। दोनों की धार्मिक शब्दावली एवं नैतिक सिद्धान्त समान हैं किन्तु उन पर अलग-अलग तरह से बल दिया गया है। दोनों ही श्रमण परम्परा वाले धर्म हैं और दोनों का विश्वास है कि जन्म-मरण के चक्र (संसार) से मुक्ति पाना सम्भव है।
Shudra, Vaishya, Kshatriya aur Brahman mr kya antar hai ? aur kaun hai vastav me Shrestha ?
भारत में वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत समाज को चार भागों में बाँटा गया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म-आधारित थी जो उत्तर वैदिक काल के बाद जन्म-आधारित हो गयी। वर्णव्यवस्था को जन्मानुसार माना जाता था और जाति भेद उच्च नीच भावना को उत्पन्न करके भयंकर रूपधारण कर रहा था। उच्चकुल में जन्म के अभिमान से लोग अपने को उच्च समझते और अन्यों को विशेषतः शूद्रों को अत्यन्त घृणा की दृष्टि से देखते थे। बहुत से लोगों को अस्पृश्य भी समझा जाता था। ये उच्चकुलाभिमानी अपने अन्दर ब्राह्मणोचित गुणों को धारण करने का कुछ भी प्रयत्न न करते थे और वस्तुतः उनमें से बहुतों का जीवन बड़ा पतित और अधोगामी था तथापि अन्यों को हीन दृष्टि से देखते हुए उन्हें लज्जा न आती थी। पवित्र जीवन निर्माण की ओर ध्यान न देते हुए भी वे शुष्क दार्शनिक चर्चा में अपना समय अवश्य नष्ट करते प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में दक्षिण एशिया में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, लेकिन विवरण से पता चलता है कि यह गैर-कठोर, लचीली और सामाजिक स्तरीकरण प्रणाली की विशेषताओं से रहित थी।
बौद्ध धर्म के निकाय ग्रंथों की अवधि (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से ५ वीं शताब्दी ईस्वी) के दौरान, वर्ण को एक वर्ग प्रणाली के रूप में प्रमाणित किया गया है, लेकिन वर्णित वर्ण एक जाति नहीं था प्रणाली पाली ग्रंथों में चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की गणना की गई है ।
1 प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन के स्रोत क्या है? वेद महाभारत को कब रचा गया भारत का इतिहास # 3 भाग1
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वेद कब रचे गए? वेद क्या है? चारो वेदो पर संक्षेप मे चर्चा करे? पुरातत्व क्या है? प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण पर चर्चा करे? सहित्यिक सहित्य क्या है? ब्राहमण आरण्यक उपनिषद वेदांग क्या है? सूत्र ग्रंथ मनुस्मृति नारदस्मृती याज्ञवल्क्य स्मृति की चर्चा करे? अर्थशास्त्र क्या है? रामायण और महाभारत कैसे रचे गए? पुराण क्या है? संगम सहित्य क्या है? बद्धाचरित किसने लिखा? कवी
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कैसे बचाये जीवन को अपने पाप कर्मों के फलों के प्रभावों से
Kaise bachaye jeevan ko apane papim karmo ke phalo ke prabhavo se
मानस ( पाली ) तीन अतिव्यापी शब्दों में से एक है जिसका उपयोग निकायों में मन को संदर्भित करने के लिए किया जाता है प्रत्येक को कभी-कभी सामान्य रूप से "दिमाग" के सामान्य और गैर-तकनीकी अर्थों में उपयोग किया जाता है और कभी-कभी किसी की मानसिक प्रक्रियाओं को समग्र रूपसे संदर्भित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
मानस अक्सर सामान्य सोच संकाय को इंगित करता है । सोच इच्छाओं के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है क्योंकि मानसिक गतिविधि उन तरीकों में से एक है जो इच्छाएं खुद को प्रकट करती हैं: "इच्छा से व्यक्ति शरीर भाषण और विचारों के माध्यम से कार्य करता है।" इसके अलावा, जानबूझकर सोच के संदर्भ में इच्छा का वर्णन किया गया है।
तथागत बुद्ध द्वारा प्रस्तावित कर्म सिद्धांत (कम्मा सिद्धांत) को कम्माविपाक कहा जाता है। कम्मा या कर्म नैतिक प्रणाली पर निर्भर करता है। नैतिक प्रणाली का अर्थ है नैतिक प्रणाली। नीति का अर्थ है नैतिकता।
कम्मानियमन एक पाली शब्द है जिसे कर्मनियमा कहा जाता है। समाज में नैतिक व्यवस्था कम्मानियमना (कर्मनियम) के अनुसार बनी रहती है।
यदि नैतिक प्रणाली अच्छी या कुशल हो और मानव निर्मित (तीन प्रकार के शारीरिक, मौखिक और मानसिक कर्म) कर्म कुशल हों, तो परिणाम फलदायी होगा।
यदि नैतिक प्रणाली खराब या अकुशल हो और मानव निर्मित (तीन प्रकार के शारीरिक, मौखिक और मानसिक कर्म) कर्म अनुसार अकुशल हैं और यदि नैतिक प्रणाली खराब है या अकुशल, कर्ता या कर्ता को परिणाम भुगतना होगा। )
तब कुशल कर्म का लाभ प्रत्येक कुशल कर्म करने वाले को दिया जाता है। और अकुशल कर्म के दुष्परिणामों से कोई नहीं बच सकता। इसीलिए गौतम बुद्ध अपनी शिक्षाओं में कहते हैं, अच्छे कर्म करो
The Karma Siddhanta (Kamma Siddhanta) proposed by Tathagata Buddha is called Kamma Vipaka. Kamma or karma depends on the moral system. Moral system means moral system.
Kushal kamma, kushal or good karma: - The work which does not cause you sorrow or remorse but gives you satisfaction, good sleep at night.
Kya Punarjanma ke pichale aur maene ke bad dusara vyakti rk hota hai Sakadgami 27
Rebirth in Buddhism refers to the teaching that the actions of a person lead to a new existence after death, in an endless cycle called samsara. This cycle is considered to be dukkha, unsatisfactory and painful. The cycle stops only if liberation is achieved by insight and the extinguishing of craving. Rebirth is one of the foundational doctrines of Buddhism, along with karma and nirvana.
The rebirth doctrine has been a subject of scholarly studies within Buddhism since ancient times, particularly in reconciling the rebirth doctrine with its anti-essentialist anatman (not-self) doctrine.
Marne ke bad kya hota hai ? Swarg ya Jannat ya heaven ya moksha ya Nirvana Sakadgami 26
Nirvana (Sanskrit - nirvaṇa; Pali - nibbana, nibbana) is the goal of the Buddhist path. The literal meaning of the term is "blowing out" or "quenching". Nirvana is the ultimate spiritual goal in Buddhism and marks the soteriological release from rebirths in samsara. Nirvana is part of the Third Truth on "cessation of dukkha" in the Four Noble Truths, and the summum bonum destination of the Noble Eightfold Path.
In the Buddhist tradition, nirvana has commonly been interpreted as the extinction of the "three fires", or "three poisons",greed (raga), aversion (dvesha) and ignorance (moha). When these fires are extinguished, release from the cycle of rebirth (samsara) is attained.
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