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22/09/2019
चक्रांगी
18/11/2017

चक्रांगी

इन नौ औषधियों में वास है नवदुर्गा कामां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात ...
27/09/2017

इन नौ औषधियों में वास है नवदुर्गा का
मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं।

इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां,जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया। चिकित्सा प्रणाली का यह रहस्य वास्तव में ब्रह्माजी ने दिया था जिसे बारे में दुर्गाकवच में संदर्भ मिल जाता है। ये औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली हैं।

शरीर की रक्षा के लिए कवच समान कार्य करती हैं। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है।

१ प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ - नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।

पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता)- शिवा यानी कल्याण करने वाली।

२ द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी -
ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है।

इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है। यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी कीआराधना करना चाहिए।

३ तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर-
नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।

यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।

४ चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा -
नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं।

इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।

५ पंचम स्कंदमाता यानि अलसी - नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।

"अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।"
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।

६ षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया -
नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है।
इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करनी चाहिए।

७ सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन-
दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है।

यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है। इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

८ अष्टम महागौरी यानि तुलसी -
नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र।
ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।

"तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि:
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।"
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।

९ नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी -
नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है।

सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
सर्व मंगलम मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्रयम्ब्के गौरी नारायणी नमो स्तुते।।

30/08/2017

#भविष्य_पुराण
भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि
#पीपल के तीन पेड़ लगाने से सद्गति मिलती है
इसके साथ ही लिखा है कि
#कदंब लगाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है,
#अशोक लगाने से शोक का नाश होता है,
#जामून से धन की प्राप्ति होती है,
#बेल-बिल्वपत्र से लंबी आयु मिलती है,
#तेंदू से कुल की वृद्धि होती है,
#अनार से विवाह के योग बनते हैं,
#सुपारी से सिद्धि की प्राप्ति होती है,
#शमी से भयंकर रोगों से छुटकारा मिलता है,
#शीशम लगाने से लोक-परलोक दोनों सुधरते हैं और
#केशर वृक्ष लगाने से शत्रुओं का नाश होना बताया गया है।
कुल मिलाकर, पेड़ सृष्टि का आधार हैं.....
इनका पौराणिक ही नहीं वैज्ञानिक महत्व भी है.....
इनके द्वारा उत्सर्जित ऑक्सीजन और कार्बनडाइक्साईड गैस के अवशोषण के गुण मानव जीवन के लिए अमोघ वरदान है.....
पेड़-पौधे धार्मिक कार्यकलापों के साथ-साथ यह स्वास्थ्य एवं रोजगार के क्षेत्र में भी अहम भूमिका निभाते हैं.....
प्राकृतिक सन्तुलन में पेड़ मुख्य भूमिका निभाते हैं.....
प्राकृतिक आपदाएं, प्रकृति के असन्तुलन से ही बढ़ी हैं.....
यदि इन पर अंकुश लगाना है तो पौधारोपण पर अधिक से अधिक जोर देना होगा....
पौधारोपण करने के उपरांत उनकीं सुरक्षा करना बेहद जरूरी हो जाता है.....
प्रतिवर्ष लाखों पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन सुरक्षा एवं देखभाल के अभाव में वे जल्द ही दम तोड़ जाते हैं.....
इससे कोई लाभ नहीं होने वाला है.....
हमें यह निश्चय करना होगा कि जहां से एक पेड़ कटे, वहों कम से कम दस पेड़ लगाने चाहिए....
यदि हम हर पर्व, जन्मदिन अथवा अन्य खुशी के पावन अवसरों पर पौधारोपण करने व पौधे उपहार स्वरूप देने की परंपरा शुरू करने का निश्चय करें तो नि:सन्देह अल्प समय में ही धरा वृक्षों से हरीभरी हो जायेगी और चहुंओर सुख, समृद्धि एवं शांति की अनहद बयार बहती नजर आयेगी।
प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति तो मिलेगी ही, साथ ही अपार पुण्य एवं मानसिक शांति की भी प्राप्ति होगी।
पर्यावरण की हो सुरक्षा, जिससे बढ़कर नहीं तपस्या I

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29/06/2017

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कर्पूर (कपूर)कपूर के बारे में तो हम सभी जानते हैं आइए आज जानते है कपूर के बारे में और कैसे बनता है और कहां मिलता हैकपूर ...
05/01/2017

कर्पूर (कपूर)

कपूर के बारे में तो हम सभी जानते हैं आइए आज जानते है कपूर के बारे में और कैसे बनता है और कहां मिलता है

कपूर के फायदे, प्रयोग, देसी और कृत्रिम कपूर

मुख्यतः कपूर हमारे घर और मंदिर में भगवान् की आरती में प्रयोग होता है, इसके अतिरिक्त कपूर आयुर्वेदिक दवाओ, तेलों, सुगंध ,कीड़े-मकोडो को दूर रखने में भी प्रयोग किया जाता है.
कपूर दो प्रकार के होते है एक प्राकृतिक जो कि कपूर के पेड़ से मिलता है और दूसरा कृत्रिम केमिकल कपूर जोकि सामान्यतः बाज़ार में मिलता है

प्राकृतिक कपूर देसी कपूर, भीमसेनी कपूर, जापानी कपूर के नाम से जाना जाता है. भीमसेनी कपूर की यह खासियत होती है कि पानी में डालने पर यह नीचे बैठ जाता है. यह कपूर वृक्ष के पत्ती, छाल और लकड़ी से आसवन विधि द्वारा सफ़ेद रंग के क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जाता है.

कपूर वृक्ष

कपूर के वृक्ष का वानस्पतिक नाम Cinnamomum camphora (सिनामोमम कैम्फोरा) है. यह सदाबहार वृक्ष मुख्यतः चीन में पाया जाता था जहाँ से यह ताइवान, जापान, कोरिया, वियतनाम और दुनिया के बाकी देशों में पहुंचा. इस वृक्ष पर चमकदार, चिकने पत्ते पाए जाते हैं जिनको मसलने पर कपूर की खुशबु आती है. वसंत मौसम में इस वृक्ष पर सफ़ेद रंग के छोटे-छोटे फूल गुच्छों में लगते है.

प्राकृतिक कपूर

आयुर्वेद के अनुसार कपूर कफ-दोष नाशक और कोलेस्ट्रोल लेवल को कम करने मददगार होती हैआयुर्वेद के अनुसार प्राकृतिक कपूर डला तेल बालों के लिए अच्छा माना गया है बाल मजबूत और घने होते हैं. चने के बराबर कपूर केले के बीच में रखकर खाने से बवासीर रोग में लाभ होता है.

कपूर युक्त तेल सीने पर मालिश करने बंद नाक और कफ और जकड़न से रहत दिलाता है .
यह तेल आर्थराइटिस और मांसपेशियों के दर्द में मालिश करने से राहत देता है. इसके अतिरिक्त मुख की दुर्गन्ध दूर करने, दांत-दर्द में, पेट के कृमि का नाश करने में लाभदायक है.

दवाइयां जिनमे कपूर प्रयोग होता है

कपूर का अधिक मात्रा में सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है अतः इसके लिए किसी अनुभवी आयुर्वेदाचार्य के निर्देश में ही करें.
भारत में कपूर देहरादून ,मैसूर ,सहारनपुर , नीलगिरी में पैदा होता है, भारत में कपूर केवल पत्तियों के आसवन से ही प्राप्त किया जाता है. दक्षिण भारत के कुछ भोज्य पदार्थों में कपूर का उपयोग किया जाता है .

कपूर का फूल और पत्ती

कृत्रिम कपूर तारपीन के तेल को बहुत सी केमिकल प्रक्रियाएं करने के बाद प्राप्त होता है. इसका रासायनिक फार्मूला है . यह पानी में अघुलनशील और अल्कोहल में घुलनशील होता है. यह कपूर बहुत से कारखानों में प्रयोग किया जाता है , यह पालीविनायल क्लोराइड, सेलूलोस नाइट्रेट, पेंट, धुवां-रहित बारूद और कुछ खास प्रकार के प्लास्टिक, कफ-सीरप आदि के उत्पादन में प्रयोग किया जाता है ।

05/11/2016
Few blossoms @ MBAC Herbal Gardan
18/10/2016

Few blossoms @ MBAC Herbal Gardan

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