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14/05/2022

आज्ञा चक्र नीचे के योग क्रम से छठा चक्र है।

आज्ञा = जितने भी प्रकार की आत्मा की मनोइच्छाएं है, वे सब यहाँ इच्छा करते ही तत्काल पूर्ण होती है,क्योकि ये स्थान केवल शक्ति की प्रधानता का चक्र है,यहाँ किन्तु परन्तु या संशय नही रहता है,केवल आदेश और उसका पालन होता है, इसलिए इसे आज्ञाचक्र कहा गया है।

यहाँ मन की दो धाराएं यानि इच्छा और क्रिया एक हो जाती है, इसे विल पावर चक्र भी कहते है। ये मस्तक के सामने के बीच के भाग और दोनों भोहों के कुछ ऊपर स्थित होता है। (वैसे ये सूक्ष्म शरीर में होता है) इसे तीसरी आँख भी कहते है। यहां मनुष्य की त्रिनाडियों यानि इंगला (चंद्र नाड़ी) पिंगला (सूर्य नाड़ी) और इन दोनों का क्रिया स्थान सुषम्ना (मन का मूल प्रवेश द्धार) बनकर एक हो जाती है। उनका संगम स्थान होता है। इसे ही सच्ची त्रिवेणी तीर्थ यानि संगम भी कहते है। यही सारी चेतना शक्ति का विकास होता है। यहां से ही सहस्त्रार चक्र का मार्ग प्रारम्भ होता है।

यहाँ सभी मंत्र यानि मन + त्र- मन की तीन अवस्थाओं का एक होना ही मन का त्राण अर्थ है। यहाँ सभी मंत्र केवल नाँद रूप में बदल कर अपनी चेतना शक्ति के रूप में कार्य करते है और वे यहां पहले केवल शुद्ध प्रकाश और उसमे हो रहे आकर्षण विकर्षण के हो जाने पर उनसे निर्मित उर्ध्वगामी शक्ति धारा से उत्पन्न एक उर्ध्वगामी ध्वनि जिसे ॐ कहते है,उसमें परिवर्तित हो जाते है। ये प्रकाश अनन्त स्वरूप में श्वेत व् शीतल अरंग होता है। इसे ही अनगिनत साधक निराकार ईश्वर के प्रकाश रूप में दर्शन पाते है और उसमें ठहर जाते है। इसे ही आदि-मध्य-अंत मान सम्पूर्ण समझते है। जबकि यहां तो मनुष्य की सभी शब्द रूपी अनंत इच्छाएं जिन्हें मंत्र भी कहते है,वे शक्ति में रूपांतरित होना भर की अवस्था का शक्ति रूप दर्शन मात्र है। इससे आगे तो आत्मदर्शन की श्रंखला शेष होती है।

यहां साधक के त्रिगुण-तम्-रज-सत् मिलकर एक गुण यानि निर्गुण बन जाते है। पर यहाँ निर्गुण का अर्थ निष्क्रिय और शक्तिहीन नहीं है। बल्कि शक्ति सहित सगुण है। तभी तो आज्ञा और उसका पालन होता है और साथ ही इस चक्र से आकाशवाणी भी होती है, जो भी प्रश्न होता है, उसका उत्तर भी मिलता है, ये वरदान स्थान भी है।

इस चक्र में प्रवेश होते ही साधक को चारों और यानि दसो दिशाओ में एक साथ एक समान निर्विघ्न रूप में सर्वत्र सब कुछ तीनों कालों के अंतर्गत जो भी है, वो सब ऐसे दीखता है, जैसे सब उसके बिलकुल सामने ही हो रहा हो। यहाँ शुक्र के तारे की तरहां आसमानी चमक वाला प्रकाशित बिंदु सदूर आकाश में दिखता है। इस आकाश को चिद्धि आकाश भी कहते है। और जब साधक की जो भी अच्छी या बुरी इच्छा होती है, वो इस शुक्र की तरह चमकते तारे से शक्ति निकलती हुयी इस भौतिक या आध्यात्मिक जगत में पूरी होती दिखती है। बल्कि ऐसा प्रत्यक्ष लगता है की-जैसे- इस तारे के ठीक पीछे से शक्ति अपने अच्छे रंग यानि श्वेत शक्ति बादल से या बुरी शक्ति काले बादल और बिजली कड़कती के रूप में फैलती चली जाती है,और आदेश अनुसार कार्य करती है। और यदि साधक को इसी बीच में अपना आदेश बदलना होता है या उस सम्बंधित उत्तर चाहिए होता है,तो वो उत्तर प्राप्ति सहित ठीक वेसा ही आदेश अनुसार होने लगता है।

स्त्री आज्ञा का मूल केंद्र में रंग पीली कणिकाओं वाला यानि रजोगुणी रश्मियों वाला श्वेत पुष्प है, जिसके केंद्र में ओंकार ध्वनि सहित प्रस्फुटित और विस्तारित है, फिर उसके बाहर की और दो लाल और नीलवर्णीय नेत्रों जैसे पटल है, इन्हें ही योनि पटल या योनि चक्र भी कहते है, और उन पटलो के दोनों और के केंद्रों की और दो दलीय पद्म है,और उन पर सं और हं बीजमंत्र प्रतिष्ठित है,वेसे यहाँ कोई बीजमंत्र नहीं रहते है,ये दोनों चेतना शक्ति की धारा के दो छोर बीजमंत्र नाम है,यानि आती चेतना का स्वर स है और जाती चेतना का स्वर ह है। ये ही योनि पीठ भी कहलाता है।

इन सबके पीछे पंच तत्वों और उनकी पांच प्राण शक्तियों के समिश्रण या एकत्रीकरण से एक पंच कोणीय सितारा है, जो शुक्र के तारे जैसा श्वेत और नीलवर्णीय मिश्रित रंग से अनन्त तक प्रकाशित है, जिसकी चमक श्वेत दूध जैसी निर्मल और शांत अनंत रश्मियों से निर्मित है, ये चारों और ऐसे फैल रहा है, जैसे किसी प्रकाश को छलनी के अवरोध से रोका जाये और वो उस छलनी के अनंत छिद्रों से प्रस्फुटित होता रहें। फिर ये सब के पीछे नीलवर्णीय आकाशीय बादल है,जो फिरोजी रंग के आकाश के केंद्र में इन सबके साथ विस्तारित हो रहे हो।

स्त्री शक्ति का ये आज्ञाचक्र अद्धभुत है।

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Mid brain activation workshop starting from 8 june 2019 to 9 june
Timing - 10 a.m. - 4p.m.
Venue - #1947 Dashmesh Nagar, Street no.8 ,MUKTSAR
Mobile no.- 9814316964

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