09/12/2021
चिरकाल से इस देश का यही दुर्भाग्य रहा है लेकिन अब तो ये सिद्ध होता जा रहा कि नही है उनका खून इस मिट्टी में, ये हराम का खून है।
क्यों कि.....
जब उरी हुआ.... तो तुम हँस रहे थे!
जब पुलवामा हुआ.... तो तुम हँस रहे थे!
रोहित सरदाना की मृत्यु हुई...तो तुम हंस रहे थे!
जब मनोहर पर्रिकर जी की मृत्यु हुई....तो तुम हँस रहे थे!
जब सुषमा स्वराज जी की मृत्यु हुई.... तो तुम हँस रहे थे!
जब भारत पाकिस्तान से हार गया......तो तुम हँस रहे थे!
अब जब राष्ट्र के CDS बिपिन रावत का हेलिकॉप्टर क्रैश हुआ, तो भी तुम हँस ही रहे।
खैर जनरल विपिन रावत की असमय मृत्यु से चीनी, पाकिस्तानियों का खुश होना लाजमी है लेकिन भारत की मजहबी कौम, उनके समर्थक राजनीतिक दल, जिहादी, अर्बन नक्सली, पत्रकार, कुछ संपादक, कुछ न्यूज चैनल और उसके एंकर खुशी मनाएं, उन माधरजातों को इस मिट्टी का कैसे माना जाय ??
आज देश के एक वीर सिपाही के निधन पर गलत, दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी करने वाले माधरजात हरामी हैं दोगले हैं और अपनी नस्ल बदल चुके हैं, यह कहने में मुझे जरा सा भी संकोच नहीं है।
जनरल हमेशा आंतरिक सुरक्षा के इन खतरों से हमें आगाह करते रहे कि ऐसे पापियों को हमें पहचानना होगा। आज देख लिया कि इस देश को बाहरी शत्रुओं से ज्यादा आंतरिक शत्रुओं से समस्या है। दिख रहा कि एक बहुत विशाल शत्रु सेना देश के अन्दर ही है, जो खा भी देश का रहे हैं और गरिया भी देश को ही रहा है।
जनरल विपिन रावत उन बड़े नामों में से थे जिन्होंने सबसे पहले ढाई मोर्चे कहना शुरू किया था। दो मोर्चे कौन से देश हैं, वो हम सब जानते हैं, बाकी का आधा कौन है, उसे स्वीकारने में कुछ लोग हिचक जाते हैं। आज के उनके कुकृत्यों के बाद अगर उस "ढाई मोर्चे" के बचे हुए "आधे" को पहचानना शुरू नहीं किया गया तो मूर्ख ही है वो।
खैर जनरल की असमय मृत्यु से उपजे दुख ने इस स्तर पर जैसा गहरा अवसाद पैदा किया है वह देखकर लग रहा है कि भारत का गंभीर हिन्दू जनमानस अब एक एकीकृत राष्ट्र की तरह देश को देखने लगा है, तभी देश को लेकर इतना संवेदनशील हो गया है। दुःख की ऐसी घड़ी में सम्पूर्ण राष्ट्र एक परिवार की तरह प्रतिक्रिया दे रहा है। इस नए समाज की एकजुटता और संवेदनाओं को नमन। किसी सैनिक के जाने पर व्यक्तिगत क्षति की तरह लोगों का प्रतिक्रिया देना देश के प्रति उनके कर्तव्यों व निष्ठा को प्रदर्शित कर रहा है। दिवंगत आत्माओं को नमन लेकिन बहुत सारा दुःख और ढेर सारे प्रश्न हैं जिनकी जाँच होनी ही चाहिए और बहुत सारे चिन्हित हरामियों पर कार्यवाई भी होनी चाहिए।
यह देश सिर्फ़ रोने के लिए और हर बार खून के घूंट पी जीने के लिये नहीं बना, उसे सवालों के जवाब भी चाहिए और देश के सम्मानित जनों के मृत्यु पर हंसने वालों पर कठोर एक्शन भी।