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14/02/2026

महाशिवरात्रि 15 फरवरी पर विशेष आध्यात्मिक संदेश
हम सभी परमात्मा को अपनी प्रार्थनाओं, भजनों और रीति-रिवाजों में पुकारते आए हैं। हमारे पास जो कुछ भी है, उसके लिए हम उन्हें धन्यवाद देते आए हैं.... उनकी शक्तियों की महिमा करते आए हैं… उन्हें मदद के लिए पुकारते आए हैं.... और हमारे पापों को क्षमा करने के लिए कहते आए हैं... इस तरह से हम सभी हर दिन परमात्मा से बात करते हैं… पर क्या हमने कभी ये जानने की कोशिश की है कि, वो हमसे क्या कहना चाहते हैं? इस महाशिवरात्रि या शिव जयंति (इस वर्ष 15 फरवरी) पर, परमात्मा द्वारा दिए गए संदेश को सुनें जिसमें आपको वो सारे जवाब मिल सकते हैं जिन्हें आप वर्षों से जानना चाहते थे। आइए सुनें कि, वे हमसे क्या कह रहे हैं:
मेरे मीठे बच्चे, तुम मुझे भूल गए हो, क्योंकि हम बहुत समय से नहीं मिले हैं। तुमने मेरे बारे में सुना है, पढ़ा है, लेकिन
अब वह समय आ गया है जब मैं तुमसे सीधे बात करना चाहता हूँ और वह सत्य बताना चाहता हूँ, जिसे तुम हमेशा जानना चाहते थे। इससे पहले कि मैं अपने बारे में बताऊँ, पहले मैं तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि तुम वास्तव में कौन हो। मीठे बच्चे, तुम वह नहीं हो जो तुमने अपने नाम, जाति, धर्म, पेशा या रिश्तों के आधार पर खुद को समझ लिया है। तुम यह शरीर भी नहीं हो, जो इन आँखों से दिखाई देता है।
तुम एक ज्योति-बिंदु आत्मा हो—अति सूक्ष्म, प्रकाशमय चेतना। एक ऐसी आत्मा, जिसने अपने रोल निभाने के लिए अनेक जन्मों में अलग-अलग शरीर धारण किए हैं। तुम मूल रूप से पवित्र, शांत, प्रेमस्वरूप और शक्तिशाली हो।
आज से लगभग 5000 वर्ष पहले, तुम सभी मेरे साथ अपने घर—आत्माओं के घर, सोल वर्ल्ड—में रहते थे। वह शांति और पवित्रता की दुनिया थी। फिर, अपने-अपने रोल निभाने के लिए, तुम इस भौतिक संसार में आए। जब तुम पहली बार धरती पर आए, तब तुम संपूर्ण, श्रेष्ठ और सतोप्रधान थे। हर आत्मा को अपना किरदार निभाने के लिए एक सुंदर और श्रेष्ठ शरीर मिला था। उस समय यह संसार भी दिव्य था—प्रेम, शांति और समृद्धि से भरपूर। इसी कारण उसे स्वर्ग, जन्नत या बहिश्त कहा गया। जब एक शरीर बूढ़ा हो जाता था, तो आत्मा नया शरीर लेकर अपना अगला रोल निभाती थी। इस तरह सोल वर्ल्ड से और आत्माएँ इस संसार में आती गईं। लगभग 2500 वर्षों तक तुम सभी आत्माएँ इस सुखमय संसार का आनंद लेती रहीं, जिसे सतयुग और त्रेतायुग कहा जाता है।

08/04/2025
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21/10/2024

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29/08/2023
27/07/2023

ओम शांति आज 27 जुलाई 2023 है।
बाबा ने कई बार सेवा की परिभाषा बताई है। सच्चे सेवा क्या है और कौन है सच्चे सेवाधारी आइये आज फिर से सच्चे सेवाधारी कौन है और आने वाले समय में क्या सेवा करनी चाहिए ये बात आज के स्लोगन से जान लेते हैं।
अपने शांति और सुख के वाइब्रेशन से हर एक को सुख चैन की अनुभूति कर आओ तब कहेंगे सच्चे सेवाधारी।
जैसे जैसे समय नाजुक होता जाएगा समय समीपता की ओर बढ़ती जाएगी। वैसे वैसे चारों ओर हलचल की अनुभूतियाँ हलचल दिखाई देगी और आत्माओं के मन के अंदर दुख और अशांति की लहर भी बढ़ती जाएगी और इसीलिए उस समय की सेवा कौन सी सेवा होगी उस समय ना तो वाणी की सेवा काम आएगी, ना कर्मणा की सेवा काम आएगी ना ही धन की सेवा काम आएगी ना प्रदर्शनी, न मेला, ना प्रोजेक्टर कोई भी नहीं, परन्तु उस समय की जो सेवा है
वो है मनसा सेवा। ऐसे ही दुखी और अशांत आत्माएं जब चारों और हलचल में अपने आप को भी हलचल में ला रहे होंगे उस समय अपने शक्तिशाली द्वारा।
शक्तिशाली शुभ भावना शुभकामना के वाइब्रेशन देना उन्हें सुख चैन के वाइब्रेशन के के द्वारा अनुभव कराना सुख और शांति के आनंद की यही है उस समय की सच्ची सेवा और जो ऐसी सेवा करने के समर्थित रखते हैं उन्हीं को ही सच्चे सेवाधारी कहा जाता है। तो इसके लिए बाबा ने पहले भी कहा हुआ है हमें अपने मन और बुद्धि को बहु काल से मन को एकाग्र करने के बुद्धि को एकाग्र करने की अभ्यास होना चाहिए। उस समय हलचल के समय

एक सेकंड में चारों तरफ से अपने मन बुद्धि को समेटकर के एक ही श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रखना शांति की स्थिति में सुख की स्थिति में आनंद की स्थिति में अपने मन बुद्धि को एक सेकंड में स्थित रख पाना ये
है एकाग्रता की शक्ति।

इसी एकाग्रता की शक्ति से ही हमारी वृद्धि से वही स् थिति का वाइब्रेशन वायुमंडल में फैले गा चाहे वह शांति हो, चाहे चैन हो, चाहे सुख हो, चाहे आनंद हो, ये वृत्ति द्वारा चारों और वायुमंडल में फैल लेंगे और आत्माओं को इन से हम सेवा कर सकते हैं। आत्माओं को कुछ ही पलों के लिए ही सही, उनको सुख और चैन की अनुभूति हम करा पाएंगे। परंतु अगर हमने बहु से मन बुद्धि को एकाग्र करने के अभ्यास नहीं किया है तो उस हलचल के समय में भी हम स्वयं हलचल हो जाएंगे।

हम भी परिस्थिति के प्रभाव में आ जाएंगे। हम खुद ही अपने आप को मन की एकाग्रता करने के अभ्यास उस समय बन जाएंगे। कहने का भाव दिए हैं कि सेवाधारी होते हुए भी उस समय दुखी और अशांत आत्माओं की सेवा हम स्वयं नहीं कर पाएंगे, क्योंकि हम स्वयं ही हलचल में है इसलिए अभी से ही हमें बहु का अभ्यास करना होगा अपने मन बुद्धि को एकाग्र करने की एक ही स्थिति में

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