22/09/2026
जमुई की घटना: पुलिस-प्रशासन से पहले, कसूर हमारा भी
हार के जमुई में उन दो मासूम बच्चों के साथ जो कुछ भी हुआ, उसने दिल को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है। लेकिन सच कहें तो इस पर सिर्फ दुख जताने या सोशल मीडिया पर गुस्सा निकालने से अब कुछ नहीं बदलने वाला। जब तक हमारे समाज के दो-चार अच्छे और समझदार लोग "हमें क्या मतलब" कहकर चुप बैठे रहेंगे, तब तक ऐसी दरिंदगी आज जमुई में हुई है, कल किसी और शहर या गांव में होगी। सोचने वाली बात यह है कि ये दरिंदे कोई बाहर से नहीं आए हैं, ये इसी समाज में पैदा हुए हैं और हमारे-आपके बीच ही पले-बढ़े हैं। बीच सड़क पर ऐसी हैवानियत करने की जो हिम्मत इनके अंदर आई है, वो रातों-रात नहीं आई। वो हिम्मत इन्हें इसी समाज के ढीलेपन और हमारी चुप्पी से मिली है।हमें अब यह कड़वा सच स्वीकार करना ही होगा कि सरकार या पुलिस को दोष देना बहुत आसान है, और उनकी लापरवाही पर सवाल उठना भी चाहिए, लेकिन प्रशासन तो घटना होने के बाद आता है। अपराध को रोकने की पहली जिम्मेदारी हमारी खुद की है, हमें अपनी सामाजिक जवाबदेही समझनी होगी। हम यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि यह तो किसी एक जगह की घटना है। आज हकीकत यह है कि देश के हर गांव, हर शहर और हर गली-मोहल्ले में ऐसे बदमाश और गुंडे पल रहे हैं। जब हम अपने आस-पास किसी को हुड़दंग मचाते या गलत करते देखते हैं और टोकते नहीं हैं, तो हम खुद उनके हौसले बढ़ा रहे होते हैं। बुरे लोगों की ताकत उनके खुद के दम पर नहीं, बल्कि अच्छे लोगों के चुप रहने की वजह से बढ़ती है। जब तक समाज के भले लोग संगठित होकर इन बदमाशों का खुलकर विरोध नहीं करेंगे, तब तक कोई भी बच्चा या बहन-बेटी सुरक्षित नहीं रह सकती।अब समय सिर्फ मोमबत्ती जलाने या रोष जताने का नहीं है, बल्कि अपने गिरेबान में झांकने का है। हमें अपने घरों और मोहल्लों में ऐसा माहौल बनाना होगा जहां गलत करने वाले को तुरंत टोका जाए और उसका सामाजिक बहिष्कार हो। जब तक समाज खुद खड़ा होकर ऐसे तत्वों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा, तब तक इन अपराधियों के मन में न तो कानून का डर बैठेगा और न ही समाज का।
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