05/05/2026
बिहार असिस्टेंट प्रोफेसर लेटर
किस प्रखंड में कितने नियुक्ति होनी है!
मानव धर्म, स्वतंत्रता,समता और बंधुत्व _ _ _ _ _ _ _
05/05/2026
बिहार असिस्टेंट प्रोफेसर लेटर
किस प्रखंड में कितने नियुक्ति होनी है!
14/04/2026
तुम किताबों के सामने झुक जाओ,
ये तुम्हारे सामने दुनिया झुका देगी।
- डॉ. भीमराव आंबेडकर
अम्बेडकर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐💐
#अम्बेडकर_जयंती #अम्बेडकर #बाबा_साहेब #बाबासाहेब #बाबा_साहेब_भीमराव_अम्बेडकर
12/04/2026
आंबेडकर ने जोतीराव फुले को अपना गुरु क्यों माना ?
जन्मदिवस(11 अप्रैल) पर सादर नमन
आधुनिक भारत में शूद्रों-अतिशूद्रों, महिलाओं और किसानों के मुक्ति-संघर्ष के पहले नायक जोतीराव फुले हैं, जिन्हें ज्योतिबा फुले नाम से भी जाना जाता है. डॉ. आंबेडकर ने गौतम बुद्ध और कबीर के साथ ज्योतिबा फुले को अपना तीसरा गुरु माना है.
अपनी किताब ‘शूद्र कौन थे?’ महात्मा फुले को समर्पित करते हुए बाबा साहेब ने लिखा है कि ‘जिन्होंने हिन्दू समाज की छोटी जातियों को उच्च वर्णों के प्रति उनकी ग़ुलामी की भावना के संबंध में जाग्रत किया और जिन्होंने सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना को विदेशी शासन से मुक्ति पाने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण बताया, उस आधुनिक भारत के महान शूद्र महात्मा फुले की स्मृति में सादर समर्पित.’
फुले ने ‘जाति भेद विवेकानुसार’ (1865) में लिखा कि ‘धर्मग्रंथों में वर्णित विकृत जाति-भेद ने हिंदुओं के दिमाग को सदियों से ग़ुलाम बना रखा है. उन्हें इस पाश से मुक्त करने के अलावा कोई दूसरा महत्त्वपूर्ण काम नहीं हो सकता है. बाबा साहेब अपनी चर्चित कृति जाति व्यवस्था का विनाश यानी ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में ठीक इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए जाति व्यवस्था के स्रोत- धर्मग्रंथों को नष्ट करने का आह्वान करते हैं.
जोतीराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को शूद्र वर्ण की माली जाति में महाराष्ट्र में हुआ था. उनके नाम में फुले शब्द माली जाति के होने की वजह से आया है.
उनके पिता का नाम गोविन्दराव और माता का नाम चिमणाबाई था. फुले जब एक वर्ष के थे, तभी उनकी मां चिमणाबाई का निधन हो गया. उनका पालन-पोषण उनके पिता की मुंहबोली बुआ सगुणाबाई ने किया. सगुणाबाई ने उन्हें आधुनिक चेतना से लैस किया.
सन 1818 में भीमा कोरेगांव युद्ध के बाद पेशवा का शासन भले ही अंग्रेजों ने खत्म कर दिया, पर सामाजिक जीवन पर उनकी जातिवादी विचारधारा का नियंत्रण कायम था. पुणे में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे. सबसे पहले ईसाई मिशनरियों ने शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे खोले.
सात वर्ष की उम्र में जोतीराव को पढ़ने के लिए स्कूल भेजा गया, लेकिन जल्दी ही सामाजिक दबाव में जोतीराव के पिता गोविंदराव ने उन्हें स्कूल से बाहर निकाल लिया. वे अपने पिता के साथ खेतों में काम करने लगे. उनकी जिज्ञासा और प्रतिभा से उर्दू-फारसी के जानकार गफ्फार बेग और ईसाई धर्मप्रचारक लिजीट साहब बहुत प्रभावित थे. उन्होंने गोविंदराव को सलाह दी कि वे जोतीराव को पढ़ने के लिए भेजें और फिर से जोतीराव स्कूल जाने लगे.
इसी बीच 13 वर्ष की उम्र में ही 1840 में जोतीराव का विवाह 9 वर्षीय सावित्रीबाई फुले से कर दिया गया. 1847 में जोतीराव स्कॉटिश मिशन के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने लगे. यहीं पर होनहार विद्यार्थी जोतीराव का परिचय आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से हुआ.
स्काटिश मिशन स्कूल में दाखिले के बाद जोतीराव फुले के रग-रग में समता और स्वतंत्रता का विचार बसने लगा. उनके सामने एक नई दुनिया खुल गई. तर्क उनका सबसे बड़ा हथियार बन गया. हर चीज को वे तर्क और न्याय की कसौटी पर कसने लगे. अपने आस-पास के समाज को एक नए नज़रिए से देखने लगे. इसी दौरान उन्हें व्यक्तिगत जीवन में जातिगत अपमान का सामना करना पड़ा. इस घटना ने भी वर्ण-जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के संदर्भ में उनकी आंखे खोलने में मदद की.
1847 में मिशन स्कूल की पढ़ाई उन्होंने पूरी कर ली. ज्योतिबा फुले को इस बात का अहसास अच्छी तरह से हो गया था कि शिक्षा ही वह हथियार है, जिससे शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति हो सकती है. उन्होंने अपनी एक कविता में लिखा- विद्या बिना मति गई/मति बिना नीति गई/नीति बिना गति गई…
सबसे पहले शिक्षा की ज्योति उन्होंने अपने घर में जलाई. अपनी पत्नी जीवन-साथी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया. उन्हें ज्ञान-विज्ञान से लैस किया. उनके भीतर यह भाव और विचार भरा कि स्त्री-पुरुष दोनों बराबर हैं. दुनिया का हर इंसान स्वतंत्रता और समता का अधिकारी है. सावित्रीबाई फुले, सगुणाबाई, फ़ातिमा शेख़ और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर ज्योतिबा ने हजारों वर्षों से ब्राह्मणों द्वारा शिक्षा से वंचित किए गए समुदायों को शिक्षित करने और उन्हें अपने मानवीय अधिकारों के प्रति सजग करने का बीड़ा उठाया.
अपने इन विचारों को व्यवहार में उतारते हुए फुले दंपति ने 1848 में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला. यह स्कूल महाराष्ट्र में ही नहीं, पूरे भारत में किसी भारतीय द्वारा लड़कियों के लिए विशेष तौर पर खोला गया पहला स्कूल था. यह स्कूल खोलकर जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने खुलेआम धर्मग्रंथों को चुनौती दी.
फुले द्वारा शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं को शिक्षित करने का उद्देश्य अन्याय और उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को उलट देना था. जब 1873 में अपनी किताब ‘ग़ुलामगिरी’ की प्रस्तावना में उन्होंने इस किताब को लिखने का उद्देश्य इन शब्दों में प्रकट किया- ‘सैकड़ों वर्षों से शूद्रादि अतिशूद्र ब्राह्मणों के राज में दुख भुगतते आए हैं. इन अन्यायी लोगों से उनकी मुक्ति कैसे हो, यह बताना ही इस ग्रंथ का उद्देश्य है.’
फुले जितने बड़े समर्थक शूद्रों-अतिशूद्रों की मुक्ति के थे, उतने ही बड़े समर्थक स्त्री-मुक्ति के भी थे. उन्होंने महिलाओं के बारे में लिखा कि ‘स्त्री-शिक्षा के द्वार पुरुषों ने इसलिए बंद कर रखे थे. ताकि वह मानवीय अधिकारों को समझ न पाए.’ स्त्री मुक्ति की कोई ऐसी लड़ाई नहीं है, जिसे ज्योतिबा फुले ने अपने समय में न लड़ी हो. ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई के साथ मिलकर अपने परिवार को स्त्री-पुरुष समानता का मूर्त रूप बना दिया और समाज तथा राष्ट्र में समानता कायम करने के लिए संघर्ष में उतर पड़े.
फुले ने समाज सेवा और सामाजिक संघर्ष का रास्ता एक साथ चुना. सबसे पहले उन्होंने हजारों वर्षों से वंचित लोगों के लिए शिक्षा का द्वार खोला. विधवाओं के लिए आश्रम बनवाया, विधवा पुनर्विवाह के लिए संघर्ष किया और अछूतों के लिए अपना पानी का हौज खोला. इस सबके बावजूद वह यह बात अच्छी तरह समझ गए थे कि ब्राह्मणवाद का समूल नाश किए बिना अन्याय, असमानता और ग़ुलामी का अंत होने वाला नहीं है. इसके लिए उन्होंने 24 सितंबर 1873 को ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की. सत्यशोधक समाज का उद्देश्य पौराणिक मान्यताओं का विरोध करना, शूद्रों-अतिशूद्रों को जातिवादियों की मक्कारी के जाल से मुक्त कराना, पुराणों द्वारा पोषित जन्मजात ग़ुलामी से छुटकारा दिलाना .
इसके माध्यम से फुले ने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत की थी. 1890 में जोतीराव फुले के देहांत के बाद सत्यशोधक समाज की अगुवाई की जिम्मेदारी सावित्रीबाई फुले ने उठायी.
शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के अलावा जिस समुदाय के लिए जोतीराव फुले ने सबसे ज़्यादा संघर्ष किया. वह समुदाय किसानों का था. ‘किसान का कोड़ा’ (1883) ग्रंथ में उन्होंने किसानों की दयनीय अवस्था को दुनिया के सामने उजागर किया. उनका कहना था कि किसानों को धर्म के नाम पर भट्ट-ब्राह्मणों का वर्ग, शासन-व्यवस्था के नाम पर विभिन्न पदों पर बैठे अधिकारियों का वर्ग और सेठ-साहूकारों का वर्ग लूटता-खसोटता है. असहाय-सा किसान सबकुछ बर्दाश्त करता है.
इस ग्रंथ को लिखने का उद्देश्य बताते हुए वे लिखते हैं कि ‘फिलहाल शूद्र-किसान धर्म और राज्य सम्बन्धी कई कारणों से अत्यन्त विपन्न हालात में पहुँच गया है. उसकी इस हालात के कुछ कारणों की विवेचना करने के लिए इस ग्रंथ की रचना की गई है.’ जोतीराव फुले चिंतक, लेखक और अन्याय के खिलाफ निरंतर संघर्षरत योद्धा थे. वे दलित-बहुजनों, महिलाओं और गरीब लोगों के पुनर्जागरण के अगुवा थे. उन्होंने शोषण-उत्पीड़न और अन्याय पर आधारित ब्राह्मणवादी व्यवस्था की सच्चाई को सामने लाने और उसे चुनौती देने के लिए अनेक ग्रंथों की रचना की. जिसमें प्रमुख रचनाएं निम्न हैं-
- तृतीय रत्न (नाटक, 1855), 2- छत्रपति राजा शिवाजी का पंवड़ा (1869), 3- ब्राह्मणों की चालाकी( 1869), 4- ग़ुलामगिरी(1873), 5- किसान का कोड़ा (1883), 6- सतसार अंक-1 और 2 (1885), 7- इशारा (1885), 8-अछूतों की कैफियत (1885), 9- सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक (1889), 10- सत्यशोधक समाज के लिए उपयुक्त मंगलगाथाएं तथा पूजा विधि (1887), 11-अंखड़ादि काव्य रचनाएं (रचनाकाल ज्ञात नहीं).
भले ही 1890 में ज्योतिबा फुले हमें छोड़कर चले गए, लेकिन ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के शोषण के खिलाफ जागरण की जो मशाल जलाई, आगे चलकर उनके बाद उस मशाल को सावित्रीबाई फुले ने जलाए रखा. सावित्रीबाई फुले के बाद इस मशाल को शाहूजी महाराज ने अपने हाथों में ले लिया. बाद में उन्होंने यह मशाल डॉ. भीमराव आंबेडकर के हाथों में थमा दिया. डॉ. आंबेडकर ने मशाल को सामाजिक परिवर्तन की ज्वाला में बदल दिया.
( the print) Siddharth Ramu
04/04/2026
❤❤❤
हमारे समय के सशक्त कवि मोहन मुक्त क्या धारदार लिखते हैं!!!
उनकी कविता संग्रह ़त्म_करेंगे की शीर्षक कविता देखें -
हम ख़त्म करेंगे...
सपेरो
तुम तो कभी साँप नहीं मारते
तुम तो सांप पालते हो
सपेरो ...तुमने कभी नहीं किया कोई नाग यज्ञ
फिर भी तुम कहे जाते हो हिंसक
नटो
तुम्हारी बच्चियां ज़मीन से ज़्यादा वक़्त
आकाश में रहती हैं
एक लम्बे बोल्ट के सिरे पर नट की तरह अटकी
जिस बोल्ट का दूसरा सिरा धंसा रहता है तुम्हारी आंतो में
नटो..
कहते हैं कि नटराज भी आकाश में रहता है
लेकिन वो कभी तुम्हारी बच्चियों से नहीं पूछता हाल चाल
वो अदृश्य केवल तमाशबीन है
जो सिक्के भी नहीं फेंकता
ना ही बजाता है ताली ...शायद वो मुस्कुराता होगा कुटिल कि बांस के डंडे पर टंगी हुई बच्ची तांडव नही कर पायेगी ...शायद वो हंसता होगा गर्वित कि धरती पर उसकी विजय की पताका की तरह तुम्हारी बिटिया लहरा रही है
बहेलियो
तुम्हारी मेहनत से पकड़ी गई सलामत चिड़िया
किसके पिंजड़े में मरेगी ...कोई नही पूछता
कोई नहीं पूछता...कि तुम हो किसके पिंजड़े में
बहेलियो ...हिंसा के पैमाने की तीखी सुई तुम्हारी आँख में क्यों घंसी हुई है ...जबकि पलड़ा तो दूसरी ओर चिपका है ज़मीन पर ...
क्या दुनिया है ये
कि हिरणों का शिकारी कहलाता है पुरुषोत्तम ...हो जाता है ईश्वर
और तुम ज़िंदा चिड़िया पकड़ने पर हिंसक हो जाते हो
जबकि चिड़िया पकड़ना तुम्हारा अपना चुनाव नहीं कभी नहीं था
मदारियो
अब भालू बन्दर नही नचा पाओगे
वन विभाग वाले तुम्हे तस्कर बता देंगे
तुम्हारे करतब अब बासी लग रहे हैं लोगों को
मैं कहूंगा ये तुम्हारे लिए अच्छा है
असल मे तमाशबीन ही बासी हो रहे हैं
उनकी आँखे चमत्कार के क़ाबिल नहीं रहीं
एक जादू होने वाला है ...
जानता है दिल तुम्हारा कि तुम्हारे लिए कुछ अच्छा होने वाला है
भाँडो
तुम्हारी सबसे ऊंची तान भी
तुम्हें आचार्य जैसा ऊंचा नहीं बना पायी
इसलिए तो सूर्यकांत त्रिपाठी बोला
'मैं आचार्य हूं भांड नहीं'
तुम निराले तो हो
लेकिन त्रिपाठी नहीं बन पाओगे
और तय है कि एक दिन तुम इस बात पर बेहद खुश हो जाओगे
छलियो
तुम इस दुनिया के सबसे ज़्यादा छले गए
लोगों में से हो
तुम्हारी तलवारें..
ये तलवारें भोथरी जिनके सहारे नाचते हो ...ये तुम्हारे शरीरों के इतने क़रीब क्यों है
ये क्यों नहीं लहरातीं है तुम्हारी तरह कभी
ये तुम्हारी आत्मा के अलावा किसी चीज़ को नहीं काटतीं
छलियो चेतना को उसका नृत्य लौटा दो
और तलवारों को उनकी भूमिका
कसाईयो
तुम हमें भोजन देते हो
लेकिन किसानों की तरह तुम्हारा कोई शुक्रगुज़ार नहीं
जबकि कोई अंतर नहीं है
किसान की दराती और तुम्हारे चाकू में
तुम इंसान हो मेरे भाई
बिलकुल मेरे जैसे इंसान
मेरा प्यार देना अपने बच्चे को
चांडालो
अगर तुम जलाने वालों में न होकर
दफ़नाने वालों में होते
तो गाली नहीं होते
मिट्टी में जज़्ब होती लाशों में पनपते कीड़े
तुम्हें शुक्रिया कहते
मैं तुम्हें यही कहूँगा
कि अब मुर्दे जलाना बन्द करो
बहुत और चीज़ें जलानी हैं
ऐसी बंजर चीज़ें जिनमें कीड़े भी नहीं पनपते
जल्लादो
मृत्युदंड के विधान वाला मुल्क हिंसक नहीं कहा जाता
भागते 'आरोपी' के सीने में नजदीक से
आठ गोलियां दागने वाली पुलिस हिंसक नहीं
बातचीत के लिए बुलाये गये विद्रोही को भूनने वाला राज्य हिंसक नहीं
मौत लिखने वाला जज हिंसक नहीं
बस तुम हो हिंसक
राज्य धर्म समाज परिवार सभ्यता संस्कृति के समस्त पाप तुम्हारे सर डाल दिये गए हैं
और तुम्हारे इंसान को दिया गया है मृत्युदंड
सुना है इसी दुनिया के कुछ टापुओं में जल्लाद एनेस्थेसिया एक्सपर्ट होते हैं वो हिंसक नहीं कहलाते ...और हाँ वो जल्लाद भी नही कहलाते
जल्लादो...
अपनी हत्या के ख़िलाफ़ खड़े हो जाओ
जल्लादो ...
अपने और सबके मृत्युदंड के ख़िलाफ़ खड़े हो जाओ
सपेरो ..नटो... बहेलियो
सीधी.. सरल ..पहेलियो
मदारियो ..भांडो ..छलियो
फूल न बन सकी ..कलियो
कसाईयो ...मेरे भाईयो
चांडालो ... जल्लादो
सुनो इंसानी औलादो
तुम न तो हिंसक हो
और न ही नीच हो
तुम एक ग़लत दुनिया मे
ग़लत लोगों के बीच हो
तुम और मैं अछूत हैं
हम ग़लत दुनिया का सबूत हैं
सबूतो इकट्ठा हो जाओ
अछूतो इकट्ठा हो जाओ
एक दूसरे को छुओ
पहले एक दूसरे को जानो
करतब तान तलवार आग की
असल आग पहचानो
असल धार इंसानी है
असल आग इंसानी है
जाननी है माननी है बात
उसके बाद मनवानी है
जो हमे कहे
है हिंसक वो ही
हम हैं जागृत
हम विद्रोही
कवियों बिंबों की मनमानी
ध्वस्त करेंगे हमने ठानी
इंसानी आंखों का पानी
आग भरी आंखें इंसानी
हिंसक हमको ठहराये जो
हर उस किताब को भस्म करेंगे
हिंसक इस दुनिया की हिंसा
हम अछूत ही ख़त्म करेंगे
हिंसक इस दुनिया की हिंसा
हम अछूत ही ख़त्म करेंगे...
✍️ मोहन मुक्त
❤❤❤
#हिमालयदलितहै
#हमख़त्मकरेंगे
08/03/2026
संजू सैमसन : प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट 🔥🔥🔥
खिलाड़ी के रूप में ढेर सारे सुपरस्टार देखे हैं मगर पहली बॉल से लेकर आखिरी बॉल तक, टीम और सिर्फ टीम की बेहतरी के लिए शत प्रतिशत समर्पित खिलाड़ी को पहली बार देख रहे हैं।
ये पर्सनल स्कोर, ये सेंचुरी सब क्या होता है, जैसे पता ही नहीं।
नजर सिर्फ एक चीज पर, टीम कहां पहुंची है, किस रफ्तार से रन बन रहे हैं।
विशेष आभार और बधाई 👍👍👍
#संजू_सैमसन
#सूर्याकुमारयादव
#बुमराह #ईशान #विश्व_विजेता
08/03/2026
🔥🇮🇳 T20 वर्ल्ड कप 2026 विजेता - INDIA! 🏆
इतिहास पहले अर्जित किए जाते हैं, बाद में लिखे जाते हैं। क्रिकेट टीम इंडिया ने ऐसा ही इतिहास अर्जित कर लिया है जो भांति–भांति तरीके से लिखा जाता रहेगा।
ढेरों बधाई क्रिकेट टीम इंडिया टी–20 में एकबार फिर से विश्व विजेता बनने के लिए है। 💐💐💐
🇮🇳संजू सैमसन की धमाकेदार बल्लेबाजी, सूर्यकुमार यादव का 360° जादू और बुमराह की घातक गेंदबाजी ने दुनिया को हरा दिया! 💥 क्या कमाल की जीत !!!
#विश्व_विजेता #भारत #भारतीय #भारतीयटीम #संजू_सैमसन #सूर्याकुमारयादव #सूर्यकुमारयादव #बुमराह #ईशान #ईशानकिशन
08/03/2026
बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की इच्छा रखने वाले प्रतीक्षारत विद्यार्थियों के लिए यह सूचना है -
BSUSC अबकी बार लिखित परीक्षा लेना जा रहा है.....
पिछली बहाली में अनुभव प्रमाण पत्र और शोध-पत्र के नाम पर खूब झोल हुआ है, जिसकी जाँच आ भी जारी है और कोर्ट में सुनवाई भी जारी है.....
्रक्रिया
कुल अंक - 200
लिखित परीक्षा- 160 अंक (80%) तथा साक्षात्कार - 40 अंक (20%)
अधिकतम आयु पहले 55 था अब 45 कर दिया गया है।
(नोट - Ph. D को मात्र पात्रता परीक्षा (NET/SLET) के बराबर मान लिया गया है, अलग से कोई वेटेज नहीं है, जिसको लेकर Ph. D डिग्रीधारी कहीं कोर्ट में न लटका दें।
ऐसे बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर की जो भी बहाली आई है, कोर्ट का चक्कर काटी है।
1997 की बहाली 2003 में पूरी हुई,
2014 की बहाली 2024 में पूरी हुई
एवं 2020 की बहाली 2026 में भी पूरी नहीं हो पाई है, अभी इतिहास, जंन्तु विज्ञान एवं वनस्पति विज्ञान बाकी है।
विदित हो कि बिहार में बहाली विश्वविद्यालय के लिए होती है और विश्वविद्यालय द्वारा कॉलेज आवंटित किए जाते हैं)
✍️@डाॅ. दिनेश पाल सर के वाॅल से
⭐बिहार विश्वविद्यालय असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति नियमावली (ड्राफ्ट) 2025
बिहार सरकार ने विश्वविद्यालयों में Assistant Professor की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाने के लिए नई नियमावली का ड्राफ्ट जारी किया है।
मुख्य उद्देश्य
इस नियमावली का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति करना है जिनके पास: • विषय का गहरा ज्ञान
• प्रभावी शिक्षण क्षमता
• मजबूत अनुसंधान दृष्टिकोण
यह नियम बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1976 और पटना विश्वविद्यालय अधिनियम 1976 के अंतर्गत आने वाले विश्वविद्यालयों पर लागू होंगे।
शैक्षणिक योग्यता
• संबंधित विषय में न्यूनतम 55% अंकों के साथ मास्टर डिग्री
• बिहार के SC / ST / EBC / BC / PwD उम्मीदवारों को 5% की छूट
अनिवार्य पात्रता में से कोई एक:
• UGC NET
• CSIR NET
• SLET / SET
या
• UGC नियम (2009 / 2016) के अनुसार PhD करने वालों को NET से छूट
आयु सीमा
• न्यूनतम आयु: 23 वर्ष
• अधिकतम आयु: 45 वर्ष
आयु की गणना 1 अगस्त (विज्ञापन वर्ष) के आधार पर होगी।
नियुक्ति की शर्तें
• चयनित उम्मीदवार को कम से कम 5 वर्ष तक उसी विश्वविद्यालय में सेवा देना अनिवार्य
• नियुक्ति पत्र मिलने के 1 महीने के अंदर जॉइन करना होगा
चयन प्रक्रिया (Selection Process)
नियुक्ति प्रक्रिया बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) द्वारा आयोजित की जाएगी।
1. लिखित परीक्षा
• परीक्षा प्रकार: वर्णनात्मक (Descriptive)
• सिलेबस: UGC NET के समान
परीक्षा विवरण
• कुल अंक: 160
• समय: 3 घंटे
• चयन में वेटेज: 80%
न्यूनतम अंक
• सामान्य वर्ग: 50%
• SC/ST/PWD: 45%
2. साक्षात्कार के लिए शॉर्टलिस्टिंग
• लिखित परीक्षा पास उम्मीदवारों को ही बुलाया जाएगा
• प्रत्येक पद के लिए 1:3 अनुपात में उम्मीदवार
उदाहरण
10 पद = 30 उम्मीदवार इंटरव्यू
3. साक्षात्कार
• कुल अंक: 40
• चयन में वेटेज: 20%
साक्षात्कार बोर्ड में:
• कम से कम 3 विषय विशेषज्ञ
• सभी विशेषज्ञ प्रोफेसर स्तर के होंगे
अंतिम मेरिट
कुल अंक: 200
लिखित परीक्षा = 160 अंक
साक्षात्कार = 40 अंक
टाई ब्रेक नियम
अगर दो उम्मीदवारों के अंक समान हों तो:
1️⃣ लिखित परीक्षा में अधिक अंक वाले को प्राथमिकता
2️⃣ फिर अधिक उम्र वाले को प्राथमिकता
3️⃣ फिर देवनागरी वर्णमाला क्रम के अनुसार चयन
निष्कर्ष
नई नियुक्ति प्रणाली का उद्देश्य:
• पारदर्शी चयन
• विषय ज्ञान पर आधारित भर्ती
• विश्वविद्यालयों में बेहतर शिक्षण और अनुसंधान
01/02/2026
रैदास: आधुनिक जीवन-मूल्यों, आदर्शों और सपनों के क्रांतिकारी कवि
रैदास जयंती की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं 💐💐💐
रैदास अपने चिंतन और अभिव्यक्ति में पूरी तरह से आधुनिक चिंतक और लेखक हैं। आधुनिक चिंतन का सबसे बड़ा लक्षण क्रिटिकल थिंकिंग (समालोचनात्मक सोच) माना जाता है, जिसे सहज और सरल शब्दों में कहें तो अपने समय की वर्चस्ववादी वैचारिकी, संवेदना, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्थितियों और संबंधों को आलोचनात्मक विवेक दृष्टि से देखना। वर्चस्व और अधीनता के सभी रूपों को चुनौती देना। चिंतन और लेखन के केंद्र में ईश्वर और राजा-महाराजा की जगह सामान्य इंसान को प्रतिष्ठित करना। आस्था की जगह तर्क और विवेक को देखने-समझने का प्रस्थान बिंदु बनाना। भाग्य-नियति नहीं, बल्कि कर्म को सब कुछ मानना। व्यक्ति की महत्ता का मूल्यांकन धर्म, जाति, परिवार या खानदान के आधार पर नहीं करके उसके गुणों के आधार पर करना। शास्त्र के सच को नहीं, भोगे हुए सच को, अपने अनुभव के सच को लेखन और अभिव्यक्ति का विषय बनाना। सर्वश्रेष्ठता का दावा करने वाले धर्मों और ग्रंथों तथा उन पर आधारित सामाजिक संबंधों को चुनौती देने और उन्हें खारिज करने का साहस रखना। रैदास आधनुकिता के इन सभी अर्थों में आधुनिक चिंतक हैं। श्रम और श्रमिक की महत्ता का उन्होंने जिस तरह बखान किया है, वह उन्हें मार्क्सवादी चिंतन के आसपास ले जाकर खड़ा कर देता है। डॉ. आंबेडकर से 400 वर्ष से अधिक समय पहले जन्मे रैदास में उनके वर्ण-जाति व्यवस्था संबंधी चिंतन के बुनियादी तत्व दिखाई देते हैं।
भारतीय समाज में सामंतवाद बनाम आधुनिकता का संघर्ष ब्राह्मणवाद और बहुजन-श्रमण परंपरा के बीच के संघर्ष के रूप में अभिव्यक्त होता रहा है। आइए पंद्रहवीं शताब्दी के रैदास के आधुनिक चिंतन को उनके लेखन के माध्यम से देखने-समझने की कोशिश करते हैं।
रैदास के चिंतन-लेखन में श्रम और श्रमिक की महत्ता
पश्चिम के देशों में श्रम और श्रमिक को चिंतन के केंद्र में लाने का श्रेय मार्क्सवाद को जाता है। श्रम और श्रमिक को मानव विकास यात्रा का केंद्र मानने वाले लोगों को समाजवादी और कम्युनिस्ट तक कहा जाता है। लेकिन भारत में रैदास सर्वश्रेष्ठता का दावा करने वाले और खुद को भू-देवता कहने वाले ब्राह्मणों की तुलना में श्रमिकों को श्रेष्ठ ठहराते हैं। यथा–
धरम करम जाने नहीं, मन मह जाति अभिमान।
ऐ सोउ ब्राह्मण सो भलो रविदास श्रमिकहु जान॥
श्रमिक को परजीवी ब्राह्मणों की तुलना में श्रेष्ठ कहना, वह भी पंद्रहवी शताब्दी में। आखिर श्रमिक से ब्राह्मण की तुलना क्यों? दरअसल, भारतीय समाज में ब्राह्मण श्रम से घृणा करने वाले समूह का प्रतिनिधि है। ब्राह्मणवादी ग्रंथों और उनके रचयिता ब्राह्मणों ने ऊंच-नीच होने का जो पैमाना बनाया, अगर उसके मूल तत्व को देखने की कोशिश की जाए, तो उसका आधार श्रम है। जो व्यक्ति या समूह जितना ही जरूरी सामाजिक श्रम करता है, ब्राह्मण धर्मग्रंथ और महाकाव्य उसे उतना ही नीच ठहराते हैं। मेहतर सबसे नीच माना जाता है, क्योंकि वह गंदगी की सफाई करता है। अन्त्यज को पांचवां और सबसे नीच वर्ण का माना गया, क्योंकि वह हरवाही और उत्पादन के अन्य कार्य करता था। शूद्र जातियां भी नीच मानी गईं, क्योंकि वे खेती और दस्तकारी के सारे कार्य करती थीं।
लेकिन पंद्रहवीं शताब्दी में रैदास श्रम करके खाने को ही सबसे बड़ा मूल्य मानते हैं। वह जोर देकर कहते हैं कि जब तक हो सके तब तक श्रम करके ही खाना चाहिए–
रैदास स्रम करि खाइहिं, जौं लौं पार बसाय।
नेक कमाई जउ करइ, कबहुं न निहफल जाय॥
वामपंथी-मार्क्सवादी जिस समाजवाद या साम्यवादी समाज को स्थापित करने का स्वप्न देखते हैं या जहां-जहां उन्होंने इसे स्थापित करने में सफलता पाई, वहां सबसे बड़ा जोर इस बात पर था कि हर स्वस्थ व्यक्ति उत्पादन में सीधे श्रमिक के रूप में योगदान दे। कोई भी किसी दूसरे के शारीरिक श्रम पर न पले। दूसरे के शारीरिक श्रम पर पलने वाले को पैरासाइट या परजीवी कहा जाता है, उसे घृणा का पात्र समझा जाता है, क्योंकि वह दूसरे का खून चूस कर जीवित रहता है। ऐसे ही रैदास स्वतंत्रता को महत्व देते हैं और पराधीनता को पाप बताते हैं।
पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत।
रैदास दास पराधीन सौं, कौन करैहै प्रीत॥
भारत की बहुजन-श्रमण परंपरा श्रम और श्रमिकों को केंद्र में रखने वाली परंपरा रही है, यहां तक कि डॉ. आंबेडकर ने जो पहली पार्टी बनाई, वह इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी थी। इसके विपरीत भारत की ब्राह्मणवादी (सामंती) परंपरा परजीवियों की परंपरा रही है। ब्राह्मणवादी द्विज परंपरा के विपरीत दलित-बहुजन परंपरा के कवि रैदास श्रम की संस्कृति में विश्वास करते हैं। उनका मानना था कि हर व्यक्ति को श्रम करके ही खाना खाने का अधिकार है। रैदास स्वयं भी श्रम करके जीवन-यापन करते थे और श्रम करके जीने को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे। घर-बार छोड़कर वन जाने या संन्यास लेने को वे ढोंग-पाखंड कहते थे। यथा–
नेक कमाई जउ करइ गृह तजि बन नहिं जाए।
इसके बरअक्स द्विज जातियां दलित-बहुजनों के श्रम पर पलती रही हैं, और अपने परजीवीपन पर अभिमान करती रही हैं तथा इसके आधार पर अपनी श्रेष्ठता का दावा करती रही हैं। उनकी नजर में जो व्यक्ति श्रम से जितना ही दूर है, वह उतना ही श्रेष्ठ है और जो सबसे ज्यादा श्रम करता है, उसे सबसे निम्न कोटि का ठहरा दिया गया।
वर्ण-जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था और रैदास
भारत में वर्ण-जाति पर आधारित आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध सामंतवाद का आधार रहा है और आज भी है। आधुनिक चिंतक की तरह रैदास इसका गहन विश्लेषण करते हैं और उसे पूरी तरह खारिज करते हैं। वे कहते हैं कि जन्म के आधार पर कोई नीच नहीं होता है, बल्कि वह व्यक्ति नीच होता है, जिसके हृदय में संवेदना और करुणा नहीं है–
दया धर्म जिन्ह में नहीं, हदय पाप को कीच।
रविदास जिन्हहि जानि हो महा पातकी नीच॥
दूसरी ओर मध्यकालीन सामंतवाद में व्यक्ति या समूह की महत्ता का आधार उसका गुण नहीं, बल्कि यह रहा है कि वह किस जाति, परिवार, खानदान या धर्म में जन्म लिया है। इसकी सबसे सटीक अभिव्यक्ति तुलसीदास के इन शब्दों में होती है–
पूंजहिं विप्र सकल गुनहीना।
सूद्र न पूजहिं ग्यान प्रवीना॥
इसके ठीक विपरीत रैदास का मानना था कि व्यक्ति का आदर और सम्मान उसके कर्म के आधार पर करना चाहिए, जन्म के आधार पर कोई पूजनीय नहीं होता है। बुद्ध, कबीर, फुले, आंबेडकर और पेरियार की तरह रैदास भी साफ कहते हैं कि कोई ऊंच या नीच अपने मानवीय कर्मों से होता है, जन्म के आधार पर नहीं। वे लिखते हैं–
रैदास जन्म के कारनै होत न कोए नीच।
नर कूं नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच॥
आंबेडकर अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ के दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखते हैं कि “अगर मैं हिंदुओं को महसूस करा पाता हूं कि वे भारत के बीमार लोग हैं [और उनकी बीमारी जाति की बीमारी है] और उनकी बीमारी अन्य भारतीयों के स्वास्थ्य और खुशी के लिए खतरे पैदा कर रही है तो मेरी संतुष्टि के लिए इतना काफी होगा।” आंबेडकर से 400 वर्ष से भी पहले रैदास का कहना था कि जाति एक ऐसा रोग है, जिसने भारतीयों की मनुष्यता का नाश कर दिया है। जाति इंसान को इंसान नहीं रहने देती। उसे ऊंच-नीच में बांट देती है। एक जाति का आदमी दूसरे जाति के आदमी को अपने ही तरह का इंसान मानने की जगह ऊंच या नीच के रूप में देखता है। रैदास का कहना था कि जब तक जाति का खात्मा नहीं होता, तब तक लोगों में इंसानियत जन्म नहीं ले सकती–
जात पांत के फेर मंहि, उरझि रहइ सब लोग।
मानुषता कूं खात हइ, रैदास जात कर रोग॥
आंबेडकर भी बार-बार यह कहते हैं कि वर्ण-जाति के विनाश के बिना भारत एक राष्ट्र नहीं बन सकता है। भारतीयों के बीच समता, स्वतंत्रता और बंधुता का नाता नहीं कायम हो सकता है। रैदास का भी मत यही है–
रैदास ना मानुष जुड़ सके, जब लौं जाए न जात।
रैदास अपने पदों में कहते हैं कि जाति ने भारतीयों को टुकड़े-टुकड़े में बांट दिया। हर जाति के भीतर भी कई जातियां हैं–
जाति-जाति में जाति है, ज्यों केलन में पात
यह तथ्य बार-बार आंबेडकर भी अपने लेखन में दुहराते हैं।
हिंदू-मुस्लिम धर्म और रैदास
रैदास साफ शब्दों में कहते हैं कि न मुझे मंदिर से कोई मतलब है, न मस्जिद से; क्योंकि दोनों में ईश्वर का वास नहीं है। हिंदू-मुस्लिम के बीच कोई भेद नहीं करते। वे दोनों के पाखंड को उजागर करते हैं।
मस्जिद सों कुछ घिन नहीं, मंदिर सों नहीं पिआर।
दोए मंह अल्लाह राम नहीं, कहै रैदास चमार॥
रैदास मंदिर-मस्जिद से अपने को दूर रखते हैं, लेकिन हिंदू-मुस्लिम दोनों से प्रेम करते हैं–
मुसलमान सों दोस्ती, हिंदुअन सों कर प्रीत।
रैदास जोति सभ राम की, सभ हैं अपने मीत॥
रैदास बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं है। जिन तत्त्वों से हिंदू बने हैं, उन्हीं तत्त्वों से मुसलमान भी बने हैं। दोनों के जन्म का तरीका भी एक ही है, दोनों एक ही हाड़-मांस से बने हैं–
हिंदू तुरुक महि नाहि कछु भेदा दुई आयो इक द्वार।
प्राण पिंड लौह मास एकहि रैदास विचार॥
यहां स्पष्ट कर लेना जरूरी है कि आधुनिकता और नास्तिकता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। आधुनिक चिंतक-विचारक के रूप में दुनिया को प्रभावित करने वाले और महान चिंतक-विचारक के रूप में स्थापित कांट, हेगेल, थामस पेन, वाल्तेयर, रुसो और जोतीराव फुले में कोई भी नास्तिक नहीं रहे। नास्तिकता को यदि आधुनिकता पर्याय बना दिया जाए तो अधिकांश आधुनिक चिंतक आधुनिक चिंतन परंपरा से बाहर हो जाएंगे। रैदास नास्तिक थे या आस्तिक, यह उनके चिंतन को देखने का आधार नहीं हो सकता है। यदि वे ईश्वर को मानते थे, तो किस रूप में और दुनिया में उसकी भूमिका क्या है? कांट जैसा महान आधुनिक दार्शनिक ईश्वर को खारिज किए बिना दुनिया की व्याख्या गति के नियमों के आधार पर करता है, जिसमें ईश्वर का कोई हस्तक्षेप नहीं है। जोतीराव फुले का निर्मिक ईश्वर उनके चिंतन को किसी तरह तार्किक-वैज्ञानिक, विवेकसंगत और न्यायसंगत बनाने से रोक नहीं पाता है।
किसी चिंतक-विचारक और लेखक के चिंतन के केंद्रीय तत्व की सबसे मुखर अभिव्यक्ति इस बात में होती है कि आखिर वह कैसे राज्य की परिकल्पना करता है। वह तुलसी की तरह वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृसत्ता आधारित रामराज्य की कल्पना करता है या सबकी समृद्धि और समता पर आधारित बेगमपुरा की कल्पना करता है। रैदास बेगमपुरा की कल्पना करते हैं। किसी भी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के जीवन में दुख के दो सबसे मुख्य कारण होते हैं। पहला न्यूनतम आवश्यक आर्थिक संसाधनों का अभाव और दूसरा असमानता और अन्याय आधारित गैर-बराबरी का व्यवहार।
जिस आधुनिक राजनीतिक शब्दावली में आर्थिक मांगें और जनवादी मांगें कहा जाता है। पहले का संबंध व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यक जरूरतों को पूरा करने से होता है, दूसरे का संबंध मानवीय गरिमा के साथ जीने से होता है। सबसे बेहतरीन समाज वह होता है, जिसमें सबकी आर्थिक जरूरतें पूरी हों और दूसरा सबकी मानवीय गरिमा का सम्मान किया जाए। बेगमपुरा के रूप में रैदास ने जिस आदर्श समाज की कल्पना की है, उसके मूल तत्व को उन्होंने दो पंक्तियों में अभिव्यक्त कर दिया है–
ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न॥
उपरोक्त दो पंक्तियों में मानवीयता का मुख्य स्वप्न समाहित है। पहली पंक्ति कहती है कि सबको अन्न मिलना चाहिए। अन्न सभी जरूरी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति को अभिव्यक्त करता है। दूसरी पंक्ति कहती है कि छोटे-बड़े के भेद के बिना सभी लोग समान रूप से रहें। यह दो चीजें ही रैदास को प्रसन्न करने वाली थीं।
तुलसी के वर्णाश्रम आधारित रामराज्य के विपरीत रैदास बेगमपुरा के रूप में एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं, जो कबीर के अमरदेसवा, जोतीराव फुले के आदर्श बलिराजा का राज, डॉ. आंबेडकर के प्रबुद्ध भारत के रूप में आदर्श समाज की कल्पना और मार्क्स के समाजवादी समाज की कल्पना से मेल खाता है–
अब हम खूब वतन घर पाया, ऊंचा खेर सदा मन भाया।
बेगमपुर सहर का नाऊं, दु:ख अंदेस नहीं तिहिं ठाऊं॥
ना तसबीस, खिराजु न मालू, खौफ न खता न तरसु जवालु।
काइमु दाइमु सदा पातिसाही, दाम न, साम एक सा आही।
आवादानु सदा मसहूर, ऊहां गनी बसहिं मामूर।
तिउं-तिउं सैर करहिं जिउ भावै, हरम महल मोहिं अटकावै।
कह रैदास खलास चमारा, जो उस सहर सों मीत हमारा।
उपरोक्त पदों में रैदास ने अपने समय की व्यवस्था से मुक्ति की तलाश करते हुए जिस दुखविहीन समाज की कल्पना की है; उसी का नाम बेगमपुरा या बेगमपुर शहर है। रैदास साहेब इस पद के द्वारा बताना चाहते हैं कि उनका आदर्श देश बेगमपुर है; जिसमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और छुआछूत का भेद नहीं है। जहां कोई टैक्स देना नहीं पड़ता है; जहां कोई संपत्ति का मालिक नहीं है। कोई अन्याय, कोई चिंता, कोई आतंक और कोई यातना नहीं है। रैदास अपने शिष्यों से कहते हैं– “ऐ मेरे भाइयो! मैंने ऐसा घर खोज लिया है, यानी उस व्यवस्था को पा लिया है, जो हालांकि अभी दूर है; पर उसमें सब कुछ न्यायोचित है। उसमें कोई भी दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है; बल्कि सब एक समान हैं। वह देश सदा आबाद रहता है। वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहे जाते हैं। जो चाहे कर्म (व्यवसाय) करते हैं। उन पर जाति, धर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उस देश में महल (सामंत) किसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं। रैदास कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक है, वही हमारा मित्र है।”
रैदास के जन्म और मृत्यु की सटीक तिथि के संदर्भ में चाहे जितनी अनिश्चितता हो और इसको लेकर शोधकर्ताओं में जो भी मतभेद हो, लेकिन इस पर सब एक स्वर से सहमत हैं कि रैदास के चिंतन और लेखन का समय पंद्रहवीं शताब्दी है। इसे मध्यकाल के रूप में जाना जाता है, मध्यकाल को सामंती काल के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस काल में रैदास जैसा आधुनिक क्रांतिकारी चिंतक कैसे जन्म ले लेता है।
किसी व्यक्ति को आधुनिक क्रांतिकारी चिंतक बनाने में निम्न तत्वों की सबसे बड़ी भूमिका होती है–
रैदास की वर्गीय जमीन :
वर्गीय तौर पर वह मेहनतकश वर्ग से आया है, या परजीवी वर्ग से। दूसरे शब्दों में ऐसे वर्ग से आया है, जो उत्पादन करता है और उत्पादन करने के लिए श्रम करता है या ऐसे वर्ग से आया है, जो दूसरे के उत्पादन को हड़प लेता है और बिना उत्पाद में कोई भूमिका निभाये, यानि बिना श्रम किए सुख-सुविधा, यहां तक कि विलासिता की जिंदगी जीता है। रैदास मेहनतकश उत्पादक वर्ग में पैदा हुए थे। उनकी वर्गीय जमीन ने उन्हें आधुनिक क्रांतिकारी चिंतक-लेखक बनाने में अहम भमिका निभाई।
रैदास का सामाजिक आधार :
भारत में वर्गीय संबंधों की अभिव्यक्ति वर्ण-जाति के संबंधों के रूप में हुई। द्विज वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि) बिना उत्पादन और श्रम में हिस्सेदारी किए सुख-सविधा की जिंदगी जीते रहे हैं। जबकि शूद्र और अंत्यज कहे जाने वाले वर्ण उत्पादक और मेहनतकश वर्ण रहे हैं। शूद्रों-अंत्यजों के उत्पाद को हड़प कर द्विज वर्ण सुख-सुविधा और आराम की जिंदगी जीता था, आज भी बड़ा हिस्सा जीता है।
रैदास की वैचारिक विरासत : वर्गीय-सामाजिक जमीन के साथ ही आधुनिक क्रांतिकारी चिंतन की दिशा में जाने की एक अनिवार्य शर्त दार्शनिक-वैचारिक विरासत होती है। रैदास की वैचारिक विरासत बहुजन-श्रमण परंपरा के चिंतकों से जुड़ी हुई है। रैदास के पहले इस विरासत की लंबी ऐतिहासिक जड़ें हैं, जिसमें बुद्ध, जैन, आजीवक, लोकायत आदि शामिल हैं। रैदास से पहले जिसकी अभिव्यक्ति सिद्धों-नाथों की रचनाओं में होती है। रैदास इस विरासत को नई ऊंचाई देते हैं।
रैदास वर्गीय तौर पर मेहनकश वर्ग में न केवल पैदा हुए, वरन् स्वयं भी श्रम करके जीवन-यापन करते हैं। श्रम की अपनी कमाई से जीते हैं और चिंतन-मनन और लेखन करते हैं। वे सामाजिक तौर पर उस दलित समाज में पैदा हुए हैं, जिसे तरह-तरह से अपमानित-लांक्षित किया जाता रहा। दूसरे शब्दों में कहें तो रैदास भारत के सबसे क्रांतिकारी वर्ग-वर्ण में पैदा हुए और उन्हें आजीवकों, बौद्धों, लोकायतों और सिद्धों-नाथों की क्रांतिकारी वैचारिक विरासत मिली। इन तीन तत्वों ने मिलकर रैदास को मध्यकालीन सामंती युग में भी एक आधुनिक क्रांतिकारी चिंतक-लेखक बना दिया।
असमानता और अन्याय के किसी भी रूप का समर्थन न करने वाले आधुनिक क्रांतिकारी विचारक के रूप में रैदास यूरोप में आधुनिक चिंतन-लेखन के अगुवा विचारकों को इस मामले में पीछे छोड़ देते हैं कि यूरोप (फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, बाद में अमेरिका) के करीब-करीब सभी आधुनिक चिंतक-विचारक अन्याय और असमानता के किसी न किसी रूप का समर्थन करते हैं। वे जब समता की बात करते हैं, सबके लिए समता की बात नहीं करते, जब वे अधिकार की बात करते हैं, तब सबके लिए अधिकार बात नहीं करते हैं। उनकी समता, न्याय और अधिकार की बातें कुछ खास समुदायों और व्यक्तियों तक सीमित हैं, जबकि रैदास सबके लिए न्याय, समता और मानवीय गरिमा की बात करते हैं। यूरोप के आधुनिक चिंतकों-लेखकों से रैदास की तुलना विस्तार की मांग करता है, फिलहाल फिर कभी।
अभी सिर्फ दो उदाहरण। फ्रांसीसी क्रांति समता, स्वतंत्रता और बंधुता का नारा देती है, लेकिन व्यवहार में इसका मतलब सिर्फ संपत्तिशाली, साक्षर और गोरे पुरुषों तक सीमित था। इसी तरह 1776 की अमेरिकी क्रांति मानवाधिकारों की बात करती है और संविधान में उसकी घोषणा करती है, लेकिन अधिकार सिर्फ और सिर्फ गोरे पुरुषों के लिए थे। उसमें नीग्रो, काले और महिलाएं आदि शामिल नहीं थीं। यह तो अठारहवीं सदी की बात है। पंद्रहवी सदी के यूरोपीय चिंतक-लेखकों के दायरे में भी सभी इंसानों की समता, स्वतंत्रता और बंधुता की बात शामिल नहीं। उनकी बातें भारत के ब्राह्मणों के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के नारे की तरह हैं। कहने को तो इस नारे में पूरा विश्व बंधु (भाई) है, लेकिन बहुसंख्यक शूद्र, अन्त्यज और महिलाएं उनके लिए नीच और अस्पृश्य हैं।
इस विषय से जुड़ा अंतिम सवाल यह है कि आखिर रैदास के आधुनिक क्रांतिकारी चिंतन-लेखन को वैश्विक और देश के फलक पर व्यापक स्वीकृति क्यों नहीं मिली? सच तो यह कि उनकी आधुनिक चिंतन दृष्टि को व्यवस्थित और व्यापक तौर इतिहास में वह जगह भी नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थी। इसकी दो स्पष्ट वजहें हैं– ब्राह्मणवादी-सामंती चिंतन और औपनिवेशिक चिंतन। ब्राह्मणवादी-सांमती आधुनिक युग का भी सबसे वर्चस्वशाली चिंतन परंपरा रही है और है।
भारत की अकादमिक दुनिया (जिसमें विश्वविद्यालय भी शामिल हैं) पर इन्हीं का वर्चस्व रहा है और है। ये ब्राह्मणवादी-सामंती वैचारिक वर्चस्व को चुनौती देने वाले रैदास की आधुनिक क्रांतिकारी चिंतन को न पहचान सकते थे और न पहचान सकते हैं और न स्वीकार कर सकते थे और न स्वीकार कर सकते हैं। वे ज्यादा से ज्यादा उन्हें रामानंद, रामानुज, तुलसी की तरह एक संत कवि कह सकते हैं। उन्हें इसी रूप में पढ़-पढ़ा सकते हैं, उनके बारे में लिखना-पढ़ना कर सकते हैं। वे ब्राह्मणवाद-सामंतवाद को चुनौती देने वाले आधुनिक क्रांतिकारी चिंतक-लेखक थे, यह स्वीकार करना उनकी चिंतन परंपरा को उलट-पुलट देता, जो समाज के उलट-पुलट का कारण बन सकता था। यह एक सांस्कृतिक-वैचारिक क्रांति जैसा होता।
रैदास को आधुनिक क्रांतिकारी चिंतक-लेखक के रूप में रेखांकित न कर पाने का कारण औपनिवेशिक मानसिकता भी है। करीब दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी करने वाले समाज का बौद्धिक वर्ग सारे आधुनिक दर्शन-चिंतन की जड़ें यूरोप-अमेरिका में तलाश करता है। भारत में मध्यकालीन पंद्रहवी शताब्दी में आधुनिक क्रांतिकारी चिंतक पैदा हो सकता है, वह भी दलित मेहनतकश समाज में, यह बात भारत का ब्राह्मणवादी-द्विज सामंती औपनिवेशिक बुद्धिजीवी-लेखक कैसे स्वीकार कर सकता है?
Siddharth Ramu के वाॅल से ।
#रैदास #संत_रैदास #रविदास #संत_रविदास #रैदास_जयंती #संत_रैदास_जयंति #रविदास_जयंती #संत_रविदास_जयंती #गुरु_रैदास #गुरु_रविदास