Farhat ali khan

Farhat ali khan Social welfare

01/12/2025
सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों को अपने देश के नागरिकों के लिए प्रथम ओर प्रायोरिटी पर  और उच्च स्तर का रखना चाहिए देश...
23/08/2025

सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों को अपने देश के नागरिकों के लिए प्रथम ओर प्रायोरिटी पर और उच्च स्तर का रखना चाहिए देश के कुशल व स्वस्थ नागरिक निर्माण में इन दोनों बुनियादी जरूरतों की परम आवश्यकता है।,
🧑‍🎨🧑‍🎨जनता सुपुत्र की भांति सरकार को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में सरकारों को पोषित करती है इसलिए उनके फ्री शिक्षण और कौशल प्रशिक्षण व फ्री स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी पिता तुल्य होनी चाहिए।
🔥 करोड़ों रुपए की सरकारी सीट पर एमबीबीएस और एमडी करने वाले डॉक्टर को पहले की तरह बीटीसी की तर्ज पर सरकारी विभागों में सेवा के लिए नियुक्त करना अनिवार्य कर दिया जाए ताकि वह टैक्स पेयर के पैसों से एमबीबीएस करके अपने जीवन को जनता के लिए ही समर्पित करें। #यूपीसीएमयोगीआदित्यनाथ
#प्राइमिनिस्टरनरेंद्रमोदी
#राहुलगांधी
#स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार

पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा को एक कटोरा भांग और धतूरा पिलाकर नशे में मदहोश कर दिया जाता था..जब वह श्मशान की ओर जाती ...
16/08/2025

पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा को एक कटोरा भांग और धतूरा पिलाकर नशे में मदहोश कर दिया जाता था..

जब वह श्मशान की ओर जाती थी,कभी हँसती थी,कभी रोती थी तो कभी रास्ते में जमीन पर लेटकर ही सोना चाहती थी..

और यही उसका सहमरण (सती) के लिए जाना था..इसके बाद उसे चिता पर बैठा कर कच्चे बांस की मचिया बनाकर दबाकर रखा जाता था क्योंकि डर रहता था कि शायद दाह होने वाली नारी दाह की जलन न सह सके..

चिता पर बहुत अधिक राल और घी डालकर इतना अधिक धुआँ कर दिया जाता था कि उस रसम को देखकर कोई डर न जाए और दुनिया भर के ढोल,करताल और शंख बजाए जाते थे ताकी कोई उसका चिल्लाना,रोना-धोना,अनुनय विनय न सुनने पाए..बस यही तो था "सहमरण" यानी सतीप्रथा..

"सतीप्रथा" से छुटकारा दिलाने वाले महर्षि दयानन्द जी को कोटि कोटि नमन जिन्होंने नारी को समझा नारी को सम्मान दिया.......🙏
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तरबियत ऐसी की चप्पलें भी की हैं सीधी ,गुरूर ऐसा की सर पे कभी ताज नहीं पहना।जो बना हो किसी मजलूम पे किए जुल्म से,मैंने कभ...
16/08/2025

तरबियत ऐसी की चप्पलें भी की हैं सीधी ,
गुरूर ऐसा की सर पे कभी ताज नहीं पहना।

जो बना हो किसी मजलूम पे किए जुल्म से,
मैंने कभी बदन पर ऐसा लिवास नहीं पहना ।

15/08/2025

"दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की.. ऐ ज़फर ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की.."

ये कटाक्ष अंग्रेज मेजर हडसन ने बहादुर शाह ज़फ़र तब कहा था जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी थी इस कटाक्ष के जवाब में बहादुर शाह ज़फ़र ने हडसन से कहा:

"ग़ज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की.. तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की."

10 मैं 1857 मेरठ क्रांति के बाद अगले दिन 11 मई को सभी क्रांतिकारी बहादुरशाह ज़फ़र के दरबार में पहुचे क्रांतिकारियों ने फिर से उन्हें हिंदुस्तान का बादशाह घोषित किया वर्सो बाद मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने अपना सिंहासन मंगवाया और दरबार लगाई। इसके बाद क्रांतिकारी पूरे दिल्ली में फैल गए अंग्रेजों को ढूंढ़ ढूंढ कर क़तल कर दिया बचे बुरे ब्रिटिश दिल्ली छोड़कर भाग गए।

लेकिन कुछ दिनो बाद ही अंग्रेजों की एक बड़ी बटालियन ने दिल्ली को घेर लिया पूरे दिल्ली में क़त्ल ओ आम शुरू कर दिया क्रांतिकारी बिखरने लगे अंग्रेजों का दिल्ली पर लगभग क़ब्ज़ा हो चुका था। बहादुर शाह ज़फ़र फौरन निज़ामुद्दीन पहुचे और उसके बाद हुमायूं मक़बरा जहां अंग्रेजों ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उनके बेटो को भी पुराना किला के क़रीब गिरफ्तार कर लिया खोनी दरवाजा ले जाया गया और उनके सभी बेटो का अंग्रेजों ने सर कलम कर दिया। और उनके बेटो का सर सुबह नाश्ते में बादशाह के सामने पेश किया गया। बादशाह ज़ुबान खामोश हो चुकी थी सिर्फ आंखों से आंसू बह रहे थे मुग़ल सल्तनत का एक एक फरद अंग्रेजों से लड़ते हुए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया...जान, माल, दौलत शोहरत सबकुछ....


         # #सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) एक प्रसिद्ध उर्दू लेखक, कहानीकार, नाटककार और पत्रकार थे, जिनका जन्म 11 मई...
01/08/2025


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#सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) एक प्रसिद्ध उर्दू लेखक, कहानीकार, नाटककार और पत्रकार थे, जिनका जन्म 11 मई 1912 को पंजाब के लुधियाना जिले के समराला में हुआ था और मृत्यु 18 जनवरी 1955 को लाहौर, पाकिस्तान में हुई। वे अपनी छोटी कहानियों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं, जो भारत-पाकिस्तान विभाजन, सामाजिक मुद्दों, मानवीय संवेदनाओं और यौनिकता जैसे विषयों को बेबाकी से उजागर करती हैं। उनकी प्रमुख कहानियाँ जैसे बू, खोल दो, ठंडा गोश्त, और टोबा टेक सिंह ने उर्दू साहित्य में अमर स्थान बनाया।
जीवन परिचय
जन्म और परिवार: मंटो का जन्म एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके पिता, ख्वाजा गुलाम हसन, एक सत्र न्यायाधीश थे, और माँ, सरदार बेगम, पठान वंश से थीं।
शिक्षा: मंटो ने अमृतसर के मुस्लिम हाई स्कूल में पढ़ाई की, लेकिन वे दो बार मैट्रिक की परीक्षा में असफल रहे। बाद में उन्होंने हिंदू सभा कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं की। 1933 में, 21 साल की उम्र में, विद्वान अब्दुल बारी अलीग से मुलाकात ने उनके जीवन को बदल दिया, जिन्होंने उन्हें रूसी और फ्रांसीसी साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
करियर: मंटो ने बॉम्बे में फिल्म उद्योग में काम शुरू किया, जहां उन्होंने मुसव्विर और कारवां जैसी पत्रिकाओं के लिए संपादन किया। वे ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम कर चुके थे, जहां उन्होंने कई रेडियो नाटक लिखे, जैसे आओ, मंटो के ड्रामे, और तीन औरतें। उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग के लिए भी संवाद और पटकथाएँ लिखीं।
साहित्यिक योगदान
मंटो ने मुख्य रूप से उर्दू में लिखा, लेकिन उनकी रचनाएँ हिंदी में भी अनुवादित होकर लोकप्रिय हुईं। उन्होंने 22 लघु कहानी संग्रह, एक उपन्यास, पांच रेडियो नाटक संग्रह, तीन निबंध संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्रों के दो संग्रह प्रकाशित किए।
प्रमुख कहानियाँ:
टोबा टेक सिंह: विभाजन की त्रासदी को दर्शाती एक मार्मिक कहानी।
ठंडा गोश्त: यौनिकता और हिंसा के मिश्रण के कारण विवादास्पद रही, जिसके लिए मंटो पर अश्लीलता के आरोप लगे।
बू: मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक वर्जनाओं को उजागर करती कहानी।
खोल दो: विभाजन के दौरान की क्रूरता और मानवता की कहानी।
विवाद: मंटो की कहानियों पर अश्लीलता के आरोप में छह बार मुकदमा चला—तीन बार ब्रिटिश भारत में और तीन बार पाकिस्तान में—लेकिन वे कभी दोषी नहीं ठहराए गए। मंटो का मानना था कि अगर उनकी कहानियाँ समाज को असहज करती हैं, तो समस्या समाज में है।
हिंदी में उपलब्धता
मंटो की कई रचनाएँ हिंदी में अनुवादित हुई हैं और विभिन्न प्रकाशनों द्वारा उपलब्ध हैं:
राजकमल प्रकाशन ने मंटो की रचनाओं के संग्रह प्रकाशित किए हैं।
अमेज़न इंडिया पर उनकी किताबें, जैसे चुनी हुई कहानियाँ और अन्य हिंदी संस्करण, उपलब्ध हैं।
रेख्ता वेबसाइट पर उनकी कहानियाँ, लेख और ई-पुस्तकें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में उपलब्ध हैं।
हिंदुस्तानी समय और अमर उजाला काव्य जैसे मंचों पर उनकी कहानियों और उद्धरणों की चर्चा होती है।
पुरस्कार और सम्मान
मंटो को उनके जीवनकाल में कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। कई शोधार्थियों ने उनके साहित्य पर पीएचडी की है, और यूजीसी/नेट के उर्दू सिलेबस में उनकी रचनाएँ शामिल हैं।
व्यक्तिगत जीवन
मंटो ने 1939 में सफिया बेगम से शादी की। उनके एक बेटे, आरिफ, की छोटी उम्र में मृत्यु हो गई, और बाद में उनकी तीन बेटियाँ—निगहत, नुज़हत और नुसरत—हुईं। मंटो का जीवन संघर्षों से भरा रहा, और शराब की लत ने उनकी सेहत को प्रभावित किया। 42 साल की उम्र में, 18 जनवरी 1955 को, लाहौर में उनका निधन हो गया।
विरासत
मंटो की कहानियाँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे सामाजिक कुरीतियों, मानवीय कमज़ोरियों और विभाजन की त्रासदी को बिना लाग-लपेट के दर्शाती हैं। उनकी रचनाएँ न केवल उर्दू बल्कि हिंदी साहित्य में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उनकी कब्र पर लिखा गया उनका ही एक वैकल्पिक शिलालेख, जो ग़ालिब से प्रेरित है, उनकी साहित्यिक गहराई को दर्शाता है: “यह सआदत हसन मंटो की कब्र है, जो अभी भी सोचता है कि उसका नाम समय की तख्ती पर बार-बार लिखा हुआ शब्द नहीं था।”
अगर आप किसी खास कहानी या उनके साहित्य के किसी विशेष पहलू के बारे में और जानना चाहते हैं, तो कृपया बताएँ

आज मैंने जिंदगी में पहली बार किसी ठेके को डूबते हुए देखा है, वरना ये हमेशा दुसरों को ही डूबोता है🙌😛
01/08/2025

आज मैंने जिंदगी में पहली बार किसी ठेके को डूबते हुए देखा है,
वरना ये हमेशा दुसरों को ही डूबोता है🙌😛

01/08/2025

रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं
अपनी आँखें दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं

ये काँटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
राहें मुश्किल हो जाएं तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं

नेट ईजाद हुआ हिज्र के मारों के लिएसर्च इंजन है बड़ी चीज़ कुँवारों के लिएजिस को सदमा शब-ए-तन्हाई के अय्याम का हैऐसे आशिक़...
28/07/2025

नेट ईजाद हुआ हिज्र के मारों के लिए
सर्च इंजन है बड़ी चीज़ कुँवारों के लिए

जिस को सदमा शब-ए-तन्हाई के अय्याम का है
ऐसे आशिक़ के लिए नेट बहुत काम का है

नेट फ़रहाद को शीरीं से मिला देता है
इश्क़ इंसान को गूगल पे बिठा देता है

काम मक्तूब का माउस से लिया जाता है
आह-ए-सोज़ाँ को भी अपलोड किया जाता है

टेक्स्ट में लोग मोहब्बत की ख़ता भेजते हैं
घर बताते नहीं ऑफ़िस का पता भेजते हैं

आशिक़ों का ये नया तौर नया टाइप है
पहले चिलमन हुआ करती थी अब इस्काइप है

इश्क़ कहते हैं जिसे इक नया समझौता है
पहले दिल मिलते थे अब नाम क्लिक होता है

दिल का पैग़ाम जब ईमेल से मिल जाता है
मेल हर चौक पे फ़ीमेल से मिल जाता है

इश्क़ का नाम फ़क़त आह-ओ-फ़ुग़ाँ था पहले
डाकख़ाने में ये आराम कहाँ था पहले

आई-डी जबसे मिली है मुझे हम-साई की
अच्छी लगती है तवालत शब-ए-तन्हाई की

नेट पे लोग जो नव्वे से पलस होते हैं
बैठे रहते हैं वो टस होते हैं न मस होते हैं

फेसबुक कूचा-ए-जानाँ से है मिलती-जुलती
हर हसीना यहाँ मिल जाएगी हिलती-जुलती

ये मोबाइल किसी आशिक़ ने बनाया होगा
उसको महबूब के अब्बा ने सताया होगा

टेक्स्ट जब आशिक़-ए-बर्क़ी का अटक जाता है
तालिब-ए-शौक़ तो सूली पे लटक जाता है

ऑनलाइन तिरे आशिक़ का यही तौर सही
तू नहीं और सही और नहीं और सही

© Khalid Irfan ❤️

🌼

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Moradabad
244102

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+918909610786

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