SFI Moradabad

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Photos from SFI Moradabad's post 26/03/2018

शिक्षा और रोजगार ,
हमारा जन्मसिद्ध अधिकार ।

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01/12/2017

गोरखपुर में ऑक्सीजन की सप्लाई रोकने से मासूमों की मौत
अब भी चेत जाओ वरना हत्यारों-लुटेरों का यह गिरोह पूरे समाज की ऑक्सीजन बन्द कर देगा!
सम्पादक मण्डल

पिछले 11 अगस्त को, आज़ादी के 70 साल पूरे होने से चार दिन पहले, एक और भयानक घटना ने हमें याद दिलाया दिया कि हमें किस तरह की आज़ादी मिली है। एक दिन में 23 और पाँच दिनों में 79 मासूम बच्चे मौत की नींद सुला दिये गये, उसी अस्पताल में जहाँ उनके ग़रीब माँ-बाप उनकी ज़ि‍न्‍दगी बचाने के लिए उन्हें लेकर आये थे। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी रहा। यह कोई हादसा नहीं था, जैसाकि खूनसने हाथों वाले प्रधानमंत्री ने लाल किले के अपने भाषण में बड़ी आसानी से कह दिया। यह एक हत्या थी। मार्च से ही अस्‍पताल से मुख्यमंत्री सहित तमाम अधिकारियों को पत्र लिखे जा रहे थे कि कंपनी को भुगतान नहीं किया गया तो वह ऑक्सीजन रोक देगी। महज़ 67 लाख रुपये न चुकाने के कारण न जाने कितने परिवार सूने हो गये। मगर प्रदेश का मुखिया और उसका स्वास्थ्य मंत्री बेशर्मी से झूठ बोलते रहे और बच्चों की मौतों के लिए कभी गन्दगी तो कभी अगस्त महीने को ज़िम्मेदार ठहराते रहे।

यूरोप का कोई देश होता तो इतनी बड़ी घटना पर सरकार गिर गयी होती। लेकिन यहाँ तो इस हत्याकाण्ड पर परदा डालने की घिनौनी कोशिशें तुरन्त ही शुरू हो गयीं। अस्पताल को पुलिस छावनी बना दिया गया, बच्चों के परिजनों को उनके शवों का पोस्टमॉर्टम कराये बिना जल्दी-जल्दी वहाँ से घर भेज दिया गया। जिस डॉक्टर ने उस खूनी रात बच्चों की जान बचाने की पूरी कोशिश की थी, उसे ही निलम्बित कर दिया गया और आरएसएस की झूठ फैलाने की मशीनरी ने तमाम तरह के झूठ फैलाने शुरू कर दिये – इस बात का फ़ायदा उठाकर कि वह डॉक्टर मुसलमान था। हमारा समाज ऐसी शर्मनाक और डरावनी हालत में पहुँच चुका है कि ऐसे झकझोर देने वाले मामलों को भी ज़हरीले साम्प्रदायिक प्रचार की धुन्ध से झुठलाया जा सकता है। सरकारी जाँचों में डॉक्टर कफ़ील पर कोई इल्ज़ाम साबित न होने के बाद भी झूठ की फ़ैक्ट्री अपने गन्दे काम में लगी हुई है।

जिस लोकसभा क्षेत्र में ये घटना घटी है, वहाँ से पिछले 5 कार्यकाल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही सांसद रहे हैं। आम लोगों से ज़्यादा उन्हें गाय की चिन्ता दिखती है। पहली गोवंश चिकित्सा ‍मोबाइल एम्बुलेंस योगी ने यहीं शुरू की थी। यहीं पर मोदी ने 2014 में इन्सेफ़लाइटिस से मरने वाले बच्‍चों के लिए रुआँसे गले से शोक प्रकट किया था और सत्ता ‍में आने पर सब ठीक करने का सपना दिखाया था। इसी इन्सेफ़लाइटिस के विरोध में संघर्ष करने का ढोल बजाकर आदित्यनाथ ने सत्ता पायी। लेकिन ऑक्सीजन के लिए भाजपा की दोनों सरकारें 67 लाख रुपये की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकी। उल्टा इस वर्ष के बजट में चिकित्सा शिक्षा का आवंटन घटाकर आधा कर दिया गया है। जान लें कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज और अन्य सरकारी कॉलेजों को इसी मद में पैसे मिलते हैं। ऐसे 14 मेडिकल कॉलेजों और उनके साथ जुड़े टीचिंग अस्पतालों का बजट पिछले वर्ष के 2344 करोड़ से घटाकर इस वर्ष 1148 करोड़ कर दिया गया है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज का आवंटन पिछले वर्ष 15.9 करोड़ से घटकर इस वर्ष केवल 7.8 करोड़ रह गया है। इतना ही नहीं, मशीनों और उपकरणों के लिए इसे मिलने वाली राशि पिछले वर्ष 3 करोड़ से घटाकर इस वर्ष केवल 75 लाख कर दी गयी है। प्रदेश के तमाम राजकीय मेडिकल कॉलेजों में यही हुआ है। उदाहरण के लिए, कानपुर और इलाहाबाद के मेडिकल कॉलेजों का आवंटन 15.9 करोड़ से घटकर इस वर्ष क्रमश: 3.3 करोड़ और 4.2 करोड़ रह गया है। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के इंसेफलाइटिस वार्ड में कार्यरत 378 चिकित्सा कर्मियों (चिकित्सक, शिक्षक, नर्स व कर्मचारी) को मार्च 2017 से तनख्वाह नहीं मिली है व 11 पीएमआर कर्मचारियों को 27 महीने से वेतन नहीं मिला है।

इससे पहले जून में मध्यप्रदेश के इंदौर में भी ऑक्सीजन की आपूर्ति 15 मिनट के लिए बन्द होने से 2 बच्चों सहित 17 लोगों की मौत हो गयी थी। तब भाजपा ने मीडिया पर अपने नियंत्रण के दम पर इस बात को दबा दिया था।

याद कीजिये, गोरखपुर के मासूम बच्चों ने ऑक्सीजन बन्द होने से किस तरह घुट-घुटकर दम तोड़ा होगा। अगर अब भी आपके दिल में इन हत्यारों के प्रति नफ़रत और ग़ुस्सा नहीं फूट पड़ता, तो आपको इलाज की ज़रूरत है। वरना, अगर इंसान हैं, तो जाग जाइये, और इन आदमख़ोरों से अपने बच्चों को, अपने समाज को, अपने मुल्क को बचाने के लिए आवाज़ उठाइये!

17/11/2017

सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना - बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना - बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना - बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना -बुरा तो है
मुट्ठियां भींचकर बस वक़्त निकाल लेना - बुरा तो है सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना तड़प का न होना सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो आपकी नज़र में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है जो सबकुछ देखती हुई जमी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीजों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है आपके कानो तक पहुँचने के लिए जो मरसिए पढता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर जो गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे खतरनाक वह रात होती है जो ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती है
जिसमे सिर्फ उल्लू बोलते और हुआँ हुआँ करते गीदड़ हमेशा के अँधेरे बंद दरवाजों-चौगाठों पर चिपक जाते है
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

03/11/2017

🌅 *सुबह सवेरे* 🌅
*कवि अमिताभ बच्‍चन की तीन कविताएं*
(1) *हम विकट गरीब-प्रेमी हैं*

हम विकट गरीब-प्रेमी हैं
चाहे कोई सरकार बने
हम उसे ग़रीबों की सरकार मानकर
उसके सामने अपना प्रलाप शुरू कर देते हैं
ग़रीबों के बारे में
हम दृष्टि-दोष से पीड़ित हैं
उनका जिक्र आया नहीं
कि हम रोना शुरू कर देते हैं
ऐसी क्या बात है
कि सारे ग़रीब हमें मरीज़ ही दिखते हैं
लाचार, कर्ज़ में डूबे, कुपोषित, दर्द से चीख़ते,
चुपचाप मरते हुए
उछलते-कूदते, नाचते, शराब पीकर डोलते ग़रीब
हमें पसन्द क्यों नहीं हैं
बम फोड़ते, डाका डालते, आतंक मचाते गरीबों को
हम गरीब क्यों नहीं मानते
ग़रीब घेरते हुए
ग़रीब घिरते हुए
ग़रीब मुठभेड़ करते हुए
मरते-मारते हुए ग़रीब हमें सपनों में भी नहीं दिखते
ग़रीबों को
राज बनाते
मन्त्रालय चलाते देखना
हमारे वश में क्यों नहीं
हम बीमार ग़रीबों को
अस्पताल, बिस्तर और मुफ़्त दवा से ज़्यादा
कुछ और क्यों नहीं देना चाहते
हम उन्हें साक्षर हट्टे-कट्टे मज़दूरों से ज़्यादा
किसी और रूप में क्यों नहीं देख पाते

(2) *मुझे ईर्ष्या है महानायकों से*

मुझे ईर्ष्या है महानायकों से
उनकी तरह मैं मजबूत घोड़ा
ताक़तवर खच्चर नहीं बन सका
जो उतार-चढ़ाव से नहीं घबराते
सारा कूड़ा-करकट
पीठ पर लाद हिनहिनाते भागते
सबकी नैया पार लगाते
टूटते सितारों को कन्धा देते
मुझे दुख है मैं महानायक भी नहीं बना ।

(3) *बाढ़ के बाद*

असमय मर गए
ये एक जवान प्रवासी खेत-मज़दूर का
मिट्टी का घर है
जो ज़मीन पर पड़ा है
छप्पर सम्भालने वाला
लकड़ी का खम्भा
अब तक खड़ा है
पेड़ के नीचे बैठी
आसमान में उड़ते बादलों को निहारती
बेआवाज़ रोती हुई
प्रवासी मज़दूर की चिन्तामग्न बीवी
जिसकी छाती का सारा दूध सूख गया है
और गोद में बच्चा भूख से बिलबिला रहा है
जल्द से जल्द
घर खड़ा करने के बारे में सोच रही है
चौकी पर लोहे की एक पेटी है
जिस पर लाल गुलाब के छापे हैं
एक छाता है
जो बिना दिक़्क़त के खुल सकता है
शराब की छोटी बोतल है
जिसकी पेंदी में सरसों तेल की कुछ बून्दें हैं
खजूर की पत्तियों से बना एक डब्बा है
जिस पर फफून्द लगी है
स्टील के एक टूटे बर्तन में दो बैट्री हैं
जिसके अन्दर का रसायन बाहर आ रहा है
लकड़ी की एक बदरंग कुर्सी है
उसके नीचे अल्युमिनियम का एक बहुत पुराना बदना है
एक काला तवा है
पानी जिसका किनारा बुरी तरह खा चुका है
जीवनरक्षक दवाओं की कुछ टूटी बोतलें हैं
जो अपने मकसद में नाकाम रहीं
खम्भे से टँगा एक काले लोहे का कजरौटा है
कुछ फटे-पुराने कपड़ों के साथ रखा है एक टार्च
जिसका पीतल हरा हो रहा है
चमड़ा सड़ गया है
ढोलक नंगा हो गया है
पर वह बज रहा है
और उसमें आदमी को रुलाने की ताक़त बची हुई है

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Photos from SFI Moradabad's post 03/12/2016

प्राइस वाटर हाउस कूपर्स द्वारा 2015 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 30 लाख डॉक्टरों और 60 लाख नर्सों की कमी है. जिस दर से काम चल रहा है उस दर से यह बैकलॉग पूरा होने में आधी सदी और लगेगी.
इसके विपरीत बीमारियों के मामले में भारत दुनिया में अव्वल है. डायबिटीज एड्स के सबसे अधिक मरीज भारत में हैं. हर साल टीबी से मरने वालों की संख्या में भारत पहले स्थान पर है. कुपोषण का शिकार बच्चे सबसे अधिक भारत में हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के हिसाब से किसी भी देश को जीडीपी का पांच प्रतिशत स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगाना चाहिए. भारत 2 प्रतिशत से भी कम लगाता है. पिछले साल यह सिर्फ 1.58 प्रतिशत था.
अनियमितताओं की लिस्ट बहुत लम्बी है. गैर जरूरी मुद्दों पर लोगों को बरगलाने वाली सरकारें कब जनता के स्वास्थ्य की सुध लेंगी यह एक यक्ष प्रश्न है.

Photos 01/12/2016

Cuban kranti ke mahanayak comrade FIDEL CAATRO ke nidhan par hardik shradhanjali. LAL SALAM

Photos 21/11/2016

'धर्म द्वारा पागल बनाये गये लोग सबसे ख़तरनाक़ पागल होते हैं और .... जिन लोगों का म‍क़सद समाज में विघटन पैदा करना होता है, वे हमेशा समझते हैं कि मौक़ा पड़ने पर ऐसे पागलों का असरदार इस्‍तेमाल किस तरह किया जाता हैा''
-देनी दिदरो (प्रबोधन काल के महान फ्रांसीसी दार्शनिक)

Photos 15/11/2016

लखनऊ विश्वविधालय का शर्मनाक कृत्य ।दलित छात्र के साथ हो रहा है ।भेदभाव

Photos 14/11/2016

समान काम का समान वेतन लागू करो : सुरजीत श्यामल
सेन्ट्रल गवर्मेंट के सरकारी विभागों में इंडियन स्टफिंग फेडरेशन के रिपोर्ट के अनुसार 1 करोड़ 25 लाख कर्मचारी काम कार्यरत है. जिसमें 69 लाख कर्मचारी ठेके पर कार्यरत हैं, जो उनके बराबर काम करते है. अभी जो 7 वां वेतन आयोग की सिफारिश है उसका लाभ केवल 57 लाख सरकारी कर्मियों को ही मिल पायेगा. तो क्या मंहगाई केवल सरकारी कर्मियों के लिए ही है. ठेका मज़दूर (नियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम 1970- " स्थाई प्रकृति के लगातार चलने वाले काम के लिये ठेका मज़दूर नहीं लगाया जासकता। ऐसे काम स्थाई (नियमित मज़दूर) से ही करवाया जाना चाहिए।"
इसी कानून से सम्बंधित नियम 1971- "समान काम के लिए समान वेतन" के अनुसार अगर किसी स्थाई प्रकृति के काम के लिए ठेका मज़दूर काम पर लगाया गया है तो जब तक उस मज़दूर को स्थाई (नियमित) नहीं कर दिया जाता, उस ठेका मज़दूर को वेतन और सभी सेवा सुबिधायें , उस काम को करने वाले स्थाई मज़दूर के सामान ही मिलेंगी।
इस क़ानून को संसद में आज सेे 45 साल पहले पास किया गया परन्तु आज तक देश में ऐसी कोई ईमानदार सरकार नहीं आई जो इसे लागू कर सकी हो। पता नहीं हमारे देश को ऐसी ईमानदार सरकार कब मिलेगी जो समाज के लिए आवश्यक सारा उत्पादन और सेवायें प्रदान करने वाले मज़दूरों को न्याय दिलाने के लिए उपरोक्त क़ानून लागू करने की कोशिश करेगी।
अगर आप या आपका कोई साथी या परिवार को कोई सदस्य ठेका वर्कर हैं तो इस पोस्ट को इतना शेयर करें की यह हकीकत एक एक वर्कर तक पहुंचे और हम इस ठेका सिस्टम को उखाड़ फेकने के लिए एकजुट हो सके.

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