Aadarsh Coaching Centre

Aadarsh Coaching Centre सातवीं से इंटरमीडिएट तक शिक्षा की स्त?

27/06/2023
27/06/2023
26/06/2023
27/02/2022

यूक्रेन पर रशिया एक न एक दिन हमला करेगा यह तय था, यूक्रेन के अस्तित्व में आने के पहले दिन से। वह जमीन ही ऐसी है। यूक्रेन वॉज ऑलवेज ए प्राइज़ कैच! एक न एक दिन रशिया आएगा ही यह बात समझकर ही यूक्रेन को शुरुआत से ही अपनी रक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए थी। लेकिन उसको बतौर नेता मिला बिना अर्जुन का राजकुमार उत्तर ।

यहाँ बात इस्राइल की भी होनी आवश्यक है। जन्म से ही अस्तित्व का संकट है तो शुरू से ही पूरा राष्ट्र जूझने के लिए तैयार है। यह भी जानता है कि उसके शत्रु एक अंधविश्वास से भी प्रेरित हैं जिनको इस्राइल के अस्तित्व को खतम करना अपने काल्पनिक स्वर्ग में अपनी काल्पनिक ऐय्याशी की पर्सनल सीट रिजर्व करने की गारंटी भी लगती है। इसलिए इस्राइल हर क्षण न केवल युद्ध के लिए तैययर है बल्कि युद्ध सामग्री के निर्माण और अक्षुण्ण आपूर्ति के लिए कई हद तक आत्मनिर्भर भी है।

यूक्रेन के पास क्षमताओं की कमी नहीं थी लेकिन एक द्रष्टा नेतृत्व का अभाव था। उसकी गति यही होनी थी। अब उसके हार का एक और परिणाम होगा, वेश्याओं की मंडी में यूक्रेनियन लड़कियों की संख्या बढ़ सकती है।

लेकिन मुझे यूक्रेन पर अधिक समय नहीं देना है, उसपर कितना ही लंबा चौड़ा विश्लेषण करूँ तो भी क्या उससे यूक्रेन की स्थिती में बाल भर का भी फर्क पड़ेगा?

यहाँ बात करूंगा इस पोस्ट के साथ जुड़े चित्र की। इसमें रंगों का चुनाव अपनी कहानी साफ कह देता है।

यूक्रेन के लोग भारत के हिंदुओं जैसे थे या भारत के हिन्दू यूक्रेन के लोगों जैसे हैं इसपर भी बहस नहीं करनी। समानता इतनी ही है कि यूक्रेन पर जैसे संकट शुरू से ही सन्निध था, सब को दिखाई भी दे रहा था। फिर भी इसने उसालिए कोई तैयारी नहीं की वही बात हिंदुओं की भी है।

दुखद बात यही है कि इससे अधिक स्पष्टता से क्या लिखें ? फिर भी यही पाता हूँ कि लोगों को सुरक्षा के मुद्दों पर बात टालकर सरकार को गालियां देने में अधिक रस है - शायद अपना कर्तव्य पूर्ण करने की फीलिंग आती होगी। अन्यों को कमेन्ट में शब्दविन्यास की अपनी क्षमता दिखानी होती है।

तेज कुछ और करो, कलम की धार नहीं।

सुन त्जु की शुरुआती सलाह है कि जो शत्रु की और खुद की भी ताकतें और कमज़ोरियों का सूक्ष्मतर ज्ञान रखता है वही जीतने की संभावना है। जो शत्रुओं की उपेक्षा कर खुद की क्षमताओं को वास्तविकता से बहुत अधिक मानता है वो कभी नहीं जीत सकता।

कोई भी इससे विरोधी मत रखता कहीं नहीं मिलेगा।

लेकिन हम व्यस्त हैं तो सोशल मीडिया या यू ट्यूब, क्लब हाउस, ट्विटर स्पेसेस आदि पर झंडे गाड़ने में।

कोई बात नहीं, यह भी आवश्यक है, लेकिन क्या आप को पता है या नहीं कि वहाँ आप से शब्दों का मोर्चा संभालनेवालों के पास आप से सड़कों पर निपटने के लिए भी अलग सक्षम लोग होते हैं ? आप के पास क्या है ? कौन हैं ?

संघ, भाजपा को बाजू रखें । आप अपने निजी संपर्कों की बात करें। वैसे भी, इनको गालियां देनेवालों में 90 %कोई स्वयंसेवक नहीं होते और न कार्यकर्ता होते हैं। अधिकतर तो संकट के अहसास से वोट देनेवाले ही होंगे। कुल मिलाकर वो यूक्रेन से बचाकर लाए बच्चों से मानसिकता बहुत अलग नहीं होगी।

वोट तो दीजिए ही, लेकिन जब अपनी सरकार आए तो मिले हुए समय का कुछ सदुपयोग भी करना आवश्यक है। परिस्थिति बदलनी आवश्यक है।

बाकी तो कहा ही गया है कि - सकल पदारथ हैं जगमाही । करमहीन नर पावत नाही ।।

11/02/2021

“रामायण” क्या है??

अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना.......

रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... 😊

एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी।
नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ?

मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं ।
माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया |

श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं

माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ?
क्या नींद नहीं आ रही ?

शत्रुघ्न कहाँ है ?

श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी,
गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।

उफ !
कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया ।

तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए ।
आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी,
माँ चली ।

आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?

अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !!

माँ सिराहने बैठ गईं,
बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं,

माँ !

उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ?
मुझे बुलवा लिया होता ।

माँ ने कहा,
शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?"

शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए,
भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?

माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।

देखो क्या है ये रामकथा...

यह भोग की नहीं....त्याग की कथा हैं..!!

यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा... चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।

"रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।

भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया..!!

परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते!
माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की..

परन्तु जब पत्नी “उर्मिला” के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी,
परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा.??

क्या बोलूँगा उनसे.?

यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं-

"आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ...मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"

लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था.!!

परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया..!!

वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है..पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे.!!

लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया.!!

वन में “प्रभु श्री राम माता सीता” की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं , परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया.!!

मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को “शक्ति” लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पर्वत लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं.!!

तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि, सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं।

यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि “लक्ष्मण” के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे.!!

माता “सुमित्रा” कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं..अभी शत्रुघ्न है.!!

मैं उसे भेज दूंगी..मेरे दोनों पुत्र “राम सेवा” के लिये ही तो जन्मे हैं.!!

माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि, यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं?

क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?

हनुमान जी पूछते हैं- देवी!

आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं...सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा।

उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा.!!

उर्मिला बोलीं- "
मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता.!!

रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता.!!

आपने कहा कि, प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं..!

जो “योगेश्वर प्रभु श्री राम” की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता..!!

यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं..

मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं..

उन्होंने न सोने का प्रण लिया था..इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं..और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया...वे उठ जायेंगे..!!

और “शक्ति” मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो प्रभु श्री राम जी को लगी है.!!

मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में ही सिर्फ राम हैं, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा.!!

इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ..सूर्य उदित नहीं होगा।"

राम राज्य की नींव जनक जी की बेटियां ही थीं...

कभी “सीता” तो कभी “उर्मिला”..!!

भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया ..परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया .!!

जिस मनुष्य में प्रेम, त्याग, समर्पण की भावना हो उस मनुष्य में राम हि बसता है...
कभी समय मिले तो अपने वेद, पुराण, गीता, रामायण को पढ़ने और समझने का प्रयास कीजिएगा .,जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने और जीने का सऊर मिलेगा .!!

"लक्ष्मण सा भाई हो, कौशल्या माई हो,
स्वामी तुम जैसा, मेरा रघुराइ हो..
नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो,
चरण हो राघव के, जहाँ मेरा ठिकाना हो..
हो त्याग भरत जैसा, सीता सी नारी हो,
लव कुश के जैसी, संतान हमारी हो..
श्रद्धा हो श्रवण जैसी, सबरी सी भक्ति हो,
हनुमत के जैसी, निष्ठा और शक्ति हो... "

!! जय जय श्री राम !!
Pawan Acharya ji

29/09/2020

आदर्श कोचिंग सेंटर में नवम वर्ग से लेकर10,11,12 तक की कक्षाएं अब सुबह के सत्र में संचालित हो रही है।

10/04/2020

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साल 2010 ... मैं पुणे गया हुआ था ... स्व नाथूराम गोडसे जी का घर भी गया ... वहां मेरी मुलाकात नाथूराम गोडसे जी के छोटे भाई गोपाल गोडसे के सुपुत्र ... श्री नारायण गोडसे और उनकी धर्मपत्नी से हुई ... उन्होंने मुझे बहुत प्यार और सम्मान से घर में बिठाया ... नाश्ता दिया और काफी सारी इधर उधर की बातें की ... मैं यह जानना चाहता था ... कि गांधी की हत्या के बाद उनके परिवार पर क्या गुजरा ...

उन्होंने बताया जिस समय महात्मा गांधी की हत्या हुई ... उस समय उनके पिता गोपाल गोडसे इंडियन आर्मी में सेवारत थे ....और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह ईरान और इराक में भी अंग्रेजी फौज की ओर से युद्ध में भाग लिए थे ...

गांधी की हत्या के तुरंत बाद ... नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे को ... घटनास्थल से गिरफ्तार कर लिया गया ... और गोपाल गोडसे को पुणे से गिरफ्तार किया गया ... निसंदेह गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी ... और नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे ने घटनास्थल से भागने की कोई कोशिश नहीं की थी ... लेकिन गोपाल गोडसे पुणे में थे ... उनका इस घटना से कोई संबंध नहीं था ... पर उन्हें भी इस हत्याकांड के लिए 18 साल की सजा दी गई ... नाथूराम गोडसे की एक इंश्योरेंस थी ₹5000 की ... जिसमें गोपाल गोडसे की धर्मपत्नी सिंधुताई गोडसे नॉमिनी थी ... क्योंकि नाथूराम गोडसे अविवाहित थे ... तो उन्होंने अपने छोटे भाई की धर्मपत्नी को नॉमिनी बनाया था ... इसी को आधार बनाते हुए कांग्रेस सरकार ने गोपाल गोडसे को 18 साल तक जेल में रखा ...

गांधी वध के तुरंत बाद पुणे और उसके आसपास के इलाकों में चितपावन ब्राह्मणों की सामूहिक हत्याकांड शुरू हो गई ... सिंधुताई गोडसे अपने तीनों छोटे बच्चों को लेकर जान बचाने के लिए इधर उधर भागती रही ... ऐसे वक्त में नाते रिश्तेदारों ने भी उनसे हाथ खींच लिया ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गांधी हत्या एक जघन्य अपराध है ... कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया ... उनके घर को जलाकर खाक कर दिया गया ...

जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने सड़क के किनारे लोहार का काम शुरू किया ... स्वर्गीय नारायण गोडसे से अपने हाथ मेरे हाथ में दिया ... और दबाने को कहा ... उनका हाथ पत्थर के माफिक कठोर थे ... उन्होंने कहा 12 साल की उम्र से वह लोहे पीट रहे थे अपनी माता जी के साथ... बहने बड़ी होती जा रही थी ... कहीं भी रिश्ते की बात होने से कांग्रेसी नेता लड़के वाले को भड़का देते थे ... और विवाह नहीं होने देते थे ... उनकी माता जी के साथ में अभद्र व्यवहार सरेआम होता था ... 2 बार तो ऐसा हुआ जब थाने से लड़के वाले को विवाह ना करने को कहा गया ... और विवाह करने की स्थिति में अंजाम भुगतने की धमकी दी गई ... आखिर वीर सावरकर ने अपने छोटे भाई के बेटे से उनकी एक बहन का विवाह करवाया ... जो बाद में हिमानी सावरकर के नाम से अभिनव भारत की प्रेसिडेंट हुई ...

आपको क्या लगता है कितने ब्राह्मणों की हत्या की गई ... मैंने उनसे पूछा ... उनकी आंखों में आंसू आ गए ...और उन्होंने कहा दिन तो किसी तरह गुजर जाता था ... लेकिन रात होते ही चुन-चुन कर चितपावन ब्राह्मणों के घर पर पेट्रोल से हमला होती थी ... और घर और उसमें रहने वाले केा साथ जलाकर राख कर दिया जाता था ... ना कोई मामला दर्ज किया जाता था ... ना पड़ोस के लोग कांग्रेसियों के डर से मदद कर पाते थे ... मदद करने वाले को अंजाम भुगतने की धमकी दी जाती थी ... और कुछ जगह पर तो मदद करने वालों की सार्वजनिक हत्या भी की गई ... ऐसी हालत में उनकी माताजी अपने दोनों छोटे बच्चों को लेकर गांव चले गए ... और एक गांव से दूसरे गांव तक भटकते रहे ... लोगों ने सलाह दिया कि वह अपने को नाथूराम का संबंधी ना बताएं ... अन्यथा जान से मारे जाएंगे ... किसी तरह से दंगा समाप्त हुआ ... लगभग 8000 से अधिक चितपावन ब्राह्मणों की सरेआम हत्या के बाद ... गांधी वध का बदला 8000 निर्दोष ब्राह्मणों की हत्या करके लिया गया ...

उन्होंने एक लंबी सांस लिया ... एक घूंट पानी पिया ... उनकी आंखों में आंसू थे ... और आगे कहना शुरू किया ... जीवन कठिन था ....दो वक्त की भोजन असंभव ... माताजी ने लोहार का काम शुरू किया ... सड़क के किनारे बैठ कर लोहे के छोटे-मोटे औजार बना कर बेचना शुरू किया ... 1962 की युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी सेवाएं केंद्र सरकार को देने के लिए पत्र भी लिखा ... जिसका उन्हें कोई जवाब नहीं मिला ... 1965 के युद्ध के दौरान भी उन्होंने अपनी सेवाएं केंद्र सरकार को देने के लिए पत्र लिखा जिसका कोई जवाब नहीं मिला ...

स्वर्गीय नाथूराम गोडसे के फांसी के बाद उनके परिवार ने उनका मतृ शरीर की मांग की थी ... ताकि वे हिंदू रीति रिवाज के अनुसार उनका अंतिम क्रिया कर्म कर सकें ... लेकिन सरकार ने उसकी पत्र का कोई जवाब नहीं दिया ... अंबाला जेल में ही उन दोनों को फांसी देकर ... उनकी लाश भी जला दी गई ...अस्थियां घग्गर नदी में फेंक दी गई ... किसी तरह से उनके परिवार को स्वर्गीय नाथूराम गोडसे और स्वर्गीय नाना आप्टे की अस्थियां मिली ... जिसको उन्होंने अपने घर के एक कमरे में रखा है ... क्योंकि नाथूराम गोडसे की अंतिम इच्छा थी ... उनकी अस्थियां सिंधु नदी में बहाया जाय ... जब सिंधु नदी हिंदुस्तान के झंडे तले बह रहा हो ... चाहे इसके लिए कितना भी समय लग जाए ... कितनी भी पीढ़ियां गुजर जाए ... नाथूराम गोडसे जी का कहना था ... यहूदियों को 16 साल लगा इसराइल को पाने में ... हमें भी 100 - 200 साल लग सकते हैं ... लेकिन हमें इंतजार और संघर्ष करना होगा ... नाथूराम गोडसे ने एक बात कही थी ... बाकी क्रांतिकारियों को और उनके परिवार वाले को ... सम्मान मिलेगा ...धन भी मिलेगी ... और लोग उनसे जुड़ने में गर्व महसूस करेंगे ... वे देशभक्त कहलाए जाएंगे ... लेकिन मेरे परिवार को ना सम्मान मिलेगा ... ना धन मिलेगा ... लोग भी उनसे जुड़ने से परहेज करेंगे ... उन्हें देशद्रोही कहा जाएगा ... अंग्रेजों के समय में तो सिर्फ क्रांतिकारी को फांसी दी जाती थी ... और परिवार वाले सुरक्षित होते थे ... मेरे मरने के 100 साल के बाद ... लोगों को मेरा बलिदान समझ में आएगा ... और गांधी का मुखौटा उतर चुका होगा ... लेकिन 100 साल तक मेरे परिवार को भीषण कष्ट सहने होंगे ...

आजादी के बाद ना सिर्फ नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे को फांसी दी गई ... बल्कि उनके पूरे परिवार को तबाह और बर्बाद कर दिया गया ... और साथ में तबाह हुए 8000 निर्दोष परिवार ... गांधी की अहिंसा का बहुत बड़ा कीमत चुकानी पड़ी निर्दोष ब्राह्मणों को ...

नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे की अस्थियों को मैंने प्रणाम किया ... उनके साथ भोजन किया और मैं चलने का इजाजत मांगा ... वह मुझे छोड़ने गेट तक आए ... मैं उनके चरण स्पर्श करने के लिए झुका ... लोहे जैसे हाथों से उन्होंने मुझे उठाया ... उनकी आंखों में आंसू थे ... मेरी भी आंखें नम थी ... कहने का कुछ नहीं था ... फिर भी उन्होंने कहा फिर आना ... और घर पर ही रुकना ...मैंने भी हां में सिर हिलाया ...

02/02/2020

मत कर बंदे चिंता आलू-प्याज की ,ये कल सस्ती हो जायेगी,
🤔
न किया CAA, NRC का सपोर्ट तो तेरे घर के पास रोहिंग्या की बस्ती बन जायेगी

12/01/2020

*आदतें नस्लों का पता देती हैं...*

एक बादशाह के दरबार मे एक अजनबी नौकरी की तलब के लिए हाज़िर हुआ ।
क़ाबलियत पूछी गई, कहा, "सियासी हूँ ।" ( अरबी में सियासी अक्ल ओ तदब्बुर से मसला हल करने वाले मामला फ़हम को कहते हैं ।)
बादशाह के पास सियासतदानों की भरमार थी, उसे खास "घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज" बना लिया।
चंद दिनों बाद बादशाह ने उस से अपने सब से महंगे और अज़ीज़ घोड़े के मुताल्लिक़ पूछा,
उसने कहा, "नस्ली नही हैं ।"
बादशाह को ताज्जुब हुआ, उसने जंगल से साईस को बुला कर दरियाफ्त किया..
उसने बताया, घोड़ा नस्ली हैं, लेकिन इसकी पैदायश पर इसकी मां मर गई थी, ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला है।
बादशाह ने अपने मसूल को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?"

""उसने कहा "जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता हैं ।"""

बादशाह उसकी फरासत से बहुत मुतास्सिर हुआ, उसने मसूल के घर अनाज ,घी, भुने दुंबे, और परिंदों का आला गोश्त बतौर इनाम भिजवाया।

और उसे मलिका के महल में तैनात कर दिया।
चंद दिनो बाद , बादशाह ने उस से बेगम के बारे में राय मांगी, उसने कहा, "तौर तरीके तो मलिका जैसे हैं लेकिन शहज़ादी नहीं हैं ।"

बादशाह के पैरों तले जमीन निकल गई, हवास दुरुस्त हुए तो अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा "हक़ीक़त ये हैं, कि आपके वालिद ने मेरे खाविंद से हमारी बेटी की पैदायश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपकी बादशाहत से करीबी ताल्लुक़ात क़ायम करने के लिए किसी और कि बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।"

बादशाह ने अपने मुसाहिब से पूछा "तुम को कैसे इल्म हुआ ?"

""उसने कहा, "उसका खादिमों के साथ सुलूक जाहिलों से भी बदतर हैं । एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक मुलाहजा एक अदब होता हैं, जो शहजादी में बिल्कुल नहीं । """

बादशाह फिर उसकी फरासत से खुश हुआ और बहुत से अनाज , भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं साथ ही उसे अपने दरबार मे मुतय्यन कर दिया।

कुछ वक्त गुज़रा, मुसाहिब को बुलाया,अपने बारे में दरियाफ्त किया ।
मुसाहिब ने कहा "जान की अमान ।"

बादशाह ने वादा किया । उसने कहा, "न तो आप बादशाह ज़ादे हो न आपका चलन बादशाहों वाला है।"

बादशाह को ताव आया, मगर जान की अमान दे चुका था, सीधा अपनी वालिदा के महल पहुंचा ।

वालिदा ने कहा, "ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे लेकर हम ने पाला ।"

बादशाह ने मुसाहिब को बुलाया और पूछा , बता, "तुझे कैसे इल्म हुआ ????"

उसने कहा "बादशाह जब किसी को "इनाम ओ इकराम" दिया करते हैं, तो हीरे मोती जवाहरात की शक्ल में देते हैं....लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें इनायत करते हैं...ये असलूब बादशाह ज़ादे का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।"

किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी मुल्लम्मा हैं ।
इंसान की असलियत, उस के खून की किस्म उसके व्यवहार, उसकी नीयत से होती हैं ।

एक इंसान बहुत आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से बहुत शक्तिशाली होने के उपरांत भी अगर वह छोटी छोटी चीजों के लिए नियत खराब कर लेता हैं, इंसाफ और सच की कदर नहीं करता, अपने पर उपकार और विश्वास करने वालों के साथ दगाबाजी कर देता हैं, या अपने तुच्छ फायदे और स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरे इंसान को बड़ा नुकसान पहुंचाने की लिए तैयार हो जाता हैं, तो समझ लीजिए, खून में बहुत बड़ी खराबी हैं । बाकी सब तो पीतल पर चढ़ा हुआ सोने का मुलम्मा हैं ।
( एक अरबी कहानी ) 🍁🍂

08/01/2020

"हमारे पास बॉलीवुड है, दाऊद है, बाजवा है, राहुल है, रवीश कुमार है, सारे बेईमान उद्योगपति हैं, छप्पन मुल्क हैं। तुम्हारे पास क्या है?
“हमारे पास नरेंद्र मोदी है।"

31/12/2019

आजादी चाहिए तो "चरखा" चलाओ बसे क्यों जला रहे भारत के इज्जतदार नागरिको।
गांधी ने अग्रेंजो से आजादी ऐसे ही तो दिलवाई थी।
भूल गए क्या???

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