खगोलशास्त्री झा " मेरठ ,झंझारपुरऔर मुम्बई "

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ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी -ज्योतिषी झा मेरठ,झंझारपुरऔर मुम्बई - परामर्श शुल्क 1100 है-आप हमें गूगल पे, पे फ़ोन ,भीम पे,पेटीएम पर भी धन भेज सकते हैं - 9897701636+9358885616 ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी |--{1 }-कुण्डली मिलान का शुल्क 2200 सौ रूपये हैं | {2 }-कुण्डली की मौखिक जानकारी शुल्क पांच सौ रूपये हैं | {3 }-जन्म कुण्डली की जानकारी मौखिक और लिखित लेना चाहते

27/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें -- भाग -49 -खगोलशास्त्री झा मेरठ
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन वास्तव में एक नाटक ही होता है, किन्तु इस बात को नाटककार ही समझ सकता है | इसलिए उसे काल्पनिक कहानी कहता है | पर जब कोई भी व्यक्ति पीछे मुरकर देखता है --तो उसे खुद ही असम्भव --संभव कैसे हुआ समझ में आता है --तो उसे प्रेरणादायी कथा कहता है ---यही मुझे अनुभव हो रहा है | अस्तु ----आज मैं खुद का चित्रण करना चाहता हूँ ---जब मेरा राजयोग था -उम्र थी 5 वर्ष मुझे ज्ञात नहीं --पिताने कभी यह बात कही थी --तो एक ज्योतिषी के पास पिता गए थे --मेरा राजयोग था ,झेल सकते थे ,धन था ,मन था ,जिज्ञासा पुत्र ठीक हो की थी --मेरे बालों में अकारण आग लग जाया करती थी | --ज्योतिषी जी ने कहा एक दिन राजा बनेगा | बालक की अभी मंगल की दशा चल रही है --अमुक उपचार करें ठीक हो जायेगा | मैं ठीक भी हो गया| जिस दिन मैं ज्योतिषी बना तो सर्वप्रथम अपनी ही कुण्डली देखने की विशेष जिज्ञासा उत्पन्न हुई --तो उसमें सुख कम दुःख विशेष दिखाई देने लगा तो सोचने लगा --इससे अच्छा तो मैं ज्योतिषी ही नहीं होता तो ठीक था | यही स्थिति प्रायः सभी लोगों की होती है | आज जहाँ -52 वर्ष में हूँ एवं अब 2014 से शनि की दशा चल रही है | शनि नीच का भाग्य क्षेत्र में है --नीचता ही सही भाग्य तो उत्तम रहेगा | --इसकी चर्चा मैं आगे करूँगा | जिस जातक के लग्न में सूर्य +मंगल +केतु हो सप्तम भाव में राहु विद्यमान हो साथ ही सिंह लग्न का भी हो --ऐसा जातक अहंकार ,क्रोध ,जिद्दी स्वभाव एवं क्रूर शासन करने वाला होता है | मेरे पिता भी मकर लग्न के थे उच्च का मंगल लग्न में था --तो वो भी बड़े जिद्दी स्वभाव के थे --शायद इसलिए --मेरे जैसा बालक के लिए सोच लिए पढ़ाना जरूर है ,अन्यथा मेरे जैसा बालक कहीं का नहीं होता --ऐसा एक और योग था मेरी कुण्डली में -चन्द्रमा उच्च का कर्मक्षेत्र में था --तो कैसा भी सही पिता का स्नेह मिलना लाजमी था --अन्यथा मैं यहाँ नहीं होता | मेरी माँ की कुण्डली उपलब्ध नहीं है --पर मेरे चौथे घर और भागयक्षेत्र का स्वामी मंगल लग्न में है ----वह योग बहुत ही उत्तम है --घर ,वाहन ,भाग्य एवं सम्पन्नता का योग है --किन्तु --चुगली ,झूठ बोलना ,झगड़ा लगाना ,विवाद बढ़ाना ,बहुत बोलना ,लज्जा विहीन ये तमाम गुण --मेरी माँ से मेरे मिलते हैं | मेरे पिता कईबार माँ पर दोष लगाया करते थे --इसका वजूद नहीं है ,इसे अपनी कमी दिखती नहीं है --जबकि ये सारे अवगुण मेरे पिता में नहीं थे | मेरे पिता जिद्दी थे अधर्मी नहीं थे ,दूसरे का अहित हो यह कदापि नहीं चाहते थे --ऐसे गुण मेरी माँ में भी थे ----पर ये सारे अवगुण मुझमें थे | मेरी कुण्डली में राहु का सप्तम भाव में होना साथ ही लग्न में सूर्य ,मंगल ,केतु का होना --विवाह सुख नहीं था --पर पतनी के आने के बाद ही सही धार्मिक बनें ,सही आचरणवान बनें ,सभी सुखों से परिपूर्ण हुए | --एक और विशेष बात --जब राहु की दशा रही --तो मैं भागा -भागा फिरता था और पतनी छत्र छाया की तरह हर पल ,हर घड़ी मेरी रक्षा में लगी रहती थी --यह थी गुरु बृहस्पति की दृष्टि | ---आज मैं इतना ही कहना चाहता हूँ --बहुत बड़ा योग लाभ या हानि उतना नहीं देता है --जितना --समभाव योग ,परस्पर सहिष्णुता की दृष्टि ,--मोठे तौर पर नवग्रहों को जानना अच्छी बात है --अगर तप का मार्ग है ,निदान का मार्ग है ,तो बड़ी -बड़ी हानियों से बचा जा सकता है |----आगे की चर्चा कल करेंगें ----ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ, झंझारपुर और मुम्बई----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut

26/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें -- भाग -48 -खगोलशास्त्री झा मेरठ,
'आपलोग यह सोचते होंगें --इस जीवनी रूपी कथा में केवल चोट और खोट ही है या कुछ उत्साह और आनन्द भी --इसका जबाब है --जिस पर ईस्वर की कृपा हो ,जिसकी कुण्डली में कुछ विशेष योग हो ,जिसका मनोबल मजबूत हो --उसे दुःख के बाद सुख भी मिलते हैं "---आज मैं अपनी नानी का चित्रण करना चाहता हूँ --क्यों सुनें ?--मेरा राजयोग केवल 10 वर्ष बाल्यकाल का था --मैं नानी के पास बहुत रहा 10 वर्ष के अन्दर| मेरी नानी मुझे बहुत स्नेह करती थी --मामा मेरे माता पिता के पास पढ़ते थे --शीघ्र नौकरी मिली तो दिल्ली चले गए | मेरी नानी वैष्णव थी ,शिव भक्त थी --अपना जीवन चरखा चलाकर जीती थी | कभी हमने माता पिता के पास नहीं देखा नानी को जाते हुए --दूर जगह पर मिल लेती थी | मैं नानी के साथ पैदल खूब चलता था --नानी के खेत हों ,उपज हो ,चरखा के लिए -रुई लानी हो या खादी ग्रामोद्योग से कपड़े लाने हो या एक विदेश्वर स्थान {भगवान शिव }का प्रमुख स्थान हो ,सभी जगह गरीबी थी तो मेरे साथ नानी जाया करती थी ---पढ़ी लिखी तो नहीं थी --पर आचरणवान थी ,कर्मनिष्ठ थी --एक और विशेषता थी स्वाभिमानी थी --ये सारे --गुण मुझे नानी से प्राप्त हुए | मेरी माँ और नानी के स्वभाव में बहुत अन्तर था | मेरी माँ के पास सबकुछ था पर सब खत्म हो गया | मेरी नानी के पास कुछ नहीं था --फिर भी एक साम्राज्य बनाया | नाना को हमने नहीं देखा --पर मामा को साम्राज्य देकर नानी गयी | जो नाना देकर गए --उस संतान को एक दक्ष और योग्य बनाया --यह बात मेरी माँ ने नहीं सीखी | नानी की कुण्डली उपलब्ध नहीं है --किन्तु मेरी कुण्डली में --छठे घर से छठे घर का स्वामी बुध शुक्र से युति बनाकर धन क्षेत्र में है | अतः मामा का धनिक होने का योग है सो मेरे मामा -करोड़ पति बहुत पहले से हैं | जब मेरे घर में गरीबी शुरू हुई तो नानी ने मामा का धन नहीं दिया --ये बात मुझे अच्छी लगी | पर एकबार जब मैं आश्रम में पढता था तो मुझसे मिलने गयी थी माँ के साथ --1984 में तब 10 रूपये दिए थे | एकबार भिक्षाटन हेतु मामा गांव बोहरबा {उजान -दरभंगा }गए --यह बात इतनी बुरी लगी मेरी नानी को उस गांव में भिक्षा मांगने नहीं दी बल्कि --इतनी भिक्षा नानी ने दे दी --जिससे कहीं जाना ही न पड़े --साथ में बोली कभी इस गांव कभी मांगने मत आना | इतना दर्द मेरी माँ को भी कभी नहीं हुआ --जितना नानी को हुआ | जब मेरठ आया और नानी से मिलने गया --केवल 3 दिन में विवाह करा दिया --शायद मेरी नानी को आभास था --मेरा घर माँ नहीं संभाल सकती है --मेरी पतनी ही मुझे आगे बढ़ा सकती है ----यह बात आज आभास हो रही है | मेरी नानी मेरी पतनी को बहू की तरह स्नेह करती थी | इतना स्नेह तो मेरी माँ ने भी कभी नही किया | --नानी की एक तमन्ना थी --मुझे देखकर बार -बार कहती थी --एकादशी का उद्यापन तुम ही करोगे | मैं छोटा था --पर कहती थी मेरे यज्ञ का तुम ही आचार्य बनोगे | मैं भी वैष्णव था मेरी पतनी भी बैष्णव थी --हम दोनों में उसे लक्ष्मी नारायण दिखते थे | आज मैं जहाँ हूँ नानी का ही आशीर्वाद है | जब नानी एकदशी का उद्यापन करने लगी तो --मामाने हमें आचार्य नहीं बनाया --बोले यज्ञ का सामान सभी बहिनों को दूंगा --हमने कहा ये आचार्य का काम है --आप केवल यजमान हो --बोले जो मैं कहूंगा वही होगा --इसके बाद मैं कभी मामा गांव भाव से नहीं गया | ---न ही कभी नानी के दर्शन ही किये | ---दोस्तों --एक ज्योतिषी होने के नाते एक बात मेरी समझ में आयी है --कुण्डली वो दर्पण है -जिसमें सबकुछ विद्यमान है ,पर आधुनिक समय में इसका जितना विस्तार हो रहा है --वो हनन की ओर विशेष जा रहा है | यह विद्या अन्वेषण की है ,सात्विक है ,धार्मिक है ,जनहित की है --आज अल्पज्ञान अर्थात खोज कम चोरी ज्यादा है --इसलिए किसी का कल्याण कारक नहीं है | जैसे गोली चलनी कहीं और थी चल कहीं और गयी --इसे ज्योतिष में योग कहते हैं | इसकी खोज मर्मज्ञ विद्वानही कर पाते हैं | --कथा को आगे पूरी करूँगा ----ज्योतिष और कर्मकाण्ड की अनन्त बातों को समझ हेतु --इस लिंक पर पधारें https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut- -आपका खगोलशास्त्री झा मेरठ

25/05/2026

मेरा" कल आज और कल -पढ़ें - भाग -47 -खगोलशास्त्री झा मेरठ
ये तमाम पात्र अपनी भूमिका नहीं निभाते -तो जीवनी कैसे लिखी जाती --कईबार खुद ही सवाल मन में उठते रहे -खुद की कुण्डली देखी है ,जिनका अपना घर ठीक नहीं होता तो दूसरे का घर ठीक करने चल देते हैं ---यही अभिप्राय इस जीवनी का है "---अस्तु ---मेरी जीवनी का एक पात्र मेरा अनुज है --जिसके ऊपर भी प्रकाश डालना चाहता हूँ | हम चार भाई एक बहिन हुए | एक अनुज बाल्यकाल में दिवंगत हो गया ,दूसरा अनुज जब हम 18 वर्ष के हुए तो सर्पदंश से दिवंगत हुआ | सबसे जो छोटा अनुज है --इसके मेरे बीच 8 वर्ष का अन्तर है| इसकी कुण्डली उपलब्ध है | मेरा स्नेह बाल्यकाल से इस अनुज पर रहा | इस अनुज का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ यह अब मैं जनता हूँ --अगर तब जनता भी तो शायद निदान नहीं हो पाता --क्योंकि माता पिता की अज्ञानता के कारण | बहुत से माता पिता हैं --बालक को बढ़िया बनाना भी चाहते हैं --पर इस बात को नहीं मानते हैं | भले ही बाल्यकाल में जब यह अनुज 2 वर्ष का हुआ तो मेरा राजयोग समाप्त हो चूका था इसे मैं स्नेह बहुत करता था --आज भी करता हूँ किन्तु --यह अनुज भी बहुत गरीबी देखी है | जैसे -तैसे धन की सोच लेकर शहर चला था --धन तो मिल गया पर --संयोग से मैं भी शिक्षा को छोड़कर -1994 मुम्बई से आये तो एक ही शहर में रहने लगे | मैं भटकता रहा --मरे हुए का नहीं खाना है ,दान नहीं लेना है ,मंदिर में नहीं रहना है --उस समय एक कन्या भी थी| यह अनुज को केवल धन चाहिए था --तो यह धनाढ्य होता गया | मेरी गरीबी बढ़ती गयी --संयोग से इसने अपने साथ रहने के लिए कहा --हमने सोचा एक अनुज पहले ही खो चुके हैं --तो चलो एक साथ रहेंगें --इसे भी शिक्षित करेंगें ---इसे दो तीन अध्याय वेद सिखाये ,ज्योतिष के शिशुबोध सिखाया| इतने ही बहुत थे आज के युग में कमाने के लिए --क्योंकि आज का समाज शिक्षा के लिए कम तुरन्त काम हो जाय -इसपर विशेष ध्यान देता है | --जब माता पिता को यह बात की जानकारी हुई --तो उन्हौनें सोचा -बड़ा भाई तो इसका सब खा जायेगा ,साथ में बेटी भी है ,इसकी शादी भी नहीं हुई थी ,माता पिता की खाई समाप्त हो चुकी थी --मेरे धन से | अब तो अनुज की शादी फिर कैसे होगी --इसकी चिंता शुरू हुई --दीदी -जीजा ,मामा -मामी ,सारे रिस्तेदार -अनुज के हो गए --मैं अकेला पड़ता गया --अब मेरा तिरस्कार पतनी भी करने लगी --जब ग्रहों के योग उत्तम न हों तो ऐसा ही होता है ,अनुज हर पल अपमानित करने लगा | तब सभी मुझे हेय दृष्टि से देखने लगे ,तब --जब ज्ञान प्राप्त हो जाता है --तो काहे के गुरु ,जब काम बन जाता है -----तो काहे का भगवान हो जाता है --तो मेरा क्या अस्तित्व | खैर --अब हम नगण्य हो रहे थे ,शिक्षा थी ,अनुभव था --पर ग्रहों के प्रभाव उत्तम नहीं थे | पतनी मेरी सदियों से पुजारिन रही है --तो जहाँ पूजा के लिए बैठती थी --मेरा अनुज वहाँ थूका करता था ,मैं अपने अनुज के कपड़े धोया करता था ,मेरा अनुज ड्राइक्लीन के ही कपड़े पहनता था ,नित्य एक फ़िल्म देखता था ,उसके मन्दिर की सारी जिम्मेदारी मेरी थी --केवल शान से रहता था --वही करता था जो उसे अच्छा लगता था | एकदिन मेरी पतनी पीडित होकर शहर मेरे पास आ गयी पिताजी के साथ | पिताजी चले गए -एक दिन नौवत यह आ गयी --अनुज बोला -शब्दों पर गौर करें -मुझे --अगर तुझे मेरे पास रहना है --तो मैं आजाद घूमूँगा तू सफाई करेगा ,बर्तन माँजेगा ,आरती करेगा साथ में मेरी सेवा तुम्हारी पतनी करेगी ---ये शब्द मानो मरने जैसा था --हमने कहा कुछ नहीं करूँगा --यहाँ से चला जाऊंगा --रात में बच्चों के साथ छत पर सो रहे थे --सुबह जब आँख खुली तो दरवाजे बंद थे --हमारी छोटी बिटिया भूख से तड़प रही थी --यह हाल मुझसे देखा नहीं गया -- दरवाजे में पैर मारे -- दरवाजे खुल गए --मुझ पर चोरी का इल्जाम लगाया साथ ही निकाल दिया --इसके बाद कभी नहीं मिले --अनुज के साथ--इस कथा को आगे पूरी करूँगा ----ज्योतिष और कर्मकाण्ड की अनन्त बातों को समझ हेतु --इस लिंक पर पधारें https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut-

24/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें ?--- भाग -46 -ज्योतिषी झा मेरठ
' कृपया ध्यान दें --जीवनी में अभी मैं सभी पात्रों की भूमिका को दर्शा रहा हूँ | यह कहानी कारीब -करीब सभी लोगों के जीवन में होती है --पर मेरा उद्देश्य इसे लाभ कहें या हानि ,इसे भाग्य कहें या कर्म ,--तो यह समझें दुःख से सभी जीव बचना चाहते हैं --ज्ञानी पुरुष खोज करते हैं ,साधारण पुरुष विधि का विधान समझकर रूक जाते हैं --मेरा मानना है --मानव का उद्देश्य सार्थकता होनी चाहिए --"---आज मैं जीजा के ऊपर प्रकाश डालना चाहता हूँ | मेरे जीजा धनाढ्य परिवार से हैं| जीजा के माता पिता वैष्णव थे| --मेरे जीजा मुझसे ज्यादा पढ़े -लिखे थे ,मुझसे बहुत बड़े थे | जीजा के कुछ कर्तव्य थे --पर कर्तव्य विमुख क्यों हुए ---अपने जीवन में कभी भी एक रुपया नहीं दिया मुझको ,कभी भी कोई सलाह नहीं दी | बदले की भावना न सही पर मेरे घर को पुत्र की तरह संभालना चाहिए था --उसकी जगह अपना घर छोड़कर मेरे घर में साम्राज्य स्थापित किया --मुझे दीदी एवं जीजा की कुण्डली नहीं मिली --जिससे यह पता करते --राहु की वजह से हम दरिद्र हुए या इनकी कुण्डली कुछ और कहती थी | मेरे माता पिता अनपढ़ थे --तो उनको सही राह दिखाते --इसकी जगह उन्होनें कैसे राज्य स्थापित किया सुनें ---कुछ धन व्याज पर चलने लगा मेरे गांव में ,यह लत इतनी बढ़ गयी --किआज तक चल रही है | माँ ऐसे लिप्त हुई --मानों उसे दीदी जीजा से उत्तम कोई दिखाई ही दिया| --बहुत कम उम्र से अपने घर को संभालने का काम हमने किया --पर जब मेरठ मैं आ गया तो पूर्ण रूप से स्थापित मेरे घर में हो गए बच्चों के साथ | तब मैं अकेला था --इस बात पर ध्यान नहीं देता था ,जब 1990 में मेरा विवाह हुआ --जिम्मेदारी बढ़ गयी तब तक मेरा घर रसातल पहुंच चूका था | जीजा का घाटा मेरी कमाई से पूरा होता था | मेरी कमाई से चौपाल लगता था जिसमें सभी लोग चाय ,सरबत का आनन्द लेते थे ,कुछ ननिहाल तो कुछ सभी रिश्तेदारों तक कमाई जाती रही ,ऊपर से खाई इतनी थी --जब मैं मुम्बई पढ़ने गया तो एक जमीन जिससे दीदी का गोना हुआ था -1000 से यह ऋण --1992 में चुकाया | दीदी -जीजा ,मामा,अनुज का तालमेल एक था मैं नगण्य था |पिता के मुकदमें में कभी जीजा नहीं बोले युद्ध मत करो --समझौता कर लो ,जब मेरी पतनी आयी --माँ बनने वाली थी --सभी मौज करते थे --खाना घरवाली बनाती थी | किसी दिन व्रत होता था --तो माँ और दीदी दूसरे के आंगन में फलाहार करती थी ताकि देख न ले --पर बात कब तक छुप सकती थी | यह कहानी जानने के बाद भी --मुझे धर्म दिखता था | --अन्त में भाग कर मेरठ मेरे पास पतनी आ गयी -----अन्त में भाग कर मेरठ मेरे पास पतनी आ गयी ---इसे राहु का चक्र कहें या कायरता --जबाब आगे दूंगा | ----ज्योतिष और कर्मकाण्ड की अनन्त बातों को समझ हेतु --इस लिंक पर पधारें https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut-

24/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें ?--- भाग -45 -खगोलशास्त्री झा मेरठ
'आज मैं मेरे मामा का साम्राज्य मेरे घर में कैसे हुआ पर प्रकाश डालना चाहता हूँ --इसके बाद दीदी की कथा सुनाऊंगा जो अधूरी रह गयी है "----अस्तु --मेरी माँ के दो बहिन एक भाय हुए | नाना बहुत छोटी 8 वर्ष की उम्र में चले गए | माँ का पालन नानी के पिता ने की जिनको हमने बहुत करीब से देखा है --उन्हौने ही मेरी माँ का विवाह मेरे पिता से कराया था साथ ही मेरे घर में बहुत सम्मान था --पर निर्लोभी थे कुछ दिया ही होगा लिया नहीं किन्तु जब मेरी गरीबी आयी उससे पहले ही दिवंगत हो गए थे| मेरे पिता के विवाह के बाद मामा मेरे घर पर रहे, नानी का खर्च भी पिता ने ही उठाया था | मौसी का लालन -पालन नानी ने ही किया --नानी पे जमीन तो थी पर आय का साधन नहीं था --अतः मेरी माँ ने भार उठाया | मेरे मामा बहुत जल्दी दसवीं पास कर सरकारी नौकरी रेलवे में प्राप्त की और दिल्ली चले गए | तब मेरी उम्र 7 वर्ष थी जो ठीक से ज्ञात नहीं है| तब जब मामा थे तो मेरा राजयोग चल रहा था पिता-ने जमीं ली, दुकान ली --पर सुना है --सारी पूंजी चोरी हो गयी थी| ---हम दोनों भाईयों के जनेऊ संस्कार 1980 में हुए --तब मामा दिल्ली से हमलोगों के लिए बहुत कुछ ला रहे थे जो ट्रेन में ही खो गए | उपनयन संस्कार बड़े ही धूमधाम से हुए थे --तत्काल ही कुछ पैसों की जरुरत हुई थी --पिताने मामा से उधार 2000 मांगें थे --बोले पैसे तो नहीं हैं मेरी पतनी के गहने ले लो और व्याज पर पैसे लेलो --मेरी माँ ने ऐसा ही किया| कुछ दिन बाद गहने वापस कर दिए --मेरे पिता ने | ---इसके बाद मेरे घर में दीदी की शादी हुई मामाने मदद नहीं की बल्की जमीन बेचकर शादी हुई थी | इसके बाद पूर्ण रूप से गरीबी मेरे परिवार में चल रही थी --कभी भी एक रूपये देते हुए मामा को नहीं देखा| --1984 में दीदी का गोना {द्विरागमन }हुआ जो जमीन फिर गिरबी रखकर हुआ --तब मैं 14 वर्ष का था ,सबकुछ जानता था | मेरा भाई सर्पदंश से दिवंगत हुआ --कर्य लेकर संस्कार हुए थे --तब भी कोई मदद नहीं की थी | मामा की शादी पिता ने करायी थी --तो मामा को पुत्र नहीं था --माँ ने कहा हमने पहली जन्मपत्री फ्री में बनायीं थी --और कहा बालक अवश्य होगा --तत्काल ही दो बालक हुए --उनको पहले से दो कन्या थीं | मुझे याद नहीं है कभी ममाने एक रुपया मुझको दिया हो --एकबार बोले दसवीं प्रथम स्थान से पास करोगे तो किताब दिलाऊंगा ---आजतक नहीं दिलाये |1981 जबसे मुझे ज्ञान हुआ -1988 जब मैं मेरठ आ गया --गुप्त रहे | मेरठ मेरा आना और मामा का अधिपत्य बनना हुआ| मामा जब भी घर आते रहे थैला ले जाते रहे ---हमने --14 वर्ष से ही अपने घर को संभालने की कोशिश की है | --मेरी माँ सदावहार रही क्योंकि मेरे घर से तब से धन जा रहा था --जब हम नहीं थे \मेरे घर में वही होता था जो माँ चाहती थी | पिता हमारे सदा नाराज रहते थे इस बात से --मुझसे बारबार कहते थे --दोनों -जीजा और मामा पे कभी भी भरोसा मत करना | --जब हम मेरठ आये --तो धन और बरसने लगा मेरे घर में मामा की तो चांदी दी ही चांदी हो गयी | ---यहाँ मैं आपलोगों से ही मत जानना चाहता हूँ --क्या मेरे मामा सही थे --अगर सही थे तो हमारी ह्रदय से कोई मदद क्यों नहीं की जबकि हमारे माता पिता ने तो बहुत किया था| --चलो जो दूसरा प्रश्न है --मेरे पिता ने पढ़ाया तो हम तीन भाई एक बहिन थे एक को ही पढ़ा देते | यदि मदद नहीं की तो मेरी माँ को सही दिशा देते | ---मेरे मामा की सारी बातें ,दीदी को ,अनुज को ,माँ को, पिता को ,जीजा को अच्छी लगती है मेरी बात या मेरी पतनी की बात अच्छी क्यों नहीं लगती है | --मैं तो कभी मांगने भी नहीं गया ==एकबार जब मुम्बई पढ़ने जा रहे थे तो --एक रास्ता बताया था मुर्दा उठाकर कमाने का जो हमने अमल नहीं किया | ---बात यह जिस व्यक्ति को खाने की लेने की आदत हो जाती है यह उसका स्वभाव बन जाता है ---मेरे मामा देना नहीं लेना सीखें हैं | जब मेरे घर में सुख के दिन आते हैं तो फिर मामा प्रकट हुए --मेरा मकान बना मामा की सलाह पर ,भाई का विवाह हुआ मामा की सलाह पर ,मुकदमें हुए मामा की सलाह पर --जब माता पिता ,अनुज -अनुज भार्या की जेल हुई तो बचाने जीजा ,मामा नहीं यह कार्य मेरी भार्या ने की |-----अब आगे ज्योतिष के माध्यम से साबित करने का प्रयास करूँगा --किसी जातक के जीवन में मातृपक्ष का सुख क्यों नहीं है | ---ॐ------आगे की चर्चा आगे करेंगें -----ॐ आपका - -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ---ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut

22/05/2026

ज्योतिष कक्षा पाठ -30 पंचांग का पांचवां अंग -करण -पढ़ें -ज्योतिषी झा मेरठ
--पाठकगण को यह तो ज्ञात होगा ही कि तिथियां केवल 30 होती हैं | 15 शुक्लपक्ष की और 15 कृष्णपक्ष की | तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं | किस तिथि के किस आधे भाग को कौन -सा करण कहते हैं | यह निम्न तालिका से स्पष्ट हो जायेगा ---------------
----कृष्णपक्ष ----- शुक्लपक्ष

-1 -प्रतिपदा =कौलव --1 --किंस्तुघ्न =बव

-2 -द्वितीया -तैतिल =गरज --2 -बालव =कौलव

-3 -तृतीया -वणिज =विष्टि --3 तृतीया -तैतिल =गरज

-4 चतुर्थी -बव =बालव --4 -चतुर्थी ---वणिज =विष्टि

-5 पंचमी -कौलव =तैतिल ,-पंचमी --बव =बालव

-6 -षष्ठी --गरज =वणिज ,--6 -षष्ठी ---कौलव =तैतिल

-7 -सप्तमी ---विष्टि -बव ----7 सप्तमी --गरज =वणिज

--8 --अष्टमी ---बालव =कौलव ,--8 -अष्टमी ---विष्टि =बव

--9 नवमी ---तैतिल =गरज ----9 नवमी ---बालव =कौलव

-10 -दशमी --वणिज ---विष्टि ,---10 दशमी ---तैतिल =गरज

--11 एकादशी ---बव =बालव ---11 एकादशी --वणिज =विष्टि

-12 -द्वादशी ---कौलव =तैतिल ,---12 -द्वादशी --बव =बालव

-13 त्रयोदशी -गरज =वणिज ,---13 त्रयोदशी ---कौलव =तैतिल

-14 -चतुर्दशी --विष्टि =शकुन ----14 चतुर्दशी =गरज =वणिज

-30 -अमावस्या ---चतुष्पाद -----15 --पूर्णिमा ---विष्टि =बव
----उपर्युक्त तालिका में पाठक देखेंगें कि बव ,बालव ,कौलव ,तैतिल ,वणिज ,गरज और विष्टि इन 7 कारणों की तो बारंबार पुनरावृत्ति होती है और शेष चार --शकुन ,चतुष्पाद ,नाग और किन्तुघ्न एक मास में केवल एकबार होते हैं ,विष्टि करण को ही भद्रा कहते हैं | पाठक इस बात को याद रखें ,क्योंकि आगे किन्हीं प्रकरणों में हम भद्रा पर विचार करेंगें | ---पंचांग में पहले - तिथि फिर दिन फिर नक्षत्र फिर योग और अन्तिम पांचवीं चीजें कारण -इनके आधार पर ही किसी भी शुभ या अशुभ कार्यों का निर्णय होता है ----अगले भाग में वार शब्द पर व्याख्या करेंगें ----- भवदीय निवेदक -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ --ज्योतिष सीखनी है तो ब्लॉकपोस्ट पर पधारें तमाम आलेखों को पढ़ने हेतु -khagolshastri.blogspot.com

22/05/2026

ज्योतिष कक्षा पाठ -29 -योग किसे कहते हैं -पढ़ें - ज्योतिषी झा मेरठ
---सूर्य और चन्द्रमा के राशि ,कला ,विक्ला को "योग "कहते हैं | योग 27 होते हैं ,जिनके नाम नीचे दिए जा रहे हैं | ---1 -विष्कुम्भ ,--2 प्रीति ,---3 --आयुष्मान ,--4 --सौभाग्य ,--5 --शोभन ,---6 --अतिगण्ड ,--7 --सुकर्मा ,--8 --धृति ,--9 --शूल ,--10 --गंड ,--11 --वृद्धि ,--12 --ध्रुव ,---13 --व्याघात ,--14 --हर्षण ,--15 --वैर ,--16 --सिद्धि ,--17 व्यतिपात ,---18 --वरीयान ,---19 --परिध ,---20 ---शिव ,---21 --सिद्ध ,---22 --साध्य ,--23 ---शुभ ,---24 --शुक्ल ,--25 --ब्रह्म ,---26 --इन्द्र ,---27 ---वैधृति |
योगों के स्वामी क्रम से जानें ------

-1 ---विष्कुम्भ =यम ,----2 ---आयुष्मान =चन्द्र ,-----3 शोभन =गुरु ,-----4 -सुकर्मा =इंद्र ,----5 --शूल =सर्प ,---6 --वृद्धि =सूर्य ,----7 ---व्याघात =वायु ,---8 --वैर -वज्र =वरुण ,----9 -व्यतिपात =रूद्र ,---10 --परिध =विश्वकर्मा ,---11 --सिद्ध =कार्तिकेय ,---12 --शुभ =लक्ष्मी ,----13 --ब्रह्म =अश्विनी ,----14 --वैधृति =दिति ,---15 --प्रीति =विष्णु ,---16 --सौभाग्य =ब्रह्मा ,---17 -अतिगंड =चंद्र ,---18 -धृति =जल ,---19 --गंड =अग्नि ,--- 20 -- ध्रुव =भूमि ,---21 --हर्षण =भग ,--22 --सिद्धि =गणेश ,--23 --वरियन =कुबेर ,--24 --शिव =मित्र ,---25 --साध्य =सावित्री ,--26 --शुक्ल =पार्वती ,---27 --इन्द्र =पितर --|
---पाठकगण --ज्योतिष जगत सबसे ज्यादा फलादेश में आधुनिक समय में --लोगों के मुखारविन्द पर दो शब्द निरन्तर होते हैं --तुम्हारा नक्षत्र ठीक नहीं है ,दूसरा --योग अच्छा नहीं चल रहा है | जबकि सच यह है --ज्योतिष में दो रूप होते हैं गणित + फलित ---गणित में नक्षत्र +योग गणना की चीजें हैं ,------किन्तु फलित में --व्यक्ति का समय का फलादेश नक्षत्र +योग हैं | अतः दोनों -गणित + फलित की जानकारी ठीक से होनी चाहिए --तभी खगोलशास्त्री बन सकते हैं | --अगले भाग में पंचांग का एक अंग करण है जिस पर परिचर्चा करेंगें | --- भवदीय निवेदक -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ --ज्योतिष सीखनी है तो ब्लॉकपोस्ट पर पधारें तमाम आलेखों को पढ़ने हेतु -khagolshastri.blogspot.com

20/05/2026

ज्योतिष कक्षा पाठ -28 पंचांग किसे कहते हैं -पढ़ें - ज्योतिषी जगा मेरठ
पंचांग के बिना वैदिक ,स्मार्त तथा गृहस्थी के कोई कार्य सिद्ध नहीं होते | काल रूपी ईस्वर के पंच अंग को पंचांग कहते हैं | वो पाँच अंग हैं --1 -तिथि , -2 -वार ,--3 -नक्षत्र ,--4 --करण ,--5 -योग ---यहाँ हम केवल नक्षत्र के बारे में बता रहे हैं | तिथियों के बारे में पहले बता चुके हैं शेष के विषय में आगे बताएंगें |
----जैसा कि हमने अभी बताया था कि समस्त भचक्र को 27 भागों में बांटा गया है | इस कारण 1 राशि =2 "सवा दो नक्षत्र " उपरोक्त तालिका के द्वारा पाठकगण प्रत्येक नक्षत्र के अंश और कला को ज्ञात कर सकते हैं |
-----चन्द्रमा जिस राशि ,अंश ,कला और विकला में होता है ,उस भाग का स्वामी जो नक्षत्र माना गया है "वह नक्षत्र हैं " ऐसा व्यवहारिक भाषा में कहा जाता है | कोई पाठक प्रश्न करे कि आज अश्विनी नक्षत्र 28 घटी 25 पल है --इसका क्या अर्थ है ? ---इसका उत्तर यह है कि अश्विनी नक्षत्र तो सदैव था ,सदैव रहेगा --किन्तु अश्विनी नक्षत्र आज 28 घटी 25 पल है ,--इसका अर्थ है जिस स्थान के हिसाब से पंचांग बनाया गया है ,उस स्थान पर सूर्योदय के 28 घटी 25 पल तक चन्द्रमा प्रथम राशि के 13 अंश 20 कला वाले भाग में "जो अश्विनी के नाम से विख्यात है " रहेगा |

----ठीक 28 घटी 25 पल व्यतीत हो जाने पर चन्द्रमा प्रथम राशि के 13 अंश 20 कला वाले भाग को पार का आगे वाले भाग "भरणी " में चला जायेगा | इसलिए नक्षत्र है --इसका अर्थ हुआ नक्षत्र वाले भाग में चन्द्रमा इस समय तक रहेगा | अक्सर पूछा जाता है कि आपका जन्म नक्षत्र क्या है ? इसका अर्थ है --जब आपका जन्म हुआ था तब चन्द्रमा किस नक्षत्र वाले आकाशीय विभाग में था | इसी प्रकार इस बात को भी जान लिया जाता है कि जन्म के समय चन्द्रमा किस राशि में था |

---प्रत्येक नक्षत्र का भाग 13 अंश 20 विकला है | इसको 4 से भाग देने पर प्रत्येक भाग 3 अंश 20 कला का हुआ ,इस प्रत्येक भाग को पाद "पैर " या चरण कहते हैं | नक्षत्र के जिस चरण में जन्म हो ,उसके अनुसार नाम का प्रथम अक्षर चुनने की प्रथा है |
---अगले भाग में --पंचांग का एक अंग योग है --जिस पर परिचर्चा करेंगें ----- भवदीय निवेदक -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ --ज्योतिष सीखनी है तो ब्लॉकपोस्ट पर पधारें तमाम आलेखों को पढ़ने हेतु -khagolshastri.blogspot.com

19/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें - भाग -44 -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ
"हम अपनी जीवनी लिखते समय सबसे पहले अपने आप को अनन्त कसौटी पर परखें --जैसे क्या मेरे माता यहीं हैं ,क्या मैं इनकी ही संतान हूँ ,मेरी जीवनी में जितने पात्र हैं सच में मेरे परिजन हैं या आपको भ्रमित करने के लिए आधार बनाया गया है --आईये आप लोग भी अपनी -अपनी कसौटी पर अपने आपको परखकर देखें "----अस्तु -- ज्योतिष की दुनिया में कोई भी जातक या जातिका यह जान सकते हैं --मैं किसकी संतान हूँ ,जो वर्तमान में मेरे माता पिता हैं क्या सच में हैं --इसके लिए ज्योतिष जगत हमें सटिक जानकारी देता है | --मेरी कुण्डली में चौथे भाव का और नवम भाव का स्वामी मंगल है जो लग्नेश सूर्य के साथ लग्न में ही विराजमान हैं ,इनकी यानि मंगल ग्रह -4 ,7 ,8 भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है | सूर्य स्वराशि का लग्न में है | --यह तो निश्चित हो गया जो मेरी माँ है -उसका मैं पूर्ण अंश हूँ | --कर्मेश --जिसे पिता का क्षेत्र भी कहा जाता है ज्योतिष की दुनिया में --मेरा शुक्र कर्मेश है किन्तु दूसरे घर में में बुध के साथ उपस्थित है ---बुध की वजह से नीचता भंग हो गयी है साथ ही कर्मक्षेत्र में चन्द्रमा उच्च का है --अतः मैं अपने पिता का ही आत्मज हूँ | अब दूसरी शंका थी --जो मेरा रंग है ,कद है क्या मेरी कुण्डली से सही मिलान है --मैं सिंह लग्न का हूँ सूर्य ,मंगल और केतु लगन में हैं एवं सप्तम भाव में राहु है और किसी ग्रह की पूर्ण दृष्टि नहीं पड़ रही है ---अतः देदीप्यमान चेहरा ,कद्दावर शक्ल ,लाल वर्ण होते हुए भी --स्थान के अनुसार रूप दिखाई देगा | जैसे ग्रहण लगने पर सूर्य +चन्द्र अपनी कान्ति खो देते हैं इसी प्रकार से मैं मातृभूमि पर जब भी रहूँगा तो रूप धूमिल रहेगा ,अगर किसी और प्रदेश या जगह पर रहूँगा तो लाल-गौर वर्ण स्वरूप मेरा रहेगा ---यह बात भी सही है --वास्तविक जो मेरा रूप है वो काला है पर ग्रहण से दूर होने पर मेरा रूप गौर वर्ण हो जाता है | --अतः यह जो उपलब्ध कुण्डली है यह भी सही है और मैं भी सही हूँ ---| --अब आपलोगों के मन में भी कई प्रश्न उठ रहे होंगें --आधार क्या है --तो ताजिकनीलकण्ठी ,मुहूर्तचिन्तामणि ,वृहत्पराशर ,जातकाभरणं ,जातकतत्वम --बहुत सारे जो संस्कृत के ग्रन्थ हैं -सांख्यकारिका --तमाम ग्रन्थों को जानने के बाद ही यह निष्कर्ष संभव है ,इसके साथ ही --व्यक्ति की अनुभव की कला ---अब फिर एक शंका आपके मन में उठ सकती है --कोई कम पढ़ा हो या नहीं जनता हो तो उसे सही ज्ञान नहीं हो सकता है ---इसका जबाब है --ज्योतिष का लाभ केवल राजा महराजा लेते थे ----इसके लिए -गणना और साधना होती थी --ब्रह्मण की जिम्मेदारी राजा की होती थी राजा का दायित्व ज्योतिषी का होता था --एवं सदा अन्वेषण में ज्योतिषी लगे रहते थे | आज अन्वेषण कम तर्क और कुतर्क ज्यादा होते हैं | आज अगर एक कुण्डली सही बनाई जाय तो लाख रूपये भी कम हैं --पर आपकी हां में हां मिलानी है ,अपनी जीविका चलानी है --तो हम लाचार होते हैं ,न अपना भला कर पाते हैं न आपका | ----ॐ------आगे की चर्चा आगे करेंगें -----ॐ आपका - -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ---ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut

19/05/2026

"मेरा" कल आज और कल -पढ़ें ?--- भाग -43 - ज्योतिषी झा मेरठ
मेरी जीवनी में नाटक की तरह अनन्त पात्र हैं ,सभी पात्रों की अपनी -अपनी भूमिका है --तभी यह आत्मकथा बनी है | परमात्मा ने मेरी जीवनी में आठों रसों का स्वाद भरपूर दिया है | इस जीवनी रूपी स्वाद को जितना चखने का प्रयास करेंगें --आप में स्वतः ही निखार आता जायेगा क्योंकि यह सत्य पर आधारित है साथ ही आज जहाँ से मैं लिखने की कोशिश कर रहा हूँ --वहां केवल एक ही धेय है --आपका कल्याण --चूकि -रत्न क्या होते हैं ,ग्रह क्या होते हैं ,हमारे ऊपर प्रभाव क्यों पड़ता है ,हमें निदान क्या -क्या करने चाहिए ,कालसर्पदोष के 95 आलेख भी लिख चूका हूँ ,वास्तु दोष क्या होता है इसके भी 35 आलेख लिख चूका हूँ --देश -विदेश की तमाम बातों को लिख चूका हूँ ,लाखों लोगों को एकबार निःशुल्क ज्योतिष सेवा दे चूका हूँ | इसके बाद हमने अपनी सेवा महंगी कर दी ताकि कम लोग ही हमसे सम्पर्क कर सकें | --पर मानव हैं कामना की पूर्ति होते ही पुनः कामना शुरू होती है --साथ ही --अगर आप सभी पाठकगण पढ़े लिखे हैं ,रामायण हो ,वेद हों ,पुराण हों ,भागवत हो या फिर और ग्रन्थ सभी के बारे में बखूबी जानते हैं| हो सकता है --रत्न के बारे में ,आलेखों के बारे में या ज्योतिष के बारे में हमने आपको अपनी और तार्किक बुद्धि से खीचने का प्रयास किया हो --तो मुझे लगा --मेरी जीवनी ही एक ऐसा उदहारण हो सकती है --जो मेरी खुद की घटना है एवं अब हम उस पड़ाव पर हैं --जहाँ मुझे जरुरत की पूर्ति हो चुकी है --और आराधना की ओर जाना चाहिए | इस अवस्था में --मुझे लगता है आने वाला जो समय आयेगा --उसमें सुख कम दुःख लोगों को अति मिलेगा --तब लोगों को शान्ति की तलाश में -कैसे यकीन करेंगें कि सामने वाला जो कह रहा है --वो लोभ से या बरगलाने के लिए या फिर बहकाने के लिए --तब आपको सच की राह ,जीने की कला ,आप क्या हैं ,क्या आप जिसे शत्रु समझते हैं --वो शत्रु है ,आपके कर्तव्य क्या हैं ,आपको करना क्या चाहिए ---तथा प्रेरणा देने वाले ठीक हैं या उनकी कहानी आप जैसी ही है --तब यह जीवनी समझ में आएगी --आज भले ही न आये | बाबा तुलसी दास हों या भगवान व्यास --तब जब वो रहे तब ये दोनों ग्रन्थ --रामायण + भागवत -जिसे स्वयं भगवान स्वरूप आज मानते हैं ,वैसी ख्याति नहीं प्राप्ति की जैसे ख्याति आज मिल रही है | --अतः --जब मैं नहीं रहूँगा तब यह जीवनी एक कथा बन जायेगी --यह मुझे भरोसा एवं विस्वास है --क्योंकि मेरा ध्येय -व्यक्ति कल्याण है | मेरा ध्येय ज्योतिष को उस पायदान पर खड़ा करना है --जो उसका सही अस्तित्व है | ---यह बात साबित करने का भरसक प्रयास करूँगा --ज्योतिष का प्रभाव क्या सच में पड़ता है | कभी मैं कन्हैयालाल झा था ,कभी मैं ज्योतिषी झा था --अब हम खगोलशास्त्री झा हैं --इसका भावार्थ होता है --अन्वेषण करना ,सटिक बातों को बताना ,भेद -भाव रहित उत्तम समज की रचना करना --जन -जन का कल्याण कैसे हों ताकि सभी अपनी -अपनी जीवनी को ठीक से सवार सकें ---ॐ------आगे की चर्चा आगे करेंगें -----ॐ आपका - -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ---ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ
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