Dear Friends, we have posted an appeal around two months ago about the idea of planting fruit plants during the rainy season. This message is to inform you about the achievements of the idea. I have personally been able to plant more than 1100 Papaya Plants. Around 150 Mango plants are ready for plantation. Around 200 packets having more than double plants are under the germination process. This whole work is done in a very small space. I was interested to plant in schools and other community places but due to Covid 19, I have to restrict myself to Vaishali only. Feeling very satisfied after seeking the achievement of my idea. Thanks for your encouragement.
SARAL - Society for Advocacy, Research & Affirmative Livelihoods
Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from SARAL - Society for Advocacy, Research & Affirmative Livelihoods, School, Meerut City.
AN APPEAL
Dear Friends,
The theme for World Environment Day 2020 was “Time for Nature”. It has been celebrated on 5th June 2020 as in over 100 countries. Many of us were also interested to contribute, but questions of how & where surrounded us. We (group of 5 people) celebrate it daily, how?
1. We daily purchase milk in one kg. packaging. What you do of empty packets- throw them in dustbin? We collect them after washing & drying.
2. We daily eat some fruits like Papaya, Mango, Java Plum (Jamun), etc. What you do of seeds- throw them in dustbin? We collect them after washing & drying.
3. Then on holidays or weekends, we volunteer to fill these empty milk packets with a mixture of soil & manure and put the collected seeds into them.
4. We water them regularly for their growth into small fruit plants. We pay Rs. 10/-per packet to guard for watering, caring & protecting these growing seeds.
5. We will plant these on right places during monsoon through self plantation and free distribution in friend circle for plantation. In case we shall be able to develop plants in good quantity, then can share with administration for helping in plantation.
6. This activity will help insects, birds & animals to sustain in environment & in turn they will improve our ecosystem.
Now, you might be thinking why are we telling all this? Simply we need your help for increasing the quantum of plants in following ways:
1. We need more empty packets.
2. We need more seeds.
3. We need voluntary contribution at your wish in the form of soil, manure, watering & caring amount and labor and plantation of fruit plants during monsoon.
4. Above all, this is an idea. Become our remote partner and grow some fruit plants at your end as it costs nothing.
We all together can make a “MISSION OF PLANTING FRUIT TREES”. Little interest & management will result in developing a culture of nurturing plants & enjoyment with nature. Our children will listen Koel Singing, Parrot sounds along with many positive biodiversity effects in our ecosystem & controlling pollution. Let’s return something back to nature.
We are working ourselves at a very small level. We are able to develop more than 1000 plants during this CORONA period and the process is still on. If somebody wants Papaya or Mango Plants then contact us at 9953742360 between 6 to 7 PM. We are providing free for plantation but cost required at your end is regular care.
Thanks & Request again, let’s we all do something for the mission……..
TEAM SARAL
02/06/2020
भारतीय (प्रवासी) मजदूर का ‘‘वापसी पलायन’’
आ अब लौट चले ..............
डा. मन्जू सिंह
किसी बुजुर्ग ने एक बार मुझसे कहा था,
‘‘नोैकरी मत करियो, धास खोद खाइयो। कोई खोदे दूर, तु पास ही खोदियो। । ‘‘
उस समय मुझे इसका मतलब समझ नही आया था, पर आज दिल की गहराई को छु चुका है कि उनके ‘पास‘ का क्या मतलब था। पलायन आधुनिक समाज का एक यर्थाथ सत्य है । यह प्रायः ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र की ओर होता है । इसे जीविका के लिये एक अवसर के रूप में देखा जाता है। जहां पलायनकर्ता की अपने समाज में प्रतिष्ठा बढती है, वहीं शहरी समाज में उसे उक परजीवी के रूप में देखा जाता है।
ग्रामीण परिवेश से आये व्यक्तियों को अक्सर अकुशल मजदूरी वाले कार्य, जो प्रायः असंगठित क्षेत्र में उपलब्ध है, ही करने को मिलते है। इन कार्याे का स्वभाव अक्सर नियमित नहीं होता और इनकी मजदूरी भी कम होती है। इन परिस्थतियों में उन्हें अपना जीवन गुणवत्ता के आधार पर सबसे नीचे वाले पायदान से शुरू करना पड़ता है। ये हाशिये पर रहने वाले लोग अक्सर समूह में रहते है। जिसमे प्रायः या तो इनके गांव के लोग या रिश्तेदार होते है। कच्ची बस्तियों के एक-एक कमरे में कई- कई लोग रहते है। जहां पीने के पानी, स्वच्छता, बिजली, सफाई आदि जैसे मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव होता है। हां, यहां अपराध और असुरक्षा का माहौल अवश्य प्रचुर मात्रा में मिलता है। ऐसे माहौल में मजदूर अक्सर अपने परिवार के साथ रहने को मजबूर होते है। जरा परिकल्पना करके सोचिये कि इस गरीब, मजबूर, ग्रामीण को महानगर में आकर किस-किस प्रकार के हादसों का सामान करना पड़ता होगा और इस प्रकार के सांस्कृतिक अंतराल से उन्हें किस प्रकार का सांस्कृतिक धक्का लगता होगा। इन सब विपरीत परिस्थितियों के बावजूद ये लोग शहरों में बसने को मजबूर हो जाते है। जिनका शरीर तो शहर में, परंतु आत्मा उनके गांव मे ही बस्ती है और इस प्रकार ये लोग अपने परिवार व रिश्तेदार जनों को आर्थिक सहयोग देने में कामयाब हो पाते है। इन भारतीय मजदूरों को प्रवासी बताकर इन्हें शहरीें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और वातावरण पर कुप्रभाव के रूप में देखा जाता है। अक्सर इन भारतीय (प्रवासी) मजदूरों को किसी ना किसी रूप में, कभी किसी राज्य से, कभी किसी राजनीतिक दल से, विरोध का सामान करना पड़ता है। इतनी विपरीत परिस्थितियों और विरोध के पश्चात् भी इन्होंने कभी शहरी छोड़कर गांव की और रूख करने के प्रयास नहीं किये, ‘‘जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां ...........’’।
कोरोना (इस सदी की महामारी) काल में ऐसा क्या हुआ, जो आजतक नहीं हुआ था। शायद भारत के 1947 के बंटवारे के बाद पहली बार इतनी बड़ी जनसंख्या का विस्थापन हुआ। इस विस्थापन को ‘‘रिवर्स माईग्रेसन’’ अथवा ‘‘वापिसी पलायन’’ इस सदी की एक नई प्रक्रिया के रूप में उभर कर आई है। जिसमें प्रवासी मजदूर ने वापिस अपने गांव का रूख कर लिया। ‘‘आ अब लौट चले..............’’ की प्रक्रिया में ऐसा क्या अनोखा पाने वाले है मजदूर? पाने से पहले, कितना खोने का खतरा, कितनी परेशानियां, यह सब तो हम रोज समाचारों तथा सोशल मिडिया के माध्यम से देख और समझ रहे है। स्थितियां इतनी भयावह है कि खुद को इंसान कहने में शर्म आ रही है। अपने देश पर अभिमान करने वाले सिर झुके जा रहे है- जाने मरने वालो की संख्या कहां तक पहुंच गई, जाने कितनी माँ अपने मृत बच्चे को उठाये जा रही है, जाने कितने भूखे-प्यासे लोग सड़को पर चल-चल कर थक गये है। यही है समन्वित विकास की परिकल्पना- कहां है सड़को किनारे छायादार वृक्ष, प्याऊ और विश्राम स्थल ? क्या हमने कभी सोचा था ऐसा मंजर, जो शायद सोचने पर ही कंपा देता, हमने तो देख भी लिया और ऐसे मे सरकार से अपेक्षा बनी निराशा, ‘‘मै ये सोच कर उसके दर से उठा था, के वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको ...........’’।
आखिर, इसके मुख्य कारण क्या हो सकते है :-
(क) रोजगार की अनिश्चितता :- कोरोना की बीमारी से बचाव के जो भी माध्यम बताये गये, उसके पश्चात् एक अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है। पता नहीं कौन सा रोजगार चलेगाघ्, कौन सा नहीं ?, कैसे चलेगा ?, कब शुरू होगा ?, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा है। अब जिस मूलभूत कारण से भारतीय (प्रवासी) मजदूर यहां रह रहे थे वहीं समाप्त होता नजर आ रहा है तो यहां रहना व्यर्थ हो गया है। शहरों का जीवन, बगैर पैसे या खर्चे के सम्भव नही है। यहां रहने का, खाने का और अब तो छींकने-खांसने का भी खर्च देना है। इन परिस्थितियों में बगैर रोजगार जीवित रहना सम्भव सा नजर नहीं आता। शहरी माहौल तो ‘‘पैसा फेंको, तमाशा देखो............’’ को ही चरितार्थ होता है।
(ख) सुरक्षा :-भारत देश की इतनी बढ़ी जनसंख्या ऐसा असुरक्षित जीवन जी रही है। यह शायद हम सबकी परिकल्पना से भी परे था। भारतीय (प्रवासी) मजदूर जो हमारे सामाजिक और आर्थिक विकास में एक नींव के पत्थर की भांति काम करते है, क्या इतनी असुरक्षा दी है हमने बदले में उन्हें ? यहां सरकार (मेरा अभिप्रायः किसी प्रकार की दलगत राजनीति अथवा पूर्व या वर्तमान राजनीति से नहीं) की अगर दूरदृष्टि होती और जो फर्ज भी था कि इन प्रवासी मजदूरों को किसी प्रकार के बीमा अथवा अन्य आर्थिक आजादी की सुरक्षा मिली होती तो शायद आज परिस्थितियां बेहतर होती। शहरों में रिश्ते सिर्फ काम से होते है। उन रिश्तों मे अपनेपन की गहराई नही होती है। इसलिये ही शायद आज मजदूर वापिस लौट चला है, ‘‘यहां कौन है तेरा, मुसाफिर रूकेगा कहां............’’।
(ग) डर :- आज भारतीय मजदूर इतना डर चुका है कि उसका भावनात्मक तर्क, आर्थिक तर्क पर भारी पड़ चुका है। आज उसके मन में एक ही सोच है कि जीना है तो अपनों के बीच और मरना है तो अपनों के बीच। बस और कुछ भी नहीं, ‘‘ओ मेरे माझी, ओ मेरे माझी, मेरे साजन है उस पार, मै मन मार, तू उस पार, ओ मेरे माझी, अबकी बार ले चल पार, ...........’’।
(घ) समूह में शक्ति , विश्वास और सुरक्षा :- यहां ध्यान देने वाली एक बात और है कि यदि कोई मजदूर रूकना भी चाहे जाक रूक ना सकेगा। मजदूर का जीवन इतनी अनिश्चितताओं से भरा होता है कि वह उसे अकेले निर्णय लेने की क्षमता प्रदान नहीं करता और उसे समूह में रहने को मजबूर करता है। यदि किसी मजदूर को 10 दिन तक काम ना मिले और उसके पास खाने को ना बचे तो उसके गांव वाले अथवा रिश्तेदार जिनके साथ वह रह रहा होता है उसे मदद कर देते है। यही होता है उनका बैंक खाता, आज लिया, कल दिया । यह उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा है। इसलिये यदि उसके समूह के लोग- उसके सुखः- दुखः के साथी, गांव की ओर निकलेंगे तो वह अकेला पीछे रूकने में नाकामयाब होगा, ‘‘साथी हाथ बढ़ाना, साथी रे, साथी हाथ बढ़ाना, साथी रे, एक अकेला थक जायेगा, मिलकर बोझ उठाना ...........’’।
(च) सरकारी आश्वासन बेअसर :-यहां जिस जिन्दगी और मौत की कशमकश चल रही है, जिसमें यह मालूम ही नहीं कि जहां है वहां रूकने से िन्दगी बचेगी या जहां से आये थे वहां पहुॅचने से जिन्दगी बचेगी। इन सब परेशानियों के बीच, अगर कहीं से इंसान को इस सभ्य समाज में उम्मीद होती है तो वह हैै, राजनीतिक तंत्र से कि वह समस्या को समझ कर अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कार्यवाही करे। इस विपति काल में, सिर्फ खोखले आश्वासन- चाहे पक्ष हो या विपक्ष के, सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे नजर आते है - सब बेअसर नजर आते है। समस्या समाधान प्रबंध में सब विचलित है। लोगों की छोटी-छोटी बातें समझ में नही आती है क्योंकि अब वोट मांगने के लिये भी सोशल मिडिया का इस्तेमाल किया जाता है, नेताओं का लोगों से संपर्क ही कहां बचा है। सिर्फ चमचे ही तो उनसे मिलने का रास्ता निकाल लेते है। लेकिन कोरोना काल ने यह तो साबित कर ही दिया कि ना तो कुछ राजनीतिक तंत्र सकारात्मक कर सकता है और ना ही जनता उनसे उम्मीद करती है। जनता का विश्वास अपने नेताओं से उठ चुका है, जिन्हें उन्होनें पूरे देश की बाागडोर सौंप रखी है, ‘‘ये पब्लिक है, ये सब जानती है, ये पब्लिक है, अन्दर क्या है, बाहर क्या है, ये सब जानती है, बस बोलती नही है, ...........’’।
इस ‘‘वापसी पलायन’’ से आखिर क्या मिलेगा, इन मजदूरों को? यह तो निश्चित है कि गांव में आर्थिक स्वावलम्बन होता, कृषि एक लाभकारी रोजगार होता, क्षेत्र में कुछ कार्य ऐसे होते है जिन्हें करके मजूदर अपना पेट भर सकते तो शायद इन्हें पलायन करने की आवश्यकता ही नही पड़ती है। पलायन करना हमारे समाज में असमान विकास का परिणाम है। अभी तो जमीन जैसे सीमित संसाधन पर ही दबाव बढ़ेगा, रोजगार नहीं मिलेगा, और मजबूरियां बढ़ेगी। पर मजूदर शायद जिन्दा रहने में कामयाब हो सकंेगे। उन्हें पता है कि वो कितने भी गरीब होंगे। कुछ अन्न पेट भरने को मिल ही जायेगा। कोई गाय, भैंस, बकरी एक-दो लीटर दूध उनके बच्चों के लिये दे ही देगी। यानि एक आश कि गांव की अर्थव्यवस्था कितनी भी कमजोर हो पर जीवन दायिनी तो है ही। शहरों के जैसे खोखली तो नहीं। वैसे तो जीवन को कायम रखने के लिये परिस्थितियों को समझौते की आदत मजदूरों का होती ही है, ‘‘समझौता गमों से कर लो, समझौता गमों से कर लो, जीवन में गम भी/ही मिलते है, ओ ओ ओ समझौता गमों से कर लो, ...........’’।
इस ‘‘वापसी पलायन’’ में जो सकारात्मक उम्मीद की किरण दिखाई दी है। वह है:-
(अ) जिन मजदूरों को हम आज तक दीन-हीन, मजबूर, लाचार, बेचारे, परजीवी, आदि के विशेषण से संबोधित करते आये है तथा सदा उनके शोषण ही सोचते रहे, उनके ‘‘वापसी पलायन’’ ने यह तो साबित कर दिया है कि शहरी जीवन के संचालन मंे उनका कितना बड़ा योगदान था? वो एक अदृश्य शक्ति के पूंज के रूप मंे हमें आगे बढ़ने में सहयोग कर रहे थे और हमने उन्हें दूध से मक्खी के जैसे निकाल कर फेंक दिया, उन्हें रोक ना सके, अपना ना सके, ‘‘तेरी दुनिया से हो के मजबूर मै चला मै बहुत दूर, बहुत दूर चला, ...........’’।
(ब) आज सभी आॅफिस और कारखाने बंद पड़े है तो हमें समझ में आ रहा है कि मजदूर हमारे आर्थिक विकास की रीढ़ की हड्डी था, है, और हां, सदा रहेगा। विकास की ओर अग्रसर होने का अभिप्राय यही है शायद- किसी का शोषण करके आगे बढ़ना, नहीं तो समाजवाद ही आ जायेगा। अब हमें समझ में आ रहा है कि हकीकत में मजबूर और लाचार कौन है मजदूर या उद्योगपति; मजदूर या शहरी; मजदूर या ्यापारी; परन्तु नुकसान आज भी मजदूर का ही है और कल भी मजदूर का ही होगा क्योंकि ये उद्योगपति और व्यापारी (चालाक लोमड़ियॅा), फिर भी कोई रास्ता निकाल लेंगे और शोषण करने का, ‘‘कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो हर बात पे रोना आया, ...........’’।
(स) जो राजनेता उन्हें अपने क्षेत्रों से भगाने की राजनीति करते थे आज इन अथवा उद्योगपतियों, व्यापारीयों और शहरी लोगों के इशारे पर मजदूरों को रोकने का प्रयास कर रहै है, प्रलोभन दे रहे है आज उन्हें अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि मजदूरों के बिना उनकी जिन्दगी का चक्काजाम हो चुका है, ‘‘पैसा ये पैसा, पैसा है कैसा, नही कोई ऐसा, ...........’’।
इस ‘‘वापसी पलायन’’ ने कुछ पत्ते और भी खोल दिये है। वह है :-
(य) कभी-कभी अफसोस राजनीति को उस वर्ग पर भी होता है, जो सदा अपने मजदूरों का शुभचिंतक दिखाने में कामयाब हुआ था- जो सिर्फ झण्डा लेकर मुद्दों पर खड़ा हुआ, जो सिर्फ घटनाओं पर केन्दित रहा और उनकी गहराई में छुपी एक भी राजनीति पर संघर्ष ना कर सका। काशः कोई ऐसी बीमा व्यवस्था भी बन जाती जो आज की परिस्थितियो में मजदूरों को कोई सुरक्षा दे पाती। यदि उन्होंने आर्थिक आजादी, आर्थिक पारदर्शिता, और आर्थिक अतिव्ययता जैसे मुद्दों पर काम किया होता तो हमारी अर्थव्यवस्था इतनी ना चरमराती और आज मजदूरोें को उसका लाभ मिलता। मध्यम वर्ग भी शायद मदद के हाथ और ज्यादा बढ़ा पाता। जब देश में बड़े-बड़े घोटाले होते रहे, जब बैंकों का अनर्जक ऋण वापस नहीं आये, जब चुपचाप ही उद्योगपतियों के करोड़ों रूपये माफ किये गये, करोडो रूपये प्रोत्साहन के रूप में उद्योगपतियों को बांटे गये, उन्हें तरह-तरह से फायदा पहुंचाया गया और किसानो के तीन- तीन साल तक भुगतान ना कर उन्हें भी मजूदर बनाया गया। उस समय यह अपने को पढ़ा लिखा और प्रगतिशील राजनीति करने वाले लोगों का समूह कहाॅ था ? यह सब भी शायद अपने स्वार्थ ही सिद्ध कर होगेे और गा रहे थे, ‘‘हम मेहनतकशः जब अपना हिस्सा मागेगे, ...........’’।
(र) 1947 में भारत देश विभाजन के बाद, शायद पहली बार इतनी भारी संख्या में भीड़ सड़को पर उतरी और इतने कष्ट उठाकर, कुछ अपने घर पहुंच गये तो कुछ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। यह इतिहास शायद पहली बार ही रचा गया होगा कि माहमारी आने से इतनी भारी संख्या में ‘‘वापसी पलायन’’ हुआ। इस मौके पर हमारे नेतागण हमें सीख दे रहे है कि हर समस्या को अवसर में बदल दोे, विचार तो बहुत अच्छा है पर क्या आज के परिपेक्ष में उस मजदूर पर सटीक बैठता है जो इस कशमकश में ही पहले जान बचायें या अवसर पर नजर रखें। हा,ॅ बड़े उद्योगपतियों ने इसकी पालना पूर्ण रूपेण की। हमारे नीति निर्धारकों ने भी इस अवसर का लाभ उठाते हुये मजदूरी के घण्टे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिये। एक मजदूर, जो सदा आभाव की जिन्दगी जीता है और उसे किसी प्रकार की सुविधायें परोसी नहीें जाती, अगर वह 8 घंटे काम करता है तो उसकी तैयारी और आने-जाने में उसके 12 घंटे ही खत्म होते है। अब अगर 12 घंटे काम करेगा तो उसके 16 घंटे खर्च होंगे। क्या यह मानवीय है या व्यावहारिक है ? किसी भी व्यक्ति से उसके जीवन के हर रोज 16 घण्टे छीन लेना, जिसको देने के लिये आपके पास कुछ भी नहीं, ‘‘या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो, मै गम को खुशी कैसे कह दूॅ जो कहते है उनकोे कहने दो ...........’’।
(ल) अब खबरे आने लगी कि श्रमिकों के ठेकेदार लक्जरी बस लेकर उन्हें वापिस लेने पहुंच गये। क्या कहें इसे? मजदूर की जीत, मालिक की मजबूरी, शोषण तंत्र की सक्रियता और इन सब के बीच गरीबी- बेचार, लाचार और परेशान पर फिर राजनीति प्रारम्भ। इन सब घटनाओं को देखते हुये सभी- सरकार, विद्वान, नीति- निर्धारको सिर्फ और सिर्फ मूक बधिर दृष्टा की तरह देखते रहे, सब समझ के आरपार, और शायद यही थी सबसे मजबूरी, ‘‘जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफर कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं,...........’’।
18/05/2019
Around 50 women and adolescent girls learned Stitching for their use with a small contribution of our own. No fund requested to any agency.
मजबूर कौन: वो, आप या हम-सब
डा0 मन्जू सिंह
ताहउम्र शहरी जीवनशैली में रहने के बाद पिछले कुछ वर्षों से ग्रामीणों के साथ रहते हुए कुछ सीखनें और कुछ भूलने का सिलसिला चल रहा है।
एक ऊँची सी इमारत में चार कमरों का घर, समस्त सुख सुविधाओं युक्त, व्यवस्थित रहन-सहन, बैंक के सहारे पूरे एक करोड़ खर्च कर खरीदा था। निरउत्तर हो गई, जब एक ग्रामीण ने एक बहुमंजिला इमारत देखकर मुझ से पूछ लिया कि बुआ जी इन घोसलों में कौन रहता होगा? ना जमीन अपनी, ना छत अपनी, ना मनचाही धूप, हवा और छाँव, जोर से बोल नहीं सकते होगे और लडाई से बचने के चक्कर में अपने तर्क स्वयं को ही विसंगत लगने लगते होगें। शिष्टाचार के नाम पर अल्हड़पन तो कहीं दिल की गहराई में दफना दिया जाता होगा।
मुझे याद आने लगा वो नौजवान जो पिछले वर्ष दिल्ली से मेरे साथ गाँव गया था। जब उने खलियानो के रास्तों पर बगैर रेड लाईट, स्पीड ब्रेकर, गोल चक्करों के खुले में धूल उड़ाते मोटर साईकिल दौडाई तो बोला आज तो मजा आ गया। मई के महीने में भी रात को खुले आसमान के नीचे सोते हुए ठण्ड के अहसास से आनन्दित हो गया था। हाँ, पेड पर कैसे चढ़ते है वो तो एक छोटे बच्चे ने ही चढ़कर बताया था पर वो हिम्मत ना कर पाया था, सिर्फ तारिफ करता रहा।
वैसे तो बहुत सारे अन्तर है ग्रामीण और शहरी जीवन में परन्तु सभी संसाधनो और जीवन शैली के अन्तर में समाहित हो जाते है। इस शहरीकरण की सतत् प्रक्रिया में क्षमताओं का प्रवाह एक तरफा रहा तथा सामाजिक व नैतिक मूल्यों को मान्यता देना दूसरी तरफ। विकास के एक ही मायने ने समाज को एकरूपता दी और यही से शुरू हुई वो कसमकस, जिसमें किसी को मालूम नहीं कि मजबूर कौन? मजबूर कौन है?
मैं नहीं, वही तो है, वही किसान-मजदूर है। जो दिन रात मेेहनत करता है और जब तक फसल छप्पर तले नहीं आ जाती, भगवान पर भी विश्वास नहीं करता। फिर ठगों का खेल शुरू, आधे पौने दामों पर उसकी मेहनत खरीदी जाती है और मनचाहे समय में किया जाता है भुगतान। आपने अनुभव किया होगा कि यदि दस रूपये कम हो तो दुकानदार सामान नहीं देता लेकिन किसान अपना सारा गन्ना, चीनी मिलों के भरोसे उधार छोड़ आता है और भुगतान होता है दो-दो, चार-चार सालों में। यदि अर्थशास्त्री लागत-खर्चे का हिसाब लगाते है तो कृषि घाटे का सौदा ही कहलाती है। वो अलग बात है कि हमारे नेता और व्यापारी लोग कृषि की आय लाखो-करोड़ांे में दिखा देते है। यही हाल है लगभग सभी फसलों का, आलू-प्याज को ही ले लिजिए जब तक किसान के पास है उसकी कीमत होगी 08-10 रूपये प्रति किलो और जैसे ही व्यापारियों के हाथ आती है, कीमत दोगुनी हो जाती हैं। लगता नहीं कि इतना बड़ा खेल व्यापारियों और नेताओं की मिलीभगत होता होगा जिसमें 50 प्रतिशत से ऊपर की जनता, प्रभावित होती है। इसका एक और उदाहरण, किसान का गेहूँ 15 रूपये किलो और व्यापारी का चैकर (गेहूँ का छिलका) 18 रूपये किलो बिकता है। कहाँ है, वो नेता, जो धर्म और जाति की राजनीति के ऊपर उठकर, व्यापक तथा समाहित सामाजिक न्याय की बात कर सके। कहाँ है, वो अधिकारी जो किसान-मजदूर के हक में नियम बनाकर इसकी पालना करा सके। कहाँ है, वो व्यापारी/समृद्ध वर्ग जो स्वराज की परिकल्पना को पूरा करने में सहयोग करें। इस पर हम अथक चर्चा कर सकते है परन्तु सारांश यह है कि कोई भी व्यक्ति लागत से कम में कब तक बेचेगा जब तक वह मजबूरी में जमीन बेचकर मजदूर ना बन जाए या आत्महत्या ना करें या उस आत्म गिलानी में जिए जब सभी शहरी उस पर थूँ-थूँ करते हो कि हमारे कमाई कर से उनका कर्जा क्यूँ माफ हो रहा है? सही बात है किसान और मजदूर तो मजबूर ही है।
मै, मै तो मजबूर हो ही नहीं सकता। अच्छा कमाता हूँ, बच्चे अच्छी जगह पढ़ रहे है, अच्छा सुख दायक जीवन जी रहा हूँ। थोडा सा मन टटोला तो ध्यान आया, अरे यार ऐसे थोडा ही कमाया जाता है, 12-12 घण्टों की तनाव भरी नौकरी, जाने कितना सच-झूठ करना पड़ता है और कल का पता नहीं। 40 वर्ष की उम्र आते-आते, उच्च रक्तचाप और मधुमेह, बोनस में मिल ही जाते है। पहले तो वेतन ही 30 प्रतिशत कटने के बाद हाथ में आता है और बचे हुए में से आधे से ज्यादा मकान की किस्तों और बच्चों की फीसों में निकल जाता है। बचे हुए पैसे से खा रहे है गन्दे पानी की सब्जियाँ, कीटनाशकों से भरे अनाज और सब्जियाँ और पी रहे नकली दूध और उसके उत्पाद। घर के सब जरूरी कार्यों के निपटने के पश्चात् जो कुछ कंजूसी करके पाई-पाई बचाकर बैंक पहुँचती है, उसके लेन-देन का खर्च भी स्वयं को ही वहन करना होता है। वही धन, उद्योगपतियों को सस्ते ब्याज दर पर ऋण के रूप में मिल जाता है और सरकार से सस्ती जमीन। उद्योगपति घाटा दिखाते है, जमीन अच्छे दाम में बेचते है और बैंकों का ऋण ना उतारने के लिए अधिकारी, व्यापारी और नेता, आपस की मिलीभगत कर बगैर शोर-शराबे के नये-नये तरीके निकालते है। इन सब घाटों की भरपाई, आम आदमी अधिक कर और महँगा ब्याज भर-भरकर करता है। एक छोटा सा उदाहरण दिल्ली वालो के लिए क्या हममे से किसी को पता है कि पर्यावरण के नाम हर वाहन पर जो 100-100 रूपया इक्ट्ठा होता है उसका उपयोग किस प्रकार पर्यावरण को सुधारने में इस्तेमाल किया केन्द्र व राज्य सरकारों ने, हमें क्या मतलब? हम अपनी ही उलझनों से नहीं निपट पा रहे, ये समाज की जिम्मेदारी लेने का समय किसके पास है? फिर हम कर ही क्या सकते हैं? सरकार के आगे भला किसकी चलती है?
अब बताइये तो जरा, आखिर मजबूर कौन नहीं है-किसान, मजदूर या नौकरी और छोटे व्यवसायों पर आधारित मध्यम और उच्च वर्ग- सब मजबूर है।
मैंने काफी करीब से अनुभव किया है, हर आदमी अपने को ऊँचा मान दूसरे से दूरी बनाने की दौड़ में लगा है और वो जिससे नजदीकियाँ बनाना चाहता है, वो भी उससे दूर भाग रहा है। आज समाज में उसकी ही पदवी ऊँची मानी जा रही है जो बाकि लोगों से जितनी दूरी बनाने में कामयाब हो पा रहा है। उदाहरणतया, यदि कोई ग्रामीण शहर आकर छोटी-मोटी नौकरी करने लगता है तो उसे वही रिश्ते, जिनके बीच में रहकर वह बढ़ा हुआ था, बोझ लगने लगते है और वह उनमे कुछ ना कुछ कमियाँ निकालकर उनसे बचने लगता है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती है, सम्पत्ति या आजादी ना बाँटने की चाह और यही तो आधारशीला है आधुनिक जीवन की कि मेरी आसमान में उड़ने की चाह, दूसरे के ज़मीन पर रहने की जरूरत में ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मजबूर सब है, पर मिलकर चलने को कोई तैयार नहीं और यही तो समाधान सोचा था मैंने इन सब उलझनों का। क्यूँ ना कुछ ऐसा हो जाए कि सबकी मजबूरियाँ मिलकर मजबूतियाँ बन जाए। गाँधी जी के स्वराज का सपना साकार हो जाए। कुछ उदाहरणों के साथ अपनी बात समझने का प्रयास करूँगी।
पहला: कितना दुपहिया और चार पहिया वाहन है घर में? नहीं भी तो वर्ष भर मे कितने किलोमीटर यात्रा करते होगें डीजल या पैट्रोल के वाहनों से? कभी सोचा है कि पर्यावरण बिगाड़ने में कितनी भूमिका निभा चुके हो? थोड़ी पर्यावरण सुधारने में भी अपना योगदान बढ़ा लो। याद है कभी, आपके हाथ का लगा वृक्ष कितना बड़ा हुआ, कुछ छाया दिया या फल दिया। बड़े शहरों में एक-एक बिल्ंिडग में 100-200 गाडियाँ मिल जाएगी परन्तु 10 वृक्ष नहीं दिखाई देगें। यही धरोहर छोड़ रहे है हम अपने प्यारे बच्चों के लिए। क्यूँ नहीं हम प्लास्टिक की पानी को बोतलों, ठण्डे पेय की बोतलों का बहिष्कार कर सकते है, हम लोग? क्यूँ नही पोलीथीन में रेडीमेड खाने की चीजों का बहिष्कार कर सकते है, हम लोग? क्यूँ नहीं, सब्जी लाने को घर से थैला ले जा सकते है, हम लोग? चलिए हम सब अपने से ही शुरू करते है। एक अच्छी शुरूआत पर्यावरण संरक्षित जीवनशैली के लिए।
दूसरा: हम लोग बड़े-बड़े ब्रांड के शोरूम में जाते है कपड़े खरीदने। इनके आॅफर हमें जबरदस्ती चीज पसन्द करना भी सीखाते है जैसे एक के साथ एक मुफ्त या 10 हजार रूपयों की खरीद पर 2 हजार रूपयों का कूपन या सूटकेस और ना जाने क्या-क्या। ओर इस चक्कर में, अलमारियाँ ठूँसी जा रही है पर लालच पूरा नहीं हो रहा। यदि हम 125 करोड़ हर साल 1-2 जोड़ी कपडे खादी आश्रम, राज्य हथकरघा उद्योग, को ओपरेटिव सोसाईटी से खरीदने लगे तो कितने लोगों का रोजगार चलता रहेगा और हमारी पारम्परिक कला को भी संरक्षण मिलेगा। सिर्फ सोच बनाकर, उस पर अमल ही तो करना है, कपड़ा तो हमे जब भी खरीदना है और तब भी। खरीदकर देखो- असली खादी, असली बुनाई, असली कढाई- महंगी नहीं पडे़गी।
तीसरा: हम किसान का कर्जा माफ़ करवाने को मजबूर हो जाते है, क्योंकि राजनैतिक मसलों में हमारी कोई पुँछ नहीं परन्तु यदि पशुपालक को दूध का सही दाम देने की बात करे तो लोग झण्ड़ा उठाते है। हम नकली दूध, दही और पनीर खाने को तैयार है, पर सही कीमत देने को नहीं। हम बडे़-बड़े रेस्टरा और हाॅटलो में खाकर 2-4 हजार रूपयों खर्च कर आते है और अगले दिन पड़ोसी को बताते है। पर अपने बच्चों को शुद्ध और पोष्टिक दूध, दही और पनीर खिलाने के पैसे हमारे पास नहीं है। यदि कुछ ऐसा हो जाए कि शहरी लोगों को शुद्ध खाने को मिल जाए और पशुपालक को सही कीमत। क्यँू ना हम शुद्ध खाये और खाते समय इस आनन्द की अनुभूति भी रहे कि मेरे इस खाने से किसी और के घर का चूल्हा भी जल रहा है।
जितना लिख रही हूँ इतनी ही बढ़ती जा रही है मन में विचारों की उठा पटक और ढेर सारा गुबार। क्यूँ ना हम सब (शिक्षित, जागरूक, प्रगतिशील लोग) मिलकर कुछ ऐसा करे, जो आदर्श कहलाये समाज के लिऐ, लाभदायक हो समाज के लिए और आत्म संतुष्ठी दे मन को। चलिए एक छोटी सी शुरूआत तो करके देखे, मिलजुल कर साथ चलने की एक-दूसरे के पूरक बनने की ओर सबकी मजबूरीयों को मिलाकर मजबूतियाँ बनाने की।
07/05/2019
रिकॉर्ड पैदावार के अनुमानों के बीच खुले में बर्बाद होते अन्न की कहानी पंजाब-हरियाणा में गेहूं की बंपर पैदावार का अनुमान है, लेकिन हर साल की तरह इस बार भी इनका संग्रहण एक बड़ी चुनौती है। .....
खुशी - अनसमझी, अनसुलझी, अनजानी, अनपहचानी शक्ति
काफी आम सी लगेगी पढने में, पहले भी कई बार सुनी होगी परन्तु शायद महसूस ना कर पाये हो। मैंने भी पहली बार महसूस की, इसलिए फिर से सुनी हुई बाते लिखने की इच्छा हुई। हकीकत है ना, थोड़ा रोमांचक कम लगेगी।
हमारे घर के चैकीदार की कहानी, एक गरीब किसान- मजदूर की कहानी, मध्य प्रदेश के महुआ के एक छोटे से गांव से आकर दिल्ली में रहने लगा, शादी हुई, दो बच्चे (खुशी और आनन्द) हुए। पति- पत्नी (सोमनाथ और उमा) दोनों मालिश का कार्य करते और बच्चों का लालन- पालन करते। दोनों बच्चे पास ही के एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ने जाते, टयूश्न जाते, स्कूल में अव्वल आते, माह में एक- आध बार बच्चों से सुनने को मिलता- आंटी, आज मंगल बाजार जायेंगे, नये कपड़े लायेगे, कुछ चाट पकोड़े भी खाकर आयेंगे। बूढ़े मां बाप और छोटे भाई के लिए गांव में पैसे भी भेजता। उनका मोबाइल रिचार्ज करवाता। कभी- कभी तो सोमनाथ ऐसा एहसास देता था कि जैसे किसी मीडिल क्लास का बच्चा अमेरिका पहुंच गया हो। बेसमेंट में मच्छर बहुत होने के कारण, बच्चे अक्सर बीमार हो जाते थे। मन में कई बार आता कह दू कि सोमनाथ कोई छोटा सा कमरा किराये पर लेकर क्यूं नहीं रह लेते। फिर खुद ही जवाब मिल जाता अरे कमरा भी कोई इससे अच्छी जगह थोड़े ही ले पायेगा। कुल मिलाकर एक अनुभूति होती कि सब ठीक- ठाक चल रहा है सिर्फ एक कमी के कि काश सोमनाथ शराब पीनी छोड़ दे।
कभी- कभी तो लगता था कि उमा ही सोमनाथ से ज्यादा समझदार और चतुर हैं। मुझे कहती, आप मेरा आधार कार्ड बनवा दीजिए और मेरा बैंक में खाता खुलवा दीजिए। बस, मैडम आप तो मेरा बीपीएल कार्ड बनवा दीजिए और मुझे गैस सिलेंडर भी दिलवा दीजिए। छोटा सिलेंडर हर हफ्ते खत्म हो जाता है ना। उसकी बातें सुनकर तो मोदी जी के मन की बात, उज्जवला योजना, जन-धन योजना जाने क्या- क्या याद आने लगती। फिर सोचती, भला इस बेचारी को क्या पता कि बीपीएल कार्ड बनना कोई मजाक थोड़े ही हैं। खैर, कुछ तो हुआ, आधार कार्ड बन गये, खाता भी खुल गया और उमा ने कुछ पैसा बचा कर खाते में डालना भी शरू कर दिया। जब कभी उमा को बच्चों के पोषण को लेकर समझाती तो वो पूरे गर्व से कहती कि रोज पूरा एक किलो दूध मंगवाती हूं और दाल- सब्जी बनाती हूं। कभी- कभी तो मुर्गा भी बनाते हैं। मैडम जी, मेहनत का काम करते हैं, खायेंगे नहीं तो कमायेगें कैसे ?
बहुत समय स्वास्थ्य विभाग में काम करने के बाद भी मेरे अकेलेपन ने मेरे मन का दव्द्व समाप्त न किया था कि छोटा परिवार- सुखी परिवार। बार-बार मन में आता था कि भगवान फिर मौका दे तो मैं दो नहीं चार बच्चे पैदा करती। अरे, थोडा खाने का ही तो खर्च बढ़ता। किताबें- कपड़ें तो पुराने वाले ही काम आ जाते। फिर किसी बुजुर्ग की बात यह पछतावा और बढा देती कि देखो फला के चार बेटे थे। चारों डाक्टर बन गये और सभी की शादी डाक्टरनियों से हुयी। अरे वाह घर का अस्पताल और घर के डाक्टर माजा आ गया।
एक दिन उमा मेरे पास आई और बोली कुछ बताओ क्या कँरू, 25 दिन चढ़ गये है महिना नहीं आया। मन से पहली प्रतिक्रिया तो यहीं हुई, अरे क्या है दो ही तो बच्चे है अगर एक और हो गया तो क्या होगा वैसी भी इसका बेटा तो बहुत बीमार होता रहता है परन्तु भावनाओं को दबाते हुए.......मैंने समझाया, इधर- उधर की गोली मत खाना, अगर बच्चा नहीं चाहिए तो सीधा सरकारी अस्पताल जाकर डाक्टर से बात करों। पर ना जाने मेडिकल स्टोर से लाकर क्या- क्या गोली खाई, परेशानी तो बहुत हुई पर बच्चा नहीं गिरा। मुझे लग रहा था कि कहीं मेरे मन की दुआ तो काम नहीं कर रहीं।
खैर, निर्णय यह हुआ कि इस बार तो बच्चा आने दो, पर डिलेवरी के साथ- साथ आपरेशन भी करवा देेगें। गर्भ के साथ- साथ मेरे भी कुछ सामाजिक दायित्व बढ़ने लगे और स्वास्थ्य विभाग के अनुभव का उपयोग। सोमनाथ से बहुत जोर- जबरदस्ती कर मैंने उन्हे नर्स बहन के पास भेजा। आयरन की गोली लेकर आ गये। हां बहन जी टीका लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड की शर्त लगा दी। नर्स बहन जी ने बगैर कुछ खून- पेशाब की जांच करे सब कुछ ठीक- ठीक चढा दिया था, ममता कार्ड पर। खैर बहुत जदोजहद के बाद, जब कार्ड मेरे पास तक पहंुचा और असलियत पता चली तो मैंने फिर नर्स बहन जी को फोन किया कि बगैर जांच किये ये सब कैसे भर दिया तो उसने बड़ी सहजता से कहा ठीक है कल फिर से भेज देना हम टैस्ट कर देगें। मैं निरउत्तर थी। मुझे समझ आ रहा था कि शिकायत करके भी यहीं होगा। परन्तु उमा के जीवन में वो कल कभी नहीं आया। मैं भी अपनी व्यस्तताओं के साथ जो कुछ कर पा रही थी उसे काफी समझ रही थी। खैर वक्त करीब आता गया, मगर क्या- क्या हुआ इसे देखकर मन कसमकस में था।
उमा का मालिस का काम बंद हो गया। वो ज्यादातर घर में रहने लगी। बच्चों का टयूशन यह कहकर बंद कर दिया गया कि टीचर दो दिन छुटटी करती है और बच्चों को पीटती भी है। नादान बच्चे खुश थे क्योंकि खेलने को ज्यादा समय मिलने लगा। मंगल बाजार का जिक्र बंद होने लगा। एक तो उमा का कमाना बंद और खाना पकाने में भी परेशानी होने लगी तो बच्चों का खाना भी कम हो गया। अब सोमनाथ कमाने जाये या खाना बनाये। फिर सर्दियों में कुछ काम भी कम मिल रहा था। रिश्तेदारों के आने का खर्च भी बढ रहा था। बच्चों का स्कूल जाना कम होने लगा। कारण अनेक कभी आँख नहीं खुली, कभी नाश्ता नहीं बना, कभी स्कूल कौन छोड़ने जाता, पापा तो मालिश करने गये हैं। धीरे- धीरे पता लगा कि सोमनाथ ने बच्चों की फीस ही नहीं भरी और बच्चे इम्तिहान ही नहीं दे पाये। कहीं ना कहीं मन की कशमकश खत्म ना होती कि गरीबी में मर्द की शान के पीछे कौन सी शक्ति छुपी थी।
इस झटके ने मेरे अकेलेपन के सारे भ्रम तोड़ दिये। अब मन पहले से ज्यादा उदास था। उमा को दिन- रात समझाती कि डिलवरी अस्पताल में ही करवाना और नसबंदी साथ- साथ ही करवा आना। उमा ने एक और प्यारी सी बच्ची को अस्पताल में जन्म दिया पर अफसोस नसबंदी से डर गई और बगैर नसबंदी कराये घर आ गई।
इन सबके बीच, मैं बच्चों को अपने पास बुलाती, पढ़ाती और मेरी बच्चों से घनिष्नठता बढती गई। खुशी अपने दिल की बात मुझे कह देती। एक दिन खुशी ने कहा कि आंटी, क्या मैं अपने बाबू (छोटी बहन) के जैसे गोरी नहीं हो सकती? आपके जैसे मेरा रंग नहीं हो सकता। मैं, आज खुशी में अपना बचपन देख रही थी क्योंकि मेरे बचपन का नाम भी कल्लो था मेरा रंग काला होने के कारण। मेरे छोटे भाई और खुशी की छोटी बहन में उम्र का भी इतना ही फर्क था करीब 7-8 वर्षों का। मैंने भी अपने छोटे भाई की बहुत देखभाल की थी। शायद उसकी और मेरी किस्मत में फर्क था पिता का- मेरे पिता पढ़े लिखे होने के साथ- साथ सरकारी नौकरी में भी रहे।
अब खुशी की जिम्मेदारियां बदलने लगी। कहती आंटी बाद में पढाना, अभी मुझे पानी भरना है और बरतन भी साफ करने हैं। मुझे बाबू और मम्मी के लिए पानी भी गर्म करना है। मैं डांटती कि आजकल तेरा पढ़ाई मंे बिल्कुल ध्यान नहीं है। मेरी थोडी बहुत डांट तो यह कहकर सहती कि आप मेरी मैडम भी तो हैं। मुझे पढ़ाती जो हो आपकी डांट मुझे बुरी नहीं लगती। शायद खुशी को जो पढाई पहले खेल से कम अच्छी लगती थी आज काम के बोझ के आगे बेहतर लगने लगी थी।
आंटी, अगर घर का काम नहीं करूंगी तो पापा पिटेंगे, बहुत जोर से मारते हैं, डर लगता है इसलिए जो भी पापा- मम्मी कहते हैं मैं तुरन्त कर देती हूं। अब बाबू करीब एक महीने की हो गई थी। खुशी, मुझे कह रही थी कि आंटी कहां चली गई थी? आपके माथे पर टीका लगा है? क्या मंदिर घूमने गई थी? बहुत पैसा लगा होगा? ये पौधे क्यूं खरीद कर लाई? पापा कहते हैं कि ज्यादा खर्चा नहीं करना चाहिए । अभी आम बहुत मंहगा है ना, आंटी।
और वो बोले जा रही थी हाँ, आंटी मैं आपको एक बात तो बताना भूल ही गई कि अब मुझे पूरा खाना बनाना आ गया है। मैं दाल छोंक लेती हूं, चावल बना लेती हूं और मैने रोटी बनानी भी सींख ली है। मेरे पास कोई जवाब ना था क्योंकि इतना तो मेरी 25 वर्ष की बेटी को भी नहीं आता। मैंने बात बदली और डांट कर कहां क्या मेरे पीछे से एक भी बार पढाई की, सच बोलना। खुशी और आनन्द के इनकार ने मुझे झंझोर दिया था। यह गुप्त शक्ति- अनपढ़, गरीब, मजबूर, लाचार औरत बनती मजदूर की बेटी- इस देश को चला रही है। ।
अब स्थितियां बदल रही थी सोमनाथ को कुछ काम कहो तो वह कहता खुशी से करवा लेना। मेरे मना करने पर कि मैं खुशी से नहीं करवाउंगी तुझे ही करना होगा तो मजबूरी दिखाने लगता कि मुझे मालिश करने जाना है, शाम को सब्जी लाने को भी पैसे नहीं है।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि शिक्षा के व्यवसायिक रूप को दोष दूं या सरकारी स्कूलों और सरकारी स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर दोष मडूं। इस उलझती पहेली को समझने में ना कामयाब कि गरीब के लिए सबसे जरूरी क्या- मकान? या बैंक खाता?? या गैस सिलेंडर??? या सरकारी अस्पतालों की सुविधायें???? या सरकारी शिक्षा????? या दारू पर रोक?????? या अच्छे रोजगार साधन??????? मुझे समझ नहीं आ रहा था कि जो लोग तनख्वाह लेकर अपने कृर्तव्यों से विमुख है या अपने दायित्वों को दिल से पूरा नहीं करते उनके लिए सरकार कौन सी योजना लाये ? और इन सबके बीच जो मध्यम व उच्च वर्ग जो इन सब सरकारी सुविधाओं का भरपूर लाभ उठा रहा है और ठसक भी दिखा रहा है।
मगर एक प्रश्न अगर हर छोटा और गरीब किसान अपना गांव छोड़ कर शहर की ओर भागता रहा तो शहरी कहां जायेगें? यदि इस प्रकार हर किसान मजदूर में परिवर्तित होता रहा तो यह समाज कब तक इस बोझ को उठाने में कामयाब होगा? जब इस किसान- मजदूर की भूख मिटनी बंद हो जायेगी तो क्या ठसक जनता चैन से जी पायेगी ?
आज मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं जिस भगवान की तलाश में इतनी दूर घूमने गई थी वह कहां है? मुझे समझ में नहीं आ रहा जिन अपनों को हम गरीबी की दलदल में छोड़ आये उन्हंे वहां से कैंसे निकाले ? मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे पढ़े- लिखे, अच्छे कमाते- खाते समाज में गरीबों का मर्म कैसे भंरू ?
इसी कमसकस में मैं, खुशी और आनन्द गमलों में मिटटी भरने में लग गये, नये पौधे जो लगाये थे ? काश भगवान खुशी और आनन्द को वही पुराने मां- बाप लौटा दें।
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