23/03/2019
Educate The People
The idea is to give the wake-up call and awareness
23/03/2019
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#जरूर पढ़ें
प्यास की चरम सीमा- रोजे नही रखने वालो के लिए इबरत वाला वाकिया
करबला का लूटा हुवा क़ाफ़िला जब
जिंदान पहोचा और ज़ैल मैं क़ैद कर के अंधेरों में कई दिन और रात बीत जाने के बाद एक दिन *इमाम हुसैन* की लाड़ली बेटी जनाबे बालि सकीना ने अपने भाई इमाम *ज़ैनुल आबेदीन* के पास जाकर एक सवाल किया।
जनाबे बालि सकीना – भाई इमाम ज़ैनुल आबेदीन, आप इस वक़्त के इमाम है और इमामे वक़्त हर इल्म से आरास्ता होता है
मै आपसे एक सवाल करती हूँ कि आप मुझे बताएं के
“प्यास में कितनी मंज़िले होती हैं ?
जनाबे सकीना का ये सवाल सुनकर जनाबे ज़ैनब तड़प गयीं। आगे बढ़कर सकीना को गोद में उठाया, प्यार किया और कहा मेरी बच्ची तू ऐसा क्यों पूछती है।
इमामे ज़ैनुल आबेदीन ने कहा –
फूफीअम्मा सकीना ने ये सवाल अपने वक़्त के इमाम से किया है और मुझ पर लाज़िम है की मै इस सवाल का जवाब दूँ।
इमाम ने फ़रमाया- बहन सकीना, प्यास की कुल चार मंज़िलें होती है
पहली मंज़िल वो होती है जब इंसान इतना प्यासा हो की उसे आँखों से धुँआ धुँआ सा दिखाई दे और ज़मीन और आसमान के बीच का कोई फ़र्क़ महसूस न हो।
जनाबे सकीना- हाँ मैंने अपने भाई क़ासिम को बाबा से कहते सुना था ” चचा जान मै इतना प्यासा हूँ की मुझे ज़मीन से आसमान तक सिर्फ धुआं सा दिखाई देता है।
इमाम ने फिर फ़रमाया- प्यास की दूसरी मंज़िल है जब किसी की जुबान सुखकर तालु से चिपक जाए।
जनाबे सकीना- हाँ जब भाई अकबर ने अपनी सुखी ज़ुबान बाबा के दहन में रखकर बाहर निकाल ली थी और कहा था “बाबा आपकी ज़ुबान तो मेरी ज़ुबान से ज़्यादा खुश्क है तब शायद मेरा बाबा प्यास की दूसरी मंज़िल में था।
इमाम ने फिर फ़रमाया- प्यास की तीसरी मंज़िल वो है जब किसी मछली को पानी से बाहर निकाल कर रेत पर डाल दिया जाता है और वो मछली कुछ देर तड़पने के बाद बिलकुल साकित सी हो कर अपना मुंह बार बार खोलती है और बंद करती है।
जनाबे सकीना- हां जब मेरे बाबा ने भाई अली असग़र को कर्बला की जलती रेत पर लिटा दिया था तो असगर भी वैसे ही तड़पने के बाद साकित सा था और अपना मुँह खोलता था फिर बंद करता था और हीचकीया ले रहा था । शायद मेरा भाई उस वक़्त प्यास की तीसरी मंज़िल में था।
इमाम ने फिर फ़रमाया- प्यास की चौथी और आखिरी मंज़िल वो है जब इंसान के जिस्म की नमी बिलकुल खत्म हो जाती है और उसका गोश्त हड्डियों को छोड़ देता है फिर इंसान की मौत हो जाती है।
इतना सुन कर जनाबे सकीना ने अपने हाथों को इमाम के आगे किया और कहा-
भाई ज़ैनुल आबेदीन मै शायद प्यास की आखिरी मंज़िल में हूँ। देखो मेरे जिस्म के गोश्त ने हड्डियों का साथ छोड़ दिया है और मै अनक़रीब अपने बाबा के पास जाने वाली हूँ।
सकीना के ये अलफ़ाज़ सुनकर कैद खाने में एक कुहराम बपा हो गया।
अब हम अंदाजा लगा सकते है हम रोजे मैं प्यास की पहली मंजिल तक भी नही पहुँचते
अफसोस फ़िर भी कई लोग रोजा नही रखते है..
अल्लाह हम सबको अहले बैत से इबरत हासिल करने की और रोज़े रखने की तौफ़ीक़ अतi फरमा
Veer tum badhe chalo.......
27/03/2018
Namak ki treh karva Gyan denewala saccha Mitra hota hai
Meethi baaten to chaaplus kerte hain
25/03/2018
आधी रोटी खायेंगे बच्चों को पढ़ायेंगे
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Maunath Bhanjan