14/08/2026
'कल्याण'
संत - अंक
[बारहवें वर्ष का विशेषांक] के पृष्ठ संख्या 757 से साभार उद्घृत ...
संत महात्मा श्री रामचन्द्रजी
आपका जन्म सन 1873 ईस्वी में फर्रुखाबाद शहर में कायस्थ वंशोद्भव चौधरी हरबख़्श सहाय जी की धर्मपत्नी के गर्भ से बसंत पंचमी के दिन हुआ था। आपकी माताजी बड़ी भक्त वैष्णव थीं। वे प्रतिदिन श्रीरामचरितमानस का पाठ करतीं और आप बैठ कर बड़े ध्यानपूर्वक सुनते। माताके इस सत्संग से इनके ह्रदयमें निहित प्रेम-बीज अंकुरित हो उठा। समयपर आपकी शिक्षा उर्दू भाषामें प्रारम्भ हुयी और अंग्रेज़ी मिडिल तक हुयी। इसके अतिरिक्त आपको हिंदी एवं फ़ारसी का भी अच्छा ज्ञान था।
जब ये अट्ठारह वर्ष के थे तब इन्हें एक सद्गुरु की प्राप्ति हुयी। यद्यपि वे इस स्थूल शरीरसे मुसलमान थे परन्तु वे थे पूरे सिद्ध एवं समदर्शी तत्वज्ञानी। रामचन्द्रजी अन्य लोगों की तरह उनके सत्संग में जाया करते थे। एक दिन इन्हें ब्रह्मविद्या का अधिकारी जानकर उन महात्मा ने इन्हें पास बुलाया और ब्रह्मविद्याका तत्वोपदेश किया। साधन करते-करते तेईस वर्ष की अवस्था में इन्होने दीक्षा ले ली और दीक्षा लेनेके पाँच मास बाद ही इन्हें तत्व का साक्षात्कार हो गया। फ़िर गुरु-आज्ञानुसार आप साधारण जनता के उपयुक्त साधनोंका उपदेश देकर उन्हें सन्मार्गपर लाने लगे।
विद्याध्यनके समय ही आपका विवाह कर दिया गया था। अतः परिवार की जीविका के लिए आपने फतेहगढ़ कलेक्ट्रीमें दस रुपये मासिक वेतन पर नौकरी कर ली। आपने इतने परिश्रम और सच्चाईसे काम किया कि आपके ऊपरके पदाधिकारी कभी अप्रसन्न नहीं हुए। अंतमें आपने सौ रूपये मासिक से पेंशन ली।
महात्माजी का कहना था कि मनुष्यमात्रका उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह परमात्माको प्राप्त कर ले। आपका उपदेश था कि 'साधनचतुष्टयकी पूर्णरूपेण प्राप्ति हुए बिना साधक ज्ञानप्राप्तिका अधिकारी नहीं हो सकता'।
इसके लिए प्रारम्भ में भगवननामजप, तत्वचिंतन, गुरुसेवा और निष्कामभावसे सबकी सेवा को ही वे प्रधान साधन बतलाते थे। ये किसी भी शिष्य द्वारा अर्पित धन नहीं लेते थे। शिष्योंसे कभी किसी तरहँ की सेवा भी नहीं करवाते थे। कई बार तो खुद उनके स्नान आदि के लिए जल खींचकर रख दिया करते थे। प्रेम की तो आप साक्षात मूर्ति ही थे। आपके दर्शन से भी शान्तिकी प्राप्ति होती थी। जब तक भक्त-लोग आपके सामने बैठे रहते उन्हें बड़े भारी सुखका अनुभव होता था। आपमें सबके प्रति दयाभाव तो कूट-कूट कर भरा था।
कहते हैं, एक बार सत्संग हो रहा था। आप समाधिस्थ थे। अक्समात बोल उठे 'जल लाओ, जल लाओ' नौकर दौड़कर जल लाया। जल रखते ही न मालूम कहाँसे एक बकरी का बच्चा आकर जल पीने लगा और पीकर चला गया। आपने कहा कि यदि इसे पाँच मिनट और जल न मिलता तो इसका प्राणान्त हो जाता।
इनके विषय में कई चमत्कार सुने जाते हैं। परन्तु ये पूर्ण सिद्ध होते हुए भी प्रायः अपनी सिद्धियों को प्रयोग में बहुत कम लाते थे। इनका यह उपदेश था कि साधक के लिए चमत्कार पतनके हेतु होते हैं। इन सबसे मुख मोड़कर वैराग्यका सुखद आश्रय लेनेसे ही मनुष्य साधन की ओर अग्रसर हो सकता है।
इस प्रकार 59 वर्ष तक इस धाराधामपर लीला करके महात्माजी ने 14 अगस्त सन 1931 को महासमाधि ली। आपने दो दिन पहले ही अपनी यात्रा की सुचना देकर शिष्यों को बुला लिया था - आपका समाधिस्थान अब भी फतेहगढ़ में बना है। आपकी समाधिके दर्शनार्थ प्रतिवर्ष सैकड़ों शिष्य बाहर से आते हैं। दादा गुरु महाराज जी की आध्यात्मिक एवं सत्संग परंपरा देश-विदेश में व्यापक रूप से संचालित होती है। उनके सत्संग, आध्यात्मिक विचारों और मानव-कल्याण के संदेश से जुड़े अनुयायी विभिन्न देशों में सक्रिय हैं। बताया जाता है कि लगभग 150 देशों में विभिन्न संस्थाओं एवं सत्संग शाखाओं के माध्यम से उनकी शिक्षाओं और आध्यात्मिक संदेश का प्रचार-प्रसार किया जाता है। इन संस्थाओं के माध्यम से नियमित सत्संग, ध्यान, सेवा तथा आध्यात्मिक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं।
दादा गुरु महाराज जी को इस आध्यात्मिक परंपरा का आदि गुरु माना जाता है। उनके अनुयायी उनके बताए मार्ग पर चलते हुए आत्मिक उन्नति, सेवा, सदाचार और मानव-कल्याण को जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य मानते हैं।
*आपकी जीवनीके सम्बन्ध में तीन लेख आये हैं - श्री मानसिंहजी गौड़ का, साहित्यालंकार पंडित रामसिंहजी शर्मा का और श्री उमेशजी कलाविद का। स्थानाभावसे केवल साराँशमात्र दिया गया है।