गोपालदर्शन

गोपालदर्शन

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�� जय श्रीगोपाल ��

20/12/2025

॥ दोहा-युक्त कीर्तन ॥

दोहा १
भक्त पुकारे प्रेम से, द्रवित हुए भगवान।
साकार हुए निराकार, मिटा सकल अज्ञान॥

कीर्तन
भक्त हेतु हरि रूप बनाया रे…
ब्रह्मानंद मेरे मन भाया रे…
हरि बोल… हरि बोल…
श्याम सुंदर हरि बोल…

दोहा २
चरण कमल की धूलि से, कटे भव के फेर।
जिसने शरण गही प्रभु, उसका मिटा अंधेर॥
कीर्तन
तेरे चरण कमल बलिहारी रे…
जग से पार उतारी रे…

गिरधारी रे… गिरधारी रे…
गोवर्धन धारी रे…

दोहा ३
दर्शन बिनु नैन सूखे, व्याकुल तन-मन प्राण।
श्याम सूरतिया देखे बिनु, सूना सारा ज्ञान॥

कीर्तन
मुझे दे दर्शन गिरधारी रे…
नैन प्यासे श्याम तुम्हारे रे…
श्याम… श्याम…
सांवरा श्याम…

दोहा ४
श्याम रूप रस सिंधु है, डूबे संत सुजान।
फल की इच्छा त्याग कर, पाया परम विधान॥

कीर्तन
तेरी सांवरी सूरतिया पे वारी रे…
तन-मन-जीवन हारी रे…

समापन दोहा
नाम बिना न साधना, नाम बिना न पार।
हरि नाम रट ले प्राणी, यही जीवन सार॥

संकीर्तन
हरि नाम… हरि नाम…
सच्चा साथी हरि नाम…
॥ गिरधारी लाल की जय ॥ 🙏🦚
॥ श्रीश्याम सुंदर की जय ॥

23/11/2025

🚩🌹 श्रीकृष्णगोविंद हरेमुरारी 🌹🙏🌿

15/11/2025

🚩जय हो 🎊🙌🌿
श्रीकृष्णगोपाल बोले मैं भगवान हूं।
🚩 जय हो 🎊🙌🌿

“श्रीकृष्ण गोपाल बोले — मैं भगवान हूँ”
— भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य स्वरूप, परमत्व और ईश्वरत्व की घोषणा कई स्थानों पर स्वयं की है।

नीचे वे मुख्य गीता–श्लोक हैं जहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से अपना भगवान-स्वरूप प्रकट करते हैं:

⭐ १. “अहं सर्वस्य प्रभव:” — मैं ही सम्पूर्ण सृष्टि का कारण हूँ

(भगवद्गीता 10.8)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥

अर्थ:
“मैं ही सम्पूर्ण जगत का जन्मस्थान हूँ; सब कुछ मुझसे ही प्रकट होता है।”

⭐ २. “मत्परतरं नान्यत्” — मुझसे बढ़कर कोई दूसरा नहीं

(गीता 7.7)
मत्परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।

अर्थ:
“हे अर्जुन! मुझसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है।”

⭐ ३. “अवेध्योऽहम् परं ब्रह्म” — मैं ही परम ब्रह्म हूँ

(गीता 14.27)
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्

अर्थ:
“मैं ही ब्रह्म का आधार हूँ।”

⭐ ४. विश्वरूप दर्शन: भगवान का प्रत्यक्ष रूप

(गीता अध्याय 11)
यह अध्याय श्रीकृष्ण स्वयं को विश्व-रूप, अनादि, अनन्त, सर्वेश्वर के रूप में प्रकट करते हैं।
अर्जुन कहता है:
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः
“आप ही आदिदेव, परम पुरुष हैं।”

⭐ ५. “मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य” — जो मेरी शरण आता है, मुक्त होता है

(गीता 9.22, 9.31, 18.66)
विशेष:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
“हे अर्जुन! सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ।”

🚩🎊 श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी 🙌🌿
#गीता

03/11/2025
30/10/2025

🚩जय जय 🌷 गोपालजी 🌷🙌🌿

28/10/2025

🌺 ।। गोपालाष्टकम् ।।🌺🙏🌿
— श्रीमद् आद्य शङ्कराचार्य कृतम् —

नमामि नन्दनन्दनं नचिकेतप्रदायकम्।
शरच्चन्द्रनिभाननं शतकोटिप्रभाकरम्॥ १॥

नवनीतनवप्रेमनवनीतविलोचनम्।
नवमेघनिभं बालं नन्दगोपप्रियं परम्॥ २॥

सदा स्नेहमयं शान्तं सौन्दर्यसुगुणान्वितम्।
सुखदं सर्वभूतानां नटं गोपाङ्गनाप्रियम्॥ ३॥

समस्तगोपसङ्घानां हृदये सन्निवेशितम्।
सदा मङ्गलदं बालं गोपालं तमुपास्महे॥ ४॥

व्रजाङ्गनाभिरालिङ्ग्यं व्रजश्रेष्ठनिवारितम्।
व्रजनाथं जगन्नाथं वन्दे गोपालरूपिणम्॥ ५॥

कुमारं करुणार्द्राक्षं कुण्डलोल्लसिताननम्।
कुब्जाकुचसमीपेऽपि कुण्ठितं नन्दसूनवम्॥ ६॥

व्रजनाथं व्रजश्रेष्ठं व्रजवल्लववल्लभम्।
व्रजकुञ्जनिकुञ्जस्थं व्रजसौख्यप्रदं भजे॥ ७॥

नमामि नन्दभवनं नमामि गोपबन्धुवत्।
नमामि गोपिकाकान्तं नमामि गोपसुनन्दनम्॥ ८॥

फलश्रुति 🌿
इदं यः पठते भक्त्या गोपालाष्टकमादरात्।
तस्य कृता भवेत् पूजा श्रीगोपालस्य सर्वदा॥

भावार्थ (संक्षेप में):

यह गोपालाष्टक श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है, जिसमें श्रीकृष्ण के बालरूप — नन्दनन्दन गोपाल — की मधुर, करुणामयी और लीलामय महिमा का वर्णन है।

जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, उसे गोपाल की कृपा सदा प्राप्त होती है।

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