13/03/2021
*गुम हो गए #संयुक्त_परिवार*
*एक वो दौर था* जब पति , *अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर*
घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था ।
पत्नी की *छनकती पायल और खनकते कंगन* बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे ।
बाऊजी की बातों का .. *”हाँ बाऊजी"* , *"जी बाऊजी"*'
के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।
*आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया*
ये *"समय - समय"* की नही , *"समझ - समझ"* की बात है l
बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने, अपने बच्चों तक से बात नही करते थे
*आज बड़े बैठे रहते हैं हम सिर्फ बीवी* से बात करते हैं l
दादाजी के कंधे तो मानो , पोतों - पोतियों के लिए आरक्षित होते थे, *काका* ही *भतीजों के दोस्त हुआ करते थे ।*
आज वही दादू - दादी *वृद्धाश्रम* की पहचान है ,
*चाचा - चाची* बस, *रिश्तेदारों की सूची का नाम है ।*
बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे, अपने बेटे के लिए जो खिलौना खरीदा वैसा ही खिलौना परिवार के सभी बच्चों के लिए लाते थे ।
*'ताऊजी'* आज *सिर्फ पहचान* रह गए
और ,......
*छोटे के बच्चे* पता नही *कब जवान* हो गये ..??
दादी जब बिलोना करती थी , बेटों को भले ही छाछ दे पर *मक्खन* तो
*केवल पोतों में ही बाँटती थी।*
*दादी ने* ... *पोतों की आस छोड़ दी*,
क्योंकि ,...
*पोतों ने अपनी राह* .... *अलग मोड़ दी ।*
राखी पर *बुआ* आती थी, घर मे नही *मोहल्ले* में ,
*फूफाजी* को *चाय - नाश्ते पर बुलाते थे ।*
अब बुआजी, बस *दादा - दादी* के बीमार होने पर आते है ,
किसी और को उनसे मतलब नही ,
चुपचाप नयननीर बरसा कर वो भी चले जाते है ।
शायद *मेरे शब्दों* का कोई *महत्व ना* हो ,
पर *कोशिश* करना , इस *भीड़* में
*खुद को पहचानने की*,
*कि*,.......
*हम "ज़िंदा है"* या *बस "जी रहे" हैं"*
अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया ,
*"शिक्षा के चक्कर में* ... *संस्कारों को ही भुला दिया"।*
बालक की प्रथम पाठशाला *परिवार*
पहला शिक्षक उसकी *माँ* होती थी ,
आज ......
*परिवार* ही नही रहे पहली *शिक्षक* का क्या काम ...??
"ये *समय - समय* की नही ,
*समझ - समझ* की बात है.