28/08/2026
महेंद्रगढ़ की धरती पर ‘हीरे’ उगाने वाला माली चला गया…
जिस इलाके में कभी बच्चे फौज और पुलिस की नौकरी को ही सबसे बड़ा सपना मानते थे, वहां शिक्षा को सपना नहीं—संस्कार और आंदोलन बनाने वाले ओम प्रकाश यादव ‘ओ.पी. बाऊ जी’ को पुण्यतिथि पर भावपूर्ण नमन
कुछ शख्सियतें सिर्फ अपने समय में नहीं जीतीं…
वे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य लिख जाती हैं।
महेंद्रगढ़ की मिट्टी ने भी ऐसी ही एक महान शख्सियत को जन्म दिया—ओम प्रकाश यादव ‘ओ.पी. बाऊ जी’।
आज जब उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हैं तो मन में एक सवाल भी उठता है—आखिर किसी व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या होती है? धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा या फिर वह बदलाव, जो उसके जाने के बाद भी समाज में दिखाई देता रहे?
ओ.पी. बाऊ जी के जीवन को देखें तो जवाब बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देता है।
उन्होंने महेंद्रगढ़ की धरती पर हीरों की खेती की… और उन हीरों का नाम था—शिक्षित युवा।
जहां सीमित थे सपने, वहां उन्होंने सपनों को पंख दिए
एक दौर था जब महेंद्रगढ़ क्षेत्र में शिक्षा को लेकर आज जैसी जागरूकता नहीं थी। ग्रामीण परिवेश के हजारों परिवारों के सामने बच्चों के भविष्य के सीमित विकल्प दिखाई देते थे।
फौज में भर्ती हो जाना, पुलिस की नौकरी लग जाना या कोई सरकारी नौकरी हासिल कर लेना—यही बहुत बड़े सपने माने जाते थे।
ऐसे समय में ओम प्रकाश यादव ने कुछ अलग सोचने का साहस किया।
उन्होंने महसूस किया कि अगर इस क्षेत्र को बदलना है, तो सिर्फ सड़कों और इमारतों से नहीं, बल्कि बच्चों की सोच और शिक्षा के स्तर को बदलना होगा।
और यहीं से शुरू हुई एक ऐसी यात्रा, जिसने महेंद्रगढ़ के शैक्षणिक इतिहास को नई दिशा दी।
उन्होंने आरपीएस संस्था की स्थापना की।
शुरुआत में शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह प्रयास आने वाले वर्षों में हजारों परिवारों के सपनों का आधार बनेगा।
लेकिन ओ.पी. बाऊ जी ने शिक्षा को सिर्फ व्यवसाय नहीं माना—
उन्होंने इसे समाज निर्माण का माध्यम बनाया।
महेंद्रगढ़ के घरों से निकलने लगे डॉक्टर, इंजीनियर और अधिकारी
आरपीएस के विस्तार के साथ क्षेत्र में शिक्षा का वातावरण बदलता गया।
जिन घरों में कभी बच्चे अपनी पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश तक सीमित रहते थे, उन्हीं घरों से आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और प्रशासनिक अधिकारी निकलने लगे।
यह बदलाव केवल आंकड़ों में नहीं था।
यह बदलाव था—
सोच का।
सपनों का।
परिवारों की प्राथमिकताओं का।
और एक पूरे क्षेत्र की मानसिकता का।
महेंद्रगढ़ के हजारों अभिभावकों को यह विश्वास मिला कि उनका बच्चा भी बड़े शहरों के बच्चों की तरह बड़े सपने देख सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है।
यही किसी शिक्षाविद् की सबसे बड़ी सफलता होती है।
ओ.पी. बाऊ जी ने सिर्फ स्कूल नहीं बनाया, एक शैक्षणिक संस्कृति बनाई
किसी संस्था की इमारत खड़ी करना आसान हो सकता है, लेकिन उस संस्था को एक विचार बनाना आसान नहीं होता।
ओ.पी. बाऊ जी ने शिक्षा को महेंद्रगढ़ के सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाने की दिशा में काम किया।
उनका प्रयास केवल अपने संस्थान तक सीमित नहीं रहा।
उन्होंने क्षेत्र में शिक्षा के प्रति ऐसी ललक पैदा की, जिसने दूसरे लोगों को भी आगे आने और बेहतर शैक्षणिक वातावरण बनाने के लिए प्रेरित किया।
आज महेंद्रगढ़ को शिक्षा के क्षेत्र में जिस पहचान से देखा जाता है, उसमें ऐसे दूरदर्शी प्रयासों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
और फिर महिला सशक्तिकरण की एक अनोखी मिसाल…
ओ.पी. बाऊ जी की सोच केवल शिक्षा तक सीमित नहीं थी।
उनके व्यक्तित्व का एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष था—महिलाओं के प्रति विश्वास और उन्हें नेतृत्व देने की सोच।
जब आरपीएस संस्था की स्थापना हुई, तब उन्होंने परंपरागत सोच से आगे बढ़कर अपनी बड़ी पुत्रवधू डॉ. पवित्र यादव को संस्था की चेयरपर्सन की जिम्मेदारी सौंपी।
यह फैसला अपने आप में एक संदेश था।
एक ऐसे समय में, जब बहुत से परिवारों में महिलाओं की भूमिका को परिवार की सीमाओं तक देखा जाता था, तब ओ.पी. बाऊ जी ने उन्हें निर्णय लेने और नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी।
यह सिर्फ किसी पद पर नियुक्ति नहीं थी।
यह विश्वास था।
यह अवसर था।
और यह समाज के सामने एक संदेश था कि बेटियां और बहुएं केवल घर संभालने के लिए नहीं, संस्थाएं और भविष्य संभालने के लिए भी सक्षम हैं।
कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन उनके विचार नहीं जाते
ओ.पी. बाऊ जी आज हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन किसी व्यक्ति की वास्तविक मृत्यु तब नहीं होती, जब उसकी सांसें थम जाती हैं।
वह तब होता है, जब उसके विचार समाप्त हो जाते हैं।
ओ.पी. बाऊ जी के विचार आज भी हजारों विद्यार्थियों की आंखों में दिखाई देते हैं।
किसी डॉक्टर की सफलता में,
किसी इंजीनियर की उपलब्धि में,
किसी अधिकारी की जिम्मेदारी में,
किसी बेटी के आत्मविश्वास में,
किसी अभिभावक के बड़े सपने में…
कहीं न कहीं उस सोच की झलक दिखाई देती है, जिसने कहा था—
“महेंद्रगढ़ के बच्चे किसी से कम नहीं हैं।”
उन्होंने शायद सिर्फ एक संस्था की नींव रखी थी, लेकिन उस नींव पर हजारों परिवारों के भविष्य खड़े हुए।
हीरे की खेती करने वाला माली…
महेंद्रगढ़ की धरती पर अगर शिक्षा के क्षेत्र में हुए बदलाव को किसी रूपक में समझना हो तो ओ.पी. बाऊ जी को एक माली कहा जा सकता है।
उन्होंने बीज बोए।
बच्चों में सपनों के बीज।
परिवारों में शिक्षा का विश्वास।
समाज में जागरूकता का बीज।
और बेटियों में नेतृत्व का आत्मविश्वास।
समय के साथ ये बीज पौधे बने…
पौधे पेड़ बने…
और उन पेड़ों पर हजारों ‘हीरे’ चमकने लगे।
आज वे स्वयं हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी लगाई हुई वह बगिया लगातार फल-फूल रही है।
पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन
आज ओ.पी. बाऊ जी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं है।
यह उस सोच को नमन है, जिसने महेंद्रगढ़ के युवाओं को बड़े सपने देखना सिखाया।
यह उस दूरदृष्टि को नमन है, जिसने शिक्षा को परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार माना।
यह उस विश्वास को नमन है, जिसने महिलाओं को नेतृत्व की जिम्मेदारी देने में संकोच नहीं किया।
और यह उस कर्मयोगी को नमन है, जिसने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा दूसरों के भविष्य को संवारने में लगा दिया।
हेलो नारनौल की पूरी टीम की ओर से महान शिक्षाविद्, दूरदर्शी समाजसेवी एवं प्रेरणादायी व्यक्तित्व श्री ओम प्रकाश यादव ‘ओ.पी. बाऊ जी’ की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
**“इंसान चला जाता है…
लेकिन उसके द्वारा रोशन किए गए रास्ते पीढ़ियों तक उजाला करते रहते हैं।”**