Jha's Physics Centre Madhubani

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jha's physics centre
for iit- jee & neet special

27/08/2023

My lovely daughter

26/10/2019

Hearty greetings to all of you from R.K JHA on Deepavali and Chhath festival.
jha's physics center

26/10/2019

करते हैं फरमाईशे पुरी और अपने जरूरतों का जिक्र तक नही करते
यह लड़के ही है जनाब जो उठाए रखते हैं जिम्मेदारीयां कंधों पर
और उफ़ तक नही करते ।
यूं तो दिल में समंदर भरा है इनके पर आंखें कभी नम नहीं होती
और जितना सोचते हैं हम लड़कों की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती ।
घर में बड़े हो या छोटे कंधे हमेशा जिम्मेदारियों से भरे होते हैं
अपने ही परिवार के खातिर अपने से ही दूर रहते हैं
और घर वाले परेशान ना हो इसलिए फोन पर हर बार मैं ठीक हूं ही कहते हैं ।
लड़की की विदाई में तो जमाना रोता है
पर इनके घर छोड़ जाने की चर्चा कोई खास नहीं होती
और जितना सोचते हैं हम लड़कों की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती ।
मां की लाडले लड़के हैं बेशक पर अपनी अलग पहचान बनानी पड़ती है
एक नौकरी की खातिर सैकड़ों ठोकरें खानी पड़ती है
कभी हर बात में सैकड़ों नखरे होते थे जिनके
बाहर रहकर सारी फरमाइश से भुलानी पड़ती है
कुछ लड़कों को जिम्मेदारियां जगाए रखती है और कुछ को सोने नहीं देती
और जितना सोचते हैं हम इनकी जिंदगी इतनी आसान नहीं होती
एक वक्त वह भी आता है जब इन्हें प्यार होता है
और एक तरफ प्यार तो दूसरी तरफ परिवार होता है
प्यार को चुने तो घर वाले नाराज
और परिवार को चुने तो सर पर बेवफ़ाई का ताज होता है
किसी भी हालत में उनकी उलझने कम नहीं होती
और जितना सोचते हैं हम लड़कों की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती ।
किसी भी हाल में शांत रहने का हुनर उनमें कमाल होता है
चीजों को सोचने और समझने का नजरिया भी कमाल होता है ।
छोटी-छोटी बातों पर यह अपना धीरज नहीं खोते
पर इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें दर्द नहीं होता या इनके जज्बात नहीं होते परेशानियां तो इनके राहों में भी आती है
पर उससे उनकी हिम्मत कभी कम नहीं होती
और जितना सोचते हैं लोग लड़कों की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती ।
यारों के ये यार कहलाते है और निभाते हैं साथ तब भी जब सब साथ छोड़ जाते है और घर में जिनकी पापा के सामने जुबान नहीं खुलती
वह बाहर आंखें चार कर लेते हैं
पर जितना सोचते है हम लड़कों की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती ।
Jha's physics centre
Add:- BABU SAHEB CHOWK ( Near central public school )

28/06/2019

*एक नसीहत*

ट्रेन में एक 18-19 वर्षीय खूबसूरत लड़की चढ़ी जिसका सामने वाली बर्थ पर रिजर्वेशन था ..
उसके पापा उसे छोड़ने आये थे। .
अपनी सीट पर बैठ जाने के बाद उसने अपने पिता से कहा "डैडी आप जाइये अब, ट्रेन तो दस मिनट खड़ी रहेगी यहाँ दस मिनट
का स्टॉपेज है।" .
उसके पिता ने उदासी भरे शब्दों के साथ कहा "कोई बात नहीं बेटा, 10 मिनट और तेरे साथ बिता लूँगा, अब तो तुम्हारे क्लासेज शुरू हो रहे हैं काफी दिन बाद आओगी तुम।"

लड़की शायद अध्ययन कर रही होगी, क्योंकि उम्र और वेशभूषा से विवाहित नहीं लग रही थी ।
ट्रेन चलने लगी तो उसने खिड़की से बाहर प्लेटफार्म पर खड़े पिता को हाथ हिलाकर बाय कहा :-
"बाय डैडी.... अरे ये क्या हुआ आपको !
अरे नहीं प्लीज"
पिता की आँखों में आंसू थे।

ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ती जा रही थी और पिता रुमाल से आंसू पोंछते हुए स्टेशन से बाहर जा रहे थे।

लड़की ने फोन लगाया..
"हेलो मम्मी.. ये क्या है यार!
जैसे ही ट्रेन स्टार्ट हुई, डैडी तो रोने लग गये..

अब मैं नेक्स्ट टाइम कभी भी उनको सी-ऑफ के लिए नहीं कहूँगी.
भले अकेली आ जाउंगी ऑटो से..
अच्छा बाय..
पहुंचते ही कॉल करुँगी.
डैडी का ख्याल रखना ओके।" .
मैं कुछ देर तक लड़की को सिर्फ इस आशा से देखता रहा
कि पारदर्शी चश्मे से झांकती उन आँखों से मुझे अश्रुधारा दिख जाए पर मुझे निराशा ही हाथ लगी.
उन आँखों में नमी भी नहीं थी।

कुछ देर बाद लड़की ने फिर किसी को फोन
लगाया- "हेलो जानू कैसे हो.... मैं ट्रेन में बैठ गई हूँ..
हाँ अभी चली है यहाँ से,
कल अर्ली-मोर्निंग पहुँच जाउंगी.. लेने आ जाना.
लव यू टू यार,
मैंने भी बहुत मिस किया तुम्हे.. बस कुछ घंटे और सब्र कर लो कल तो पहुँच
ही जाऊँगी।"

मैं मानता हूँ दोस्तों...कि
आज के युग में बच्चों को उच्च शिक्षा हेतु बाहर भेजना आवश्यक है पर इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि इसके कई दुष्परिणाम भी हैं।

मैं यह नहीं कह रहा कि बाहर पढने वाले सारे लड़के लड़कियां ऐंसे होते हैं। मैं सिर्फ उनकी बात कर रहा हूँ जो पाश्चात्य
संस्कृति की इस हवा में अपने कदम बहकने से नहीं रोक पाते

और उनको माता-पिता, भाई- बहन किसी का प्यार याद नहीं रह जाता सिर्फ एक प्यार ही याद रहता है!!!

वो ये भी भूल जाते हैं कि उनके माता-पिता ने कैसे-कैसे साधनों को जुटा कर और किन सपनों को संजो कर अपने दिल के टुकड़े को अपने से दूर पढने भेजा है।

लेकिन बच्चे के कदम बहकने से उसका परिणाम क्या होता है??
वो ये नहीं जानते हैं.,

इसलिये सभी से रिक्वेस्ट है
वो अपने माता पिता के जज्बातों के साथ खिलवाड़ नहीं करें.!!
खासकर लड़कियां... क्योंकि लड़की की अपनी इज्जत के साथ सारे परिवार की इज्जत जुडी होती है..||

19/05/2019
Photos from Jha's Physics Centre Madhubani's post 05/05/2019
24/04/2019

एक एसडीएम की कहानी --
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आज स्कूल में शहर की महिला SDM आने वाली थी क्लास की सारी लड़कियां ख़ुशी के मारे फूले नहीं समां रही थी ...सबकी बातों में सिर्फ एक ही बात थी SDM .. और हो भी क्यों न आखिर वो भी एक लड़की थी ....पर एक ओर जब सब लड़कियां व्यस्त थी SDM की चर्चाओं में ....एक लड़की सीट की लास्ट बेंच पर बैठी पेन और उसके कैप से खेल रही थी ...उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था कौन आ रहा है और क्यों आ रहा है ? .वो अपने में मस्त थी ....वो लड़की थी आरुषि ...!!! आरुषि पास के ही एक गांव के एक किसान की एकलौती बेटी थी .....स्कूल और उसके घर का फासला लगभग 10 किलोमीटर का था जिसे वो साइकिल से तय करती थी .....स्कूल में बाकि की सहेलियां उससे इसलिए ज्यादा नहीं जुड़कर रहती थी क्योंकि वो उनकी तरह रईस नहीं थी लेकिन इसमें उसका क्या दोष था ...?...... खैर उसकी जिंदगी सेट कर दी गयी थी इंटरमीडिएट के बाद उसे आगे नहीं पढ़ा सकते थे ....क्योंकि उसके पापा पैसा सिर्फ एक जगह लगा सकते थे या शादी में और या तो आगे की पढाई में ....उसके परिवार में कोई भी मैट्रिक से ज्यादा पढ़ा नहीं था .... बस यही रोड मैप उसके आँखों के सामने हमेशा घूमता रहता कि ये क्लास उसकी अंतिम क्लास है और इसके बाद उसकी शादी कर दी जाएगी .....इसीलिए वो आगे सपने ही नहीं देखती थी और इसीलिए उस दिन एसडीएम के आने का उसपर कोई फर्क नहीं पड़ा ......ठीक 12 बजे SDM उनके स्कूल में आयी .... यही कोई 24 -25 की साल की लड़की ..नीली बत्ती की अम्बेसडर गाड़ी और साथ में 4 पुलिसवाले .....2 घंटे के कार्यक्रम के बाद एसडीएम चली गयी ....लेकिन आरुषि के दिल में बहुत बड़ी उम्मीद छोड़कर गयी ...उसे अपनी जिंदगी से अब प्यार हो रहा था .....जैसे उसके सपने अब आज़ाद होना चाहते हो ...!!
उस रात आरुषि सो नहीं पायी ....स्कूल में भी उसी उलझन में लगी रही ....क्या करूँ ? .... वो अब उड़ना चाहती थी फिर अचानक पापा की गरीबी उसके सपनो और मंजिलो के बीच में आकर खड़ी हो जाती ......वो घर वापस गयी और रात खाने के वक़्त सब माँ और पापा को बता डाला ......पापा ने उसे गले से लगा लिया ....उनके पास छोटी सी जमीन का एक टुकड़ा था ...कीमत यही 50000 रुपये की होगी .....आरुषि की शादी के लिए उसे डाल रखा था .....पापा ने कहा की मैं सिर्फ एक ही चीज पूरी कर सकता हूँ .. .. तेरी शादी के लिए हो या तेरे सपने ......आरुषि अपने सपनों पर दांव खेलने को तैयार हो गयी ....... इंटरमीडिएट के बाद उसके बीए में दाखिला लिया ...क्योंकि ग्रेजुएशन में इसकी फीस सबसे सस्ती थी .... पैसे का इंतेजाम पापा ने किसी से मांग कर कर दिया .... पर ये उसकी मंजिल नहीं थी उसकी मंजिल तो कही और थी ....उसने तैयारी शुरू की .....सबसे बड़ी समस्या आती किताबों की .... तो उसके लिए नुक्कड़ की एक पुरानी दुकान का सहारा लिया ..जहाँ पुरानी किताबे बेचीं या खरीदी जाती थी ..ये पुरानी किताबें उसे आधी कीमत में मिल जाती थी ...वो एक किताब खरीदकर लाती और पढ़ने के बाद उसे बेचकर दूसरी किताब ....."" कहते हैं न कि जब परिंदों के हौसलों में शिद्दत होती है तो आसमान भी अपना कद झुकाने लगता है "" ....आरुषि की लगन को देखकर उस दुकान वाले अंकल ने उसे किताबे फ्री में देनी शुरू की और कुछ किताबें तो खुद नयी खरीदकर दे देते और कहते कि बिटिया जब बन जाना तो सूद समेत वापस कर देना "" कुछ भी हो आरुषि इस यकीन को नहीं तोडना चाहती थी ..... ग्रेजुएशन के 2 साल पूरे हो गए .....और उसकी तैयारी लगातार चलती रही ..... सब ठीक चल रहा था कि अचानक उसके माँ की तबियत ख़राब हो गयी ....इलाज के लिए पैसे की जरुरत थी लेकिन पहले से की घर क़र्ज़ में डूब चूका था .....अंत में पापा ने जमीन गिरवी रख दी .... और इसी बीच उसने ग्रेजुएशन के तीसरे वर्ष में दाखिला लिया .... समस्याएं दामन नहीं छोड़ रही थी .... आरुषि कब तक अपने हौसलो को मजबूत बनाने की कोशिस करती आख़िरकार एक दिन मां से लिपटकर वो बहुत रोई ..और एक ही बात पूछी """ मां हमारे कभी अच्छे दिन नहीं आएंगे ? .""" . .... मां ने उसे साहस दिया ..और फिर से उसने कोशिस की ..!! ..कहते हैं न कि योद्धा कभी पराजित नहीं होते ...या तो विजयी होते हैं और या तो वीरगति को प्राप्त होते हैं ........!! ....23 जून हाँ ये वही दिन था जब आरुषि ने प्रारंभिक परीक्षा पास की थी ..अब बारी मुख्य परीक्षा की थी .और आरुषि के हौसले अब सातवें आसमान को छू रहे थे ...... तीन वर्ष की लगातार कठिन परिश्रम का फल था की आरुषि ने मुख्य परीक्षा भी पास कर ली ........अब वो अपने सपने से सिर्फ एक कदम दूर खड़ी थी ...... पीछे मुड़कर देखती तो उसे सिर्फ तीन लोग ही नजर आते ..माँ , पापा और दुकान वाले अंकल ......आख़िरकार इंटरव्यू हुआ .....और अंतिम परिणाम में आरुषि ने सफलता हासिल की ....आरुषि को जैसे यकीन नहीं हो रहा था की हाँ ये वही आरुषि है ..... माँ , पापा तो अपने आंसुओं के सैलाब को रोक नहीं पा रहे थे .... आरुषि अपने घर से तेजी से निकल गयी ... उन्ही आंसुओं के साथ आखिर किसी और को भी तो उसे धन्यवाद देना था ....सीधे जाकर दुकान वाले अंकल के पास रुकी .....अंकल ने उसे गले से लगा लिया और खुद भी छलक गए !!
असल में ये जीत सिर्फ आरुषि की जीत नहीं थी .इस जीत में शामिल थी माँ की ममता ..पिता के हौसले और दुकान वाले अंकल का यकीन ..!!

24/04/2019

Jha's physics centre.
Add.:- Main gate B.N JHA colony, Madhubani ( Bihar )

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम): इतिहास और कार्यप्रणाली

भारत में ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल 1982 में केरल के 70-पारुर विधानसभा क्षेत्र में किया गया था जबकि 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद से भारत में प्रत्येक लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन द्वारा ही संपन्न होती है. एक पायलट परियोजना के तौर पर 2014 के लोकसभा चुनाव में 543 में से 8 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता-सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रायल (वीवीपीएटी) प्रणाली वाले ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था.

सर्वप्रथम जानते हैं कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इतिहास क्या है?

पहले भारतीय ईवीएम का आविष्कार 1980 में “एम बी हनीफा” के द्वारा किया गया था जिसे उसने “इलेक्ट्रॉनिक संचालित मतगणना मशीन" के नाम से 15 अक्तूबर 1980 को पंजीकृत करवाया था। एकीकृत सर्किट का उपयोग कर “एम बी हनीफा” द्वारा बनाये गये मूल डिजाइन को तमिलनाडु के छह शहरों में आयोजित सरकारी प्रदर्शनियों में जनता के लिए प्रदर्शित किया गया था।

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 1989 में “इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड” के सहयोग से भारत में ईवीएम बनाने की शुरूआत की गई थी। ईवीएम के औद्योगिक डिजाइनर “औद्योगिक डिजाइन सेंटर, आईआईटी बॉम्बे” के संकाय सदस्य (faculty members) थे।

जानिये कैसे तय होता है कि लोक सभा में कौन सांसद कहाँ बैठेगा?

ईवीएम की संरचना और तकनीक

एक ईवीएम में दो भाग होते हैं- नियंत्रण इकाई और मतदान इकाई। दोनों भाग एक पांच मीटर लंबे केबल से जुड़े होते हैं। नियंत्रण इकाई, “पीठासीन अधिकारी” या “मतदानअधिकारी” के पास रहता है जबकि मतदान इकाई को मतदान कक्ष के अंदर रखा जाता है। मतदाता को मतपत्र जारी करने के बजाय नियंत्रण इकाई के पास बैठा अधिकारी मतदान बटन (Ballot Button) को दबाता है। जिसके बाद मतदाता “मतदान इकाई” पर अपने पसन्द के उम्मीदवार के नाम और चुनाव चिह्न के सामने अंकित नीले बटन को दबाकर मतदान करता है।

ईवीएम में नियंत्रक के रूप में स्थायी रूप से सिलिकन से बने “ऑपरेटिंग प्रोग्राम” का इस्तेमाल किया जाता है। एक बार नियंत्रक का निर्माण हो जाने के बाद निर्माता सहित कोई भी इसमें बदलाव नहीं कर सकता है।

ईवीएम 6 वोल्ट के एक साधारण बैटरी से चलता है जिसका निर्माण “भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बंगलौर” और “इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद” द्वारा किया जाता है। चूंकि यह बैटरी से चलता है जिसके कारण इसे पूरे भारत में आसानी से उपयोग में लाया जाता है, साथ ही कम वोल्टेज के कारण ईवीएम से किसी भी मतदाता को बिजली का झटका लगने का भी डर नहीं रहता है।

एक ईवीएम में अधिकतम 3840 मतों को रिकॉर्ड किया जा सकता है और एक ईवीएम में अधिकतम 64 उम्मीदवारों के नाम अंकित किए जा सकते हैं। एक “मतदान इकाई” (Ballot Unit) में 16 उम्मीदवारों का नाम अंकित रहता है और एक ईवीएम में ऐसे 4 इकाइयों को जोड़ा जा सकता है। यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में 64 से अधिक उम्मीदवार होते हैं तो मतदान के लिए पारंपरिक “मतपत्र या बॉक्स विधि” का प्रयोग किया जाता है।

ईवीएम मशीन के बटन को बार-बार दबाकर एक बार से अधिक वोट करना संभव नहीं है, क्योंकि मतदान इकाई में किसी उम्मीदवार के नाम के आगे अंकित बटन को एक बार दबाने के बाद मशीन बंद हो जाती है।

यदि कोई व्यक्ति एक साथ दो बटन दबाता है तो उसका मतदान दर्ज नहीं होता है। इस प्रकार ईवीएम मशीन "एक व्यक्ति, एक वोट” के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है।

नोट: हाल ही में निर्वाचन आयोग ने घोषणा की है कि आगामीपांच राज्यों में होनेवाले चुनाव में पहली बार “मतदान इकाई” परउम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न के अलावा उनके फोटो भीअंकित रहेंगें।

भारत के प्रधानमंत्री से मिलने के लिए अपॉइंटमेंट कैसे लें

ईवीएम के प्रयोग के फायदे

1. वर्तमान में एक M3 EVM की लागत 17 हजार रुपये के लगभग आती है लेकिन भविष्य में इस निवेश के माध्यम से मतपत्र की छपाई, उसके परिवहन और भंडारण तथा इनकी गिनती के लिए कर्मचारियों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक के रूप में खर्च होने वाले लाखों रूपए की बचत की जा सकती है।

2. एक अनुमान के मुताबिक ईवीएम मशीन के प्रयोग के कारण भारत में एक राष्ट्रीय चुनाव में लगभग 10,000 टन मतपत्रबचाया जाता है।

3. ईवीएम मशीनों को मतपेटियों की तुलना में आसानी से एक जगह से दूसरे जगह ले जाया जाता है, क्योंकि यह हल्का और पोर्टेबल होता है।

4. ईवीएम मशीनों के द्वारा मतगणना तेजी से होती है।

5. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि निरक्षर लोगों को भी मतपत्र प्रणाली की तुलना में ईवीएम मशीन के द्वारा मतदान करने में आसानी होती है।

6. ईवीएम मशीनों के द्वारा चूंकि एक ही बार मत डाला जा सकता है अतः फर्जी मतदान में बहुत कमी दर्ज की गई है।

7. मतदान होने के बाद ईवीएम मशीन की मेमोरी में स्वतः ही परिणाम स्टोर हो जाते हैं।

8. ईवीएम का “नियंत्रण इकाई” मतदान के परिणाम को दस साल से भी अधिक समय तक अपनी मेमोरी में सुरक्षित रख सकता है।

9. ईवीएम मशीन में केवल मतदान और मतगणना के समय में मशीनों को सक्रिय करने के लिए केवल बैटरी की आवश्यकता होती है और जैसे ही मतदान खत्म हो जाता है तो बैटरी को बंद कर दिया जाता है।

10. एक भारतीय ईवीएम को लगभग 15 साल तक उपयोग में लाया जा सकता है।

भारतीय निर्वाचन आयोग

ईवीएम को बंद करने की प्रक्रिया

आखिरी मतदाता द्वारा वोट डालने के पश्चात् “नियंत्रण इकाई” (Control Unit) का प्रभारी इसके “बंद (close)” बटन को दबा देता है। इसके बाद ईवीएम में कोई भी वोट दर्ज नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, चुनाव की समाप्ति के बाद “मतदान इकाई” को “नियंत्रण इकाई” से अलग कर दिया जाता है। मतगणना के दौरान परिणाम (Result) बटन दबाने पर परिणाम प्रदर्शित होता है

मतदान के बाद ईवीएम को सुरक्षित रखने के इंतज़ाम

मतदान से पहले और मतदान के बाद प्रत्येक ईवीएम मशीन को कड़ी निगरानी में रखा जाता है। वोट डलने के बाद शाम को कई लोगों की मौजूदगी में मतदान अधिकारी इस मशीन को सील बंद करता है। हर ईवीएम मशीन को एक खास कागज से सील किया जाता है। ये कागज भी करंसी नोट की तरह ही खास तौर पर बने होते हैं। करंसी नोट की ही तरह हर कागज़ के ऊपर एक खास नंबर होता है। कागजों से सील करने के बाद हर मशीन के परिणाम वाले हिस्से में स्थित छेद को धागे के मदद से बंद किया जाता है और उसके बाद उसे कागज और गर्म लाख से एक खास पीतल की सील लगा कर बंद किया जाता है।

सील करने के बाद हर ईवीएम मशीन को किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की तरह की सुरक्षा के घेरे में मतगणना केन्द्र तक लाया जाता है। मतगणना केन्द्रों पर हर मशीन को मतगणना तिथि तक कड़े पहरे में रखा जाता है।

भारत द्वारा ईवीएम मशीन का निर्यात किन-किन देशों कोकिया गया है?

भारत द्वारा नेपाल, भूटान, नामीबिया, फिजी और केन्या जैसे देशों ने ईवीएम मशीन का निर्यात किया गया है। नामीबिया द्वारा 2014 में संपन्न राष्ट्रपति चुनावों के लिए भारत में निर्मित 1700 “नियंत्रण इकाई” और 3500 “मतदान इकाई” का आयात किया गया था। इसके अलावा कई अन्य एशियाई और अफ्रीकी देश भारतीय ईवीएम मशीनों की खरीद में रूचि दिखा रहे हैं।

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